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आईपीसी की धारा 508 | व्यक्ति को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करके कि वह दैवीय अप्रसाद का भाजन होगा, कराया गया कार्य | IPC Section- 508 in hindi| Act caused by inducing person to believe that he will be rendered an object of Divine displeasure.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 508 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 508 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 508 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 508 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई व्यक्ति यह विश्वास करने के लिए प्रेरित करने के कारण किया गया कार्य कि उसे दैवीय अप्रसन्नता का विषय बनाया जाएगा और विश्वास करने के लिये उत्प्रेरित करेगा, या उत्प्रेरित करने का प्रयत्न कराएगा, कि यदि वह उस बात को न करेगा जिसे उससे कराना अपराधी का उद्देश्य हो, या यदि वह उस बात को करेगा, जिसका उससे लोप कराना अपराधी का उद्देश्य हो, कराएगा, तो वह धारा 508 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 508 के अनुसार

व्यक्ति को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करके कि वह दैवीय अप्रसाद का भाजन होगा, कराया गया कार्य-

जो कोई किसी व्यक्ति को यह विश्वास करने के लिये उत्प्रेरित करके, या उत्प्रेरित करने का प्रयत्न करके, कि यदि वह उस बात को न करेगा, जिसे उससे कराना अपराधी का उद्देश्य हो, या यदि वह उस बात को करेगा, जिसका उससे लोप कराना अपराधी का उद्देश्य हो, तो वह या कोई व्यक्ति, जिससे वह हितबद्ध है, अपराधी के किसी कार्य से दैवी अप्रसाद का भाजन हो जाएगा, या बना दिया जाएगा, उस व्यक्ति से कोई ऐसी बात करवाएगा या करवाने का प्रयत्न करेगा, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध न हो, या किसी ऐसी बात के करने का लोप करवाएगा या करवाने का प्रयत्न करेगा, जिसे करने के लिये वह वैध रूप से हकदार हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
दृष्टान्त
(क) क, यह विश्वास कराने के आशय से य के द्वार पर धरना देता है कि इस प्रकार धरना देने से वह य को दैवी अप्रसाद का भाजन बना रहा है। क ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है।
(ख) क, य को धमकी देता है कि यदि य अमुक कार्य नहीं करेगा, तो क अपने बच्चों में से किसी एक का वध ऐसी परिस्थितियों में कर डालेगा जिससे ऐसे वध करने के परिणामस्वरूप यह विश्वास किया जाये, कि य दैवी अप्रसाद का भाजन बना दिया गया है। क ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है।

Act caused by inducing person to believe that he will be rendered an object of Divine displeasure
Whoever voluntarily causes or attempts to cause any person to do anything which that person is not legally bound to do, or to omit to do anything which he is legally entitled to do, by inducing or attempting to induce that person to believe that he or any person in whom he is interested will become or will be rendered by some act of the offender an object of Divine displeasure if he does not do the thing which it is the object the offender to cause him do, or if he does the thing which it is the object of the offender to cause him to omit, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to one year, or with fine, or with both.
Illustrations
(a) A sits dharna at Z’s door with the intention of causing it to be believed that, by so sitting, he renders Z an object of Divine displeasure, A has committed the offence defined in this section.
(b) A threatens Z that, unless Z performs a certain act, A will kill one of A’s own children. under such circumstances that the killing would be believed to render Z an object of Divine displeasure. A has committed the offence defined in this section.

लागू अपराध

व्यक्ति को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करके कि वह दैवी अप्रसाद का भाजन होगा, कराया गया कार्य।
सजा- एक वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना या दोनो।
यह अपराध एक जमानतीय और गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 508 के अंतर्गत जो कोई व्यक्ति यह विश्वास करने के लिए प्रेरित करने के कारण किया गया कार्य कि उसे दैवीय अप्रसन्नता का विषय बनाया जाएगा और विश्वास करने के लिये उत्प्रेरित करेगा, या उत्प्रेरित करने का प्रयत्न कराएगा, कि यदि वह उस बात को न करेगा जिसे उससे कराना अपराधी का उद्देश्य हो, या यदि वह उस बात को करेगा, जिसका उससे लोप कराना अपराधी का उद्देश्य हो, कराएगा, तो वह दोनों में से, किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा या जुर्माने से या दोनो से भी दण्डनीय होगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 508 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
व्यक्ति को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करके कि वह दैवी अप्रसाद का भाजन होगा, कराया गया कार्य।एक वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना या दोनो।गैर-संज्ञेयजमानतीयकिसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 508 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 507 | अनाम संसूचना द्वारा आपराधिक अभित्रास | IPC Section- 507 in hindi| Criminal intimidation by an anonymous communication.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 507 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 507 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 507 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 507 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई अनाम संसूचना (जिसने ऐसी सूचना फैलाई हो उसका अता-पता न हो)  द्वारा या उस व्यक्ति का, जिसने धमकी दी हो, नाम या निवास स्थान छिपाने की पूर्वावधानी करके आपराधिक अभित्रास का अपराध करेगा, तो वह धारा 507 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 507 के अनुसार

