नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 393 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 393 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 393 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 393 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई लूट करने का प्रयत्न करेगा, तो वह धारा 393 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।
आईपीसी की धारा 393 के अनुसार
लूट करने का प्रयत्न-
जो कोई लूट करने का प्रयत्न करेगा, वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
Attempts to commit robbery- Whoever attempts to commit robbery shall be punished with rigorous imprisonment for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine.
लागू अपराध
लूट करने का प्रयत्न। सजा- सात वर्ष के लिए कठिन कारावास और जुर्माना। यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।
जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 393 के अंतर्गत जो कोई लूट करने का प्रयत्न करेगा, वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायगा और जुर्माने से दंडित किया जाएगा।
जमानत (Bail) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 393 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नहीं मिल सकेगी।
अपराध
सजा
अपराध श्रेणी
जमानत
विचारणीय
लूट करने का प्रयत्न।
सात वर्ष के लिए कठिन कारावास और जुर्माना।
संज्ञेय
गैर-जमानतीय
प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 393 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 391 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 391? साथ ही हम आपको IPC की धारा 391, क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
IPC की धारा 391 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 391 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय दंड संहिता की धारा 391 में डकैती (Dacoity) को परिभाषित किया गया है, साथ ही लूट, डकैती कब कही जाएगी। यह भी, इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे।
आईपीसी की धारा 391 के अनुसार
डकैती-
जब कि पाँच या अधिक व्यक्ति संयुक्त होकर लूट करते हैं या करने का प्रयत्न करते हैं या जहाँ कि वे व्यक्ति, जो संयुक्त होकर लूट करते हैं या करने का प्रयत्न करते हैं और वे व्यक्ति जो उपस्थित हैं और ऐसी लूट के किये जाने या ऐसे प्रयत्न में मदद करते हैं, कुल मिलाकर पाँच या अधिक हैं, तब हर व्यक्ति जो इस प्रकार लूट करता है या उसका प्रयत्न करता है या उसमें मदद करता है, कहा जाता है कि वह ‘डकैती” करता है ।
Dacoity- When five or more persons conjointly commit or attempt to commit a robbery, or where the whole number of persons conjointly committing or attempting to commit a robbery, and persons present and aiding such commission or attempt, amount to five or more, every person so committing, attempting or aiding, is said to commit “dacoity”.
लूट, डकैती कब कही जायेगी?
वैसे, जब पांच या पांच से अधिक व्यक्ति मिलकर किसी लूट को अंजाम देते हैं या देने का प्रयास करते है, तब उसे ही डकैती कहा जाता है, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यदि वे व्यक्ति, जो संयुक्त होकर लूट करते हैं या करने का प्रयत्न करते हैं और वे व्यक्ति जो उपस्थित हैं और ऐसी लूट के किये जाने या ऐसे प्रयत्न में मदद करते हैं वह सभी पांच या से पांच से अधिक व्यक्ति संयुक्त रूप से लूट करते है, इसे ही डकैती (Dacoity) कहा जाता है।
Important Notes- डकैती के लिए न्यूनतम पाँच व्यक्तियों का होना आवश्यक है, परन्तु धारा 391 कहीं पर यह नहीं कहतीं कि न्यूनतम पाँच व्यक्तियों का दोषसिद्ध किया जाना आवश्यक है।
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 391 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है। धन्यवाद
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 390 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 390? साथ ही हम आपको IPC की धारा 390, क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
IPC की धारा 390 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 390 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय दंड संहिता की धारा 390 में लूट (Robbery) को परिभाषित किया गया है, साथ ही चोरी कब लूट है और उद्दापन कब लूट है। इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे।।
आईपीसी की धारा 390 के अनुसार
लूट-
सब प्रकार की लूट में या तो चोरी या उद्दापन होता है। चोरी कब लूट है- चोरी “लूट” है, यदि उस चोरी को करने के लिये, या उस चोरी के करने में, या उस चोरी द्वारा अभिप्राप्त सम्पत्ति को ले जाने या ले जाने का प्रयत्न करने में अपराधी उस उद्देश्य से स्वेच्छया किसी व्यक्ति की मृत्यु, या उपहति या उसको, सदोष अवरोध या तत्काल मृत्यु का या तत्काल उपहति का, या तत्काल सदोष अवरोध का भय कारित करता है या कारित करने का प्रयत्न करता है। उद्दापन कब लूट है- उद्दापन ‘लूट’ है, यदि अपराधी वह उद्दापन करते समय भय में डाले गये व्यक्ति की उपस्थिति में है, और उस व्यक्ति को स्वयं उसकी या किसी अन्य व्यक्ति की तत्काल मृत्यु या तत्काल उपहति या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डालकर वह उद्दापन करता है और इस प्रकार भय में डालकर इस प्रकार भय में डाले गये व्यक्ति को उद्दापन की जाने वाली चीज उसी समय और वहाँ ही परिदत्त करने के लिये उत्प्रेरित करता है। स्पष्टीकरण- अपराधी का उपस्थित होना कहा जाता है, यदि वह उस अन्य व्यक्ति को तत्काल मृत्यु के, तत्काल उपहति