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कंपनी अधिनियम की धारा 8| Companies Act Section 8

कंपनी अधिनियम Companies Act (Companies Act Section-8 in Hindi) के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। कंपनी अधिनियम की धारा 8 के अनुसारकेन्द्रीय सरकार उस व्यक्ति या व्यक्ति-संगम को, ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, और ऐसी शर्तों पर जो वह ठीक समझे जारी की गई अनुज्ञप्ति द्वारा उसके नाम में, यथास्थिति, “लिमिटेड” शब्द या “प्राइवेट लिमिटेड” शब्द जोड़े बिना, इस धारा के अधीन लिमिटेड कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए अनुज्ञात कर सकेगी और तदुपरि रजिस्ट्रार विहित प्ररूप में आवेदन किए जाने पर, ऐसे व्यक्ति या व्यक्ति-संगम को इस धारा के अधीन कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत करता है, जिसे Companies Act Section-8 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

कंपनी अधिनियम की धारा 8 (Companies Act Section-8) का विवरण

कंपनी अधिनियम की धारा 8 Companies Act Section-8 के अनुसार केन्द्रीय सरकार उस व्यक्ति या व्यक्ति-संगम को, ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, और ऐसी शर्तों पर जो वह ठीक समझे जारी की गई अनुज्ञप्ति द्वारा उसके नाम में, यथास्थिति, “लिमिटेड” शब्द या “प्राइवेट लिमिटेड” शब्द जोड़े बिना, इस धारा के अधीन लिमिटेड कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए अनुज्ञात कर सकेगी और तदुपरि रजिस्ट्रार विहित प्ररूप में आवेदन किए जाने पर, ऐसे व्यक्ति या व्यक्ति-संगम को इस धारा के अधीन कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत करता है।

कंपनी अधिनियम की धारा 8 (Companies Act Section-8 in Hindi)

पुर्त उदेश्यो आदि वाली कंपनियों का बनाया जाना

(1) जहां, केन्द्रीय सरकार के समाधानप्रद रूप में यह साबित हो जाता है कि इस अधिनियम के अधीन लिमिटेड कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए प्रस्तावित किसी व्यक्ति या किसी व्यक्ति-संगम का

(क) उद्देश्य वाणिज्य, कला, विज्ञान, खेलकूद, शिक्षा, अनुसंधान, समाज कल्याण, धर्म, पूर्त, पर्यावरण का संरक्षण या किसी ऐसे अन्य उद्देश्य का संवर्धन करना है:

(ख) अपने लाभों को, यदि कोई हों, या अन्य आय को अपने उद्देश्यों के संवर्धन में लगाने का आशय है; और

(ग) अपने सदस्यों के किसी लाभांश के संदाय को प्रतिषिद्ध करने का आशय है,

वहां केन्द्रीय सरकार उस व्यक्ति या व्यक्ति-संगम को, ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, और ऐसी शर्तों पर जो वह ठीक समझे जारी की गई अनुज्ञप्ति द्वारा उसके नाम में, यथास्थिति, “लिमिटेड” शब्द या “प्राइवेट लिमिटेड” शब्द जोड़े बिना, इस धारा के अधीन लिमिटेड कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए अनुज्ञात कर सकेगी और तदुपरि रजिस्ट्रार विहित प्ररूप में आवेदन किए जाने पर, ऐसे व्यक्ति या व्यक्ति-संगम को इस धारा के अधीन कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत करेगा ।

(2) इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत कंपनी, सभी विशेषाधिकारों का उपभोग करेगी और लिमिटेड कंपनियों की सभी बाध्यताओं के अधीन होगी।

(3) कोई फर्म, इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत कंपनी की सदस्य हो सकेगी ।

(4) (i) इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई कंपनी, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के सिवाय, अपने ज्ञापन या अनुच्छेदों के उपबंधों में परिवर्तन नहीं करेगी ।

(ii) इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई कंपनी ऐसी शर्तों का, जो विहित की जाएं. पालन करने के पश्चात् ही, किसी अन्य प्रकार की कंपनी में स्वयं को संपरिवर्तित कर सकेगी।

(5) जहां, केन्द्रीय सरकार के समाधानप्रद रूप में यह साबित हो जाता है कि इस अधिनियम के अधीन या किसी पूर्व कंपनी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई लिमिटेड

