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सीआरपीसी की धारा 370 | मतभेद की दशा में प्रक्रिया | CrPसीआरपीसी की धारा 370 | मतभेद की दशा में प्रक्रिया | CrPC Section- 370 in hindi| Procedure in case of difference of opinion.C Section- 370 in hindi| Procedure in case of difference of opinion.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 370 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 370 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 370 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 370 के अन्तर्गत जहां कोई ऐसा मामला न्यायाधीशों के न्यायपीठ के समक्ष सुना जाता है और ऐसे न्यायाधीश राय के बारे में समान रूप से विभाजित है वहां मामला धारा 392 द्वारा उपबंधित रीति से विनिश्चित किया जाएगा।

सीआरपीसी की धारा 370 के अनुसार

मतभेद की दशा में प्रक्रिया-
जहां कोई ऐसा मामला न्यायाधीशों के न्यायपीठ के समक्ष सुना जाता है और ऐसे न्यायाधीश राय के बारे में समान रूप से विभाजित है वहां मामला धारा 392 द्वारा उपबंधित रीति से विनिश्चित किया जाएगा।

Procedure in case of difference of opinion-
Where any such case is heard before a Bench of Judges and such Judges are equally divided in opinion, the case shall be decided in the manner provided by Section 392.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 370 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 369 | नए दंडादेश की पुष्टि का दो न्यायाधीशों द्वारा हस्ताक्षरित किया जाना | CrPC Section- 369 in hindi| Confirmation or new sentence to be signed by two Judges.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 369 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 369 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 369 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 369 के अन्तर्गत ऐसे प्रत्येक मामले में उच्च न्यायालय द्वारा दंडादेश का पुष्टिकरण या उसके द्वारा पारित कोई नया दंडादेश, या आदेश, यदि ऐसे न्यायालय में दो या अधिक न्यायाधीश हों तो, उनमें से कम से कम दो न्यायाधीशों द्वारा किया, पारित किया और हस्ताक्षरित किया जाएगा।

सीआरपीसी की धारा 369 के अनुसार

नए दंडादेश की पुष्टि का दो न्यायाधीशों द्वारा हस्ताक्षरित किया जाना—
इस प्रकार प्रस्तुत प्रत्येक मामले में उच्च न्यायालय द्वारा दंडादेश का पुष्टिकरण या उसके द्वारा पारित कोई नया दंडादेश, या आदेश, यदि ऐसे न्यायालय में दो या अधिक न्यायाधीश हों तो, उनमें से कम से कम दो न्यायाधीशों द्वारा किया, पारित किया और हस्ताक्षरित किया जाएगा।

Confirmation or new sentence to be signed by two Judges-
In every case so submitted, the confirmation of the sentence, or any new sentence or order passed by the High Court, shall, when such Court consists of two or more Judges, be made, passed and signed by at least two of them.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 369 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 368 | दंडादेश को पुष्ट करने या दोषसिद्धि को बातिल करने की उच्च न्यायालय की शक्ति | CrPC Section- 368 in hindi| Power of High Court to confirm sentence or annul conviction.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 368 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 368 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 368 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 368 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय धारा 366 के अधीन प्रस्तुत किसी मामले में दंडादेश की पुष्टि कर सकता है या विधि द्वारा समर्थित कोई अन्य दंडादेश दे सकता है अथवा दोषसिद्धि को बातिल कर सकता है और अभियुक्त को किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध कर सकता है जिसके लिए सेशन न्यायालय उसे दोषसिद्ध कर सकता था, या उसी या संशोधित आरोप पर नए विचारण का आदेश दे सकता है अथवा अभियुक्त व्यक्ति को दोषमुक्त कर सकता है।

सीआरपीसी की धारा 368 के अनुसार

दंडादेश को पुष्ट करने या दोषसिद्धि को बातिल करने की उच्च न्यायालय की शक्ति–
उच्च न्यायालय धारा 366 के अधीन प्रस्तुत किसी मामले में-
(क) दंडादेश की पुष्टि कर सकता है या विधि द्वारा समर्थित कोई अन्य दंडादेश दे सकता है, अथवा
(ख) दोषसिद्धि को बातिल कर सकता है और अभियुक्त को किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध कर सकता है जिसके लिए सेशन न्यायालय उसे दोषसिद्ध कर सकता था, या उसी या संशोधित आरोप पर नए विचारण का आदेश दे सकता है; अथवा
(ग) अभियुक्त व्यक्ति को दोषमुक्त कर सकता है:
परन्तु पुष्टि का कोई आदेश इस धारा के अधीन तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक अपील करने के लिए अनुज्ञात अवधि समाप्त न हो गई हो या यदि ऐसी अवधि के अन्दर अपील पेश कर दी गई है तो जब तक उस अपील का निपटारा न हो गया हो।

