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सीआरपीसी की धारा 467 | परिभाषा- परिसीमा- काल | CrPC Section- 467 in hindi| Definition- period of limitation.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 467 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 467 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 467 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 467 के अन्तर्गत जब किसी मामले मे अपराध की तारीख को प्रारंभ होगा; या उक्त अवधि की संगणना करने में, उस दिन को छोड़ दिया जाएगा जिस दिन ऐसी अवधि की संगणना की जानी है। परिसीमा-काल” से किसी अपराध का संज्ञान करने के लिए धारा 468 में विनिर्दिष्ट अवधि अभिप्रेत है।

सीआरपीसी की धारा 467 के अनुसार

परिभाषा–

(1) इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए, जब तक संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो, “परिसीमा-काल” से किसी अपराध का संज्ञान करने के लिए धारा 468 में विनिर्दिष्ट अवधि अभिप्रेत है।

Definitions-
For the purposes of this Chapter, unless the context otherwise requires, “period of limitation” means the period specified in Section 468 for taking cognizance of an offence.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 467 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 466 | त्रुटि या गलती के कारण कुर्की का अवैध न होना | CrPC Section- 466 in hindi| Defect or error not to make attachment unlawful.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 466 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 466 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 466 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 466 के अन्तर्गत इस संहिता के अधीन की गई कोई कुर्की ऐसी किसी त्रुटि के कारण या प्ररूप के अभाव के कारण विधिविरुद्ध न समझी जाएगी जो समन, दोषसिद्धि, कुर्की की रिट या तत्सम्बन्धी अन्य कार्यवाही में हुई है और न उसे करने वाला कोई व्यक्ति अतिचारी समझा जाएगा।

सीआरपीसी की धारा 466 के अनुसार

त्रुटि या गलती के कारण कुर्की का अवैध न होना-

इस संहिता के अधीन की गई कोई कुर्की ऐसी किसी त्रुटि के कारण या प्ररूप के अभाव के कारण विधिविरुद्ध न समझी जाएगी जो समन, दोषसिद्धि, कुर्की की रिट या तत्सम्बन्धी अन्य कार्यवाही में हुई है और न उसे करने वाला कोई व्यक्ति अतिचारी समझा जाएगा।

Defect or error not to make attachment unlawful-
No attachment made under this Code shall be deemed unlawful, nor shall any person making the same be deemed a trespasser, on account of any defect or want of form in the summons, conviction, writ of attachment or other proceedings relating thereto.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 466 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 465 | निष्कर्ष या दंडादेश कब गलती, लोप या अनियमितता के कारण उलटने योग्य होगा | CrPC Section- 465 in hindi| Finding or sentence when reversible by reason of error, omission or irregularity.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 465 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 465 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 465 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 465 के अन्तर्गत यदि अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा पारित कोई निष्कर्ष, दंडादेश या आदेश विचारण के पूर्व या दौरान परिवाद, समन, वारंट, उद्घोषणा, आदेश, निर्णय या अन्य कार्यवाही में हुई या इस संहिता के अधीन किसी जांच या अन्य कार्यवाही में हुई किसी गलती, लोप या अनियमितता या अभियोजन के लिए मंजूरी में हुई किसी गलती या अनियमितता के कारण अपील, पुष्टीकरण या पुनरीक्षण न्यायालय द्वारा तब तक न तो उलटा जाएगा और न परिवर्तित किया जाएगा।

सीआरपीसी की धारा 465 के अनुसार

निष्कर्ष या दंडादेश कब गलती, लोप या अनियमितता के कारण उलटने योग्य होगा-

(1) इसमें इसके पूर्व अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन यह है कि सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा पारित कोई निष्कर्ष, दंडादेश या आदेश विचारण के पूर्व या दौरान परिवाद, समन, वारंट, उद्घोषणा, आदेश, निर्णय या अन्य कार्यवाही में हुई या इस संहिता के अधीन किसी जांच या अन्य कार्यवाही में हुई किसी गलती, लोप या अनियमितता या अभियोजन के लिए मंजूरी में हुई किसी गलती या अनियमितता के कारण अपील, पुष्टीकरण या पुनरीक्षण न्यायालय द्वारा तब तक न तो उलटा जाएगा और न परिवर्तित किया जाएगा जब तक न्यायालय की यह राय नहीं है कि उसके कारण वस्तुत: न्याय नहीं हो पाया है।
(2) यह अवधारित करने में कि क्या इस संहिता के अधीन किसी कार्यवाही में किसी गलती, लोप या अनियमितता या अभियोजन के लिए मंजूरी में हई किसी गलती या अनियमितता के कारण न्याय नहीं हो पाया है न्यायालय इस बात को ध्यान में रखेगा कि क्या वह आपत्ति कार्यवाही के किसी पूर्वतर प्रक्रम में उठायी जा सकती थी और उठायी जानी चाहिए थी।