के, या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डालने के लिए पर्याप्त रूप से निकट हो । दृष्टान्त (क) क, य को दबोच लेता है, और य के कपड़े में से य का धन और आभूषण य की सम्मति के बिना कपटपूर्वक निकाल लेता है। यहाँ, क ने चोरी की है और वह चोरी करने के लिए स्वेच्छया य का सदोष अवरोध कारित करता है। इसलिये क ने लूट की है। (ख) क, य को राजमार्ग पर मिलता है, एक पिस्तौल दिखलाता है और य की थैली मांगता है। परिणामस्वरूप य अपनी थैली दे देता है। यहाँ क ने य को तत्काल उपहति का भय दिखलाकर थैली उद्दापित की है और उद्दापन करते समय वह उसकी उपस्थिति में है। अतः क ने लूट की है। (ग) क राजमार्ग पर य और य के शिशु से मिलता है। क उस शिशु को पकड़ लेता है और यह धमकी देता है कि यदि य उसको अपनी थैली नहीं परिदत्त कर देता है, तो वह उस शिशु को कगार के नीचे फेंक देगा। परिणामस्वरूप य अपनी थैली परिदत्त कर देता है। यहाँ क ने य को यह भय कारित करके कि वह उस शिशु को, जो वहाँ उपस्थित है, तत्काल उपहति करेगा, य से उसकी थैली उद्दापित की है। इसलिये क ने य को लूटा है।
Robbery- In all robbery there is either theft or extortion. When theft is robbery- Theft is “robbery” if, an order to the committing of the theft, or in committing the theft, or in carrying away or attempting to carry away property obtained by the theft, the offender, for that end, voluntarily causes or attempts to cause to any person death or hurt or wrongful restraint, or fear of instant death or of instant hurt, or of instant wrongful restraint. When extortion is robbery- Extortion is “robbery” if the offender at the time of committing the extortion, is in the presence of the person put in fear, and commits the extortion by putting that person in fear of instant death, of instant hurt, or of instant wrongful restraint to that person, or to some other person, and, by so putting in fear, induces the person so put in fear then and there to deliver up the things extorted. Explanation- The offender is said to be present if he is sufficiently near to put the other person in fear of instant death, of instant hurt, or of instant wrongful restraint. Illustrations (a) A holds Z down, and fraudulently takes Z’s money and jewels from Z’s clothes. without Z’s consent. Here A has committed theft, and, in order to the committing of that theft, has voluntarily caused wrongful restraint to Z. A has therefore committed robbery. (b) A meets Z on the high road, shows a pistol, and demands Zs purse. Z, in consequence, surrenders his purse. Here A has extorted the purse from Z by putting him in fear of instant hurt, and being at the time of committing the extortion in his presence, A has therefore committed robbery. (c) A meets Z and Z’s child on the high road. A takes the child, and threatens to fling it down a precipice, unless Z delivers his purse. Z, in consequence, delivers his purse. Here A has extorted the purse from Z, by causing Z to be in fear of instant hurt to the child who is there present. A has therefore committed robbery on Z.
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 390 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है। धन्यवाद
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 389 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 389 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 389 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 389 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को, स्वयं उसके विरुद्ध या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध यह अभियोग लगाने का भय दिखलायेगा या यह भय दिखलाने का प्रयत्न करेगा कि उसने ऐसा अपराध किया है, या करने का प्रयत्न किया है जो मृत्यु से या आजीवन कारावास से, या दस वर्ष तक के कारावास से, दण्डनीय है, तो वह धारा 389 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।
आईपीसी की धारा 389 के अनुसार
उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को अपराध का अभियोग लगाने के भय में डालना–
जो कोई उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को, स्वयं उसके विरुद्ध या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध यह अभियोग लगाने का भय दिखलायेगा या यह भय दिखलाने का प्रयत्न करेगा कि उसने ऐसा अपराध किया है, या करने का प्रयत्न किया है, जो मृत्यु से या आजीवन कारावास से, या दस वर्ष तक के कारावास से, दण्डनीय है, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; तथा यदि वह अपराध ऐसा हो जो इस संहिता की धारा 377 के अधीन दण्डनीय है, तो वह आजीवन कारावास से दण्डित किया जा सकेगा।
Putting person in fear of accusation of offence, in order to commit extortion- Whoever, in order to the committing of extortion, puts or attempts to put any person in fear of an accusation, against that person or any other, of having committed, or attempted to commit, an offence punishable with death or with imprisonment for life, or with imprisonment for a term which may extend to ten years, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine; and, if the offence be punishable under Section 377 of this Code, may be punished with imprisonment for life.
