नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 395 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 395 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 395 का विवरण
दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 395 के अन्तर्गत जहां किसी न्यायालय का समाधान हो जाता है कि उसके समक्ष लंबित मामले में किसी अधिनियम, अध्यादेश या विनियम की अथवा किसी अधिनियम, अध्यादेश या विनियम में अन्तर्विष्ट किसी उपबन्ध की विधिमान्यता के बारे में ऐसा प्रश्न अन्तर्ग्रस्त है, जिसका अवधारण उस मामले को निपटाने के लिए आवश्यक है, और उसकी यह राय है कि ऐसा अधिनियम, अध्यादेश, विनियम या उपबन्ध अविधिमान्य या अप्रवर्तनशील है किन्तु उस उच्च न्यायालय द्वारा, जिसके वह न्यायालय अधीनस्थ है, या उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित नहीं किया गया है वहां न्यायालय अपनी राय और उसके कारणों को उल्लिखित करते हुए मामले का कथन तैयार करेगा और उसे उच्च न्यायालय के विनिश्चय के लिए निर्देशित करेगा।
सीआरपीसी की धारा 395 के अनुसार
उच्च न्यायालय को निर्देश- (1) जहां किसी न्यायालय का समाधान हो जाता है कि उसके समक्ष लंबित मामले में किसी अधिनियम, अध्यादेश या विनियम की अथवा किसी अधिनियम, अध्यादेश या विनियम में अन्तर्विष्ट किसी उपबन्ध की विधिमान्यता के बारे में ऐसा प्रश्न अन्तर्ग्रस्त है, जिसका अवधारण उस मामले को निपटाने के लिए आवश्यक है, और उसकी यह राय है कि ऐसा अधिनियम, अध्यादेश, विनियम या उपबन्ध अविधिमान्य या अप्रवर्तनशील है किन्तु उस उच्च न्यायालय द्वारा, जिसके वह न्यायालय अधीनस्थ है, या उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित नहीं किया गया है वहां न्यायालय अपनी राय और उसके कारणों को उल्लिखित करते हुए मामले का कथन तैयार करेगा और उसे उच्च न्यायालय के विनिश्चय के लिए निर्देशित करेगा। स्पष्टीकरण- इस धारा में “विनियम” से साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) में या किसी राज्य के साधारण खण्ड अधिनियम में यथापरिभाषित कोई विनियम अभिप्रेत है। (2) यदि सेशन न्यायालय या महानगर मजिस्ट्रेट अपने समक्ष लंबित किसी मामले में, जिसे उपधारा (1) के उपबंध लागू नहीं होते हैं, ठीक समझता है तो वह, ऐसे मामले की सुनवाई में उठने वाले किसी विधि-प्रश्न को उच्च न्यायालय के विनिश्चय के लिए निर्देशित कर सकता है। (3) कोई न्यायालय, जो उच्च न्यायालय को उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन निर्देश करता है, उस पर उच्च न्यायालय का विनिश्चय होने तक, अभियुक्त को जेल को सुपुर्द कर सकता है या अपेक्षा किए जाने पर हाजिर होने के लिए जमानत पर छोड़ सकता है।
Reference to High Court- (1) Where any Court is satisfied that a case pending before it involves a question as to the validity of any Act, Ordinance or Regulation or of any provision contained in an Act, Ordinance or Regulation, the determination of which is necessary for the disposal of the case, and is of opinion that such Act, Ordinance, Regulation or provision is invalid or inoperative, but has not been so declared by the High Court to which that Court is subordinate or by the Supreme Court, the Court shall state a case setting out its opinion and the reasons therefor, and refer the same for the decision of the High Court. Explanation- In this section, “Regulation” means any Regulation as defined in the General Clauses Act, 1897 (10 of 1897), or in the General Clauses Act of a State. (2) A Court of Session or a Metropolitan Magistrate may, if it or he thinks fit in any case pending before it or him to which the provisions of sub-section (1) do not apply, refer for the decision of the High Court any question of law arising in the hearing of such case. (3) Any Court making a reference to the High Court under sub-section (1) or sub section (2) may, pending the decision of the High Court thereon, either commit the accused to jail or release him on bail to appear when called upon.
