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सीआरपीसी की धारा 437 | अजमानतीय अपराध की दशा में कब जमानत ली सकेगी | CrPC Section- 437 in hindi| Concurrent power of Central When bail may be taken in case of non-bailable offence.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 437 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 437 के अन्तर्गत जब कोई व्यक्ति, जिस पर अजमानतीय अपराध का अभियोग है या जिस पर यह सन्देह है कि उसने अजमानतीय अपराध किया है, पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाता है या उच्च न्यायालय अथवा सेशन न्यायालय से भिन्न न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है तब वह जमानत पर छोड़ा जा सकता है, किन्तु यदि यह विश्वास करने के लिए उचित आधार प्रतीत होते हैं कि ऐसा व्यक्ति मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दोषी है तो वह इस प्रकार नहीं छोड़ा जाएगा।

सीआरपीसी की धारा 437 के अनुसार

अजमानतीय अपराध की दशा में कब जमानत ली सकेगी-

(1) जब कोई व्यक्ति, जिस पर अजमानतीय अपराध का अभियोग है या जिस पर यह सन्देह है कि उसने अजमानतीय अपराध किया है, पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाता है या उच्च न्यायालय अथवा सेशन न्यायालय से भिन्न न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है तब वह जमानत पर छोड़ा जा सकता है, किन्तु-
(i) यदि यह विश्वास करने के लिए उचित आधार प्रतीत होते हैं कि ऐसा व्यक्ति मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दोषी है तो वह इस प्रकार नहीं छोड़ा जाएगा;
(ii) यदि ऐसा अपराध कोई संज्ञेय अपराध है और ऐसा व्यक्ति मृत्यु, आजीवन कारावास या सात वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दण्डनीय किसी अपराध के लिए पहले दोषसिद्ध किया गया है, या [तीन वर्ष या उससे अधिक के लिए किन्तु सात वर्ष से अनधिक की अवधि के कारावास से दण्डनीय किसी संज्ञेय अपराध] के लिए दो या अधिक अवसरों पर पहले दोषसिद्ध किया गया है तो वह इस प्रकार नहीं छोड़ा जाएगा :
परन्तु न्यायालय यह निदेश दे सकेगा कि खण्ड (i) या खण्ड (ii) में निर्दिष्ट व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाए यदि ऐसा व्यक्ति सोलह वर्ष से कम आयु का है या कोई स्त्री या कोई रोगी या शिथिलांग व्यक्ति है :
परन्तु यह और कि न्यायालय यह भी निदेश दे सकेगा कि खण्ड (ii) में निर्दिष्ट व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाए, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि किसी अन्य विशेष कारण से ऐसा करना न्यायोचित तथा ठीक है :
परन्तु यह और भी कि केवल यह बात कि अभियुक्त की आवश्यकता, अन्वेषण में साक्षियों द्वारा पहचान • जाने के लिए हो सकती है, जमानत मंजूर करने से इंकार करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं होगी, यदि वह अन्यथा जमानत पर छोड़ दिये जाने के लिए हकदार है और वह वचन देता है कि वह ऐसे निदेशों का, जो न्यायालय द्वारा दिए जाएं, अनुपालन करेगा।
परन्तु यह और भी कि किसी भी व्यक्ति को, यदि उस द्वारा किया गया अभिकथित अपराध मृत्यु, आजीवन कारावास या सात वर्ष अथवा उससे अधिक के कारावास से दण्डनीय है तो लोक अभियोजक को सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना इस उपधारा के अधीन न्यायालय द्वारा जमानत पर नहीं छोड़ा जाएगा।
