नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 3 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 3? साथ ही हम आपको IPC की धारा 3 के अंतर्गत क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
IPC की धारा 3 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 3 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा जो कोई व्यक्ति भारत से परे किए गए अपराध के लिये जो कोई व्यक्ति किसी भारतीय विधि के अनुसार विचारण का पात्र हो, भारत से परे किए गए किसी कार्य के लिये उससे इस संहिता के उपबन्धों के अनुसार ऐसा बरता जायेगा, मानो वह कार्य भारत के भीतर किया गया था। यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 3 इसी बात को परिभाषित करती है।
आईपीसी की धारा 3 के अनुसार-
भारत से परे किए गए, किन्तु उसके भीतर विधि के अनुसार विचारणीय अपराधों का दण्ड-
भारत से परे किए गए अपराध के लिये जो कोई व्यक्ति किसी भारतीय विधि के अनुसार विचारण का पात्र हो, भारत से परे किए गए किसी कार्य के लिये उससे इस संहिता के उपबन्धों के अनुसार ऐसा बरता जायेगा, मानो वह कार्य भारत के भीतर किया गया था।
Punishment of offences committed beyond, but which by law may be tried within India- Any person liable, by any Indian law, to be tried for an offence committed beyond India shall be dealt with according to the provisions of this Code for any act committed beyond India in the same manner as if such act had been committed within India.
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 2 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है। धन्यवाद
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 2 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 2? साथ ही हम आपको IPC की धारा 2 के अंतर्गत क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
IPC की धारा 2 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 2 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा जो कोई व्यक्ति इस संहिता के उपबंधो के प्रतिकूल हर कार्य, लोप के लिए, अगर वह भारत के भीतर दोषी होगा, तब ही इस संहिता के आधीन दंडनीय होगा अथवा दंडनीय नही होगा। यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 2 इसी बात को परिभाषित करती है।
आईपीसी की धारा 2 के अनुसार-
भारत के भीतर किए गए अपराधों का दण्ड-
हर व्यक्ति इस संहिता के उपबन्धों के प्रतिकूल हर कार्य या लोप के लिए, जिसका वह भारत के भीतर दोषी होगा, इसी संहिता के अधीन दण्डनीय होगा, अन्यथा नहीं।
Punishment of offences committed within India- Every person shall be liable to punishment under this Code and not otherwise for every act or omission contrary to the provisions thereof, of which he shall be guilty within India.
भारतीय दंड संहिता की धारा 2 के अंतर्गत जो कोई व्यक्ति द्वारा किसी प्रकार का अपराध कारित किया गया है, यदि वह भारत के भीतर दोषी होगा तब ही वह दंडित किया जा सकता है, यदि वह किसी अन्य देश के बाहर का किसी अपराध दोषी है तो वह भारतीय दंड संहिता के अधीन अपराध का दोषी नही माना जायेगा।
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 2 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है। धन्यवाद
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 1 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 1? साथ ही हम आपको IPC की धारा 1 के अंतर्गत क्या परिभाषित करती है, और यह कहा-कहा लागू होती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
IPC की धारा 1 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 1 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा संहिता का नाम और उसके प्रवर्तन का विस्तार कहा-कहा लागू होता है, और कहा लागू होता है यह सभी बतलाती है यह धारा 1 भारतीय दंड संहिता (IPC) नाम और विस्तार को परिभाषित करती है।
आईपीसी की धारा 1 के अनुसार-
संहिता का नाम और उसके प्रवर्तन का विस्तार–
यह अधिनियम भारतीय दण्ड संहिता कहलाएगा, और इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर होगा।
Title and extent of operation of the Code– This Act shall be called the indian Penal Code, and shall extend to the whole of India except the State of Jammu and Kashmir.
