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आईपीसी की धारा 386 | किसी व्यक्ति को मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालकर उद्दापन | IPC Section- 386 in hindi| Extortion by putting a person in fear of death or grievous hurt.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 386 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 386 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 386 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 386 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उसकी या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालकर उद्दापन करेगा, तो वह धारा 386 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 386 के अनुसार

किसी व्यक्ति को मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालकर उद्दापन–

जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उसकी या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालकर उद्दापन करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

Extortion by putting a person in fear of death or grievous hurt-
Whoever commits extortion by putting any person in fear of death or of grievous burt to that person or to any other, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.

लागू अपराध

किसी व्यक्ति को मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालकर उद्दापन।
सजा- दस वर्ष के लिए कारावास, या जुर्माना या दोनो।
यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 386 के अंतर्गत जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उसकी या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालकर उद्दापन करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 386 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
किसी व्यक्ति को मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालकर उद्दापन।दस वर्ष के लिए कारावास, या जुर्माना या दोनो।संज्ञेयगैर-जमानतीयप्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 386 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 385 | उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को क्षति के भय में डालना | IPC Section- 385 in hindi| Putting person in fear of injury in order to commit extortion.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 385 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 385 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 385 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 385 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को किसी क्षति के पहुँचाने के भय में डालेगा या भय में डालने का प्रयत्न करेगा, तो वह धारा 385 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 385 के अनुसार

उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को क्षति के भय में डालना-

जो कोई उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को किसी क्षति के पहुँचाने के भय में डालेगा या भय में डालने का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

Putting person in fear of injury in order to commit extortion-
Whoever, in order to the committing of extortion, puts any person in fear, or attempts to put any person in fear of any injury, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, or with fine, or with both.

लागू अपराध

उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को क्षति के भय में डालना या डालने का प्रयत्न करना।
सजा- दो वर्ष के लिए कारावास, या जुर्माना या दोनो।
यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 385 के अंतर्गत जो कोई उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को किसी क्षति के पहुँचाने के भय में डालेगा या भय में डालने का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 385 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को क्षति के भय में डालना या डालने का प्रयत्न करना।दो वर्ष के लिए कारावास, या जुर्माना या दोनो।संज्ञेयगैर-जमानतीयकिसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 385 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 384 | उद्दापन के लिये दण्ड | IPC Section- 384 in hindi| Punishment for extortion.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 384 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 384 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 384 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 384 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई उद्दापन करेगा, अर्थात् जो कोई व्यक्ति, किसी व्यक्ति को डरा धमकाकर उसकी किसी मूल्यवान वस्तु अथवा उसकी संपत्ति को लेने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करेगा, तो वह धारा 384 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 384 के अनुसार

उद्दापन के लिये दण्ड-

जो कोई उद्दापन करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

Punishment for extortion-
Whoever commits extortion shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three years, or with fine, or with both.

लागू अपराध

उद्दापन के लिये दण्ड।
सजा- तीन वर्ष के लिए कारावास, या जुर्माना या दोनो।
यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 384 के अंतर्गत जो कोई उद्दापन (Extortion) करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 384 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
उद्दापन के लिये दण्ड।तीन वर्ष के लिए कारावास, या जुर्माना या दोनो।संज्ञेयगैर-जमानतीयकिसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 384 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 383 | उद्दापन | IPC Section- 383 in hindi| Extortion.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 383 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 383? साथ ही हम आपको IPC की धारा 383 के अंतर्गत क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 383 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 383 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई, किसी व्यक्ति को इस आशय से उसे अथवा अन्य को क्षति पहुंचाने का भय कारीत करेगा, इस तरह से भय डाले गए व्यक्ति अपनी कोई संपत्ति या मूल्यवान वस्तु उसे देने के लिए बेईमानी से प्रेरित करता हो, तो वह धारा 383 के अंतर्गत के उद्दापन कहा जायेगा।

