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आईपीसी की धारा 88 | किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सम्मति से सद्भावपूर्वक किया गया कार्य जिससे मृत्यु कारित करने का आशय नहीं है | IPC Section- 88 in hindi| Act not intended to cause death, done by consent in good faith for person’s benefit.

IPC-88

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 88 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 88 साथ ही हम आपको IPC की धारा 88 सम्पूर्ण जानकारी एवम् परिभाषा इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 88 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 88 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा उन मामलो को परिभाषित करती है, जैसा हम सभी ने देखा कि कभी-कभी डॉक्टर्स द्वारा किसी मरीज की इलाज करते समय मरीज की मृत्यु भी हो जाती है, तो उन मामलों में क्या हम डॉक्टर का अपराधी कहेंगे नही, इसलिए उनके द्वारा ऐसा कृत्य अपराध की दृष्टि में नही आका जायेगा। इसी तरह से यह धारा ऐसे मामलो को परिभाषित करती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 88 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 88 के अनुसार-

किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सम्मति से सद्भावपूर्वक किया गया कार्य जिससे मृत्यु कारित करने का आशय नहीं है –

कोई बात, जो मृत्यु कारित करने के आशय से न की गयी हो, किसी ऐसी अपहानि के कारण नहीं है जो उस बात से किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके फायदे के लिए वह बात सद्भावपूर्वक की जाए और जिसने उस अपहानि को सहने, या उस अपहानि की जोखिम उठाने के लिए चाहे अभिव्यक्त, चाहे विवक्षित सम्मति दे दी हो, कारित हो या कारित करने का कर्ता का आशय हो या कारित होने की सम्भाव्यता कर्ता को ज्ञात है।

Act not intended to cause death, done by consent in good faith for person’s benefit-

Nothing, which is not intended to cause death, is an offence by reason of any harm which it may cause, or be intended by the doer to cause, or be known by the doer to be likely to cause, to any person for whose benefit it is done in good faith, and who has given a consent, whether express or implied, to suffer that harm, or to take the risk of that harm.

दृष्टान्त
क एक शल्य चिकित्सक, यह जानते हुए कि एक विशेष शस्त्रकर्म से य को, जो वेदनापूर्ण व्याधि से ग्रस्त है, मृत्यु कारित होने की संभाव्यता है, किन्तु य की मृत्यु कारित करने का आशय न रखते हुए और सद्भावपूर्वक य के फायदे के आशय से य की सम्मति से य पर शस्त्रकर्म करता है। क ने कोई अपराध नही किया है।

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 88 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन मे कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 83 | सात वर्ष से ऊपर किंतु बारह वर्ष से कम आयु के अपरिपक्व समझ के शिशु का कार्य | IPC Section- 83 in hindi| Act of a child above saven and under twelve of immature understanding.

IPC-83

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 83 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 83 साथ ही हम आपको IPC की धारा 83 सम्पूर्ण जानकारी एवम् परिभाषा इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 83 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 83 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई जिसकी आयु सात वर्ष से ऊपर बारह वर्ष से कम अपरिपक्व समझ के शिशु का कार्य, उसके द्वारा किया गया कोई कार्य अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 83 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 83 के अनुसार-

सात वर्ष से ऊपर किंतु बारह वर्ष से कम आयु के अपरिपक्व समझ के शिशु का कार्य-

कोई बात अपराध नही है, जो सात वर्ष से ऊपर और बारह वर्ष से कम आयु के ऐसे शिशु द्वारा को जाती है जिसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह उस अवसर पर अपने आचरण की प्रकृति और परिणामों का निर्णय कर सके।

Act of a child above seven and under twelve of immature understanding-

Nothing an offence which is done by a child above seven years of age and under twelve, who has not attained sufficient maturity of understanding to judge of the nature and consequences of his conduct on that occasion.

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 83 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 381| लिपिक या सेवक द्वारा स्वामी के कब्जे में संपत्ति की चोरी |IPC Section- 381 in hindi | Theft by clerk or servent of property in possession of masters.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 381 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 381? साथ ही हम आपको IPC की धारा 381 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 381 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम बात करेंगे धारा 381 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यदि कोई सरकारी कर्मचारी या नौकर अपने ही ऑफिस या कारोबारी में किसी चल संपत्ति की चोरी करता है तो वह व्यक्ति भारतीय दण्ड संहिता की धारा 381 के अंतर्गत अपराधी होगा। इस लेख के माध्यम से हम आपको दंड, जमानत कैसे मिलेगी और इत्यादि की जानकारी आप को देगें।

आईपीसी की धारा 381 के अनुसार-

लिपिक या सेवक द्वारा स्वामी के कब्जे में सम्पत्ति की चोरी-

जो कोई लिपिक या सेवक होते हुये, या लिपिक या सेवक की हैसियत में नियोजित होते हुये, अपने मालिक या नियोक्ता के कब्जे को किसी सम्पत्ति की चोरी करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

Theft by clerk or servant of property in possession of masters-

Whoever being a clerk or servant, or being employed in the capacity of a clerk or servant, commits theft in respect of any property in the possession of his master or employer, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine.