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नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 392 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 392 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 392 का विवरण
दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 392 के अन्तर्गत जब इस अध्याय के अधीन अपील उच्च न्यायालय द्वारा उसके न्यायाधीशों के न्यायपीठ के समक्ष सुनी जाती है और वे राय में समान रूप से विभाजित हैं जब अपील उनकी रायों के सहित उसी न्यायालय के किसी अन्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जाएगी और ऐसा न्यायाधीश, ऐसी सुनवाई के पश्चात्, जैसी वह ठीक समझे, अपनी राय देगा और निर्णय या आदेश ऐसी राय के अनुसार होगा, परन्तु यदि न्यायपीठ गठित करने वाले न्यायाधीशों में से कोई एक न्यायाधीश या जहां अपील इस धारा के अधीन किसी अन्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जाती है वहां वह न्यायाधीश अपेक्षा करे तो अपील, न्यायाधीशों के वृहत्तर न्यायपीठ द्वारा पुन: सुनी जाएगी और विनिश्चित की जाएगी।
सीआरपीसी की धारा 392 के अनुसार
जहां अपील न्यायालय के न्यायाधीश राय के बारे में समान रूप में विभाजित हों, वहां प्रक्रिया- जब इस अध्याय के अधीन अपील उच्च न्यायालय द्वारा उसके न्यायाधीशों के न्यायपीठ के समक्ष सुनी जाती है और वे राय में समान रूप से विभाजित हैं जब अपील उनकी रायों के सहित उसी न्यायालय के किसी अन्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जाएगी और ऐसा न्यायाधीश, ऐसी सुनवाई के पश्चात्, जैसी वह ठीक समझे, अपनी राय देगा और निर्णय या आदेश ऐसी राय के अनुसार होगा : परन्तु यदि न्यायपीठ गठित करने वाले न्यायाधीशों में से कोई एक न्यायाधीश या जहां अपील इस धारा के अधीन किसी अन्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जाती है वहां वह न्यायाधीश अपेक्षा करे तो अपील, न्यायाधीशों के वृहत्तर न्यायपीठ द्वारा पुन: सुनी जाएगी और विनिश्चित की जाएगी।
Procedure where Judges of Court of Appeal are equally divided- When an appeal under this Chapter is heard by a High Court before a Bench of Judges and they are divided in opinion, the appeal, with their opinions, shall be laid before another Judge of that Court, and that Judge, after such hearing as he thinks fit, shall deliver his opinion, and the judgment or order shall follow that opinion : Provided that if one of the Judges constituting the Bench, or where the appeal is laid before another Judge under this section, that Judge, so requires, the appeal shall be re-heard and decided by a larger Bench of Judges.
