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आईपीसी की धारा 194, मृत्यु से दंडनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध कराने के आशय से मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना | IPC Section-194 in hindi | Giving or fabricating false evidence with intent to procure conviction of capital offence.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 194 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 194? साथ ही हम आपको IPC की धारा 194 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 194 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। हम में बहुत से लोगो को नहीं पता होता हैं कि यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को मृत्यु जैसे अपराध में दण्ड से बचने या बचाने के लिए मिथ्या साक्ष्य प्रस्तुत करते है या मिथ्या साक्ष्य जारी करते है तो यह धारा उन अपराधियों के लिए है जो जानबूझकर किसी अपराधी को बचाने के लिए गलत साक्ष्य का सहारा लेकर अपराधी को बचाने का प्रयास करता है, तो वह धारा 194 के अंतर्गत अपराधी होंगा ।

आईपीसी की धारा 194 के अनुसार-

मृत्यु से दंडनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध कराने के आशय से मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना-

जो कोई भारत में तत्समय प्रवृत्त विधि के द्वारा मृत्यु से दंडनीय अपराध के लिए किसी व्यक्ति को दोषसिद्ध कराने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा दोषसिद्ध कराएगा, यह जानते हुए, मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा, वह आजीवन कारावास से, या कठिन कारावास से, जिसकी अवधि 10 वर्ष तक कि हो सकेगी, दंडित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

Giving or fabricating false evidence with intent to procure conviction of capital offence-

Whoever gives or fabricates false evidence, intending thereby to cause, or knowing it to be likely that he will thereby cause, any person to be convicted of an offence which is capital by the law for the time being in force in India shall be punished with imprisonment for life, or with rigorous imprisonment for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.

यदि निर्दोष व्यक्ति एतद्द्वारा दोषसिद्ध किया जाये और उसे फांसी दी जाए – यदि कोई निर्दोष व्यक्ति को ऐसे मिथ्या साक्ष्य के परिणामस्वरूप दोषसिद्ध किया जाए और उसे फांसी दे दी जाए, तो उस व्यक्ति को, जो मिथ्या साक्ष्य देगा, या तो मृत्युदंड या एतस्मिन् पूर्व वर्णित दण्ड दिया जाएगा ।

लागू अपराध

1.किसी व्यक्ति को मृत्यु से दंडनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध कराने के आशय से मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना।
सजा– आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कठिन कारावास और जुर्माना भी या दोनों हो सकते है ।
2. यदि निर्दोष व्यक्ति उसके द्वारा दोषसिद्ध किया जाता है और उसे फांसी दे दी जाती है ।
सजा– मृत्यु या आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कठिन कारावास और जुर्माना भी या दोनों हो सकते है ।
यह एक अजमानती, संज्ञेय अपराध है और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

जो कोई किसी ऐसे अपराधी व्यक्ति को मृत्युदंड जैसे दण्ड अपराध के लिए दोषसिद्ध कराने के आशय से झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करता है, या बनाता है तो आईपीसी धारा 194 के अंतर्गत अपराधी होगा, जिसे आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कठिन कारावास और जुर्माना या फिर दोनों भी हो सकते हैंइसी तरह से यदि निर्दोष व्यक्ति उसके द्वारा दोषसिद्ध किया जाता है और उसे फांसी दे दी जाती है आईपीसी धारा 194 के अंतर्गत अपराधी होगा, जिसे मृत्युदंड या आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कठिन कारावास और जुर्माना या फिर दोनों भी हो सकते हैं ।

जमानत (Bail) का प्रावधान

यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को मृत्यु जैसे अपराध में दण्ड से बचने या बचाने के लिए मिथ्या साक्ष्य प्रस्तुत करते है या मिथ्या साक्ष्य जारी करते है वह भी दंडनीय होगा। यह एक संज्ञेय अपराध है, और साथ ही यह अपराध की जमानतीय नहीं है। इसलिये जमानत मिलनी बहुत मुश्किल होगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
किसी व्यक्ति को मृत्यु से दंडनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध कराने के आशय से मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना।आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कठिन कारावास और जुर्माना भी या दोनोंसंज्ञेयगैर-जमानतीयसेशन न्यायालय
यदि निर्दोष व्यक्ति उसके द्वारा दोषसिद्ध किया जाता है और उसे फांसी दे दी जाती है।मृत्यु या आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कठिन कारावास और जुर्माना भी या दोनोंसंज्ञेयगैर-जमानतीयसेशन न्यायालय

हमारा प्रयास धारा 194 की पूर्ण जानकारी आप तक प्रदान करने का है, अगर आपके मन में कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है ।

आईपीसी की धारा 499 व 500 मानहानि | IPC Section- 499 & 500 in hindi | Defamation | मानहानि क्या है ? पूर्ण जानकारी | What is defamation?