वैसे क्या हम जानते है कि जम्मू और कश्मीर में IPC क्यू नही लागू होती थी? भारत देश के सभी कानूनी मामलों में IPC यानी भारतीय दंड संहिता लागू थी, लेकिन हमारे भारत देश के जम्मू और कश्मीर में क्यू नही लागू होती थी। आज हम आपको इस विषय पर पूर्ण चर्चा करेंगे। जब हमारा भारत देश आजाद हुआ था, उससे पहले से ही जम्मू और कश्मीर स्वतंत्र रियासती था। उस समय जम्मू कश्मीर में डोगरा राजवंश का शासन था। महाराजा रणबीर सिंह वहां के शासक थे। इसलिए वहां 1932 में महाराजा के नाम पर रणबीर दंड संहिता लागू की गई थी। यह संहिता थॉमस बैबिंटन मैकॉले की भारतीय दंड संहिता के ही समान थी। महत्वपूर्ण सूचना यह भी है कि Article 370 जम्मू और कश्मीर से हटाने के पश्चात् अब यहां भी IPC लागू होगी।
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 1 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 215 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 215? साथ ही हम आपको IPC की धारा 215 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
IPC की धारा 215 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 215 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई किसी व्यक्ति की किसी ऐसी जंगम सम्पत्ति के वापस करा लेने में, जिससे इस संहिता के अधीन दण्डनीय किसी अपराध द्वारा वह व्यक्ति वंचित कर दिया गया हो, सहायता करने के बहाने या सहायता करने की बाबत कोई परितोषण लेगा या लेने का करार करेगा या लेने को सहमत होगा, वह, जब तक कि अपनी शक्ति में के सब साधनों को अपराधी को पकड़वाने के लिये और अपराध के लिये दोषसिद्ध कराने के लिये उपयोग में न लाए, तो वह धारा 215 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।
आईपीसी की धारा 215 के अनुसार-
चोरी की सम्पत्ति इत्यादि के वापस लेने में सहायता करने के लिये उपहार लेना-
जो कोई किसी व्यक्ति की किसी ऐसी जंगम सम्पत्ति के वापस करा लेने में, जिससे इस संहिता के अधीन दण्डनीय किसी अपराध द्वारा वह व्यक्ति वंचित कर दिया गया हो, सहायता करने के बहाने या सहायता करने की बाबत कोई परितोषण लेगा या लेने का करार करेगा या लेने को सहमत होगा, वह, जब तक कि अपनी शक्ति में के सब साधनों को अपराधी को पकड़वाने के लिये और अपराध के लिये दोषसिद्ध कराने के लिये उपयोग में न लाए, दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा।
Taking gift to help to recover stolen property, etc- Whoever takes or agrees or consents to take any gratification under pretence or on account of helping any person to recover any movable property of which he shall have been deprived by any offer.ce punishable under this Code, shall, unless he uses all means in his power to cause the offender to be apprehended and convicted of the offence, be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, or with fine, or with both.
लागू अपराध
अपराधी को पकड़वाए बिना उस जंगम संपत्ति को वापस कराने में सहायता करने के लिए उपहार लेना जिससे कोई व्यक्ति अपराध द्वारा वंचित कर दिया गया है। सजा- दो वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना या दोनो। यह एक जमानतीय, संज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 215 के अंतर्गत जो कोई किसी व्यक्ति की किसी ऐसी जंगम सम्पत्ति के वापस करा लेने में, जिससे इस संहिता के अधीन दण्डनीय किसी अपराध द्वारा वह व्यक्ति वंचित कर दिया गया हो, सहायता करने के बहाने या सहायता करने की बाबत कोई परितोषण लेगा या लेने का करार करेगा या लेने को सहमत होगा, वह, जब तक कि अपनी शक्ति में के सब साधनों को अपराधी को पकड़वाने के लिये और अपराध के लिये दोषसिद्ध कराने के लिये उपयोग में न लाए, तो वह दो वर्ष के लिए कारावास या जुर्माने से या दोनो से दंडित किया जायेगा।
जमानत (Bail) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 215 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाती है।
अपराध
सजा
अपराध श्रेणी
जमानत
विचारणीय
अपराधी को पकड़वाए बिना उस जंगम संपत्ति को वापस कराने में सहायता करने के लिए उपहार लेना जिससे कोई व्यक्ति अपराध द्वारा वंचित कर दिया गया है।
दो वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना या दोनो।
संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 215 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 214 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 214? साथ ही हम आपको IPC की धारा 214 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
IPC की धारा 214 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 214 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई किसी व्यक्ति को कोई अपराध उस व्यक्ति द्वारा छिपाये जाने के लिये या उस व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिये वैध दण्ड से प्रतिच्छादित किये जाने के लिये या उस व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति को वैध दण्ड दिलाने के प्रयोजन से उसके विरुद्ध की जाने वाली कार्यवाही न की जाने के लिये प्रतिफलस्वरूप कोई परितोषण देगा या दिलाएगा या देने या दिलाने की प्रस्थापना या करार करेगा, तो वह धारा 214 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।
आईपीसी की धारा 214 के अनुसार-
अपराधी के प्रतिच्छादन के प्रतिफलस्वरूप उपहार की प्रस्थापना या सम्पत्ति का प्रत्यावर्तन-