लागू अपराध
उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय अपराध का अभियोग लगाने के भय में डालना। सजा- दस वर्ष के लिए कारावास, और जुर्माना। यदि अपराध प्रकृति विरुद्ध अपराध है। सजा- आजीवन कारावास। यह अपराध एक जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।
जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 389 के अंतर्गत जो कोई उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को, स्वयं उसके विरुद्ध या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध यह अभियोग लगाने का भय दिखलायेगा या यह भय दिखलाने का प्रयत्न करेगा कि उसने ऐसा अपराध किया है, या करने का प्रयत्न किया है जो मृत्यु से या आजीवन कारावास से, या दस वर्ष तक के कारावास से, दण्डनीय है, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, दण्डित किया जाएगा या यदि अपराध प्रकृति विरुद्ध अपराध किया गया है, तो वह आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा।
जमानत (Bail) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 389 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत मिल सकेगी।
अपराध
सजा
अपराध श्रेणी
जमानत
विचारणीय
उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय अपराध का अभियोग लगाने के भय में डालना।
दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना या दोनो।
संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा
यदि वह अपराध, जिसकी धमकी दी गई हो, प्रकृति विरुद्ध अपराध हो।
आजीवन कारावास
संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 389 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 388 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 388 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 388 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 388 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उसके विरुद्ध या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध यह अभियोग लगाने के भय में डालकर कि उसने कोई ऐसा अपराध किया है, या करने का प्रयत्न किया है, जो मृत्यु से या आजीवन कारावास से या ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय है, अथवा यह कि उसने किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा अपराध करने के लिये उत्प्रेरित करने का प्रयत्न किया है, उद्दापन करेगा, तो वह धारा 388 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।
आईपीसी की धारा 388 के अनुसार
मृत्यु या आजीवन कारावास, आदि से दण्डनीय अपराध का अभियोग लगाने की धमकी देकर उद्दापन-
जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उसके विरुद्ध या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध यह अभियोग लगाने के भय में डालकर कि उसने कोई ऐसा अपराध किया है, या करने का प्रयत्न किया है, जो मृत्यु से या आजीवन कारावास से या ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय है, अथवा यह कि उसने किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा अपराध करने के लिये उत्प्रेरित करने का प्रयत्न किया है, उद्दापन करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा, तथा यदि वह अपराध ऐसा हो जो इस संहिता की धारा 377 के अधीन दण्डनीय है तो वह आजीवन कारावास से दण्डित किया जा सकेगा।
Extortion by threat of accusation of an offence punishable with death or imprisonment for life, etc- Whoever commits extortion by putting any person in fear of an accusation against that person or any other, of having committed or attempted to commit any offence punishable with death, or with imprisonment for life, or with imprisonment for a term which may extend to ten years, or of having attempted to induce any other person to commit such offence, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine; and, if the offence be one punishable under Section 377 of this Code, may be punishable with imprisonment for life.
लागू अपराध
मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय अपराध का अभियोग लगाने की धमकी देकर उद्दापन। सजा- दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना या दोनो। यदि वह अपराध, जिसकी धमकी दी गई हो, प्रकृति विरुद्ध अपराध हो। सजा- आजीवन कारावास। यह अपराध एक जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।
जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 388 के अंतर्गत जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उसके विरुद्ध या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध यह अभियोग लगाने के भय में डालकर कि उसने कोई ऐसा अपराध किया है, या करने का प्रयत्न किया है, जो मृत्यु से या आजीवन कारावास से या ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय है, अथवा यह कि उसने किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा अपराध करने के लिये उत्प्रेरित करने का प्रयत्न किया है, उद्दापन करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा, या यदि वह अपराध जिसमे धमकी दी गई हो, प्रकृति विरुद्ध अपराध किया गया है तो वह आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा।
जमानत (Bail) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 388 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत मिल सकेगी।
अपराध
सजा
अपराध श्रेणी
जमानत
विचारणीय
मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय अपराध का अभियोग लगाने की धमकी देकर उद्दापन।
दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना या दोनो।
संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा
यदि वह अपराध, जिसकी धमकी दी गई हो, प्रकृति विरुद्ध अपराध हो।
आजीवन कारावास
संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 388 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 387 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 387 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 387 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 387 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को स्वयं उसकी या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालेगा या भय में डालने का प्रयत्न करेगा, तो वह धारा 387 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।
आईपीसी की धारा 387 के अनुसार
उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालना-
जो कोई उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को स्वयं उसकी या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालेगा या भय में डालने का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
Putting person in fear of death or of grievous hurt, in order to commit extortion- Whoever, in order to the committing of extortion, puts or attempts to put any person in fear of death or of grievous hurt to that person or to any other, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine.
लागू अपराध
उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालना या डालने का प्रयत्न करना। सजा- सात वर्ष के लिए कारावास, या जुर्माना या दोनो। यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।
जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 387 के अंतर्गत जो कोई उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति को स्वयं उसकी या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालेगा या भय में डालने का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
जमानत (Bail) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 387 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नही मिल सकेगी।
अपराध
सजा
अपराध श्रेणी
जमानत
विचारणीय
उद्दापन करने के लिये किसी व्यक्ति मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालना या डालने का प्रयत्न करना।
सात वर्ष के लिए कारावास, या जुर्माना या दोनो।
संज्ञेय
गैर-जमानतीय
प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 387 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।