अनाम संसूचना द्वारा आपराधिक अभित्रास-

जो कोई अनाम संसूचना द्वारा या उस व्यक्ति का, जिसने धमकी दी हो, नाम या निवास स्थान छिपाने की पूर्वावधानी करके आपराधिक अभित्रास का अपराध करेगा, वह पूर्ववर्ती अन्तिम धारा द्वारा उस अपराध के लिये उपबन्धित दण्ड के अतिरिक्त, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा।

Criminal intimidation by an anonymous communication-
Whoever commits the offence of criminal intimidation by an anonymous communication, or having taken precaution to conceal the name or abode of the person from whom the threat comes, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, in addition to the punishment provided for the offence by the last preceding section.

लागू अपराध

अनाम संसूचना द्वारा अथवा वह धमकी कहाँ से आती है उसके छिपाने की पूर्वावधानी करके किया गया आपराधिक अभित्रास।
सजा- ऊपर की धारा के अधीन दण्ड के अतिरिक्त, दो वर्ष के लिए कारावास।
यह अपराध एक जमानतीय और गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 507 के अंतर्गत जो कोई अनाम संसूचना (जिसने ऐसी सूचना फैलाई हो उसका अता-पता न हो)  द्वारा या उस व्यक्ति का, जिसने धमकी दी हो, नाम या निवास स्थान छिपाने की पूर्वावधानी करके आपराधिक अभित्रास का अपराध करेगा, तो वह पूर्ववर्ती अन्तिम धारा द्वारा उस अपराध के लिये उपबन्धित दण्ड के अतिरिक्त, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 507 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
अनाम संसूचना द्वारा अथवा वह धमकी कहाँ से आती है उसके छिपाने की पूर्वावधानी करके किया गया आपराधिक अभित्रास।ऊपर की धारा के अधीन दण्ड के अतिरिक्त, दो वर्ष के लिए कारावास।गैर-संज्ञेयजमानतीयप्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 507 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 505 | लोक रिष्टिकारक वक्तव्य | IPC Section- 505 in hindi| Statement conducing to public mischief.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 505 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 505 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 505 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 505 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई व्यक्ति समाज में किसी कथन के संबंध में मिथ्या कथन, जनश्रुति आदि को इस आशय से परिचालित करना कि विद्रोह हो अथवा लोक-शान्ति के विरुद्ध अपराध कारित करेगा, तो वह धारा 505 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 505 के अनुसार

लोक रिष्टिकारक वक्तव्य –

(1) जो कोई किसी कथन, जनश्रुति या रिपोर्ट को-
(क) इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य कि, भारत की सेना, नौसेना या वायुसेना का कोई आफिसर, सैनिक, नाविक या वायुसैनिक विद्रोह करे या अन्यथा वह अपने उस नाते अपने कर्तव्य की अवहेलना करे या उसके पालन में असफल रहे, अथवा
(ख) इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, लोक या लोक के किसी भाग को ऐसा भय या संत्रास कारित हो जिससे कोई व्यक्ति राज्य के विरुद्ध या लोक-प्रशान्ति के विरुद्ध अपराध करने के लिये उत्प्रेरित हो, अथवा
(ग) इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, उससे व्यक्तियों का कोई वर्ग या समुदाय किसी दूसरे वर्ग या समुदाय के विरुद्ध अपराध करने के लिये उद्दीप्त किया जाये,
रचेगा, प्रकाशित करेगा या परिचालित करेगा, वह कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जायेगा।

Statement conducing to public mischief
(1) Whoever makes, publishes or circulates any statement, rumour or report,-
(a) with intent to cause, or which is likely to cause, any officer, soldier, sailor or airman in the Army, Navy or Air Force of India to mutiny or otherwise disregard or fail in his duty as such ; or
(b) with intent to cause, or which is likely to cause, fear or alarm to the public or to any section of the public whereby any person may be induced to commit an offence against the State or against the public tranquillity; or
(c) with intent to incite, or which is likely to incite, any class or community of persons to commit any offence against any other class or community,
shall be punished with imprisonment which may extend to three years, or with fine, or with both.