जो कोई किसी व्यक्ति को कोई अपराध उस व्यक्ति द्वारा छिपाये जाने के लिये या उस व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिये वैध दण्ड से प्रतिच्छादित किये जाने के लिये या उस व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति को वैध दण्ड दिलाने के प्रयोजन से उसके विरुद्ध की जाने वाली कार्यवाही न की जाने के लिये प्रतिफलस्वरूप कोई परितोषण देगा या दिलाएगा या देने या दिलाने की प्रस्थापना या करार करेगा, या कोई सम्पत्ति प्रत्यावर्तित करेगा या कराएगा;यदि अपराध मृत्यु से दण्डनीय हो- यदि वह अपराध मृत्यु से दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; यदि आजीवन कारावास या कारावास से दण्डनीय हो— तथा यदि वह अपराध आजीवन कारावास से या दस वर्ष तक के कारावास से दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; तथा यदि वह अपराध दस वर्ष से कम के कारावास से दण्डनीय हो, तो वह उस अपराध के लिये उपबन्धित भांति के कारावास से इतनी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित कारावास की दीर्घतम अवधि की एक-चौथाई तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। अपवाद- धारा 213 और 214 के उपबन्धों का विस्तार किसी ऐसे मामले पर नहीं है, जिसमें कि अपराध का शमन विधिपूर्वक किया जा सकता है। Offering gift or restoration of property in consideration of screening offender- Whoever gives or causes, or offers or agrees to give or cause, any gratification to any person, or restores or causes the restoration of any property to any person, in consideration of that person’s concealing an offence, or of his screening any person from legal punishment for any offence, or of his not proceeding against any person for the purpose of bringing him to legal punishment, if a capital offence- shall, if the offence is punishable with death, be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine. if punishable with imprisonment for life, or with imprisonment- and if the offence is punishable with imprisonment for life, or with imprisonment which may extend to ten years, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three years, and shall also be liable to fine ; and if the offence is punishable with imprisonment not extending to ten years, shall be punished with imprisonment of the description provided for the offence for a term which may extend to one-fourth part of the longest term of imprisonment provided for the offence, or with fine, or with both. Exception- The provisions of Sections 213 and 214 do not extend to any case in which the offence may lawfully be compounded.
लागू अपराध
अपराधी के प्रतिच्छादन के प्रतिफलस्वरूप उपहार की प्रस्थापना या सम्पत्ति का प्रत्यावर्तन, यदि अपराध मृत्यु से दंडनीय है। सजा- सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना। यदि आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय है। सजा- तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना। यदि दस वर्ष से कम के लिए कारावास से दंडनीय है। सजा- उस दीर्घतम् अवधि की एक चौथाई का कारावास जो उस अपराध के लिए उपबंधित है या जुर्माना या दोनो। यह एक जमानतीय, संज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 214 के अंतर्गत जो कोई अपराधी के प्रतिच्छादन के प्रतिफलस्वरूप उपहार की प्रस्थापना या सम्पत्ति का प्रत्यावर्तन, यदि अपराध मृत्यु से दंडनीय है, तो वह सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माने से दंडित किया जायेगा। यदि आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय है, तो वह तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माने से दंडित किया होगा, इसी तरह से यदि दस वर्ष से कम के लिए कारावास से दंडनीय है तो तो वह उस दीर्घतम् अवधि की एक चौथाई का कारावास जो उस अपराध के लिए उपबंधित है या जुर्माना या दोनो से दंडित किया जायेगा।
जमानत (Bail) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 214 के अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाती है।
अपराध
सजा
अपराध श्रेणी
जमानत
विचारणीय
अपराधी के प्रतिच्छादन के प्रतिफलस्वरूप उपहार की प्रस्थापना या सम्पत्ति का प्रत्यावर्तन, यदि अपराध मृत्यु से दंडनीय है।
सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा
यदि आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय है।
तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा
यदि दस वर्ष से कम के लिए कारावास से दंडनीय है।
उस दीर्घतम् अवधि की एक चौथाई का कारावास जो उस अपराध के लिए उपबंधित है या जुर्माना या दोनो।
संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 214 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 213 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 213? साथ ही हम आपको IPC की धारा 213 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