आज हम आपके लिये अच्छी जानकारी लाए है अक्सर हम सभी ने अखबार एवंम् न्यूज में देखा होगा, किसी व्यक्ति ने किसी व्यक्ति पर मानहानि का मामला दर्ज कराया अथवा किसी नेता ने किसी दूसरे नेता या मंत्री के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज कराया गया। आज हम अपने इस लेख में मानहानि से सम्बन्धित महत्वपूर्ण जानकारी देंगे।

मानहानि की परिभाषा

सामाजिक प्रतिष्ठा या मान सम्मान की रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का विशिष्ठ अधिकार है । हमारे संविधान में प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसकी संपत्ति से भी अधिक मूल्यवान होती हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी इस सामाजिक प्रतिष्ठा को किसी भी कीमत पर बनाये रखना चाहता है और यह कानून इस अधिकार को मान्यता प्रदान करता है तथा उसको पूर्ण संरक्षण प्रदान करता है। व्यक्ति की प्रतिष्ठा को किसी भी प्रकार का आघात या हानि पहुचाना मानहानि कहा जाता हैं।

हमारे संविधान में प्रत्येक नागरिकों को यह भी अधिकार दिया गया है कि अपनी, अपने परिवार की सुरक्षा और मान-सम्मान की रक्षा करे। अगर कोई आपके मान-सम्मान को ठेस पहुंचाने की कोशिश करता है तो वह अपराध करता है, जो IPC धारा-499 के अंतर्गत लागू होगा। ऐसे अपराध के लिए भारतीय दण्ड संहिता की धारा 500 के अंतर्गत दंडित किया जाता है ।

धारा 499 का विवरण

जो कोई भी व्यक्ति को जानबूझकर उसकी मान-सम्मान सामाजिक प्रतिष्ठा को किसी भी तरह से छति पहुंचाता है तो वह IPC की धारा 499 के अंतर्गत अपराध होगा, जिसके लिए उसे धारा 500 के अंतर्गत 2 वर्ष का सादा कारावास या जुर्माने से अथवा दोनों से दंडित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 499 के अनुसार-

मानहानि

जो कोई बोले गए या पढ़े जाने के लिए आशयित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्य रूपणों द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में कोई लांछन इस आशय से लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से व्यक्ति की ख्याति कि अपहानि की जाए या यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति कि अपहानि होगी, एतस्मिन् पश्चात अपवादित दशाओं के सिवाय उसके बारे में कहा जाता है कि वह उस व्यक्ति की मानहानि करता है ।

Defamation

Whoever, by words, either spoken or intended to be read, or by signs or by visible representations, makes or publish any imputation concerning any person intending to harm, or knowing or having reason to believe that such imputation will harm, the reputation of such person, is said, except in the cases hereinafter excepted, to defame that person.

स्पष्टीकरण- किसी मृत व्यक्ति को कोई लांछन लगाना, मानहानि की कोटि में आ सकेगा यदि वह लांछन उस व्यक्ति की ख्याति की, यदि वह जीवित होता, अपहानि करता, और उसके परिवार या अन्य निकट सम्बन्धियों की भावनाओं को उपहत करने के लिए आशयित हो।

स्पष्टीकरण- कोई लांछन किसी व्यक्ति की ख्याति की अपहानि करने वाला नहीं कहा जाता जब तक कि वह लांछन दूसरों की दृष्टि में प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उस व्यक्ति के सदाचारिक या बौद्धिक स्वरूप को हेय न करें या उस व्यक्ति की जाति के या उसकी अजीविका के संबंध में उसके सील को हेय न करें या एक उस व्यक्ति की साख को नीचे ना गिराए या यह विश्वास ना कराए कि उस व्यक्ति का शरीर   घृणोत्पादक दशा में है या ऐसी दशा में है जो साधारण रूप से निकृष्ट समझी जाती है।