(2) यदि ऐसे अधिकारी या न्यायालय को, यथास्थिति, अन्वेषण, जांच या विचारण के किसी प्रक्रम में यह प्रतीत होता है कि यह विश्वास करने के लिए उचित आधार नहीं है कि अभियुक्त ने अजमानतीय अपराध किया है किन्तु उसके दोषी होने के बारे में और जांच करने के लिए पर्याप्त आधार है [तो अभियुक्त धारा 446- क के उपबन्धों के अधीन रहते हुए और ऐसी जांच लम्बित रहने तक] जमानत पर, या ऐसे अधिकारी या न्यायालय के स्वविवेकानुसार, इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित प्रकार से अपने हाजिर होने के लिए प्रतिभुओं रहित बन्धपत्र निष्पादित करने पर, छोड़ दिया जाएगा।
(3) जब कोई व्यक्ति, जिस पर ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की या उससे अधिक की है, दण्डनीय कोई अपराध या भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 6, अध्याय 16 या अध्याय 17 के अधीन कोई अपराध करने या ऐसे किसी अपराध का दुष्प्रेरण या षड्यंत्र या प्रयत्न करने का अभियोग या संदेह है, उपधारा (1) के अधीन जमानत पर छोड़ा जाता है [तो न्यायालय यह शर्त अधिरोपित करेगा:-
(क) कि ऐसा व्यक्ति इस अध्याय के अधीन निष्पादित बंधपत्र की शर्तों के अनुसार हाजिर होगा;
(ख) कि ऐसा व्यक्ति उस अपराध जैसा, जिसको करने का उस पर अभियोग या संदेह है, कोई अपराध नहीं करेगा; और
(ग) कि ऐसा व्यक्ति उस मामले के तथ्यों से अवगत किसी व्यक्ति को न्यायालय या किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष ऐसे तथ्यों को प्रकट न करने के लिए मनाने के वास्ते प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उसे कोई उत्प्रेरणा, धमकी या वचन नहीं देगा या साक्ष्य को नहीं बिगाड़ेगा,
और न्याय के हित में ऐसी अन्य शर्तें, जिसे वह ठीक समझे, अधिरोपित कर सकता है।
(4) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन जमानत पर किसी व्यक्ति को छोड़ने वाला अधिकारी या न्यायालय ऐसा करने के अपने कारणों या विशेष कारणों] को लेखबद्ध करेगा।
(5) यदि कोई न्यायालय, जिसने किसी व्यक्ति को उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन जमानत पर छोड़ा है, ऐसा करना आवश्यक समझता है तो ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने का निदेश दे सकता है और उसे अभिरक्षा के लिए सुपुर्द कर सकता है।
(6) यदि मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय किसी मामले में ऐसे व्यक्ति का विचारण, जो किसी अजमानतीय अपराध का अभियुक्त हैं, उस मामले में साक्ष्य देने के लिए नियत प्रथम तारीख से साठ दिन की अवधि के अन्दर पूरा नहीं हो जाता है तो, यदि ऐसा व्यक्ति उक्त सम्पूर्ण अवधि के दौरान अभिरक्षा में रहा है तो, जब तक ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे मजिस्ट्रेट अन्यथा निदेश न दे वह मजिस्ट्रेट की समाधानप्रद जमानत पर छोड़ दिया जाएगा।
(7) यदि अजमानतीय अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विचारण के समाप्त हो जाने के पश्चात् और निर्णय दिए जाने के पूर्व किसी समय न्यायालय की यह राय है कि यह विश्वास करने के उचित आधार हैं कि अभियुक्त किसी ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और अभियुक्त अभिरक्षा में है, तो वह अभियुक्त को, निर्णय सुनने के लिए अपने हाजिर होने के लिए प्रतिभुओं रहित बन्धपत्र उसके द्वारा निष्पादित किए जाने पर छोड़ देगा।