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नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 391 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 391 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 391 का विवरण
दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 391 के अन्तर्गत इस अध्याय के अधीन किसी अपील पर विचार करने में यदि अपील न्यायालय अतिरिक्त साक्ष्य आवश्यक समझता है तो वह अपने कारणों को अभिलिखित करेगा और ऐसा साक्ष्य या तो स्वयं ले सकता है या मजिस्ट्रेट द्वारा, या जब अपील न्यायालय उच्च न्यायालय है तब सेशन न्यायालय या मजिस्ट्रेट द्वारा, लिए जाने का निदेश दे सकता है। इसके अतिरिक्त साक्ष्य सेशन न्यायालय या मजिस्ट्रेट द्वारा ले लिया जाता है तब वह ऐसा साक्ष्य प्रमाणित करके अपील न्यायालय को भेजेगा और तब ऐसा न्यायालय अपील निपटाने के लिए अग्रसर होगा।
सीआरपीसी की धारा 391 के अनुसार
अपील न्यायालय अतिरिक्त साक्ष्य ले सकेगा या उसके लिए जाने का निदेश दे सकेगा– (1) इस अध्याय के अधीन किसी अपील पर विचार करने में यदि अपील न्यायालय अतिरिक्त साक्ष्य आवश्यक समझता है तो वह अपने कारणों को अभिलिखित करेगा और ऐसा साक्ष्य या तो स्वयं ले सकता है या मजिस्ट्रेट द्वारा, या जब अपील न्यायालय उच्च न्यायालय है तब सेशन न्यायालय या मजिस्ट्रेट द्वारा, लिए जाने का निदेश दे सकता है। (2) जब अतिरिक्त साक्ष्य सेशन न्यायालय या मजिस्ट्रेट द्वारा ले लिया जाता है तब वह ऐसा साक्ष्य प्रमाणित करके अपील न्यायालय को भेजेगा और तब ऐसा न्यायालय अपील निपटाने के लिए अग्रसर होगा। (3) अभियुक्त या उसके प्लीडर को उस समय उपस्थित होने का अधिकार होगा जब अतिरिक्त साक्ष्य लिया जाता है। (4) इस धारा के अधीन साक्ष्य का लिया जाना अध्याय 23 के उपबंधों के अधीन होगा मानो वह कोई जांच हो ।
Appellate Court may take further evidence or direct it to be taken- (1) In dealing with any appeal under this Chapter, the Appellate Court, if it thinks additional evidence to be necessary, shall record its reasons and may either take such evidence itself, or direct it to be taken by a Magistrate, or when the Appellate Court is a High Court, by a Court of Session or a Magistrate. (2) When the additional evidence is taken by the Court of Session or the Magistrate, it or he shall certify such evidence to the Appellate Court, and such Court shall thereupon proceed to dispose of the appeal. (3) The accused or his pleader shall have the right to be present when the additional evidence is taken. (4) The taking of evidence under this section shall be subject to the provisions of Chapter XXIII, as if it were an inquiry.
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नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 390 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 390 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 390 का विवरण
दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 390 के अन्तर्गत जब धारा 378 के अधीन अपील उपस्थित की जाती है तब उच्च न्यायालय वारण्ट जारी कर सकता है जिसमें यह निदेश होगा कि अभियुक्त गिरफ्तार किया जाए और उसके या किसी अधीनस्थ न्यायालय के समक्ष लाया जाए, और वह न्यायालय जिसके समक्ष अभियुक्त लाया जाता है, अपील का निपटारा होने तक उसे कारागार को सुपुर्द कर सकता है या उसकी जमानत ले सकता है।
सीआरपीसी की धारा 390 के अनुसार
दोषमुक्ति से अपील में अभियुक्त की गिरफ्तारी- जब धारा 378 के अधीन अपील उपस्थित की जाती है तब उच्च न्यायालय वारण्ट जारी कर सकता है जिसमें यह निदेश होगा कि अभियुक्त गिरफ्तार किया जाए और उसके या किसी अधीनस्थ न्यायालय के समक्ष लाया जाए, और वह न्यायालय जिसके समक्ष अभियुक्त लाया जाता है, अपील का निपटारा होने तक उसे कारागार को सुपुर्द कर सकता है या उसकी जमानत ले सकता है।
Arrest of accused in appeal from acquittal- When an appeal is presented under Section 378, the High Court may issue a warrant directing that the accused be arrested and brought before it or any subordinate Court, and the Court before which he is brought may commit him to prison pending the disposal of the appeal or admit him to bail.