IPC की धारा 213 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 213 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई अपने या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई परितोषण या अपने या किसी अन्य व्यक्ति के लिये किसी सम्पत्ति का प्रत्यास्थापन, किसी अपराध को छिपाने के लिए या किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए वैध दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिए, या किसी व्यक्ति के विरुद्ध वैध दण्ड दिलाने के प्रयोजन से उसके विरुद्ध की जाने वाली कार्यवाही न करने के लिए, प्रतिफलस्वरूप प्रतिगृहीत करेगा, यदि अपराध मृत्यु से दण्डनीय हो या आजीवन कारावास या कारावास से दण्डनीय हो तो वह धारा 213 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।
आईपीसी की धारा 213 के अनुसार-
अपराधी को दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिए उपहार आदि लेना-
जो कोई अपने या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई परितोषण या अपने या किसी अन्य व्यक्ति के लिये किसी सम्पत्ति का प्रत्यास्थापन, किसी अपराध को छिपाने के लिए या किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए वैध दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिए, या किसी व्यक्ति के विरुद्ध वैध दण्ड दिलाने के प्रयोजन से उसके विरुद्ध की जाने वाली कार्यवाही न करने के लिए, प्रतिफलस्वरूप प्रतिगृहीत करेगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा या प्रतिगृहीत करने के लिए करार करेगा; यदि अपराध मृत्यु से दण्डनीय हो- यदि वह अपराध मृत्यु से दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; यदि आजीवन कारावास या कारावास से दण्डनीय हो- यदि वह अपराध आजीवन कारावास या दस वर्ष तक के कारावास से दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; तथा यदि वह अपराध 10 वर्ष से कम तक के कारावास से दण्डनीय हो, तो वह उस अपराध के लिये उपबन्धित भांति के कारावास से इतनी अवधि के लिये, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित कारावास की दीर्घतम अवधि की एक-चौथाई तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जायेगा।
Taking gift, etc., to screen an offender from punishment- Whoever accepts or attempts to obtain, or agrees to accept any gratification for himself or any other person, or any restitution of property to himself or any other person, in consideration of his concealing an offence or of his screening any person from legal punishment for any offence, or of his not proceeding against any person for the purpose of bringing him to legal punishment; if a capital offence- shall, if the offence is punishable with death, be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine ; if punishable with imprisonment for life, or with imprisonment- and if the offence is punishable with imprisonment for life, or with imprisonment which may extend to ten years, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three years, and shall also be liable to fine : and if the offence is punishable with imprisonment not extending to ten years, shall be punished with imprisonment of the description provided for the offence for a term which may extend to one-fourth part of the longest term of imprisonment provided for the offence, or with fine, or with both.
लागू अपराध
अपराधी को दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिए उपहार आदि लेना, यदि अपराध मृत्यु से दंडनीय है। सजा- सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना। यदि आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय है। सजा- तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना। यदि दस वर्ष से कम के लिए कारावास से दंडनीय है। सजा- उस दीर्घतम् अवधि की एक चौथाई का कारावास जो उस अपराध के लिए उपबंधित है या जुर्माना या दोनो। यह एक जमानतीय, संज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 213 के अंतर्गत जो कोई अपराधी को दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिए उपहार आदि लेना, यदि अपराध मृत्यु से दंडनीय है, तो वह सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माने से दंडित किया जायेगा। यदि आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय है, तो वह तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माने से दंडित किया होगा, इसी तरह से यदि दस वर्ष से कम के लिए कारावास से दंडनीय है, तो उस दीर्घतम् अवधि की एक चौथाई का कारावास जो उस अपराध के लिए उपबंधित है या जुर्माना या दोनो से दंडित किया जायेगा।
जमानत (Bail) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 213 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाती है।
अपराध
सजा
अपराध श्रेणी
जमानत
विचारणीय
अपराधी को दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिए उपहार आदि लेना, यदि अपराध मृत्यु से दंडनीय है।
सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा
यदि आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय है।
तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा
यदि दस वर्ष से कम के लिए कारावास से दंडनीय है।
उस दीर्घतम् अवधि की एक चौथाई का कारावास जो उस अपराध के लिए उपबंधित है या जुर्माना या दोनो।
संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 213 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।