आईपीसी की धारा 383 के अनुसार

उद्दापन-

जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उस व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति को कोई क्षति करने के भय में साशय डालता है, और तद्वारा इस प्रकार भय में डाले गये व्यक्ति को, कोई सम्पत्ति या मूल्यवान् प्रतिभूति या हस्ताक्षरित या मुद्रांकित कोई चीज, जिसे मूल्यवान् प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सके, किसी व्यक्ति को परिदत्त करने के लिये बेईमानी से उत्प्रेरित करता है, वह ‘उद्दापन’ करता है।
दृष्टान्त
(क) क यह धमकी देता है कि यदि य ने उसको धन नहीं दिया, तो वह य बारे में मानहानिकारक अपमानलेख प्रकाशित करेगा। अपने को धन देने के लिए वह इस प्रकार य को उत्प्रेरित करता है। क ने उद्दापन किया है।
(ख) क य को यह धमकी देता है कि यदि वह क को कुछ धन देने के संबंध में अपने आपको आबद्ध करने वाला एक वचनपत्र हस्ताक्षरित करके क को परिदत्त नहीं कर देता, तो वह य के शिशु को सदोष परिरोध में रखेगा। य वचनपत्र हस्तक्षरित करके परिदत्त कर देता है। क ने उद्दापन किया है।

Extortion-
Whoever intentionally puts any person in fear of any injury to that person, or to any other, and thereby dishonestly induces the person so put in fear to deliver to any person any property or valuable security, or anything signed or sealed which may be converted into a valuable security, commits “extortion”.
Illustrations
(a) A threatens to publish a defamatory libel concerning Z unless Z gives him money. He thus induces Z to give him money. A has committed extortion.
(b) A threatens Z that he will keep Z’s child in wrongful confinement, unless Z will sign and deliver to A a promissory note binding Z to pay certain money to A. Z signs and delivers the note. A has committed extortion.

उद्दापन (Extortion) क्या है?

उद्दापन (Extortion) को हम साधारण भाषा में जबरदस्ती वसूली समझ सकते है, जब भी कोई किसी व्यक्ति को अथवा उसके परिवार को, इस प्रकार डरा धमकाकर किसी मूल्यवान वस्तु अथवा उसकी संपत्ति को लेने का प्रयास करता है, जिस पर उसका कोई अधिकार नहीं है तो उसे उद्दापन (Extortion) करना कहते है।

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 383 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

GST मे रजिस्ट्रेशन कराना किनको आवश्यक है और किनको नही, साथ ही सीजीएसटी एक्ट की धारा 22 एवम् धारा 23 इस संबंध में क्या कहती है?

नमस्कार दोस्तों, आज हम जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विस टैक्स में जीएसटी रजिस्ट्रेशन किन लोगो को लेना आवश्यक है और किन्हें जीएसटी रजिस्ट्रेशन लेने की आवश्यकता भी नहीं है, साथ ही सीजीसीटी एक्ट की धारा 22 एवम् 23 इस संबंध में क्या कहती है। इन बिंदुओं पर चर्चा करेंगे।

रजिस्ट्रेशन करवाना किसके लिए आवश्यक है [धारा 23]-

सीजीएसटी एक्ट 2017 की धारा 22 के तहत निम्न श्रेणी के व्यवहारियों को जीएसटी के तहत रजिस्ट्रेशन करवाना आवश्यक है-

(1) प्रत्येक सप्लावर जो किसी भी राज्य या यूनियन टेरेटरी स्पेशल केटेगरी स्टेट को छोड़कर से माल या सेवा की सप्लाई करता है, रजिस्ट्रेशन कराना आवश्यक है यदि उसकी एक वित्तीय वर्ष में एग्रीगेट टर्नओवर 20 लाख रु से अधिक है।

धारा 22(1) के प्रथम प्रोविजो के अनुसार स्पेशल कैटेगरी स्टेट के मामले में एग्रीगेट टर्नओवर की लिमिट 10 लाख रु होगी।

धारा 22(1) के दूसरे प्रोविजो के अनुसार सरकार किसी स्पेशल केटेगरी स्टेट की प्रार्थना पर प्रथम प्रोविजो में दी गई 10 लाख रु की एग्रीगेट टर्नओवर लिमिट को 10 लाख रु से बढ़ाकर 20 लाख रु कर सकती है। यानि यदि कोई स्पेशल केटेगरी स्टेट चाहती है कि उसके राज्य में 20 लाख रु तक की एग्रीगेट टर्नओवर तक रजिस्ट्रेशन अनिवार्य ना हो तो सरकार ऐसी आज्ञा प्रदान कर सकती है।