लागू अपराध

मिथ्या कथन, जनश्रुति आदि को इस आशय से परिचालित करना कि विद्रोह हो अथवा लोक-शान्ति के विरुद्ध अपराध हो।
सजा- तीन वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना या दोनों।
यह अपराध एक गैर-जमानतीय और गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 505 के अंतर्गत  जो कोई व्यक्ति समाज में किसी कथन के संबंध में मिथ्या कथन, जनश्रुति आदि को इस आशय से परिचालित करना कि विद्रोह हो अथवा लोक-शान्ति के विरुद्ध अपराध कारित हो ऐसा करेगा, तो वह दोनों में से, किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा या जुर्माने या दोनों से भी दण्डनीय होगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 505 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नहीं मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
मिथ्या कथन, जनश्रुति आदि को इस आशय से परिचालित करना कि विद्रोह हो अथवा लोक-शान्ति के विरुद्ध अपराध हो।तीन वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना या दोनों।गैर-संज्ञेयगैर-जमानतीयकिसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 505 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 503 | आपराधिक अभित्रास | IPC Section- 503 in hindi | Criminal intimidation.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 503 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 503? साथ ही हम आपको IPC की धारा 503, क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

IPC की धारा 503 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 503 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय दंड संहिता की धारा 503 में आपराधिक अभित्रास (Criminal intimidation) को परिभाषित किया गया है, इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे।

आईपीसी की धारा 503 के अनुसार

आपराधिक अभित्रास-

जो कोई किसी अन्य व्यक्ति के शरीर, ख्याति या सम्पत्ति को, या किसी ऐसे व्यक्ति के शरीर या ख्याति को, जिससे कि वह व्यक्ति हितबद्ध हो, कोई क्षति करने की धमकी उस अन्य व्यक्ति को इस आशय से देता है कि उसे संत्रास कारित किया जाये, या उससे ऐसी धमकी के निष्पादन का परिवर्जन करने के साधन स्वरूप कोई ऐसा कार्य कराया जाये, जिसे करने के लिये वह वैध रूप से आबद्ध न हो या किसी ऐसे कार्य को करने का लोप कराया जाए जिसे करने के लिए वह वैध रूप से हकदार हो, वह आपराधिक अभित्रास करता है ।
स्पष्टीकरण- किसी ऐसे मृत व्यक्ति की ख्याति को क्षति करने की धमकी, जिससे वह व्यक्ति, जिसे धमकी दी गई है, हितबद्ध हो, इस धारा के अन्तर्गत आता है।
दृष्टान्त
सिविल वाद चलाने से उपरत रहने के लिये ख को उत्प्रेरित करने के प्रयोजन से ख के घर को जलाने की धमकी क देता है। क आपराधिक अभित्रास का दोषी है।

Criminal intimidation-
Whoever threatens another with any injury to his person, reputation or property, or to the person or reputation of any one in whom that person is interested, with intent to cause alarm to that person, or to cause that person to do any act which he is not legally bound to do, or to omit to do any act which that person is legally entitled to do, as the means of avoiding the execution of such threat, commits criminal intimidation.
Explanation- A threat to injure the reputation of any deceased person in whom the person threatened is interested, is within this section.
Illustration
A, for the purpose of inducing B to desist from prosecutting a civil suit, threatens to burn B’s house. A is guilty of criminal intimidation.

आपराधिक अभित्रास क्या है?

साधारण भाषा में आपराधिक अभित्रास (Criminal intimidation), जो कोई किसी व्यक्ति के शरीर अथवा उसकी किसी संपत्ति को क्षति करने की धमकी या हासिल करने के उद्देश्य से धमकाता है अथवा किसी कार्य को पूर्ण कराने के उद्देश्य से किसी व्यक्ति को धमकाता है, जब कि वह व्यक्ति यह कार्य करने के लिए वैध रूप से आबद्ध न हो या किसी ऐसे कार्य को करने का लोप कराया जाए, उसे आपराधिक अभित्रास (Criminal intimidation) कहते हैं।

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 503 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
धन्यवाद

आईपीसी की धारा 493 | विधिपूर्ण विवाह का प्रवंचना से विश्वास उत्प्रेरित करने वाले पुरुष द्वारा कारित सहवास | IPC Section- 493 in hindi| Cohabitation caused by a man deceitfully inducing a belief of lawful marriage.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 493 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 493 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 493 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 493 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई पुरुष, जो किसी स्त्री को, जो विधिपूर्वक उससे विवाहित न हो, प्रवंचना से यह विश्वास कारित करेगा कि वह विधिपूर्वक उससे विवाहित है और इस विश्वास में उस स्त्री का अपने साथ सहवास या मैथुन कारित करेगा, तो वह धारा 493 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 493 के अनुसार

विधिपूर्ण विवाह का प्रवंचना से विश्वास उत्प्रेरित करने वाले पुरुष द्वारा कारित सहवास-

हर पुरुष, जो किसी स्त्री को, जो विधिपूर्वक उससे विवाहित न हो, प्रवंचना से यह विश्वास कारित करेगा कि वह विधिपूर्वक उससे विवाहित है और इस विश्वास में उस स्त्री का अपने साथ सहवास या मैथुन कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

Cohabitation caused by a man deceitfully inducing a belief of lawful marriage-
Every man who by deceit causes any woman who is not lawfully married to him to believe that she is lawfully married to him and to cohabit or have sexual intercourse with him in that belief, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.