मानहानि के प्रकार –

1. अपलेख(Libel):- अपलेख के अंतर्गत कोई व्यक्ति, किसी व्यक्ति को किसी स्थायी एवं दिखाई देने वाले रूप में प्रकाशन किया जाता हैं जैसे लिखा हुआ, छापा हुआ, चित्र, फोटो, सिनेमा, फिल्म, कार्टून या व्यंग्य चित्र, पुतला या किसी के दरवाजे पर कुछ लिखकर चिपकाना इत्यादि कार्य करके उपहत (ठेस) पहुंचाता है।यह कहा जाता हैं अपलेख आंखों को सम्बोधित किया जाता हैं। इस प्रकार यह मानहानिकारक विषय अपलेख होता हैं।

2. अपवचन(slander):- जो कोई व्यक्ति, किसी व्यक्ति के प्रति मानहानिकारक वचन के प्रयोग को अपवचन कहते है।सामान्य रूप से अपवचन मौखिक शब्दों, संकेतों अथवा अव्यक्त ध्वनियों द्वारा किया जाता हैं।एवं अपवचन कानों को संबोधित किया जाता हैं। इस प्रकार यह मानहानिकारक विषय अपवचन होता हैं।

भारतीय दण्ड संहिता में अपलेख एवं अपवचन दोंनो प्रकार मानहानि को दंडनीय अपराध माना है। ऐसे अपराध के लिए भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत मानहानि की धारा 500 के अंतर्गत दण्ड दिया जाता है।

मानहानि का दावा कब और कैसे दर्ज होता है-

मानहानि का दावा वह व्यक्ति जो किसी व्यक्ति के द्वारा अपनी ख्याति या सामाजिक प्रतिष्ठा को गवा चुका है अथवा गवा रहा है, जबकि वास्तव में वह निर्दोष है, केवल उस व्यक्ति को बदनाम करने के उद्देश्य से दूसरे व्यक्ति ने केवल लांछन या प्रतिष्ठा को गिराने के लिए किया है, तो पीड़ित व्यक्ति पुनः प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए मानहानि का दावा न्यायालय में कर सकता है, जो धारा 499 के अंतर्गत आता है।

मानहानि का दावा पीड़ित व्यक्ति पुनः प्रतिष्ठा अर्जित करने के उद्देश्य से, दावा न्यायालय में दायर करके अपने अधिकार को प्राप्त कर सकता हैं , साथ ही दोषी व्यक्ति को सजा अथवा अर्थदंड से भी दंडित कराया जा सकता है, अगर वास्तव में अपराधी है ।

लागू अपराध

जो कोई किसी अन्य व्यक्ति की मानहानि करेगा।
सजा – 2 वर्ष के का कारावास और जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं ।
यह एक जमानती, गैर संज्ञेय अपराध है और प्रथम वर्ग के न्यायाधीश द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध पीड़ित व्यक्ति के साथ समझौता करने योग्य है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

जो कोई बोले गए या पढ़े जाने के लिए आशयित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्य रूपणों द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में कोई लांछन इस आशय से लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से व्यक्ति की ख्याति कि अपहानि की जाए या यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाता या प्रकाशित करता है, तो वह मानहानि की आईपीसी धारा 500 के अंतर्गत 2 वर्ष का कारावास और जुर्माना या फिर दोनों भी हो सकते हैं ।

जमानत (Bail) का प्रावधान

इस धारा में किसी के मान सम्मान या प्रतिष्ठा को अपमान या ठेस पहुंचाता या पहुंचाने का प्रयास करता है तो वह दंडनीय होगा। यह एक गैर संज्ञेय अपराध है, और साथ ही इस अपराध की प्रकृति जमानती है। यह अपराध पीड़ित व्यक्ति के साथ समझौता करने योग्य है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
जो कोई किसी अन्य व्यक्ति की मानहानि करेगा।2 वर्ष के का कारावास और जुर्माना या फिर दोनोंगैर-संज्ञेयजमानतीयप्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट

हमारा प्रयास धारा 499, 500 की पूर्ण जानकारी आप तक प्रदान करने का है, अगर फिर भी आपके मन में कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है ।

आईपीसी की धारा 153-AA | किसी जलूस में जानबूझकर आयुध ले जाने या किसी सामूहिक ड्रिल या सामूहिक प्रशिक्षण का आयुध सहित संचालन या आयोजन करना या उसमें भाग लेना | IPC Section- 153-AA in hindi | Punishment for Knowingly carrying arms in any procession or organising, or holding or taking part in any mass drill or mass training with arms.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 153-AA के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 153-AA? साथ ही हम आपको IPC की धारा 153-AA सम्पूर्ण जानकारी कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलेगी, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 153-AA का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 153-AA के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई किसी सार्वजनिक स्थान पर अथवा अन्य जुलूस में, जबकि वह स्थान जहां शस्त्र और आयुध वर्जित है अथवा किसी आदेश के उल्लंघन में जानबूझकर आयुध या शस्त्र ले जाता है या संचालन करता है अथवा भाग लेता है तो वह भारतीय दंड संहिता की धारा 153-AA के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153-AA इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 153-AA के अनुसार

किसी जलूस में जानबूझकर आयुध ले जाने या किसी सामूहिक ड्रिल या सामूहिक प्रशिक्षण का आयुध सहित संचालन या आयोजन करना या उसमें भाग लेना-

जो कोई किसी सार्वजनिक स्थान में, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 144क के अधीन जारी की गई किसी लोक सूचना या किए गए किसी आदेश के उल्लंघन में किसी जलूस में जानबूझकर आयुध ले जाता है या सामूहिक ड्रिल या सामूहिक प्रशिक्षण का आयुध सहित जानबूझकर संचालन या आयोजन करता है या उसमें भाग लेता है तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा।स्पष्टीकरण–“आयुध” से अपराध या सुरक्षा के लिए हथियार के रूप में डिजाइन की गई या अपनाई गई किसी भी प्रकार की कोई वस्तु अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अग्नि शस्त्र, नुकीली धार वाले हथियार लाठी, डण्डा और छड़ी भी है।

Punishment for knowingly carrying arms in any procession or organising, or holding or taking part in any mass drill or mass training with arms-
Whoever knowingly carries arms in any procession or organizes or holds or takes part in any mass drill or mass training with arms in any public place in contravention of any public notice or order issued or made under Section 144-A of the Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974) shall be punished with imprisonment for a term which may extend to six months and with fine which may extend to two thousand rupees.

Explanation. “Arms” means articles of any description designed or adapted as weapons for offence or defence and includes fire arms, sharp edged weapons, lathis, dandas and sticks.

जब कोई व्यक्ति किसी विधिविरुद्ध जुलूस अथवा किसी सार्वजनिक स्थान पर, जानबूझकर आयुध या शस्त्र जैसे ले जाते है अथवा आयुध सहित संचालन या आयोजन करता या उसमे भाग लेता है तो यह धारा अप्लाई होगी।

लागू अपराध

किसी जलूस में जानबूझकर आयुध ले जाने या किसी सामूहिक ड्रिल या सामूहिक प्रशिक्षण का आयुध सहित संचालन या आयोजन करना या उसमें भाग लेना।
सजा- छह माह का कारावास, और दो हजार रूपए का जुर्माना।
यह एक गैर-जमानतीय, संज्ञेय अपराध है और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नही है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 153-AA के अंतर्गत जो कोई  किसी जुलूस में जानबूझकर शस्त्र अथवा आयुध ले जाने, या आयुध का प्रशिक्षण देने, संचालन या आयोजन करने अथवा उसमे भाग लेता है तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

जो कोई व्यक्ति किसी विधिविरुद्ध जुलूस अथवा किसी सार्वजनिक स्थान पर, जानबूझकर आयुध या शस्त्र जैसे ले जाते है अथवा आयुध सहित संचालन या आयोजन करता या उसमे भाग लेता है तो वह व्यक्ति भारतीय दंड संहिता की धारा 153-AA के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा ऐसे अपराध कारित करने वाले व्यक्ति अपराध के अनुसार ही मामले में पुलिस द्वारा FIR दर्ज करती है यह अपराध गैर-जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
किसी जलूस में जानबूझकर आयुध ले जाने या किसी सामूहिक ड्रिल या सामूहिक प्रशिक्षण का आयुध सहित संचालन या आयोजन करना या उसमें भाग लेना।छह माह का कारावास, और दो हजार रूपए का जुर्माना।संज्ञेयगैर-जमानतीयकिसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेट

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 153-AA की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा- 153A, धर्म, मूलवंश, जन्मस्थान, निवासस्थान, भाषा इत्यादि के आधारों के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन और सौहार्द बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कार्य करना | IPC Section- 153A in hindi |

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 153-A के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है आईपीसी की धारा 153A? साथ ही हम आपको IPC की धारा 153-A सम्पूर्ण जानकारी कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलेगी, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है पूर्ण जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 153A का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। हम में बहुत से लोगो को नहीं पता होता हैं कि यदि हम किसी धर्म (जाति और समुदाय) या संप्रदाय अथवा किसी धार्मिक भावनाओं पर कोई ऐसा कार्य समूहों द्वारा किया जाता है, जिससे लोक शांति में बाधा उत्पन्न होती है तो ऐसे समूहों (व्यक्तियों) द्वारा IPC की धारा 153A के तहत अपराधी होंगे । आज कल हमारे भारत देश ऐसा बहुत कुछ, हम सभी लोग को देखने को मिलता हैं ।

हम सभी जानते हैं हमारे भारत देश में इस समय धर्म, जाति, सामाजिक सांप्रदायिक, बातो को लेकर आपसी मतभेद बहुत सी समस्याओं को जन्म दे रही है । ऐसे लोगो के लिए आईपीसी की धारा 153A से दंडित किया जाता है।

आईपीसी की धारा 153 के अनुसार-

धर्म, मूलवंश, जन्मस्थान, निवासस्थान, भाषा इत्यादि के आधारों के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन और सौहार्द बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कार्य करना-

क) जो कोई – बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा दृश्यरूपणों द्वारा या विभिन्न धार्मिक, मूलवंशीय या भाषाई या प्रादेशिक समूहों, जातियों या समुदायों के बीच असौहार्द्र अथव शत्रुता, घृणा या वैमनस्य की भावनाएं, धर्म मूलवंश, जन्म स्थान, निवास स्थान, भाषा, जाति या समुदाय के आधारों पर या अन्य किसी आधार पर संप्रवर्तित करेगा या संप्रवर्तित करने का प्रयत्न करेगा, अथवा
ख) कोई ऐसा कार्य करेगा, जो विभिन्न धार्मिक मूलवंशीय, भाषाई या प्रादेशिक समूहों या जातियों या समुदायों के बीच सौहार्द्र बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है और जो लोक प्रशांति में विघ्न डालता है या जिससे उसमें विघ्न पड़ना संम्भाव्य हो, अथवा
ग कोई ऐसा अभ्यास, आंदोलन, कवायद या अन्य वैसा ही क्रियाकलाप इस आशय से संचालित करेगा कि ऐसे क्रियाकलाप में भाग लेने वाले व्यक्ति किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषाई या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के विरुद्ध अपराधिक बल या हिंसा का प्रयोग करेंगे अथवा प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया जाए और ऐसे क्रियाकलाप से ऐसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषाई या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्यों के बीच, चाहे किसी भी कारण से, भय या संत्रास या असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है या उत्पन्न होने सम्भाव्य है,।
पूजा के स्थान आदि में किया गया अपराध- जो कोई उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अपराध किसी पूजा के स्थान में या किसी जमाव में, जो धार्मिक पूजा या धार्मिक कर्म करने में लगा हुआ हो, करेगा, वह कारावास से, जो 5 वर्ष तक का हो सकेगा, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