धारा 22(1) के तीसरे प्रोविजों के अनुसार यदि कोई राज्य केन्द्र सरकार से प्रार्थना करता है कि यदि किसी व्यवहारी की एग्रीगेट टर्नओवर केवल माल की सप्लाई के मामले में 40 लाख रु से अधिक नहीं है तो वह रजिस्ट्रेशन के लिए दायी ना हो तो केन्द्र सरकार उसे यह आज्ञा प्रदान कर सकती है। इसके अनुसार यदि किसी व्यवहारी की केवल माल सप्लाई की एग्रीगेट टर्नओवर 40 लाख रु से अधिक नहीं है तो वह रजिस्ट्रेशन के लिए दायी नही होगा।

स्पष्टीकरण- इस प्रोविजो में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि किसी व्यवहारी द्वारा कर मुक्त सप्लाई जैसे जमा, लोन या एडवांस की सेवा प्रदान की जाती है जिसका प्रतिफल ब्याज या डिस्काउन्ट के रूप में प्राप्त होता है तो भी उसे केवल माल का सप्लायर ही माना जायेगा तथा उसे 40 लाख रु तक की एग्रीगेट टर्नओवर पर रजिस्ट्रेशन करवाने की आवश्यकता नहीं है।

(2)जो व्यक्ति जीएसटी लागू होने की तिथी को किसी पूर्व कानून के तहत रजिस्टर्ड था तो उसे जीएसटी के तहत आवश्यक रूप से रजिस्ट्रेशन कराना होगा। [धारा 22(2)]

(3) यदि किसी पंजीकृत व्यवहारी द्वारा किये जा रहे व्यापार को गोइंग कन्सर्न के रूप में ट्रांस्फर कर दिया जाता है चाहे वह उत्तराधिकारी के रूप में हो या अन्य प्रकार से तो ट्रांस्फरी या उत्तराधिकारी जैसी भी परिस्थिति हो को ट्रांस्फर की तिथी से रजिस्ट्रेशन करवाना होगा। [धारा 22(3)]

(4) अमालगमेशन एवं डी-मर्जर के मामले में ट्रांस्फरी को रजिस्ट्रार ऑफ कम्पनीज द्वारा इनकारपोरेशन का सर्टिफिकेट जारी करने की तिथी से रजिस्ट्रेशन लेना आवश्यक होगा। [धारा 22(4)]

स्पष्टीकरण
(i) एग्रीगेट टर्नओवर में कर योग्य व्यक्ति द्वारा की गई सभी सप्लाई शामिल होगी चाहे वह उसने स्वयं के एकाउन्ट में की हो या प्रिंसिपल के लिए की हो।

जॉबवर्क के बाद रजिस्टर्ड जोबवर्कर द्वारा की गई सप्लाई प्रिंसिपल द्वारा की गई सप्लाई मानी जायेगी तथा उस सप्लाई का मूल्य जॉब वर्कर के एग्रीगेट टर्न ओवर में नहीं जोड़ा जायेगा।

(iii) स्पेशल कैटेगरी स्टेट में संविधान के आर्टिकल 279ए के क्लाज (4) के सब क्लाज (g) में शामिल राज्य आते है। लेकिन इनमें जम्मू एवं कश्मीर एवं अरुणाचल प्रदेश, आसाम, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, सिक्किम एवं उत्तराखण्ड शामिल नहीं होंगे।

किन व्यक्तियों को रजिस्ट्रेशन करवाने की आवश्यकता नहीं है- [धारा 23]

(1) धारा 22(1) में आवश्यक होने के बावजूद निम्नलिखित व्यक्ति रजिस्ट्रेशन कराने के लिए दायी नहीं माने जायेंगे।

