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आईपीसी की धारा 180 | कथन पर हस्ताक्षर करने से इन्कार | IPC Section- 180 in hindi | Refusing to sign statement.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 180 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 180? साथ ही हम आपको IPC की धारा 180 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

IPC की धारा 180 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 180 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई अपने द्वारा किये गये किसी कथन पर हस्ताक्षर करने को ऐसे लोक-सेवक द्वारा अपेक्षा किये जाने पर, जो उससे यह अपेक्षा करने के लिये वैध रूप से सक्षम हो कि वह उस कथन पर हस्ताक्षर करे, उस कथन पर हस्ताक्षर करने से इन्कार करेगा तो वह व्यक्ति धारा 180 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 180 के अनुसार

कथन पर हस्ताक्षर करने से इन्कार-

जो कोई अपने द्वारा किये गये किसी कथन पर हस्ताक्षर करने को ऐसे लोक-सेवक द्वारा अपेक्षा किये जाने पर, जो उससे यह अपेक्षा करने के लिये वैध रूप से सक्षम हो कि वह उस कथन पर हस्ताक्षर करे, उस कथन पर हस्ताक्षर करने से इन्कार करेगा, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा।

Refusing to sign statement-
Whoever refuses to sign any statement made by him, when required to sign that statement by a public servant legally competent to require that he shall sign that statement, shall be punished with simple imprisonment for a term which may extend to three months, or with fine which may extend to five hundred rupees, or with both.

लागू अपराध 

लोक सेवक से किए गए कथन पर हस्ताक्षर करने से इन्कार करना जब वह वैसा करने के लिए वैध रूप से अपेक्षित है।
सजा- तीन मास के लिए सादा कारावास या पांच सौ रूपये का जुर्माना या दोनो।
यह एक जमानतीय, गैर-संज्ञेय अपराध है और अध्याय 26 के उपबन्धो के अधीन रहते हुये वह न्यायालय जिसमे अपराध किया गया है या अपराध न्यायालय मे नही किया गया है तो कोई भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 180 के अंतर्गत जो कोई लोक सेवक से किए गए कथन पर हस्ताक्षर करने से इन्कार करेगा, जबकि वह वैसा करने के लिए वैध रूप से अपेक्षित है, फिर भी अपने द्वारा कहे गए कथनो पर हस्ताक्षर करने से इन्कार करेगा, तो वह तीन मास के लिए सदा कारावास या पांच सौ रुपए का जुर्माना या दोनो से दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 180 के अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाती है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
लोक सेवक से किए गए कथन पर हस्ताक्षर करने से इन्कार करना जब वह वैसा करने के लिए वैध रूप से अपेक्षित है।तीन मास के लिए सादा कारावास या पांच सौ रूपये का जुर्माना या दोनो।गैर-संज्ञेयजमानतीयअध्याय 26 के उपबन्धो के अधीन रहते हुये वह न्यायालय जिसमे अपराध किया गया है या अपराध न्यायालय मे नही किया गया है तो कोई भी मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 180 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 181 | शपथ दिलाने या प्रतिज्ञान कराने के लिए प्राधिकृत लोक सेवक के, या व्यक्ति के समक्ष शपथ या प्रतिज्ञान पर मिथ्या कथन | IPC Section- 181 in hindi | False statement on oath or affirmation to public servant or person authorised to administer an oath or affirmation.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 181 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 181? साथ ही हम आपको IPC की धारा 181 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

IPC की धारा 181 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 181 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई किसी लोक-सेवक या किसी अन्य व्यक्ति से, जो ऐसे शपथ दिलाने या प्रतिज्ञान देने के लिए विधि द्वारा प्राधिकृत है। किसी विषय पर सत्य कथन करने के लिये शपथ या प्रतिज्ञान द्वारा वैध रूप से आबद्ध होते हुए ऐसे लोक-सेवक या अन्य व्यक्ति से उस विषय के सम्बन्ध में कोई ऐसा कथन करेगा, जो मिथ्या है, और जिसके मिथ्या होने का या तो उसे ज्ञान है या विश्वास है तो वह व्यक्ति धारा 181 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 181 के अनुसार-

शपथ दिलाने या प्रतिज्ञान कराने के लिए प्राधिकृत लोक सेवक के, या व्यक्ति के समक्ष शपथ या प्रतिज्ञान पर मिथ्या कथन-