When bail may be taken in case of non-bailable offence-
(1) When any person accused of, or suspected of, the commission of any non-bailable offence is arrested or detained without warrant by an officer in charge of a police station or appears or is brought before a Court other than the High Court or Court of Session, he may be released on bail, but-
(i) such person shall not be so released if there appear reasonable grounds for believing that he has been guilty of an offence punishable with death or imprisonment for life;
(ii) such person shall not be so released if such offence is a cognizable offence and he had been previously convicted of an offence punishable with death, imprisonment for life or imprisonment for seven years or more, or he had been previously convicted on two or more occasions of 3[a cognizable offence punishable with imprisonment for three years or more but not less than seven years.
Provided that the Court may direct that a person referred to in clause (i) or clause (ii) be released on bail if such person is under the age of sixteen years or is a woman or is sick or infirm:
Provided further that the Court may also direct that a person referred to in clause (ii) be released on bail if it is satisfied that it is just and proper so to do for any other special reason:
Provided also that the mere fact that an accused person may be required for being identified by witnesses during investigation shall not be sufficient ground for refusing to grant bail if he is otherwise entitled to be released on bail and gives an undertaking that he shall comply with such directions as may be given by the Court.
Provided also that no person shall, if the offence alleged to have been commi by him is punishable with death, imprisonment for life, or imprisonment for se years or more be released on bail by the Court under this sub-section without give an opportunity of hearing to the Public Prosecutor.
(2) If it appears to such officer or Court at any stage of the investigation, inquiry or trial, as the case may be, that there are no reasonable grounds for believing that the accused has committed a non-bailable offence, but that there are sufficient grounds for further inquiry into his guilt, [the accused shall, subject to the provisions of Section 446-A and pending such inquiry, be released on bail], or, at the discretion of such officer or Court, on the execution by him of a bond without sureties for hu appearance as hereinafter provided.
(3) When a person accused or suspected of the commission of an offence punishable with imprisonment which may extend to seven years or more or of an offence under Chapter VI. Chapter XVI or Chapter XVII of the Indian Penal Code (43 of 1860) or abetment of, or conspiracy or attempt to commit, any such offence. a released on bail under sub-section (1), the Court shall impose the conditions-
(a) that such person shall attend in accordance with the conditions of bond executed under this Chapter.
(b) that such person shall not commit an offence similar to the offence of which he is accused, or suspected, of the commission of which be suspected, and
(c) that such person shall not directly or indirectly make any inducement, threat or promise to any person acquainted with the facts of the case so as to dissuade him from disclosing such facts to the Court or to any police officer or tamper with the evidence.
and may also impose, in the interests of justice, such other conditions as it considers necessary.
(4) An officer or a Court releasing any person on bail under sub-section (1) or sub section (2), shall record in writing his or its 4[reasons or special reasons for so doing. (5) Any Court which has released a person on bail under sub-section (1) or sub section (2), may, if it considers it necessary so to do, direct that such person be arrested and commit him to custody.
(6) If, in any case triable by a Magistrate, the trial of a person accused of any non bailable offence is not concluded within a period of sixty days from the first date fixed for taking evidence in the case, such person shall, if he is in custody during the whole of the said period, be released on bail to the satisfaction of the Magistrate, unless for reasons to be recorded in writing, the Magistrate otherwise directs.
(7) If, at any time after the conclusion of the trial of a person accused of a non bailable offence and before judgment is delivered, the Court is of opinion that there are reasonable grounds for believing that the accused is not guilty of any such offence, it shall release the accused, if he is in custody, on the execution by him of a bond without sureties for his appearance to hear judgment delivered.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 437 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 436A | अधिकतम अवधि जिसके लिए विचाराधीन कैदी निरुद्ध किया जा सकता है | CrPC Section- 436A in hindi| Maximum period for which an undertrial prisoner can be detained.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 436A का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 436A के अन्तर्गत जहाँ कोई व्यक्ति, किसी विधि के अधीन किसी अपराध के (जो ऐसा अपराध नहीं है जिसके लिए उस विधि के अधीन मृत्यु दण्ड एक दण्ड के रूप में विनिर्दिष्ट किया गया है) इस संहिता के अधीन अन्वेषण, जाँच या विचारण की अवधि के दौरान कारावास की उस अधिकतम अवधि के जो उस विधि के अधीन उस अपराध के लिए विनिर्दिष्ट की गई है, आधे से अधिक की अवधि के लिए निरोध भोग चुका है, वहाँ वह प्रतिभूओं सहित या रहित व्यक्तिगत बंधपत्र पर न्यायालय द्वारा छोड़ दिया जाएगा ।