लागू अपराध

यह लिपिक या सेवक द्वारा स्वामी के या नियोक्ता के कब्जे की संपत्ति की चोरी करना।
सजा- सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना, अथवा दोनो का भागीदार होगा।
यह एक गैर जमानती, संज्ञेय अपराध है और किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नही है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

जो कोई सरकारी कर्मचारी या नौकर, जो किसी कार्यालय में कार्यरत है, अपने स्वामी अथवा नियोक्ता के कब्जे की किसी संपत्ति की चोरी करेगा तो वह सात वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना अथवा दोनो का भागीदार हो सकता है।

जमानत (Bail) का प्रावधान

यह अपराध एक गैर जमानतीय, संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। यह अपराध गैर जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से नही मिल पाएगी। न्यायालय द्वारा ट्रायल के पश्चात् ही दोषी या निर्दोष साबित होगा।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
यह लिपिक या सेवक द्वारा स्वामी के या नियोक्ता के कब्जे की संपत्ति की चोरी करना।सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना, अथवा दोनो।संज्ञेयगैर-जमानतीयकिसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेट

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 381 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी , फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है ।

आईपीसी की धारा 419 | प्रतिरूपण द्वारा छल के लिए दंड | IPC Section-419 in hindi | Punishment for Cheating by personation.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 419 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 419? साथ ही हम आपको IPC की धारा 419 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 419 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। हम में से बहुत लोगो के मन में सवाल उठता होगा, यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के साथ वेशभूषा बदलकर छल करता है, तो क्या उसके लिए कोई सजा है हमारे संविधान में है जी हां हमारे संविधान में ऐसे प्रत्येक छल के लिए सजा का प्रावधान दिया गया है ।

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 419 के अंतर्गत कोई व्यक्ति वेशभूषा बदलकर किसी अन्य व्यक्ति के साथ छल करता है, तो वह इस धारा के अंतर्गत दण्ड का भागीदारी होगा।आज हम आपको इस लेख के माध्यम से आपको ऐसे अपराध के लिए क्या सजा, अर्थदंड और जमानत कैसे मिलेगी इत्यादि सब कुछ बताएंगे । आइए जानते हैं आईपीसी क्या कहती है।

आईपीसी की धारा 419 के अनुसार-

प्रतिरूपण द्वारा छल के लिए दंड –

जो कोई प्रतिरूपण द्वारा छल करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जाएगा।

Punishment for Cheating by personation-

Whoever cheats by personation shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three years, or with fine, or with both.

प्रतिरूपण द्वारा छल क्या है-

भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत छल को आईपीसी की धारा 416 में परिभाषित किया गया है, किसी व्यक्ति द्वारा प्रत्येक प्रकार से किए गए छल में दंड का प्रावधान है। इसी प्रकार प्रतिरूपण छल भी दंडनीय है। प्रतिरूपण (Personation) अर्थात् वेश भूषा बदलकर, रूप बदलकर या व्यक्तित्व बदलकर किसी अन्य व्यक्ति को छलना भी एक तरह छल है, जिसके लिए वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 419 के अंतर्गत दंडनीय होगा।

लागू अपराध

प्रतिरूपण द्वारा छल करना ।
सजा– 3 वर्ष के लिए कारावास या आर्थिक दंड या दोनों का भागीदार होगा।
यह एक जमानती, संज्ञेय अपराध है और किसी भी  मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध पीड़ित व्यक्ति के साथ समझौता करने योग्य है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के साथ रूप बदलकर छल करता है तो हमारे संविधान में ऐसे अपराधों के लिए दण्ड का प्रावधान भारतीय दंड संहिता की धारा 419 में परिभाषित किया गया है। IPC में धारा 419 तक किसी व्यक्ति के साथ रूप बदलकर छल करने की सजा 3 वर्ष के लिए कारावास या आर्थिक दंड या दोनों दिया जा सकता है।

जमानत (Bail) का प्रावधान

यह अपराध एक जमानतीय, संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। यह अपराध जमानतीय होने के कारण आसानी से जमानत किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा मिल सकती है, क्यों कि यह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत जमानतीय है। यह अपराध पीड़ित व्यक्ति के साथ समझौता करने योग्य है |