जो कोई किसी लोक-सेवक या किसी अन्य व्यक्ति से, जो ऐसे शपथ दिलाने या प्रतिज्ञान देने के लिए विधि द्वारा प्राधिकृत हो, किसी विषय पर सत्य कथन करने के लिये शपथ या प्रतिज्ञान द्वारा वैध रूप से आबद्ध होते हुए ऐसे लोक-सेवक या यथापूर्वोक्त अन्य व्यक्ति से उस विषय के सम्बन्ध में कोई ऐसा कथन करेगा, जो मिथ्या है, और जिसके मिथ्या होने का या तो उसे ज्ञान है या विश्वास है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

False statement on oath or affirmation to public servant or person authorised to administer an oath or affirmation-
Whoever, being legally bound by an oath or affirmation to state the truth on any subject to any public servant or other person authorised by law to administer such oath or affirmation, makes, to such public servant or other person as aforesaid, touching that subject, any statement which is false, and which he either knows or believes to be false or does not believe to be true, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three years, and shall also be liable to fine.

लागू अपराध 

लोक सेवक से शपथ पर जानते हुए सत्य के रूप में ऐसा कथन करना जो मिथ्या है।
सजा- तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
यह एक जमानतीय, गैर-संज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 181 के अंतर्गत जो कोई लोक सेवक से शपथ पर जानते हुए सत्य के रूप में ऐसा कथन करना जो मिथ्या है, जबकि वह शपथ या प्रतिज्ञान द्वारा वैध रूप से आबद्ध होते हुए, वह व्यक्ति सत्य के रूप में ऐसा कथन कहेगा, करेगा जो मिथ्या है, तो वह तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 181 के अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाती है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
लोक सेवक से शपथ पर जानते हुए सत्य के रूप में ऐसा कथन करना जो मिथ्या है।तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।गैर-संज्ञेयजमानतीयप्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 181 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 182 | इस आशय से मिथ्या इत्तिला देना कि लोक-सेवक अपनी विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग दूसरे व्यक्ति को क्षति करने के लिए करे | IPC Section- 182 in hindi | False information, with intent to cause public servant to use his lawful power to the injury of another person.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 182 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 182? साथ ही हम आपको IPC की धारा 182 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

IPC की धारा 182 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 182 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई किसी लोक सेवक को कोई ऐसी इत्तिला, जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास है, इस आशय से देगा कि वह उस लोक सेवक अपनी विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग दूसरे व्यक्ति को क्षति करने के लिए करे इस उद्देश्य से प्रेरित करता है तो वह व्यक्ति धारा 182 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 182 के अनुसार-

इस आशय से मिथ्या इत्तिला देना कि लोक-सेवक अपनी विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग दूसरे व्यक्ति को क्षति करने के लिए करे-

जो कोई किसी लोक सेवक को कोई ऐसी इत्तिला, जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास है, इस आशय से देगा कि वह उस लोक सेवक को प्रेरित करे या यह सम्भाव्य जानते हुए देगा कि वह उसको तद्द्वारा प्रेरित करेगा कि वह लोक सेवक-
(क) कोई ऐसी बात करे या करने का लोप करे जिसे वह लोक-सेवक, यदि उसे उस सम्बन्ध में, जिसके बारे में ऐसी इत्तिला दी गई है, तथ्यों की सही स्थिति का पता होता तो न करता या करने का लोप न करता; अथवा
(ख) ऐसे लोक-सेवक की विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग करे जिस उपयोग से किसी व्यक्ति को क्षति या क्षोभ हो;
वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा।
दृष्टान्त
क एक मजिस्ट्रेट को यह इत्तिला देता है कि य एक पुलिस आफिसर, जो ऐसे मजिस्ट्रेट का अधीनस्थ है, कर्तव्य-पालन में उपेक्षा या अवचार का दोषी है, यह जानते हुए देता है कि ऐसी इतिला मिथ्या है, और यह सम्भाव्य है कि उस इत्तिला से वह मजिस्ट्रेट य को पदच्युत कर देगा। क ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है।

False information, with intent to cause public servant to use his lawful power to the injury of another person-
Whoever gives to any public servant any information which he knows or believes to be false, intending thereby to cause, or knowing it to be likely that he will thereby cause, such public servant-
(a) to do or omit anything which such public servant ought not to do or omit if the true state of facts respecting which such information is given were known by him, or
(b) to use the lawful power of such public servant to the injury or annoyance of any person, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to six months, or with fine which may extend to one thousand rupees, or with both.
Illustrations
A informs a Magistrate that Z, a police-officer, subordinate to such a Magistrate, has been guilty of neglect of duty or misconduct, knowing such information to be false, and knowing it to be likely that the information will cause the Magistrate to dismiss Z. A has committed the offence defined in this section.