सीआरपीसी की धारा 436A के अनुसार

अधिकतम अवधि जिसके लिए विचाराधीन कैदी निरुद्ध किया जा सकता है-

जहाँ कोई व्यक्ति, किसी विधि के अधीन किसी अपराध के (जो ऐसा अपराध नहीं है जिसके लिए उस विधि के अधीन मृत्यु दण्ड एक दण्ड के रूप में विनिर्दिष्ट किया गया है) इस संहिता के अधीन अन्वेषण, जाँच या विचारण की अवधि के दौरान कारावास की उस अधिकतम अवधि के जो उस विधि के अधीन उस अपराध के लिए विनिर्दिष्ट की गई है, आधे से अधिक की अवधि के लिए निरोध भोग चुका है, वहाँ वह प्रतिभूओं सहित या रहित व्यक्तिगत बंधपत्र पर न्यायालय द्वारा छोड़ दिया जाएगा;
परन्तु न्यायालय, लोक अभियोजक की सुनवाई के पश्चात् और उन कारणों से जो उस द्वारा लेखबद्ध किए जाएंगे, ऐसे व्यक्ति के उक्त आधी अवधि से दीर्घतर अवधि के लिए निरोध को जारी रखने का आदेश कर सकेगा या व्यक्तिगत बंधपत्र के बजाय प्रतिभुओं सहित या रहित जमानत पर उसे छोड़ देगा;
परन्तु यह और कि कोई भी ऐसा व्यक्ति अन्वेषण, जाँच या विचारण की अवधि के दौरान उस विधि के अधीन उक्त अपराध के लिए उपबंधित कारावास की अधिकतम अवधि से अधिक के लिए किसी भी दशा में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा।
स्पष्टीकरण- जमानत मंजूर करने के लिए इस धारा के अधीन निरोध की अवधि की गणना करने में अभियुक्त द्वारा कार्यवाही में किए गए विलंब के कारण भोगी गई निरोध की अवधि की अपवर्जित किया जाएगा।

Maximum period for which an undertrial prisoner can be detained-

Where a person has, during the period of investigation, inquiry or trial under this Code of an offence under any law (not being an offence for which the punishment of death has been specified as one of the punishments under that law) undergone detention for a period extending up to one-half of the maximum period of imprisonment specified for that offence under that law, he shall be released by the Court on his personal bond with or without sureties:
Provided that the Court may, after hearing the Public Prosecutor and for reasons to be recorded by it in writing, order the continued detention of such person for a period longer than one-half of the said period or release him on bail instead of the personal bond with or without sureties :
Provided further that no such person shall in any case be detained during the period of investigation inquiry or trial for more than the maximum period of imprisonment provided for the said offence under that law.
Explanation- In computing the period of detention under this section for granting bail the period of detention passed due to delay in proceeding caused by the accused shall be excluded.

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सीआरपीसी की धारा 436 | किन मामलों में जमानत ली जाएगी | CrPC Section- 436 in hindi| In what cases bail to be taken.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 436 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 436 के अन्तर्गत जब गैर-जमानतीय अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से भिन्न कोई व्यक्ति पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाता है या न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है और जब वह ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में है उस बीच किसी समय, या ऐसे न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम में, जमानत देने के लिए तैयार तब ऐसा व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा।

सीआरपीसी की धारा 436 के अनुसार

किन मामलों में जमानत ली जाएगी-

(1) जब अजमानतीय अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से भिन्न कोई व्यक्ति पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाता है या न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है और जब वह ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में है उस बीच किसी समय, या ऐसे न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम में, जमानत देने के लिए तैयार तब ऐसा व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा:
परन्तु यदि ऐसा अधिकारी या न्यायालय ठीक समझता है [तो वह ऐसे व्यक्ति से जमानत लेने के बजाय उसके इनमें इसके पश्चात् उपबंधित प्रकार से अपने हाजिर होने के लिए प्रतिभूओं रहित बंधपत्र निष्पादित करने पर उसे उन्मोचित कर सकेगा और यदि ऐसा व्यक्ति निर्धन है और जमानत देने में असमर्थ है, तो उसे ऐसे उन्मोचित करेगा।]
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां कोई व्यक्ति, हाजिरी के समय और स्थान के बारे में जमानतपत्र की शर्तों का अनुपालन करने में असफल रहता है वहां न्यायालय उसे, जब वह उसी मामले में किसी पश्चात्वर्ती अवसर पर न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या अभिरक्षा में लाया जाता है, जमानत पर छोड़ने से इंकार कर सकता है और ऐसी किसी इंकारी का, ऐसे जमानतपत्र से आबद्ध किसी व्यक्ति से धारा 446 के अधीन उसकी शास्ति देने की अपेक्षा करने की न्यायालय की शक्तियों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