Promoting enmity between different groups on grounds of religion, race, place of birth, residence, language, etc. and doing acts prejudicial tomaintence of harmony-
(1)Whoever
(a) by words, either spoken or written, or by signs or by visible representations or otherwise, promotes, or attempts to promote, on grounds of religion, race, place of birth, residence, language, caste or community or any other ground whatsoever, disharmony or feelings of enmity, hatred or ill-will between different religious, racial, language or regional groups or castes or communities, or
(b) commits any act which is prejudicial to the maintenance of harmony between different religious, racial, language or regional groups or castes or communities, and which disturbs or is likely to disturb the public tranquillity, or
(c) organizes any exercise, movement, drill or other similar activity intending that the participants in such activity shall use or be trained to use criminal force or violence or knowing it to be likely that the participants in such activity will use or be trained to use criminal force or violence, or participates in such activity intending to use or to be trained to use criminal force or violence or knowing it to be likely that the participants in such activity will use or be trained to use criminal force or violence against any religious, racial, language or regional group or caste or community and such activity, for any reason whatsoever causes or is likely to cause fear or alarm or a feeling of insecurity amongst members of such religious acial, language or regional group or caste or community.

shall be punished with imprisonment which may extend to three years, or with fine, or

with both. (2) Offences committed in the place of worship, etc.-Whoever commits an offence specified in sub-section (1) in any place of worship or in any assembly engaged in the performance of religious worship or religious ceremonies, shall be punished with imprisonment which may extend to five years and shall also be liable to fine.

लागू अपराध

1.वर्गो के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन ।
सजा –
3 वर्ष का कारावास या जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं ।
2. पूजा के स्थान आदि में वर्गो के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन।
सजा
– 5 वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं ।
यह एक अजमानती, संज्ञेय अपराध है और प्रथम वर्ग के न्यायाधीश द्वारा विचारणीय है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

जो कोई किसी धर्म (जाति और समुदाय) या संप्रदाय अथवा किसी धार्मिक भावनाओं पर कोई ऐसा कार्य समूहों द्वारा किया जाता है, जिससे लोक शांति में बाधा उत्पन्न होती है, तो आईपीसी धारा 153A के अंतर्गत अपराधी होगा, जिसे 3 वर्ष कारावास या जुर्माना या फिर दोनों भी हो सकते हैं । पूजा के स्थान आदि में वर्गो के बीच शत्रुता का दंगा जैसा कृत करने वाले समूह को 5 वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं ।

जमानत (Bail) का प्रावधान

इस धारा जो कोई किसी धर्म, समुदाय, या धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए लोक शांति भंग करता है या करने का प्रयास करता है तो वह दंडनीय होगा। साथ मंदिर, मस्जिद जैसे पूजा स्थलों पर लोक शांति भंग करता है या करने का प्रयास करता है तो वह भी दंडनीय होगा।  यह एक संज्ञेय अपराध है, और साथ ही इस अपराध की जमानती नहीं है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
वर्गो के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन3 वर्ष का कारावास या जुर्माना या फिर दोनोंसंज्ञेयगैर-जमानतीयप्रथम वर्ग के न्यायाधीश
पूजा के स्थान आदि में वर्गो के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन5 वर्ष का कारावास और जुर्माना या फिर दोनोंसंज्ञेयगैर-जमानतीयप्रथम वर्ग के न्यायाधीश

हमारा प्रयास धारा 153A की पूर्ण जानकारी आप तक प्रदान करने का है, अगर फिर भी आपके मन में कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है ।

आईपीसी की धारा- 212, अपराधी को संश्रय देना | IPC Section- 212 in hindi | Harbouring offender.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 212 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 212? साथ ही हम आपको IPC की धारा 212 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 212 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा के विषय में पूर्ण जानकारी आपको देंगे। हम में बहुत से लोगो को नहीं पता होता हैं कि यदि कोई व्यक्ति किसी अपराधी को संश्रय (आश्रय देना या छिपाना) देता है, तो भी हम एक तरह से अपराध ही करते है । जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 212 के अंतर्गत दंडनीय है। इस धारा में हम आपको पूर्ण जानकारी देंगे कि कैसे ऐसे अपराध के लिए खुद को सुरक्षित किया जाए एवम् जुर्माना व अपराध किस तरह का है पूर्ण जानकारी देंगे।

आईपीसी की धारा 212 के अनुसार-

अपराधी को संश्रय देना-

जबकि कोई अपराध किया जा चुका हो, तब जो कोई किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके बारे में वह जानता हो या विश्वास करने का कारण रखता हो कि वह अपराधी है, वैध दंड से प्रतिच्छादित करने के आशय से संश्रय देगा या छिपायेगा ।

Harbouring offender-
Whenever an offence has been committed, whoever harbours or conceals a person whom he knows or has reason to believe to be the offender, with the intention of screening him from legal punishment.