कंपनी, उपधारा (1) के खंड (क) में विनिर्दिष्ट किन्हीं उद्देश्यों और उस उपधारा के क्रमशः खंड (ख) और खंड (ग) में यथावर्णित निबंधनों और प्रतिषेधों सहित बनाई गई है, वहां वह अनुज्ञप्ति द्वारा, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो केंद्रीय सरकार ठीक समझे, इस धारा के अधीन कंपनी को रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए और इसके नाम से, यथास्थिति, “लिमिटेड” शब्द या “प्राइवेट लिमिटेड” शब्दों का लोप करके अपने नाम में परिवर्तन करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगी और तदुपरि, रजिस्ट्रार विहित प्ररूप में आवेदन किए जाने पर इस धारा के अधीन ऐसी कंपनी को रजिस्ट्रीकृत करेगा तथा इस धारा के सभी उपबंध उस कंपनी को लागू होंगे।

(6) केन्द्रीय सरकार, इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी कंपनी को अनुदत्त अनुज्ञप्ति को आदेश द्वारा प्रतिसंहृत कर सकेगी, यदि कंपनी इस धारा की किन्हीं अपेक्षाओं या ऐसी किन्हीं शर्तों का, जिनके अधीन रहते हुए कोई अनुज्ञप्ति जारी की गई है, उल्लंघन करती है, या कंपनी का कामकाज कपटपूर्ण रूप से या ऐसी रीति से, जो कंपनी के उद्देश्यों का अतिक्रमण करती है या लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली है, संचालित किया जाता है और इस अधिनियम के अधीन कंपनी के विरुद्ध किसी अन्य कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना कंपनी को अपनी प्रास्थिति में संपरिवर्तन करने और अपने नाम में, यथास्थिति, “लिमिटेड” शब्द या “प्राइवेट लिमिटेड” शब्दों को जोड़कर परिवर्तन करने का निदेश दे सकेगी और तदुपरि रजिस्ट्रार, किसी ऐसी कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जो उपधारा (7) के अधीन की जा सके, विहित प्ररूप में आवेदन करने पर कंपनी को तद्नुसार रजिस्ट्रीकृत कर सकेगा :

परंतु ऐसा कोई आदेश, तभी किया जाएगा, जब कंपनी को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया हो :

परंतु यह और कि ऐसे प्रत्येक आदेश की एक प्रति रजिस्ट्रार को दी जाएगी ।

(7) जहां उपधारा (6) के अधीन कोई अनुज्ञप्ति प्रतिसंहृत की जाती है, वहां केन्द्रीय सरकार यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि लोकहित में यह आवश्यक है तो यह निदेश दे सकेगी कि कंपनी का इस अधिनियम के अधीन परिसमापन किया जाए या इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी अन्य कंपनी के साथ समामेलन किया जाए :

परन्तु ऐसा कोई आदेश, तभी किया जाएगा, जब कंपनी को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया हो ।

(8) जहां उपधारा (6) के अधीन कोई अनुज्ञप्ति प्रतिसंहृत की जाती है और जहां केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि लोकहित. में यह आवश्यक है कि इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत कंपनी को इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत और समान उद्देश्यों वाली किसी अन्य कंपनी के साथ समामेलित किया जाना चाहिए तो इस अधिनियम में प्रतिकुल किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा, ऐसे गठन, संपत्तियों, शक्तियों, अधिकारों, हित, प्राधिकारों और विशेषाधिकारों सहित, तथा ऐसे दायित्वों, कर्तव्यों और बाध्यताओं सहित, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, किसी एकल कंपनी को बनाए जाने के लिए ऐसे समामेलन का उपबंध कर सकेगी।

(9) यदि, इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी कंपनी के परिसमापन या विघटन पर उसके ऋणों और दायित्वों के समाधान के पश्चात् कोई आस्ति शेष रहती है तो उसे इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत और समान उद्देश्यों वाली किसी अन्य कंपनी को, ऐसी

शर्तो के अधीन रहते हए, जो अधिकरण अधिरोपित करे अंतरित किया जा सकेगा या उनका विक्रय किया जा सकेगा और उनके आगमों को धारा 269 के अधीन विरचित, पुनर्वास और दिवाला निधि में जमा किया जा सकेगा ।

(10) इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत कंपनी को केवल इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत और समान उद्देश्यों वाली किसी अन्य कंपनी के साथ ही समामेलित किया जाएगा।

(11) यदि कोई कंपनी इस धारा में अधिकथित किसी अपेक्षा का अनुपालन करने में कोई व्यतिक्रम करती है तो, कंपनी, इस धारा के उपबंधों के अधीन किसी अन्य कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे जुर्माने से, जो दस लाख रुपए से कम का नहीं होगा, किंतु जो एक करोड़ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगी और कंपनी के निदेशक और वह प्रत्येक ऐसा अधिकारी, जो व्यतिक्रमी है, कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो पच्चीस हजार रुपए से कम का नहीं होगा, किन्तु जो पच्चीस लाख रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दंडनीय होगा:

परन्तु जब यह साबित हो जाता है कि कंपनी के कामकाज का संचालन, कपटपूर्वक किया गया था, तब प्रत्येक व्यतिक्रमी अधिकारी, धारा 447 के अधीन कार्रवाई के लिए दायी होगा।

Companies Act Section-8 (Company Act Section-8 in English)

Formulation of companies with charitable objects, etc

(1) Where it is proved to the  satisfaction of the Central Government that a person or an association of persons proposed to be  registered under this Act as a limited company— 

(a) has in its objects the promotion of commerce, art, science, sports, education, research, social  welfare, religion, charity, protection of the environment, or any such other object; 

(b) intends to apply its profits, if any, or other income in promoting its objects; and (c) intends to prohibit the payment of any dividend to its members, 

the Central Government may, by license issued in such manner as may be prescribed, and on such conditions as it deems fit, allow that person or association of persons to be registered as a limited company under this section without the addition to its name of the word ―Limited‖, or as the case may be,  the words ―Private Limited‖, and thereupon the Registrar shall, on application, in the prescribed form,  register such person or association of persons as a company under this section. 

(2) The company registered under this section shall enjoy all the privileges and be subject to all the obligations of limited companies. 

(3) A firm may be a member of the company registered under this section. 

(4) (i) A company registered under this section shall not alter the provisions of its memorandum or articles except with the previous approval of the Central Government. 

(ii) A company registered under this section may convert itself into a company of any other kind only after complying with such conditions as may be prescribed. 

(5) Where it is proved to the satisfaction of the Central Government that a limited company registered under this Act or under any previous company law has been formed with any of the objects specified in clause (a) of sub-section (1) and with the restrictions and prohibitions as mentioned respectively in clauses (b) and (c) of that sub-section, it may, by license, allow the company to be registered under this section subject to such conditions as the Central Government deems fit and to change its name by omitting the word ―Limited‖, or as the case may be, the words ―Private Limited‖ from its name and thereupon the Registrar shall, on application, in the prescribed form, register such company under this section and all the provisions of this section shall apply to that company. 

(6) The Central Government may, by order, revoke the license granted to a company registered under  this section if the company contravenes any of the requirements of this section or any of the conditions  subject to which a license is issued or the affairs of the company are conducted fraudulently or in a  manner violative of the objects of the company or prejudicial to the public interest, and without prejudice to  any other action against the company under this Act, direct the company to convert its status and change  its name to add the word ―Limited‖ or the words Private Limited‖, as the case may be, to its name and 

thereupon the Registrar shall, without prejudice to any action that may be taken under sub-section (7), on application, in the prescribed form, register the company accordingly: 

Provided that no such order shall be made unless the company is given a reasonable opportunity of  being heard: 

Provided further that a copy of every such order shall be given to the Registrar. 

(7) Where a license is revoked under sub-section (6), the Central Government may, by order, if it is  satisfied that it is essential in the public interest, direct that the company be wound up under this Act or  amalgamated with another company registered under this section: 

Provided that no such order shall be made unless the company is given a reasonable opportunity of being heard. 

(8) Where a license is revoked under sub-section (6) and where the Central Government is satisfied that it is essential in the public interest that the company registered under this section should be amalgamated with another company registered under this section and having similar objects, then,  notwithstanding anything to the contrary contained in this Act, the Central Government may, by order,  provide for such amalgamation to form a single company with such constitution, properties, powers,  rights, interest, authorities and privileges and with such liabilities, duties, and obligations as may be specified in the order. 

(9) If on the winding up or dissolution of a company registered under this section, there remains, after the satisfaction of its debts and liabilities, any asset, they may be transferred to another company registered under this section and having similar objects, subject to such conditions as the Tribunal may impose, or may be sold and proceeds thereof credited to the Rehabilitation and Insolvency Fund formed under section 269. 

(10) A company registered under this section shall amalgamate only with another company registered under this section and having similar objects. 

(11) If a company makes any default in complying with any of the requirements laid down in this  section, the company shall, without prejudice to any other action under the provisions of this section, be  punishable with a fine which shall not be less than ten lakh rupees but which may extend to one crore  rupees and the directors and every officer of the company who is in default shall be punishable with  imprisonment for a term which may extend to three years or with fine which shall not be less than twenty-five thousand rupees but which may extend to twenty-five lakh rupees, or with both: 

Provided that when it is proved that the affairs of the company were conducted fraudulently, every officer in default shall be liable for action under section 447.

हमारा प्रयास कंपनी अधिनियम (Companies Act Section) की धारा 8 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

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