Power of High Court to confirm sentence or annul conviction-
In any case submitted under Section 366, the High Court-
(a) may confirm the sentence, or pass any other sentence warranted by law. or
(b) may annul the conviction, and convict the accused of any offence of which the Court of Session might have convicted him, or order a new trial on the same or on amended charge, or
(c) may acquit the accused person:
Provided that no order of confirmation shall be made under this section until the period allowed for preferring an appeal has expired, or, if an appeal is presented within such period, until such appeal is disposed of.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 368 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 367 | अतिरिक्त जांच किए जाने के लिए या अतिरिक्त साक्ष्य लिए जाने के लिए निदेश देने की शक्ति | CrPC Section- 367 in hindi| Power to direct further inquiry to be made or additional evidence to be taken.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 367 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 367 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 367 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 367 के अन्तर्गत यदि ऐसी कार्यवाही के प्रस्तुत किए जाने पर उच्च न्यायालय यह ठीक समझता है कि दोषसिद्ध व्यक्ति को दोषी या निर्दोष होने से संबंधित किसी प्रश्न पर अतिरिक्त जांच की जाए या अतिरिक्त साक्ष्य लिया जाए तो वह स्वयं ऐसी जांच कर सकता है या ऐसा साक्ष्य ले सकता है या सेशन न्यायालय द्वारा उसके किए जाने या लिए जाने का निदेश दे सकता है। जब तक उच्च न्यायालय अन्यथा निदेश न दे, दोषसिद्ध व्यक्ति को, जांच किए जाने या साक्ष्य लिए जाने के समय उपस्थित होने से, अभिमुक्ति दी जा सकती है। जब जांच या साक्ष्य (यदि कोई हो) उच्च न्यायालय द्वारा नहीं की गई है या नहीं लिया गया है तब ऐसी जांच या साक्ष्य का परिणाम प्रमाणित करके उस न्यायालय को भेजा जाएगा।

सीआरपीसी की धारा 367 के अनुसार

अतिरिक्त जांच किए जाने के लिए या अतिरिक्त साक्ष्य लिए जाने के लिए निदेश देने की शक्ति-
(1) यदि ऐसी कार्यवाही के प्रस्तुत किए जाने पर उच्च न्यायालय यह ठीक समझता है कि दोषसिद्ध व्यक्ति को दोषी या निर्दोष होने से संबंधित किसी प्रश्न पर अतिरिक्त जांच की जाए या अतिरिक्त साक्ष्य लिया जाए तो वह स्वयं ऐसी जांच कर सकता है या ऐसा साक्ष्य ले सकता है या सेशन न्यायालय द्वारा उसके किए जाने या लिए जाने का निदेश दे सकता है।
(2) जब तक उच्च न्यायालय अन्यथा निदेश न दे, दोषसिद्ध व्यक्ति को, जांच किए जाने या साक्ष्य लिए जाने के समय उपस्थित होने से, अभिमुक्ति दी जा सकती है।
(3) जब जांच या साक्ष्य (यदि कोई हो) उच्च न्यायालय द्वारा नहीं की गई है या नहीं लिया गया है तब ऐसी जांच या साक्ष्य का परिणाम प्रमाणित करके उस न्यायालय को भेजा जाएगा।

Power to direct further inquiry to be made or additional evidence to be taken-
(1) If, when such proceedings are submitted, the High Court thinks that a further inquiry should be made into, or additional evidence taken upon, any point bearing upon the guilt or innocence of the convicted person, it may make such inquiry or take such evidence itself, or direct it to be made or taken by the Court of Session.
(2) Unless the High Court otherwise directs, the presence of the convicted person may be dispensed with when such inquiry is made or such evidence is taken.
(3) When the inquiry or evidence (if any) is not made or taken by the High Court, the result of such inquiry or evidence shall be certified to such Court.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 367 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 366 | सेशन न्यायालय द्वारा मृत्यु दंडादेश का पुष्टि के लिए प्रस्तुत किया जाना | CrPC Section- 366 in hindi| Sentence of death to be submitted by Court of Session for confirmation.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 366 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 366 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 366 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 366 के अन्तर्गत जब सेशन न्यायालय मृत्यु दंडादेश देता है तब कार्यवाही उच्च न्यायालय को प्रस्तुत की जाएगी और दंडादेश तब तक निष्पादित न किया जाएगा जब तक वह उच्च न्यायालय द्वारा पुष्ट न कर दिया जाए। दंडादेश पारित करने वाला न्यायालय वारंट के अधीन दोषसिद्ध व्यक्ति को जेल की अभिरक्षा के लिए सुपुर्द करेगा।