यदि अपराध मृत्यु से दंडनीय हो- यदि का अपराध मध्य से डंडे नहीं हो तो वह दोनों में से किसी बात के कारावास से जिसकी अवधि 5 वर्ष तक की हो सकेगी दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।
यदि अपराध आजीवन कारावास से या कारावास से दंडनीय हो – और यदि वह अपराध आजीवन कारावास से, या 10 वर्ष तक के कारावास से दंडनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि 3 वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।
यदि अपराध 1 वर्ष तक न कि 10 वर्ष के कारावास से दंडनीय हो, अपराध के लिए जिसकी अवधि उपबंधित कारावास की दीर्घतम् अवधि की एक चौथाई तक की हो सकेगी जिसे जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जा सकता है।
इस धारा में अपराध के अंतर्गत भारत से बाहर किसी स्थान पर किया गया ऐसा कार्य आता है, जो यदि भारत में किया जाता है, तो निम्नलिखित धारा 302, 304, 382, 392, 393, 394, 395, 396, 397, 398, 399, 402, 435, 436, 449, 450, 457, 458,  459 और 460 में से किसी धारा के अधीन दंडनीय होता और हर ऐसा कार्य इस तरह का प्रयोजन के लिए जैसे दंडनीय समझा जाएगा मानो अभियुक्त उसे भारत में करने का दोषी था।

नोट- इस धारा में ऐसे मामले नहीं शामिल होते हैं जिसमें अपराधी का संश्रय देना या छिपाना उसके पति या पत्नी द्वारा हो।

लागू अपराध

1.अपराधी का संश्रय देना या छिपाना, यदि अपराध मृत्यु से दंडनीय है ।
सजा –
5 वर्ष का कारावास और जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं ।
2. यदि आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय है।
सजा –
3 वर्ष का कारावास और जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं ।
3. यदि एक वर्ष के लिए न कि दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय है।
सजा –
दीर्घतम् अवधि की एक चौथाई के लिए कारावास और जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं ।
यह एक जमानती, संज्ञेय अपराध है और प्रथम वर्ग के न्यायाधीश द्वारा विचारणीय है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 212 के अंतर्गत जो कोई किसी व्यक्ति को किसी अपराध से बचाने के लिए संश्रय (छिपाने) का प्रयास करता है, जबकि वह वास्तव में अपराधी होता है तो संश्रय (छिपाना) देने वाला व्यक्ति भी आईपीसी धारा 212 के अंतर्गत अपराधी होगा, जिसे उपरोक्त दंडानुसार उसके अपराध के दण्ड अनुसार कारावास और जुर्माना या फिर दोनों भी हो सकते हैं ।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 212 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
अपराधी का संश्रय देना या छिपाना, यदि अपराध मृत्यु से दंडनीय है5 वर्ष का कारावास और जुर्माना या दोनोंसंज्ञेयजमानतीयप्रथम वर्ग के न्यायाधीश
यदि आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय है3 वर्ष का कारावास और जुर्माना या दोनोंसंज्ञेयजमानतीयप्रथम वर्ग के न्यायाधीश
यदि एक वर्ष के लिए न कि दस वर्ष के लिए कारावास से दंडनीय है
दीर्घतम् अवधि की एक चौथाई के लिए कारावास और जुर्माना या दोनोंसंज्ञेयजमानतीयप्रथम वर्ग के न्यायाधीश

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 212 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 191 | मिथ्या साक्ष्य देना | IPC Section- 191 in hindi | Giving false evidence.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 191 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 191? साथ ही हम आपको IPC की धारा 191 के अंतर्गत परिभाषा इत्यादि की जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 191 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 191 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। वैसे तो हम सभी जानते हैं जो कोई व्यक्ति झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करता है तो वह भी एक तरह का अपराध करता है। है आज हम बात करेंगे झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करना (Giving false evidence) क्या होते है और किसे कहते है। यह भारतीय दंड संहिता की धारा 191, उन झूठे साक्ष्य को परिभाषित करती है, जो स्वतः झूठ परिलक्षित होते हैं, चाहे कोई कथन लिखित अथवा मौखिक रूप में हो। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 191 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 191 के अनुसार-