In what cases bail to be taken-
(1) When any person other than a person accused of a non-bailable offence is arrested or detained without warrant by an officer in charge of a police station, or appears or is brought before a Court, and is prepared at any time while in the custody of such officer or at any stage of the proceeding before such Court to give bail, such person shall be released on bail :
Provided that such officer or Court, if he or it thinks fit, may, and shall, if such person is indigent and is unable to furnish surety, instead of taking bail] from such person, discharge him on his executing a bond without sureties for his appearance as hereinafter provided :
(2) Notwithstanding anything contained in sub-section (1), where a person has failed to comply with the conditions of the bail-bond as regards the time and place of attendance, the Court may refuse to release him on bail, when on a subsequent occasion in the same case he appears before the Court or brought in custody and any such refusal shall be without prejudice to the powers of the Court to call upon any person bound by such bond to pay the penalty thereof under Section 446.

स्पष्टीकरण- जहाँ कोई व्यक्ति अपनी गिरफ्तारी की तारीख के एक सप्ताह के भीतर जमानत देने में असमर्थ है वहाँ अधिकारी या न्यायालय के लिए यह उपधारणा करने का पर्याप्त आधार होगा कि वह इस परन्तुक के प्रयोजनों के लिए निर्धन व्यक्ति है।
परन्तु यह और कि इस धारा की कोई बात धारा 116 की उपधारा (3) या धारा 466-क के उपबन्धों पर प्रभाव डालने वाली न समझी जाएगी।

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 436 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 435 | कुछ मामलों में राज्य सरकार का केन्द्रीय सरकार से परामर्श करने के पश्चात् कार्य करना | CrPC Section- 435 in hindi| State Government to act after consultation with Central Government in certain cases.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 435 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 435 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 435 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 435 के अन्तर्गत किसी मामले मे किसी दंडादेश का परिहार करने या उसके लघुकरण के बारे में धारा 432 और 433 द्वारा राज्य सरकार को प्रदत्त शक्तियों का राज्य सरकार द्वारा प्रयोग उस दशा में केन्द्रीय सरकार से परामर्श किए बिना नहीं किया जाएगा जब दंडादेश किसी ऐसे अपराध के लिए है।


सीआरपीसी की धारा 435 के अनुसार

कुछ मामलों में राज्य सरकार का केन्द्रीय सरकार से परामर्श करने के पश्चात् कार्य करना-

(1) किसी दंडादेश का परिहार करने या उसके लघुकरण के बारे में धारा 432 और 433 द्वारा राज्य सरकार को प्रदत्त शक्तियों का राज्य सरकार द्वारा प्रयोग उस दशा में केन्द्रीय सरकार से परामर्श किए बिना नहीं किया जाएगा जब दंडादेश किसी ऐसे अपराध के लिए है-
(क) जिसका अन्वेषण दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 (1946 का 25) के अधीन गठित दिल्ली पुलिस स्थापन द्वारा या इस संहिता से भिन्न किसी केन्द्रीय अधिनियम के अधीन अपराध का अन्वेषण करने के लिए सशक्त किसी अन्य अभिकरण द्वारा किया गया है, अथवा (ख) जिसमें केन्द्रीय सरकार की किसी सम्पत्ति का दुर्विनियोग या नाश या नुकसान अन्तर्ग्रस्त है, अथवा
(ग) जो केन्द्रीय सरकार की सेवा में के किसी व्यक्ति द्वारा तब किया गया है जब वह अपने पदीय कर्तव्यों के निर्वहन में कार्य कर रहा था या उसका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित था।
(2) जिस व्यक्ति को ऐसे अपराधों के लिए दोषसिद्ध किया गया है जिनमें से कुछ उन विषयों से सम्बन्धित है जिन पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, और जिसे पृथक्-पृथक् अवधि के कारावास का, जो साथ-साथ भोगी जानी है, दंडादेश दिया गया है, उसके सम्बन्ध में दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण का राज्य सरकार द्वारा पारित कोई आदेश प्रभावी तभी होगा जब ऐसे विषयों के बारे में जिन पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, उस व्यक्ति द्वारा किए गए अपराधों के संबंध में ऐसे दंडादेशों के, यथास्थिति, परिहार, निलंबन या लघुकरण का आदेश केन्द्रीय सरकार द्वारा भी कर दिया गया है।