लागू अपराध

किसी लोक सेवक को इस आशय से मिथ्या इत्तिला देना कि वह अपनी विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग दूसरे व्यक्ति को क्षति या क्षोभ करने के लिए करे।
सजा- छह मास के लिए कारावास या एक हजार रूपए जुर्माना या दोनो।
यह एक जमानतीय, गैर-संज्ञेय अपराध है और किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 182 के अंतर्गत जो कोई किसी लोक सेवक को कोई ऐसी मिथ्या इत्तिला देता है, जबकि उसका उद्देश्य लोक-सेवक अपनी विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग दूसरे व्यक्ति को क्षति करने के लिए करे, तो वह छह मास के लिए कारावास और जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 182 के अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाती है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
किसी लोक सेवक को इस आशय से मिथ्या इत्तिला देना कि वह अपनी विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग दूसरे व्यक्ति को क्षति या क्षोभ करने के लिए करे।छह मास के लिए कारावास या एक हजार रूपए जुर्माना या दोनो।गैर-संज्ञेयजमानतीयकिसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेट

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 182 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई प्रश्न हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 183 | लोक-सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा सम्पत्ति लिये जाने का प्रतिरोध | IPC Section- 183 in hindi | Resistance to the taking of property by the lawful authority of a public servant.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 183 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 183? साथ ही हम आपको IPC की धारा 183 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

IPC की धारा 183 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 183 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई किसी लोक-सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा किसी सम्पत्ति के ले लिये जाने का प्रतिरोध यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए करेगा कि वह ऐसा लोक सेवक है तो वह धारा 183 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 183 के अनुसार

लोक-सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा सम्पत्ति लिये जाने का प्रतिरोध-

जो कोई किसी लोक-सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा किसी सम्पत्ति के ले लिये जाने का प्रतिरोध यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए करेगा कि वह ऐसा लोक सेवक है, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा।

Resistance to the taking of property by the lawful authority of a public servant-
Whoever offers any resistance to the taking of any property by the lawful authority of any public servant, knowing or having reason to believe that he is such public servant, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to six months, or with fine which may extend to one thousand rupees, or with both.

लागू अपराध 

लोक-सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा सम्पत्ति लिये जाने का प्रतिरोध।
सजा- छह मास के लिए कारावास या एक हजार रुपए का जुर्माना या दोनो।
यह एक जमानतीय, गैर-संज्ञेय अपराध है और किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 183 के अंतर्गत जो कोई किसी लोक-सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा किसी सम्पत्ति के ले लिये जाने का प्रतिरोध यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए करेगा कि वह ऐसा लोक सेवक है, तो वह छह के लिए कारावास और जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 183 के अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाती है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
लोक-सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा सम्पत्ति लिये जाने का प्रतिरोध।छह मास के लिए कारावास या एक हजार रुपए का जुर्माना या दोनो।गैर-संज्ञेयजमानतीयकिसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेट

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 183 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 184 | लोक-सेवक के प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिए प्रस्थापित की गयी सम्पत्ति के विक्रय में बाधा उपस्थित करना | IPC Section- 184 in hindi | Obstructing sale of property offered for sale by authority of public servant.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 184 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 184? साथ ही हम आपको IPC की धारा 184 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

IPC की धारा 184 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 184 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई ऐसी किसी सम्पत्ति के विक्रय में, जो ऐसे लोक-सेवक के नाते किसी लोक-सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिये प्रस्थापित की गई हो, साशय बाधा डालेगा, तो वह व्यक्ति धारा 184 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 184 के अनुसार-

लोक-सेवक के प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिए प्रस्थापित की गयी सम्पत्ति के विक्रय में बाधा उपस्थित करना-

जो कोई ऐसी किसी सम्पत्ति के विक्रय में, जो ऐसे लोक-सेवक के नाते किसी लोक-सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिये प्रस्थापित की गई हो, साशय बाधा डालेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा।

Obstructing sale of property offered for sale by authority of public servant-
Whoever intentionally obstructs any sale of property offered for sale by the lawful authority of any public servant, as such, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to one month, or with fine which
may extend to five hundred rupees, or with both.