मिथ्या साक्ष्य देना-
जो कोई शपथ द्वारा या विधि के किसी अभिव्यक्त उपबन्ध द्वारा सत्य कथन करने के लिये वैध रूप से आबद्ध होते हुये, या किसी विषय पर घोषणा करने के लिए विधि द्वारा आबद्ध होते हुये, ऐसा कोई कथन करेगा, जो मिथ्या है, और या तो, जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान है या विश्वास
है, या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, वह मिथ्या साक्ष्य देता है, यह कहा जाता है।

स्पष्टीकरण
1-कोई कथन चाहे वह मौखिक हो, या अन्यथा किया गया हो, इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत आता है।
2- अनुप्रमाणित करने वाले व्यक्ति के अपने विश्वास के बारे में मिथ्या कथन इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत आता है और कोई व्यक्ति यह कहने से कि उसे उस बात का विश्वास है, जिस बात का उसे विश्वास नहीं है तथा यह कहने से कि वह उस बात को जानता है जिस बात को वह नहीं जानता, मिथ्या साक्ष्य देने का दोषी हो सकेगा।

दृष्टान्त
(क) क एक न्यायसंगत दावे के समर्थन में, जो य के विरुद्ध ख के एक हजार रुपये के लिए है, विचारण के समय शपथ पर मिथ्या कथन करता है कि उसने य को ख के दावे का न्यायासंगत होना स्वीकार करते हुए सुना था। क ने मिथ्या साक्ष्य दिया है।

(ख) क सत्य कथन करने के लिये शपथ द्वारा आबद्ध होते हुये कथन करता है कि वह अमुक हस्ताक्षर के सम्बन्ध में यह विश्वास करता है कि वह य का हस्तलेख है, जब कि वह उसके य का हस्तलेख होने का विश्वास नहीं करता है, यहाँ, क वह कथन करता है, जिसका मिथ्या होना वह जानता है, और इसलिये मिथ्या साक्ष्य देता है।

Giving false evidence-
Whoever, being legally bound by an oath or by any express provision of law to state the truth, or being bound by law to make a declaration upon any subject, makes any statement which is false, and which he either knows or believes to be false, or does not believe to be true, is said to give false
evidence.

Explanation
1- A statement is within the meaning of this section, whether it is made verbally or otherwise.
2- A false statement as to the belief of the person attesting is within the meaning of this section and a person may be guilty of giving false evidence by stating that he believes a thing which he does not believe, as well as by stating that he knows a thing which he does not know.

Illustrations

(a) A, in support of a just claim which B has against Z for one thousand rupees. falsely
swears on a trial that he heard Z admit the justice of B’s claim. A has given false evidence.

(b) A, being bound by an oath to state the truth, states that he believes a certain signature to be the handwriting of Z when he does not believe it to be the handwriting of Z. Here A states that which he knows to be false, and therefore gives false evidence.

मिथ्या साक्ष्य देना (Giving false evidence) किसे कहते है?

जब कोई व्यक्ति जिसे शपथ द्वारा या विधि के किसी उपबंध द्वारा सत्य कथन प्रस्तुत करने के लिए विधि द्वारा आबद्ध होते हुए या किसी विषय की पुष्टि करने हेतु, ऐसा कोई कथन प्रस्तुत करता है, जो स्वतः ही परिलक्षित होता है कि इस व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे कथन झूठ है, जिसे उस झूठे कथन प्रस्तुत करने का ज्ञान भी है अर्थात् जो कोई जानबूझकर मिथ्या कथन या मिथ्या साक्ष्य प्रस्तुत करता है।जिसे हम मिथ्या साक्ष्य देना (Giving false evidence) कहते है।

जो व्यक्ति न्यायालय अथवा विधि द्वारा उपबंधित, सत्य कथन प्रस्तुत करने के लिए विधि द्वारा आबद्ध होते हुए भी झूठे कथन व झूठे साक्ष्य अपने किसी उद्देश्य से प्रस्तुत करता है। चाहे वह लिखित या मौखिक अथवा किसी विषय की पुष्टि करने हेतु हो, जबकि वह व्यक्ति जानबूझकर प्रस्तुत करता है।

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 191 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।