सीआरपीसी की धारा 366 के अनुसार

सेशन न्यायालय द्वारा मृत्यु दंडादेश का पुष्टि के लिए प्रस्तुत किया जाना—
(1) जब सेशन न्यायालय मृत्यु दंडादेश देता है तब कार्यवाही उच्च न्यायालय को प्रस्तुत की जाएगी और दंडादेश तब तक निष्पादित न किया जाएगा जब तक वह उच्च न्यायालय द्वारा पुष्ट न कर दिया जाए।
(2) दंडादेश पारित करने वाला न्यायालय वारंट के अधीन दोषसिद्ध व्यक्ति को जेल की अभिरक्षा के लिए सुपुर्द करेगा।

Sentence of death to be submitted by Court of Session for confirmation-
(1) When the Court of Session passes a sentence of death, the proceedings shall be submitted to the High Court, and the sentence shall not be executed unless it is confirmed by the High Court.
(2) The Court passing the sentence shall commit the convicted person to jail custody under a warrant.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 366 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 359 | असंज्ञेय मामलों में खर्चा देने के लिए आदेश | CrPC Section- 359 in hindi| Order to pay costs in non-cognizable cases.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 359 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 359 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 359 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 359 के अन्तर्गत जब कभी किसी असंज्ञेय अपराध का कोई परिवाद न्यायालय में किया जाता है तब, यदि न्यायालय अभियुक्त को दोषसिद्ध कर देता है तो, वह अभियुक्त पर अधिरोपित शास्ति के अतिरिक्त उसे यह आदेश दे सकता है कि वह परिवादी को अभियोजन में उसके द्वारा किए गए खर्चे, पूर्णत: या अंशतः दे और यह अतिरिक्त आदेश दे सकता है कि उसे देने में व्यतिक्रम करने पर अभियुक्त तीस दिन से अनधिक की अवधि के लिए सादा कारावास भोगेगा और ऐसे खर्चों के अन्तर्गत आदेशिका फीस, साक्षियों और प्लीडरों की फीस की बाबत किए गए कोई व्यय भी हो सकेंगे जिन्हें न्यायालय उचित समझे।

सीआरपीसी की धारा 359 के अनुसार

असंज्ञेय मामलों में खर्चा देने के लिए आदेश-
(1) जब कभी किसी असंज्ञेय अपराध का कोई परिवाद न्यायालय में किया जाता है तब, यदि न्यायालय अभियुक्त को दोषसिद्ध कर देता है तो, वह अभियुक्त पर अधिरोपित शास्ति के अतिरिक्त उसे यह आदेश दे सकता है कि वह परिवादी को अभियोजन में उसके द्वारा किए गए खर्चे, पूर्णत: या अंशतः दे और यह अतिरिक्त आदेश दे सकता है कि उसे देने में व्यतिक्रम करने पर अभियुक्त तीस दिन से अनधिक की अवधि के लिए सादा कारावास भोगेगा और ऐसे खर्चों के अन्तर्गत आदेशिका फीस, साक्षियों और प्लीडरों की फीस की बाबत किए गए कोई व्यय भी हो सकेंगे जिन्हें न्यायालय उचित समझे।
(2) इस धारा के अधीन आदेश किसी अपील न्यायालय द्वारा, या उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय द्वारा भी किया जा सकेगा जब वह अपनी पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो।

Order to pay costs in non-cognizable cases-
(1) Whenever any complaint of a non-cognizable offence is made to a Court, the Court, if it convicts the accused, may, in addition to the penalty imposed upon him, order him to pay to the complainant, in whole or in part, the cost incurred by him in the prosecution, and may further order that in default of payment, the accused shall suffer simple imprisonment for a period not exceeding thirty days and such costs may include any expenses incurred in respect of process-fees, witnesses and pleader’s fees which the Court may consider reasonable.
(2) An order under this section may also be made by an Appellate Court or by the High Court or Court of Session when exercising its powers of revision.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 359 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।