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
प्रतिरूपण द्वारा छल करना।3 वर्ष के लिए कारावास या आर्थिक दंड या दोनोंसंज्ञेयजमानतीयकिसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेट

हमारा प्रयास धारा 419 की पूर्ण जानकारी आप तक प्रदान करने का है, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है ।
धन्यवाद

आईपीसी की धारा 409, लोक सेवक या बैंकर द्वारा, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा आपराधिक न्यासभंग | IPC Section-409 in hindi | Punishment for Criminal breach of trust by Public servant, or by banker, merchant or agent.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 409 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 409? साथ ही हम आपको IPC की धारा 409 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 409 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। हम में से बहुत लोगो के मन में सवाल उठता होगा, यदि कोई सरकारी नौकर अथवा बैंक में नौकर, व्यापारी अथवा अभिकर्ता द्वारा किसी व्यक्ति के विश्वास के साथ छल करते है, तो क्या वह भी दंड के भागीदार होंगे । जी हां आज हम आपको IPC की धारा 409 के बारे कैसे क्या सजा मिलती और कैसे क्या जुर्माना भी देना पड़ सकता है और बचने के क्या तरीके है।

कोई सरकारी कर्मचारी, बैंक, अथवा कोई एजेंट कभी कभी किसी व्यक्ति के कागजों अथवा उसके अर्जित धन का गलत उपयोग करते है, अर्थात् उनके विश्वास का अपराधिक हनन “Criminal Breach of Trust” करते है, तो वह भी दंड के भागीदार होंगे।
यह धारा ऐसे अपराधों के लिए दंड का प्रावधान देती है। आइए जानते हैं भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409 क्या कहती है।

आईपीसी की धारा 409 के अनुसार-

लोक सेवक या बैंकर द्वारा,  व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा आपराधिक न्यासभंग-

जो कोई लोक-सेवक के नाते अथवा बैंकर, व्यापारी फैक्टर, दलाल, अटार्नी या अभिकर्ता के रूप में अपने कारोबार के अनुक्रम में किसी प्रकार की संपत्ति या संपत्ति पर, कोई अख्तार अपने में न्यस्त होते हुए उस संपत्ति के विषय में, अपराधिक न्यासभंग करेगा, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि 10 वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया  जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

Punishment for Criminal breach of trust by Public servant, or by banker, merchant or agent-

Whoever, being in any manner entrusted with property, or which any dominion over property in his capacity of a public servant or in the way of his business as a banker, merchant, factor, broker, attorney or agent, commits criminal breach of trust in respect of that property, shall be punished with imprisonment for life, or with imprisonment of either description for a term which may extend to 10 years and shall also be liable to fine.

लागू अपराध

लोक सेवक या बैंक कर्मचारी, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा विश्वास का आपराधिक हनन करने पर
सजा– 10 वर्ष का कारावास और आर्थिक दंड का भागीदार होगा।
यह एक अजमानती, संज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

जब कोई व्यक्ति किसी लोक सेवक या बैंक कर्मचारी, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा, उसके विश्वास को इस प्रकार तोड़ता है तो वह, उसके विश्वास का अपराधिक हनन करता है। ऐसे अपराधों के लिए दण्ड का प्रावधान भारतीय दंड संहिता की धारा 409 परिभाषित किया गया है। IPC में धारा 409 तक आपराधिक हनन की सजा 10 वर्ष का कारावास और आर्थिक दंड दिया जा सकता है।

आपराधिक हनन “Criminal Breach of Trust” करने वाले व्यक्ति को कारावास की सजा का प्रावधान है, जिसकी समय सीमा को 10, बर्षों तक बढ़ाया जा सकता है, साथ ही उस दोषी व्यक्ति को आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है।

जमानत (Bail) का प्रावधान

यह अपराध एक अजमानतीय, संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। इस धारा में आरोप लगाए गए व्यक्ति को इतनी आसानी से जमानत नहीं मिलेगी। आपराधिक हनन “Criminal Breach of Trust” करने लोक सेवक या बैंक कर्मचारी, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा जमानत अपराधी के अपराध की गहराइयों को देखकर ही उच्च न्यायालय से ही जमानत मिल सकती है इस अपराध में समझौता करने योग्य नहीं है|

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
लोक सेवक या बैंक कर्मचारी, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा विश्वास का आपराधिक हनन करने पर।10 वर्ष का कारावास और आर्थिक दंडसंज्ञेयजमानतीयप्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट

हमारा प्रयास धारा 409 की पूर्ण जानकारी आप तक प्रदान करने का है, अगर फिर भी आपके मन में कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है ।