State Government to act after consultation with Central Government in certain cases-
(1) The powers conferred by Sections 432 and 433 upon the State Government to remit or commute a sentence, in any case where the sentence is for an offence-
(a) which was investigated by the Delhi Special Police Establishment constituted under the Delhi Special Police Establishment Act, 1946 (25 of 1946), or by any other agency empowered to make investigation into an offence under any Central Act other than this Code, or
(b) which involved the misappropriation or destruction of, or damage to, any property belonging to the Central Government, or
(c) which was committed by a person in the service of the Central Government, while acting or purporting to act in the discharge of his official duty. shall not be exercised by the State Government except after consultation with the Central Government.
(2) No order of suspension, remission or commutation of sentences passed by the State Government in relation to a person, who has been convicted of offences, some of which relate to matters to which the executive power of the Union extends, and who has been sentenced to separate terms of imprisonment which are to run concurrently, shall have effect unless an order for the suspension, remission or commutation, as the case may be, of such sentences has also been made by the Central Government in relation to the offences committed by such person with regard to matters to which the executive power of the Union extends.

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सीआरपीसी की धारा 434 | मृत्यु दंडादेशों की दशा में केन्द्रीय सरकार की समवर्ती शक्ति | CrPC Section- 434 in hindi| Concurrent power of Central Government in case of death sentences.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 434 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 434 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 434 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 434 के अन्तर्गत किसी मामले मे धारा 431 और 433 द्वारा राज्य सरकार को प्रदत्त शक्तियां मृत्यु दंडादेशों की दशा में केन्द्रीय सरकार द्वारा भी प्रयुक्त की जा सकती हैं।

सीआरपीसी की धारा 434 के अनुसार

मृत्यु दंडादेशों की दशा में केन्द्रीय सरकार की समवर्ती शक्ति-

धारा 431 और 433 द्वारा राज्य सरकार को प्रदत्त शक्तियां मृत्यु दंडादेशों की दशा में केन्द्रीय सरकार द्वारा भी प्रयुक्त की जा सकती हैं।

Concurrent power of Central Government in case of death sentences-
The powers conferred by Sections 432 and 433 upon the State Government may, in the case of sentences of death, also be exercised by the Central Government.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 434 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 433A | कुछ मामलों में छूट या लघुकरण की शक्तियों पर निर्बन्धन | CrPC Section- 433A in hindi| Restriction on powers of remission or commutation in certain cases.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433A के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433A कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 433A का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 433A के अन्तर्गत किसी मामले मे धारा 432 में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी व्यक्ति को ऐसे अपराध के लिए, जिसके लिए मृत्यु दण्ड विधि द्वारा उपबन्धित दण्डों में से एक है, आजीवन कारावास का दंडादेश दिया गया है या धारा 433 के अधीन किसी व्यक्ति को दिए गए मृत्यु दंडादेश का आजीवन कारावास के रूप में लघुकरण किया गया है वहां ऐसा व्यक्ति कारावास से तब तक नहीं छोड़ा जाएगा जब तक कि उसने चौदह वर्ष का कारावास पूरा न कर लिया हो।

सीआरपीसी की धारा 433A के अनुसार

कुछ मामलों में छूट या लघुकरण की शक्तियों पर निर्बन्धन-

धारा 432 में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी व्यक्ति को ऐसे अपराध के लिए, जिसके लिए मृत्यु दण्ड विधि द्वारा उपबन्धित दण्डों में से एक है, आजीवन कारावास का दंडादेश दिया गया है या धारा 433 के अधीन किसी व्यक्ति को दिए गए मृत्यु दंडादेश का आजीवन कारावास के रूप में लघुकरण किया गया है वहां ऐसा व्यक्ति कारावास से तब तक नहीं छोड़ा जाएगा जब तक कि उसने चौदह वर्ष का कारावास पूरा न कर लिया हो।

Restriction on powers of remission or commutation in certain cases-
Notwithstanding anything contained in Section 432, where a sentence of imprisonment for life is imposed on conviction of a person for an offence for which death is one of the punishment provided by law, or where a sentence of death imposed on a person has been commuted under Section 433 into one of imprisonment for life, such person shall not be released from prison unless he had served at least fourteen years of imprisonment.

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