(a) ऐसा व्यक्ति जो केवल ऐसे माल या सेवा की सप्लाई करता है जो कि पूर्णत करमुक्त है। यानि केवल करमुक्त माल की बिक्री करने पर या करमुक्त सेवा सप्लाई करने वाले व्यवहारियों को जीएसटी के तहत रजिस्ट्रेशन की कोई आवश्यकता नहीं है चाहे उनकी एग्रीगेट टर्नओवर 20 लाख/40 लाख रु से अधिक ही क्यों ना हो।

(b) एक किसान जो खेती के उत्पाद की सप्लाई करता है। यह छूट तभी उपलब्ध है जब वह केवल खेती के उत्पाद की ही सप्लाई करता है। [धारा 23(1)]

2) इसके अतिरिक्त जीएसटी काउंसिल की सिफारिश पर सरकार कुछ श्रेणी के व्यक्तियों को रजिस्ट्रेशन से छूट प्रदान कर सकती है। [धारा 23(2)]
सरकार ने अब तक विभिन्न अधिसूचनाओं द्वारा निम्न श्रेणी के व्यक्तियों को इस धारा के तहत रजिस्ट्रेशन में छूट प्रदान की है

(i) 40 लाख रु तक की टर्नओवर वाले व्यवहारी अधिसूचना स. 10/2019-सीटी दिनांक 1.4.2019 ।

(ii) हैण्डीक्राफ्ट गुड्स की इंटर स्टेट कैजुअल सप्लाई करने वाले व्यवहारियों को रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं है अधिसूचना स. 56/2018-सीटी दिनांक 23.10.2018 |

(iii) यदि कोई सर्विस के सप्लायर इलैक्ट्रोनिक कामर्स ऑपरेटर के माध्यम से सेवा की सप्लाई करते है तथा उनकी पूरे भारत में मिला कर सप्लाई 20 लाख रु से अधिक नहीं है उन्हें रजिस्ट्रेशन करवाने की आवश्यकता नहीं है अधिसूचना स. 65/2017 सीटी दिनांक 15.11.2017।

(iv) सर्विसेज की इंटर स्टेट सप्लाई करने वाले व्यक्ति जिनकी एग्रीगेट टर्नओवर 20 लाख रु से अधिक नहीं है उन्हें 20 लाख रु तक की सप्लाई पर रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं है अधिसूचना स. 10/2017-आईटी दिनांक 13.10.2017 ।

(v) ऐसा जॉब वर्कर जो धारा 22(1) के तहत रजिस्ट्रेशन के लिए दायी नहीं है यदि इंटरस्टेट सप्लाई करता है तो उसे रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता नही है अधिसूचना स. 07/2017-आईटी दिनांक 14.09.20171 ।

(vi) ऐसे माल या सेवा के सप्लायर्स जिनकी सप्लाई पर धारा 9(3) के तहत सप्लाई प्राप्तकर्ता को टैक्स का भुगतान करना होता है – अधिसूचना स. 05/2017-सीटी दिनांक 19.06.2017 ।

आईपीसी की धारा 377 | प्रकृति विरुद्ध अपराध | IPC Section- 377 in hindi| Unnatural offences.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 377 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 377 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई, किसी पुरुष, स्त्री या जीव-जन्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्द्रिय-भोग करेगा, तो वह धारा 377 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 377 के अनुसार

प्रकृति विरुद्ध अपराध-

जो कोई, किसी पुरुष, स्त्री या जीव-जन्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्द्रिय-भोग करेगा, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। स्पष्टीकरण- इस धारा में वर्णित अपराध के लिये आवश्यक इन्द्रिय-भोग गठित करने के लिये प्रवेशन पर्याप्त है।

Unnatural offences-
Whoever voluntarily has carnal intercourse against the order of nature with any man, woman, or animal, shall be punished with imprisonment for life, or with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.
Explanation- Penetration is sufficient to constitute the carnal intercourse necessary to the offence described in this section.

लागू अपराध

प्रकृति विरुद्ध अपराध।
सजा- आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के अंतर्गत जो कोई, किसी पुरुष, स्त्री या जीव-जन्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्द्रिय-भोग करेगा, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
प्रकृति विरुद्ध अपराध।आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।संज्ञेयगैर-जमानतीयप्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 377 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।