लागू अपराध

पुरुष द्वारा स्त्री को, जो उससे विधिपूर्वक विवाहित नहीं है, प्रवंचना से विश्वास कारित करके कि वह उससे विधिपूर्वक विवाहित है, उस विश्वास में उससे सहवास करना।
सजा- दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
यह अपराध एक गैर-जमानतीय और गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 493 के अंतर्गत जो कोई पुरुष, जो किसी स्त्री को, जो विधिपूर्वक उससे विवाहित न हो, प्रवंचना से यह विश्वास कारित करेगा कि वह विधिपूर्वक उससे विवाहित है और इस विश्वास में उस स्त्री का अपने साथ सहवास या मैथुन कारित करेगा, तो वह दोनों में से, किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 493 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नहीं मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
पुरुष द्वारा स्त्री को, जो उससे विधिपूर्वक विवाहित नहीं है, प्रवंचना से विश्वास कारित करके कि वह उससे विधिपूर्वक विवाहित है, उस विश्वास में उससे सहवास करना।दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।गैर-संज्ञेयगैर-जमानतीयप्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 493 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 491 | असहाय व्यक्ति की परिचर्या करने की और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की संविदा का भंग | IPC Section- 491 in hindi| Breach of contract to attend on and supply wants of helpless person.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 491 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 491 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 491 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 491 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई किसी ऐसे व्यक्ति की, जो किशोरावस्था या चित्तविकृति या रोग या शारीरिक दुर्बलता के कारण असहाय है, या अपने निजी क्षेम की व्यवस्था या अपनी निजी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये असमर्थ है परिचर्या करने के लिये या उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये विधिपूर्ण संविदा द्वारा आबद्ध होते हुये, स्वेच्छया ऐसा करने का लोप करेगा, तो वह धारा 491 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 491 के अनुसार

असहाय व्यक्ति की परिचर्या करने की और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की संविदा का भंग-

जो कोई किसी ऐसे व्यक्ति की, जो किशोरावस्था या चित्तविकृति या रोग या शारीरिक दुर्बलता के कारण असहाय है, या अपने निजी क्षेम की व्यवस्था या अपनी निजी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये असमर्थ है, परिचर्या करने के लिये या उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये विधिपूर्ण संविदा द्वारा आबद्ध होते हुये, स्वेच्छया ऐसा करने का लोप करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो सौ रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जायगा।

Breach of contract to attend on and supply wants of helpless person-
Whoever, being bound by a lawful contract to attend on or to supply the wants of any person who, by reason of youth, or of unsoundness of mind, or of a disease or bodily weakness, is helpless or incapable of providing for his own safety or of supplying his own wants, voluntarily omits so to do, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three months, or with fine which may extend to two hundred rupees, or with both.

लागू अपराध

किशोरावस्था या चित्तविकृति या रोग के कारण असहाय व्यक्ति की परिचर्या करने या उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए आबद्ध होते हुए उसे करने का स्वेच्छया लोप।
सजा- तीन मास के लिए कारावास या दो सौ रुपए का जुर्माना या दोनो।
यह अपराध एक जमानतीय और गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 491 के अंतर्गत जो कोई किसी ऐसे व्यक्ति की, जो किशोरावस्था या चित्तविकृति या रोग या शारीरिक दुर्बलता के कारण असहाय है, या अपने निजी क्षेम की व्यवस्था या अपनी निजी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये असमर्थ है परिचर्या करने के लिये या उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये विधिपूर्ण संविदा द्वारा आबद्ध होते हुये, स्वेच्छया ऐसा करने का लोप करेगा, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो सौ रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जायगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 491 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
किशोरावस्था या चित्तविकृति या रोग के कारण असहाय व्यक्ति की परिचर्या करने या उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए आबद्ध होते हुए उसे करने का स्वेच्छया लोप।तीन मास के लिए कारावास या दो सौ रुपए का जुर्माना या दोनो।गैर-संज्ञेयजमानतीयकिसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 491 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।