लागू अपराध 

लोक-सेवक के प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिए प्रस्थापित की गयी सम्पत्ति के विक्रय में बाधा उपस्थित करना।
सजा- एक मास के लिए कारावास या पांच सौ रुपया जुर्माना या दोनो।
यह एक जमानतीय, गैर-संज्ञेय अपराध है और किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 184 के अंतर्गत जो कोई ऐसी किसी सम्पत्ति के विक्रय में, जो ऐसे लोक-सेवक के नाते किसी लोक-सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिये प्रस्थापित की गई हो, साशय बाधा डालेगा, तो वह एक मास के लिए कारावास और जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 184 के अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाती है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
लोक-सेवक के प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिए प्रस्थापित की गयी सम्पत्ति के विक्रय में बाधा उपस्थित करना।एक मास के लिए कारावास या पांच सौ रुपया जुर्माना या दोनो।गैर-संज्ञेयजमानतीयकिसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेट

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 184 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 185 | लोक सेवक के प्राधिकार द्वारा, विक्रय के लिए प्रस्थापित की गयी सम्पत्ति का अवैध क्रय या उसके लिए अवैध बोली लगाना | IPC Section- 185 in hindi | Illegal purchase or bid for property offered for sale by authority of public servant.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 185 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 185? साथ ही हम आपको IPC की धारा 185 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

IPC की धारा 185 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 185 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई सम्पत्ति के किसी ऐसे विक्रय में, जो लोक-सेवक के नाते लोक सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा हो रहा हो, किसी ऐसे व्यक्ति के निमित्त चाहे वह व्यक्ति वह स्वयं हो, या कोई अन्य हो, किसी सम्पत्ति का क्रय करेगा या किसी सम्पत्ति के लिये बोली लगायेगा, तो वह व्यक्ति धारा 185 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 185 के अनुसार

लोक सेवक के प्राधिकार द्वारा, विक्रय के लिए प्रस्थापित की गयी सम्पत्ति का अवैध क्रय या उसके लिए अवैध बोली लगाना-

जो कोई सम्पत्ति के किसी ऐसे विक्रय में, जो लोक-सेवक के नाते लोक सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा हो रहा हो, किसी ऐसे व्यक्ति के निमित्त चाहे वह व्यक्ति वह स्वयं हो, या कोई अन्य हो, किसी सम्पत्ति का क्रय करेगा या किसी सम्पत्ति के लिये बोली लगायेगा, जिसके बारे में वह जानता हो कि वह व्यक्ति उस विक्रय में उस सम्पत्ति के क्रय करने के बारे में किसी विधिक असमर्थता के अधीन है, या ऐसी सम्पत्ति के लिए वह आशय रख कर बोली लगायेगा कि ऐसी बोली लगाने से जिन बाध्यताओं के अधीन वह अपने आपको डालता है, उन्हें उसे पूरा नहीं करना है, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो सौ रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा।

Illegal purchase or bid for property offered for sale by authority of public servant-
Whoever, at any sale of property held by the lawful authority of a public servant, as such, purchases or bids for any property on account of any person. whether himself or any other, whom he knows to be under a legal incapacity to purchase that property at that sale, or bids for such property not intending to perform the obligations under which he lays himself by such bidding, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to one month or with fine which may extend to two hundred rupees, or with both.

लागू अपराध

विधिपूर्ण प्राधिकृत विक्रय में संपत्ति के लिए ऐसे व्यक्ति का, जो उसे क्रय करने के लिए किसी विधिक असमर्थता के आधीन है, बोली लगाना या उपगत बध्यताओ को पूरा करने का आशय न रखते हुए बोली लगाना।
सजा- एक मास के लिए कारावास या दो सौ रुपया जुर्माना या दोनो।
यह एक जमानतीय, गैर-संज्ञेय अपराध है और किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 185 के अंतर्गत जो कोई विधिपूर्ण प्राधिकृत विक्रय में संपत्ति के लिए ऐसे व्यक्ति का, जो उसे क्रय करने के लिए किसी विधिक असमर्थता के आधीन है, बोली लगाना या उपगत बध्यताओ को पूरा करने का आशय न रखते हुए बोली लगाएगा, तो एक मास के लिए कारावास और जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 185 के अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाती है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
विधिपूर्ण प्राधिकृत विक्रय में संपत्ति के लिए ऐसे व्यक्ति का, जो उसे क्रय करने के लिए किसी विधिक असमर्थता के आधीन है, बोली लगाना या उपगत बध्यताओ को पूरा करने का आशय न रखते हुए बोली लगाना।एक मास के लिए कारावास या दो सौ रुपया जुर्माना या दोनो।गैर-संज्ञेयजमानतीयकिसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेट

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 185 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।