Finding or sentence when reversible by reason of error, omission or irregularity-
(1) Subject to the provisions hereinbefore contained, no finding, sentence or order passed by a Court of competent jurisdiction shall be reserved or altered by a Court of appeal, confirmation or revision on account of any error, omission or irregularity in the complaint, summons, warrant, proclamation, order, judgment or other proceedings before or during trial or in any inquiry or other proceeding under this Code, or any error, or irregularity in any sanction for the prosecution, unless in the opinion of that Court, a failure of justice has in fact been occasioned thereby.
(2) In determining whether any error, omission or irregularity in any proceeding under this Code, or any error, or irregularity in any sanction for the prosecution has occasioned a failure of justice, the Court shall have regard to the fact whether the objection could and should have been raised at an earlier stage in the proceedings.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 465 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 464 | आरोप विरचित न करने या उसके अभाव या उसमें गलती का प्रभाव | CrPC Section- 464 in hindi| Effect of omission to frame, or absence of, or error in, charge.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 464 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 464 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 464 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 464 के अन्तर्गत किसी सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय का कोई निष्कर्ष, दंडादेश या आदेश केवल इस आधार पर कि कोई आरोप विरचित नहीं किया गया अथवा इस आधार पर कि आरोप में कोई गलती, लोप या अनियमितता थी, जिसके अन्तर्गत आरोपों का कुसंयोजन भी है, उस दशा में ही अविधिमान्य समझा जाएगा जब अपील, पुष्टीकरण या पुनरीक्षण न्यायालय की राय में उसके कारण वस्तुतः न्याय नहीं हो पाया है।

सीआरपीसी की धारा 464 के अनुसार

आरोप विरचित न करने या उसके अभाव या उसमें गलती का प्रभाव-

(1) किसी सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय का कोई निष्कर्ष, दंडादेश या आदेश केवल इस आधार पर कि कोई आरोप विरचित नहीं किया गया अथवा इस आधार पर कि आरोप में कोई गलती, लोप या अनियमितता थी, जिसके अन्तर्गत आरोपों का कुसंयोजन भी है, उस दशा में ही अविधिमान्य समझा जाएगा जब अपील, पुष्टीकरण या पुनरीक्षण न्यायालय की राय में उसके कारण वस्तुतः न्याय नहीं हो पाया है।
(2) यदि अपील, पुष्टीकरण या पुनरीक्षण न्यायालय की यह राय है कि वस्तुत: न्याय नहीं हो पाया है तो वह-
(क) आरोप विरचित न किए जाने वाली दशा में यह आदेश कर सकता है कि आरोप विरचित किया जाए और आरोप की विरचना के ठीक पश्चात् से पुनः प्रारम्भ किया जाए;
(ख) आरोप में किसी गलती, लोप या अनियमितता वाली दशा में यह निदेश दे सकता है कि किसी ऐसी रीति से, जिसे वह ठीक समझे, विरचित आरोप पर नया विचारण किया जाए:
परन्तु यदि न्यायालय की यह राय है कि मामले के तथ्य ऐसे हैं कि साबित तथ्यों की बाबत अभियुक्त के विरुद्ध कोई विधिमान्य आरोप नहीं लगाया जा सकता तो वह दोषसिद्धि को अभिखंडित कर देगा।

Effect of omission to frame, or absence of, or error in, charge-
(1) No finding, sentence or order by a Court of competent jurisdiction shall be deemed invalid merely on the ground that no charge was framed or on the ground of any error, omission or irregularity in the charge including any misjoinder of charges, unless, in the opinion of the Court of appeal, confirmation or revision, a failure of justice has in fact been occasioned thereby.
(2) If the Court of appeal, confirmation or revision is of opinion that a failure of justice has in fact been occasioned, it may-
(a) in the case of an omission to frame a charge, order that a charge be framed and that the trial be recommended from the point immediately after the framing of the charge;
(b) in the case of an error, omission or irregularity in the charge, direct a new trial to be had upon a charge framed in whatever manner it thinks fit.
Provided that if the Court is of opinion that the facts of the case are such that no valid charge could be preferred against the accused in respect of the facts proved, it shall quash the conviction.

