भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 133 | Indian Contract Act Section 133

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-133) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 133 के अनुसार जो भी फेरकार मूल [ऋणी] और लेनदार के बीच की संविदा के निबंधनों में प्रतिभ् की सम्मति के बिना किया जाए वह उस फेरफार के पश्चात्वर्ती संव्यवहारों के बारे में प्रतिभूति का उन्मोचन कर देता है, जिसे IC Act Section-133 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 133 (Indian Contract Act Section-133) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 133 IC Act Section-133 के अनुसार जो भी फेरकार मूल [ऋणी] और लेनदार के बीच की संविदा के निबंधनों में प्रतिभ् की सम्मति के बिना किया जाए वह उस फेरफार के पश्चात्वर्ती संव्यवहारों के बारे में प्रतिभूति का उन्मोचन कर देता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 133 (IC Act Section-133 in Hindi)

संविदा के निबंधनों में फेरफार से प्रतिभू का उन्मोचन-

जो भी फेरकार मूल [ऋणी] और लेनदार के बीच की संविदा के निबंधनों में प्रतिभ् की सम्मति के बिना किया जाए वह उस फेरफार के पश्चात्वर्ती संव्यवहारों के बारे में प्रतिभूति का उन्मोचन कर देता है।
दृष्टांत
(क) ग के बैंक में प्रबंधक के तौर पर ख के आचरण के लिए ग के प्रति क प्रतिभू होता है। तत्पश्चात क की सम्मति के बिना ख और ग संविदा करते हैं कि ख का संबलम् बढ़ा दिया जाएगा और औवर-ड्राफ्टों से हई हानि की एक चौथाई का ख दायी है। ख एक ग्राहक को ओवरड्राफ्ट करने देता है और बैंक को कुछ धन की हानि होती है । क उसकी सम्मति के बिना किए गए फेरफार के कारण, अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित हो जाता है, और इस हानि को पूरा करने का दायी नहीं है।
(ख) क एक ऐसे पद पर ख के रहते हुए उसके अवचार के विरुद्ध ग को प्रत्याभूति देता है जिस पद पर ग द्वारा ख नियुक्त किया जाता है और जिसके कर्तव्य विधान-मंडल के एक अधिनियम द्वारा परिभाषित हैं। एक पश्चात्वर्ती अधिनियम द्वारा उस पद की प्रकृति तात्त्विक रूप से बदल दी जाती है। तत्पश्चात् ख अवचार करता है। इस तब्दीली के कारण क अपनी प्रत्याभूति के अधीन भावी दायित्व से उन्मोचित हो जाता है, यद्यपि ख का वह अवचार ऐसे कर्तव्य के संबंध में है जिस पर पश्चात्वर्ती अधिनियम का प्रभाव नहीं पड़ता।
(ग) ग अपना माल बेचने के लिए वार्षिक संबलम् पर ख को अपना लिपिक नियुक्त करने का करार इस बात पर करता है कि ऐसे लिपिक के नाते ख द्वारा प्राप्त धन का उसके द्वारा सम्यक् हिसाब किए जाने के लिए ग के प्रति क प्रतिभू हो जाए। तत्पश्चात् क के ज्ञान या सम्मति के बिना ग और ख करार करते हैं कि ख को पारिश्रमिक उसके द्वारा बेचे गए माल पर कमीशन के रूप में न कि नियत संबलम् के रूप में, दिया जाएगा। ख के पश्चात्वर्ती अवचार के लिए क दायी नहीं है।
(घ) ग द्वारा ख को उधार प्रदाय किए जाने वाले तेल के लिए क 3,000 रुपए तक की चलत प्रत्याभूति ग को देता है। तत्पश्चात् ख संकट में पड़ जाता है और क के ज्ञान के बिना ख और ग संविदा करते हैं कि ख को ग नकद धन पर तेल प्रदाय करता रहेगा और वे संदाय जो किए जाएं, ख और ग के उस समय वर्तमान ऋणों के लिए उपयोजित किए जाएंगे। क इस नए ठहराव के पश्चात् दिए गए किसी भी माल के लिए अपनी प्रत्याभूति के अधीन संदाय का दायी नहीं है।
(ङ) ख को पहली मार्च को 5,000 रुपए उधार देने की संविदा ग करता है। क उस ऋण से प्रतिसंदाय की प्रत्याभूति करता है। ग 5,000 रुपए ख को पहली जनवरी को दे देता है। क अपने दायित्व से उन्मोचित हो जाता है, क्योंकि संविदा में यह फेरफार हो गया है कि ग रुपयों के लिए ख पर पहली मार्च से पूर्व वाद ला सकता है।

Indian Contract Act Section-133 (IC Act Section-133 in English)

Discharge of surety by variance in terms of contract-

Any variance, made without the surety‟s consent, in the terms of the contract between the principal 1[debtor] and the creditor, discharges the surety as to transactions subsequent to the variance.
Illustrations
(a) A becomes surety to C for B‟s conduct as a manager in C‟s bank. Afterwards, B and C contract, without A‟s consent, that B‟s salary shall be raised, and that he shall become liable for one-fourth of the losses on overdrafts. B allows a customer to overdraw, and the bank loses a sum of money. A is discharged from his suretyship by the variance made without his consent, and is not liable to make good this loss.
(b) A guarantees C against the misconduct of B in an office to which B is appointed by C, and of which the duties are defined by an Act of the Legislature. By a subsequent Act, the nature of the office is materially altered. Afterwards, B misconducts himself. A is discharged by the change from future liability under his guarantee, though the misconduct of B is in respect of a duty not affected by the later Act.
(c) C agrees to appoint B as his clerk to sell goods at a yearly salary, upon A‟s becoming surety to C for B‟s duly accounting for moneys received by him as such clerk. Afterwards, without A‟s knowledge or consent, C and B agree that B should be paid by a commission on the goods sold by him and not by a fixed salary. A is not liable for subsequent misconduct of B.
(d) A gives to C a continuing guarantee to the extent of 3,000 rupees for any oil supplied by C to B on credit. Afterwards B becomes embarrassed, and, without the knowledge of A, B and C contract that C shall continue to supply B with oil for ready money, and that the payments shall be applied to the then, existing debts between B and C. A is not liable on his guarantee for any goods supplied after: this new arrangement.
(e) C contracts to lend B 5,000 rupees on the 1st March. A guarantees repayment. C pays the 5,000 rupees to B on the 1st January. A is discharged from his liability, as the contract has been varied, inasmuch as C might sue B for the money before the 1st of March.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 133 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

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