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नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 385 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 385 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 385 का विवरण
दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 385 के अन्तर्गत यदि अपील न्यायालय अपील को संक्षेपतः खारिज नहीं करता है तो वह उस समय और स्थान की, जब और जहां ऐसी अपील सुनी जाएगी। इसके अलावा जहां दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील का आधार केवल दंडादेश की अभिकथित कठोरता है वहां अपीलार्थी न्यायालय की इजाजत के बिना अन्य किसी आधार के समर्थन में न तो कहेगा और न उसे उसके समर्थन में सुना ही जाएगा।
सीआरपीसी की धारा 385 के अनुसार
संक्षेपतः खारिज न की गई अपीलों की सुनवाई के लिए प्रक्रिया- (1) यदि अपील न्यायालय अपील को संक्षेपतः खारिज नहीं करता है तो वह उस समय और स्थान की, जब और जहां ऐसी अपील सुनी जाएगी, सूचना- (i) अपीलार्थी या उसके प्लीडर को; (ii) ऐसे अधिकारी को, जिसे राज्य सरकार इस निमित्त नियुक्त करे; (iii) यदि परिवाद पर संस्थित मामले में दोषसिद्धि के निर्णय के विरुद्ध अपील की गई है तो परिवादी को; (iv) यदि अपील धारा 377 या धारा 378 के अधीन की गई है तो अभियुक्त को, दिलवाएगा और ऐसे अधिकारी, परिवादी और अभियुक्त को अपील के आधारों की प्रतिलिपि भी देगा। (2) यदि अपील न्यायालय में मामले का अभिलेख, पहले से ही उपलभ्य नहीं है तो वह न्यायालय ऐसा अभिलेख मंगाएगा और पक्षकारों को सुनेगा : परन्तु यदि अपील केवल दण्ड के परिमाण या उसकी वैधता के बारे में है तो न्यायालय अभिलेख मंगाए बिना ही अपील का निपटारा कर सकता है। (3) जहां दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील का आधार केवल दंडादेश की अभिकथित कठोरता है वहां अपीलार्थी न्यायालय की इजाजत के बिना अन्य किसी आधार के समर्थन में न तो कहेगा और न उसे उसके समर्थन में सुना ही जाएगा। Procedure for hearing appeals not dismissed summarily- (1) If the Appellate Court does not dismiss the appeal summarily, it shall cause notice of the time and place at which such appeal will be heard to be given- (i) to the appellant or his pleader; (ii) to such officer as the State Government may appoint in this behalf; (iii) if the appeal is from a judgment of conviction in a case instituted upon complaint, to the complainant ; (iv) if the appeal is under Section 377 or Section 378, to the accused, and shall also furnish such officer, complainant and accused with a copy of the grounds of appeal. (2) The Appellate Court shall then send for the record of the case, if such record is not already available in that Court and hear the parties : Provided that if the appeal is only as to the extent or the legality of the sentence. the Court may dispose of the appeal without sending for the record. (3) Where the only ground for appeal from a conviction is the alleged severity of the sentence, the appellant shall not except with the leave of the Court, urge or be heard in support of any other ground.
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Definition of bail जो कोई व्यक्ति किसी के कोई काम करने, समय पर हाज़िर होने, ऋण चुकाने आदि की दूसरे द्वारा ली जानेवाली ज़िम्मेदारी (जैसे—अदालत में मुलजिम की गारण्टी लेता है) उसे जमानती व्यक्ति या गारन्टर कहलाता है। ऐसे मामलो मे जो व्यक्ति गारण्टी लेता है या देता है। जमानत कहलाता है।