आईपीसी की धारा 406, आपराधिक न्यासभंग के लिए दण्ड | IPC Section-406 in hindi | Punishment for Criminal breach of trust.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 406 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 406? साथ ही हम आपको IPC की धारा 406 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, पूर्ण जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 406 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। हम में बहुत से लोग, जिन पर हम विश्वास करते है, और वह विश्वास जीतते है, इस प्रकार विश्वास जीतने कि बाद विश्वास तोड़े, इसको ही कानून कि भाषा में “Criminal Breach of Trust” कहते है |

इसके बारे में विस्तार से बात करेंगे, आज हम आपको यह भी बताएँगे कि IPC (आईपीसी) की धारा 406 क्या है, IPC की इस धारा 406 के अंतर्गत क्या अपराध आता है साथ ही इस धारा 406 में सजा का क्या प्रावधान है,  तो आइये जानते  हैं क्या कहती है।

आईपीसी की धारा 406 के अनुसार-

आपराधिक न्यासभंग के लिए दण्ड-

जो कोई अपराधिक न्यासभंग करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।

Punishment for Criminal breach of trust-

Whoever commits criminal breach of trust shall be punished with imprison-ment of either description for a term which may extend to three years, or with fine, or with both.

आपराधिक न्यासभंग का क्या अर्थ-

हम में से बहुत लोगो ने किसी न किसी व्यक्ति पर व्यक्ति बहुत अधिक विश्वास करते है और एक समय ऐसा आता है, जब उसी, विश्वास के कारण धोखा भी खा जाते है। जब किसी व्यक्ति को अधिक विश्वास करते है लेकिन जो व्यक्ति इस प्रकार विश्वास जीतने कि बाद विश्वास तोड़े, इसको कानून कि भाषा में “Criminal Breach of Trust”  कहते है |

उदाहरार्थ- जब भी कोई किसी व्यक्ति ने किसी दूसरे व्यक्ति को विश्वास या भरोसे पे कोई संपत्ति दी या कोई ऐसी वस्तु दी और उस दूसरे व्यक्ति द्वारा उस संपत्ति का गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया या गैर कानूनी से प्रयोग में लिया गया या किसी अन्य व्यक्ति को बेच दिया या फिर पहले व्यक्ति के माँगने पर उस संपत्ति को नही लौटाया, तो वह इसके लिए अपराध का भागीदार होगा। विश्वास के “आपराधिक हनन” अर्थात “Criminal Breach of Trust” का दोषी होगा। इसे ही कानून की भाषा में आपराधिक न्यासभंग कहते है ।

ऐसे कृत्य ही अपराध की श्रेणी में आते है जिसे IPC की धारा 405 में परिभाषित किया गया है अब इस अपराध कि लिए दंड का निर्धारण किया गया है इसके लिए IPC की धारा 406 में प्रावधान दिया गया है जिसमे उस व्यक्ति एक अवधि के लिए कारावास जिसे तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या आर्थिक दंड, या दोनों से दंडित किया जाएगा।

लागू अपराध

यदि अपराधिक न्यासभंग करता है।
सजा– तीन वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना या दोनों हो सकते है ।
यह एक अजमानती, संज्ञेय अपराध है । यह केवल और केवल प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा ही विचारणीय होता है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के विश्वास को इस प्रकार तोड़ता है तो वह, उसके विश्वास का अपराधिक हनन करता है। ऐसे अपराधों के लिए दण्ड का प्रावधान भारतीय दंड संहिता की धारा 405 परिभाषित किया गया है। IPC में धारा 407 से धारा 409 तक अलग – अलग प्रावधानों के अनुसार अलग – अलग प्रकार से विश्वास के आपराधिक हनन की सजा का वर्णन किया गया है।

आपराधिक हनन “Criminal Breach of Trust” करने वाले व्यक्ति को कारावास की सजा का प्रावधान है, जिसकी समय सीमा को 3, बर्षों तक बढ़ाया जा सकता है, साथ ही उस दोषी व्यक्ति को आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है।

जमानत (Bail) का प्रावधान

यह अपराध एक अजमानतीय, संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। इस धारा में आरोप लगाए गए व्यक्ति को इतनी आसानी से जमानत नहीं मिलेगी। आपराधिक हनन “Criminal Breach of Trust” करने वाले अपराधों मे जमानत अपराधी के अपराध के अनुसार जुर्म की गहराइयों को देखकर ही उच्च न्यायालय से ही जमानत मिल सकती है, यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
यदि अपराधिक न्यासभंग करता है।तीन वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना या दोनोंसंज्ञेयगैर-जमानतीयप्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट

हमारा प्रयास धारा 406 की पूर्ण जानकारी आप तक प्रदान करने का है, अगर फिर भी आपके मन में कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।