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सीआरपीसी की धारा 463 | धारा 164 या धारा 281 के उपबंधों का अनुपालन | CrPC Section- 463 in hindi| Non-compliance with provisions of Section 164 or Section 281.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 463 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 463 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 463 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 463 के अन्तर्गत यदि कोई न्यायालय, जिसके समक्ष अभियुक्त व्यक्ति की संस्वीकृति या अन्य कथन, जो धारा 164 या धारा 281 के अधीन अभिलिखित है या अभिलिखित होना तात्पर्यित है, साक्ष्य में दिया जाता है या लिया जाता है, इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि कथन अभिलिखित करने वाले मजिस्ट्रेट द्वारा इन धाराओं में से किसी धारा के किसी उपबन्ध का अनुपालन नहीं किया गया है तो वह, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 91 में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे अननुपालन के बारे में साक्ष्य ले सकता है और यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसे अननुपालन से अभियुक्त की, गुणागुण विषयक बातों पर अपनी प्रतिरक्षा करने में कोई हानि नहीं हुई है और उसने अभिलिखित कथन सम्यक् रूप से किया था, तो ऐसे कथन को ग्रहण कर सकता है।

सीआरपीसी की धारा 463 के अनुसार

धारा 164 या धारा 281 के उपबंधों का अनुपालन–

(1) यदि कोई न्यायालय, जिसके समक्ष अभियुक्त व्यक्ति की संस्वीकृति या अन्य कथन, जो धारा 164 या धारा 281 के अधीन अभिलिखित है या अभिलिखित होना तात्पर्यित है, साक्ष्य में दिया जाता है या लिया जाता है, इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि कथन अभिलिखित करने वाले मजिस्ट्रेट द्वारा इन धाराओं में से किसी धारा के किसी उपबन्ध का अनुपालन नहीं किया गया है तो वह, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 91 में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे अननुपालन के बारे में साक्ष्य ले सकता है और यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसे अननुपालन से अभियुक्त की, गुणागुण विषयक बातों पर अपनी प्रतिरक्षा करने में कोई हानि नहीं हुई है और उसने अभिलिखित कथन सम्यक् रूप से किया था, तो ऐसे कथन को ग्रहण कर सकता है।
(2) इस धारा के उपबन्ध अपील, निर्देश और पुनरीक्षण न्यायालयों को लागू होते हैं।

Non-compliance with provisions of Section 164 or Section 281-
(1) If any Court before which a confession or other statement of an accused person recorded, or purporting to be recorded under Section 164 or Section 281, is tendered, or has been received, in evidence finds that any of the provisions of either of such sections have not been complied with by the Magistrate recording the statement, it may, notwithstanding anything contained in Section 91 of the Indian Evidence Act, 1872 (1 of 1872), take evidence in regard to such non-compliance, and may, if satisfied that such non-compliance has not injured the accused in his defence on the merits and that he duly made the statement recorded, admit such statement.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 463 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 462 | गलत स्थान में कार्यवाही | CrPC Section- 462 in hindi| Proceedings in wrong place.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 462 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 462 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 462 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 462 के अन्तर्गत किसी दण्ड न्यायालय का कोई निष्कर्ष, दंडादेश या आदेश केवल इस आधार पर कि वह जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही जिसके अनुक्रम में उस निष्कर्ष पर पहुंचा गया था या वह दंडादेश या आदेश पारित किया गया था, गलत सेशन खण्ड, जिला, उपखण्ड या अन्य स्थानीय क्षेत्र में हुई थी उस दशा में ही अपास्त किया जाएगा जब यह प्रतीत होता है कि ऐसी गलती के कारण वस्तुतः न्याय नहीं हो पाया है।

सीआरपीसी की धारा 462 के अनुसार

गलत स्थान में कार्यवाही-

किसी दण्ड न्यायालय का कोई निष्कर्ष, दंडादेश या आदेश केवल इस आधार पर कि वह जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही जिसके अनुक्रम में उस निष्कर्ष पर पहुंचा गया था या वह दंडादेश या आदेश पारित किया गया था, गलत सेशन खण्ड, जिला, उपखण्ड या अन्य स्थानीय क्षेत्र में हुई थी उस दशा में ही अपास्त किया जाएगा जब यह प्रतीत होता है कि ऐसी गलती के कारण वस्तुतः न्याय नहीं हो पाया है।

Proceedings in wrong place-
No finding, sentence or order of any Criminal Court shall be set aside merely on the ground that the inquiry, trial or other proceedings in the course of which it was arrived at or passed, took place in a wrong sessions division, district, sub-division or other local area, unless it appears that such error has in fact occasioned a failure of justice.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 462 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।