जब कोई व्यक्ति किसी लीगल मामलो मे किसी दूसरे व्यक्ति की गारन्टी लेता है और वह व्यक्ति जो किसी व्यक्ति को ऋण दिलाने अथवा किसी न्यायिक न्यायालय मे उपस्थित होने के लिये प्रस्ताव के मुताबिक जिस भी न्यायालय के समक्ष पेश करते है अथवा ऋण चुकाने के लिये जमानत दी है। वह गारन्टर व्यक्ति जिसे जमानत देता है, अर्थात् जो किसी व्यक्ति की गारन्टी लेता है, इसे ही जमानत कहते है।
धारा 41 (1) CrPC के अनुसार, कोई भी पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना और बिना किसी वारंट के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है, यदि यह अपराध संज्ञेय अपराध से संबंधित है।
यहकि किसी अभियुक्त व्यक्ति जिसके कब्जे में कुछ भी पाया जाता है, जिस पर चोरी की संपत्ति होने का संदेह हो सकता है, तो ऐसे मामलो मे भी जमानत लेनी पड़ सकती है। जिसके लिये जमानत के लिए आवेदन देने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि केवल बेलबाण्ड संख्या-45(Bail bond- 45) भरकर न्यायालय में पेश करना होता है, और जमानत असानी से मिल जाती है।
जब कोई अभियुक्त किसी मामले में विचाराधीन आपराधिक होते हुए न्यायालय में हाजिर होता हैं, तो बतौर अभियुक्त समन या जमानती वारण्ट पर ही सुनवाई की पहली तारीख पर न्यायालय के समक्ष हाजिर होता हैं, तो सबसे पहले उसे अपने लिए जमानत का आवेदन दाखिल करना चाहिए-
1. जमानती अपराधों (bailable offenses)जैसे मामलो में कानून के तहत मुलजिम अधिकार स्वरूप अपने लिए जमानत की मांग कर सकता है। ऐसे मामलों में आपको जमानत के लिए आवेदन देने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि केवल बेलबाण्ड संख्या-45(Bail bond- 45) भरकर न्यायालय में पेश करना होता है। यदि एक बार अभियुक्त बेलबाण्ड की शर्तों का पालन नहीं करता है यानि बेलबाण्ड में लिखे समय और स्थान पर हाजिर नहीं होता है, तो अगली बार न्यायालय उसकी जमानत याचिका को खारिज कर सकता है। ऐसी स्थिति में अभियुक्त जमानत योग्य अपराध में अधिकारस्वरूप जमानत का हकदार नहीं होता है।
जमानती मामले में अभियुक्त को जमानत उसका अधिकार होता है, जिसे उसे समस्त शर्तो को पूर्ण करने के पश्चात् आसानी से bail ले सकेगा। यदि अभियुक्त किसी मामले में बेल लेने के उपरांत निश्चित समय, स्थान और नियत तिथि पर न्यायालय के समक्ष उपस्थित नही होता है, तो भी उसकी बेल न्यायालय द्वारा निरस्त कर सकता है, इसके अलावा अर्थदंड भी लगाने की शक्ति है।
जमानती अपराध के मामले में यदि कोई अभियुक्त गिरफ्तारी के एक सप्ताह के भीतर किसी व्यक्ति को अपने जमानती के तौर पर पेश करने में असफल रहता है, तो पुलिस और न्यायालय उसे जमानत पेश नहीं कर सकता है। न्यायालय ऐसे किसी भी व्यक्ति को उसी की जिम्मेदारी पर यानि बाण्ड भरने पर जमानत दे सकते है। ऐसी हालत में उसे किसी जमानती की जरूरत नहीं होती है।
2. गैर जमानती अपराधों (Nonbailable offenses) जैसे मामलों में अभियुक्त को अपनी जमानत के लिए न्यायालय के समक्ष आवेदन दाखिल करना पड़ता है। इसके बाद यह न्यायालय पर निर्भर है कि आपको जमानत दी जाएगी या नहीं। यदि जानना चाहते हैं कि कौन-सा अपराध जमानती है और कौन-सा गैर जमानती, तो इसका विस्तारपूर्वक विवरण दण्ड प्रक्रिया संहिता (कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर) में दिया गया है। यदि कोई अपराध विशेष नियमों तथा अधिनियमों के अन्तर्गत आता है, तो जमानत के लिए उस अधिनियम में दिए गए प्रावधानों के अनुसार दरखास्त दी जाती है।
किन परिस्थितियों में न्यायालय जमानत देने से इनकार कर सकता है? (Under what circumstances can the court refuse to grant bail.)
यदि न्यायालय को लगता है कि अभियुक्त द्वारा अपराध किए जाने के पुख्ता सबूत मौजूद हैं और उसके द्वारा किए गए अपराध की सजा फांसी या उम्रकैद है, तो वह अभियुक्त को जमानत पर रिहा करने से मना कर सकता है।
इसके अलावा यदि न्यायालय अभियुक्त के पूर्व रिकार्ड को देखकर भी निर्णय ले सकती है।
महिलाओं तथा बच्चों के मामलों में जमानत (Bail in cases of women and children.)
यदि किसी 16 साल से कम उम्र के बच्चे या महिला या बीमार या अत्यंत दुर्बल व्यक्ति को किसी गैर जमानती अपराध के मामले में हिरासत में लिया गया है अथवा उसे संदेह के आधार पर हिरासत में लिया गया है, तो न्यायालय उसकी जमानत का आदेश दे सकती है। यदि न्यायालय इस बात से संतुष्ट है कि ऐसे किसी व्यक्ति को जिसकी उम्र 16 साल से कम है या वह महिला या बीमार व्यक्ति है, किन्हीं विशेष कारणों से जमानत देना उचित है, तो वह उसे जमानत दे सकता है।
अग्रिम जमानत (Anticipatory bail)
क्या करें जब पुलिस जांच या अदालती कार्यवाही के दौरान अपको अपनी गिरफ्तारी की आशंका है?
किसी गैर जमानती अपराध के मामले में यदि आपको पुलिस जांच या अदालती कार्यवाही के दौरान अपनी गिरफ्तारी की आशंका है, तो आप गिरफ्तारी से पहले अपने लिए जमानत का आवेदन कर सकते हैं। इसे अग्रिम जमानत कहा जाता है। अग्रिम जमानत की याचिका सेशन जज या उच्च न्यायालय में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के तहत पेश की जाती है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 SC/ST मामलों में लागू नहीं होगा। जब भी किसी मामले में अग्रिम जमानत स्वीकृत हो जाती है तो थाना प्रभारी (एस.एच.ओ.) को या गिरफ्तार करने आये कोई दूसरा पुलिस अधिकारी अभियुक्त/आवेदनकर्त्ता को गिरफ्तारी के समय न्यायालय के आदेश में लिखी जमानतनामे की शर्तों के आधार पर जमानत पर रिहा करना होता है।
क्या करें जब दहेज या उत्पीड़न के मामले में किसी अपने या स्वयं अथवा किसी सम्बन्धी को गिरफ्तारी की आशंका हो ?
यदि आपकी पत्नी, पुत्रवधू साली या भाभी ने आपके खिलाफ दहेज, उत्पीड़न और मारपीट का मामला दर्ज कराया है और आपको आशंका है कि पुलिस उस मामले में आपको गिरफ्तार कर सकती है, तो आप न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दाखिल कर सकते हैं। अग्रिम जमानत की सुनवाई करते समय सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय सरकारी वकील के माध्यम से पीड़ित पक्ष और पुलिस की बात सुनकर ही कोई फैसला सुनाता है। न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत देने के बाद थाना प्रभारी (एस.एच.ओ.) या गिरफ्तार करने आया कोई दूसरा पुलिस अधिकारी आपको न्यायालय के आदेशानुसार जमानतना की शर्तों के आधार पर जमानत पर रिहा कर देता है।
बेलबाण्ड यानि जमानतनामा (bail bond)
बेलबाण्ड यानि जमानतनामा एक तरह का आश्वासन है कि जब भी पुलिस या न्यायालय के सम्मुख पेश होने या किसी अन्य व्यक्ति को पेश करने के लिए कहा जाएगा तो आप उस आदेश का पालन करते निर्धारित समय और स्थान पर उपस्थित होंगे या वांछित व्यक्ति को पेश करेंगे। बेलबाण्ड पर आपके अलावा किसी अन्य व्यक्ति को भी यह आश्वासन / गारण्टी देनी होती है कि वह तय तारीख और समय पर आपको सम्बन्धित पुलिस अधिकारी या न्यायालय के सम्मुख पेश करेगा। इसलिए हमेशा ध्यान रखें कि जब भी आप आत्मसमर्पण के लिए पुलिसस्टेशन या न्यायालय में जा रहे हैं और आपको अपनी जमानत के लिए बेलबाण्ड दाखिल करना है, तो किसी व्यक्ति को अपने जमानती के तौर पर अवश्य साथ लेकर जाएं। बेलबाण्ड के छपे हुए नमूने न्यायालय परिसर में विक्रेताओं के पास उपलब्ध रहते हैं। यदि आप बेलबाण्ड पेश करने में असफल हो जाते हैं, तो जांचकर्त्ता पुलिस अधिकारी आपको गिरफ्तार कर सकती है। यदि आप बेलबाण्ड की शर्तों का उल्लंघन करते हैं या बिना किसी कारणवश या छोटे-मोटी वजह से न्यायालय/पुलिस अधिकारी के सम्मुख पेश नहीं होते हैं या पेश होने से मना कर देते हैं, तो आपको जुर्माने की पूरी राशि का भुगतान करना होता है। जुर्माने की यह राशि जमानती आदेश में लिखी बेलबाण्ड की राशि जितनी ही होती है, जो राज्य के खाते में जमा की जाती है। आदेशानुसार आपके न्यायालय में पेश नहीं होनी की स्थिति में आपका जमानती भी बतौर अभियुक्त न्यायालय में पेश नहीं कर पाने का जिम्मेदार हो जाता है और उसे भी जुर्माने की राशि का भुगतान करना पड़ सकता है।
बेलबाण्ड दाखिल करते समय इन महत्त्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिए
जब भी किसी अभियुक्त द्वारा जमानत पर रिहाई के लिए, न्यायालय के सम्मुख नियमित रूप से तय तारीख पर पेश होने की गारण्टी के तौर पर, बेलबाण्ड दाखिल किया जाता है तथा किसी जमानती को बतौर गौर करता है कि जो व्यक्ति अभियुक्त की जमानत दे रहा है, उसका आश्वासन पेश किया जाता है, तो न्यायालय सबसे पहले इस बात पर अभियुक्त पर कितना नियंत्रण है तथा क्या वह न्यायालय के निर्देशानुसार अभियुक्त को सुनवाई की तारीख पर न्यायालय में पेश कर पाएगा अथवा नहीं। इसके अतिरिक्त न्यायालय यह भी देखता है कि जमानती की आर्थिक स्थिति जमानत देने लायक है अथवा नहीं। इसलिए जब भी आपको अपनी जमानत के लिए किसी जमानती को न्यायालय में पेश करना हो, तो हमेशा ध्यान रखें कि उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी होनी चाहिए तथा वह न्यायालय को तारीख के दिन और समय पर आपकी नियमित पेशी के लिए संतुष्ट करने वाला होना चाहिए।
जमानत लेने या देने के लिये आवश्यक दस्तावेज
अभियुक्त की जमानत देते समय जमानती को न्यायालय के सामने अपनी पहचान, निवास, रोजगार, वेतन या मजबूत आर्थिक स्थिति दर्शाने वाले दस्तावेज प्रस्तुत करने होते हैं। इन दस्तावेजों में जमानती का फोटोग्राफ, राशनकार्ड, पहचान-पत्र, मतदाता पहचान-पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, पैनकार्ड, मासिक वेतन की रसीद, रोजगारदाता द्वारा दिया गया स्थाई रोजगार तथा वेतन का प्रमाणपत्र, किसान विकास पत्र, लघु या दीर्घावधि जमाराशि की रसीद, बैंक द्वारा दी गई स्थाई जमाराशि यानि फिक्स डिपोजिट की रसीद, जीवन बीमा सम्बन्धित कागजात इत्यादि शामिल हैं। बेलवाण्ड न्यायालय परिसर में विक्रेताओं के पास उपलब्ध रहते हैं। अपनी जमानत के लिए किसी दलाल, नकली जमानती या अज्ञात व्यक्ति के संपर्क में आने से बचें, क्योंकि यह आपके लिए किसी बड़ी मुसीबत का कारण बन सकता है।