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सीआरपीसी की धारा 358 | निराधार गिरफ्तार करवाए गये व्यक्तियों को प्रतिकर | CrPC Section- 358 in hindi| Compensation to persons groundlessly arrested.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 358 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 358 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 358 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 358 के अन्तर्गत जब कभी कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को पुलिस अधिकारी से गिरफ्तार कराता है, तब यदि उस मजिस्ट्रेट को, जिसके द्वारा वह मामला सुना जाता है यह प्रतीत होता है कि ऐसी गिरफ्तारी कराने के लिए कोई पर्याप्त आधार नहीं था तो, वह मजिस्ट्रेट अधिनिर्णय दे सकता है कि ऐसे गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को इस सम्बन्ध में उसके समय की हानि और व्यय के लिए [एक हजार रुपये] से अनधिक इतना प्रतिकर, जितना मजिस्ट्रेट ठीक समझे, गिरफ्तार कराने वाले व्यक्ति द्वारा दिया जाएगा।

सीआरपीसी की धारा 358 के अनुसार

निराधार गिरफ्तार करवाए गये व्यक्तियों को प्रतिकर-
(1) जब कभी कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को पुलिस अधिकारी से गिरफ्तार कराता है, तब यदि उस मजिस्ट्रेट को, जिसके द्वारा वह मामला सुना जाता है यह प्रतीत होता है कि ऐसी गिरफ्तारी कराने के लिए कोई पर्याप्त आधार नहीं था तो, वह मजिस्ट्रेट अधिनिर्णय दे सकता है कि ऐसे गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को इस सम्बन्ध में उसके समय की हानि और व्यय के लिए [एक हजार रुपये] से अनधिक इतना प्रतिकर, जितना मजिस्ट्रेट ठीक समझे, गिरफ्तार कराने वाले व्यक्ति द्वारा दिया जाएगा।
(2) ऐसे मामलों में यदि एक से अधिक व्यक्ति गिरफ्तार किए जाते हैं तो मजिस्ट्रेट उनमें से प्रत्येक के लिए उसी रीति से [एक हजार रुपये] से अनधिक उतना प्रतिकर अधिनिर्णीत कर सकेगा, जितना ऐसा मजिस्ट्रेट ठीक समझे।
(3) इस धारा के अधीन अधिनिर्णीत समस्त प्रतिकर ऐसे वसूल किया जा सकता है मानो वह जुर्माना है। और यदि वह ऐसे वसूल नहीं किया जा सकता तो उस व्यक्ति को, जिसके द्वारा वह संदेय है, तीस दिन से अनधिक की इतनी अवधि के लिए, जितनी मजिस्ट्रेट निर्दिष्ट करें, सादे कारावास का दंडादेश दिया जायेगा जब तक कि ऐसी राशि उससे पहले न दे दी जाए।

Compensation to persons groundlessly arrested-
(1) Whenever any person causes a police officer to arrest another person, if it appears to the Magistrate by whom the case is heard that there was no sufficient ground for causing such arrest, the Magistrate may award such compensation, not exceeding [one thousand rupees], to be paid by the person so causing the arrest to the person so arrested, for his loss of time and expenses in the matter, as the Magistrate thinks fit.
(2) In such cases, if more persons than one are arrested, the Magistrate may, in like manner, award to each of them such compensation, not exceeding [one thousand rupees], as such Magistrate thinks fit.
(3) All compensation awarded under this section may be recovered as if it were a fine, and, if it cannot be so recovered, the person by whom it is payable shall be sentenced to simple imprisonment for such term not exceeding thirty days as the Magistrate directs, unless such sum is sooner paid.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 358 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 357C | पीड़िता का उपचार | CrPC Section- 357C in hindi| Treatment of victims.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357C के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357C कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 357C का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357C के अन्तर्गत सभी अस्पताल, लोक या प्राइवेट, चाहे केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, 357 स्थानीय निकायों या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा संचालित हो, भारतीय दण्ड संहिता, (1860 का 45) की धारा 326-क, 376, [धारा 376क, धारा 376कख, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ, धारा 376घक, धारा 376घख] या धारा 376-ङ के अधीन आने वाले किसी अपराध की पीड़िता को तत्काल निःशुल्क प्राथमिक या चिकित्सीय उपचार उपलब्ध करायेंगे और ऐसी घटना की पुलिस को तत्काल सूचना देंगे।

सीआरपीसी की धारा 357C के अनुसार

पीड़िता का उपचार-
सभी अस्पताल, लोक या प्राइवेट, चाहे केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, 357 स्थानीय निकायों या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा संचालित हो, भारतीय दण्ड संहिता, (1860 का 45) की धारा 326-क, 376, [धारा 376क, धारा 376कख, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ, धारा 376घक, धारा 376घख] या धारा 376-ङ के अधीन आने वाले किसी अपराध की पीड़िता को तत्काल निःशुल्क प्राथमिक या चिकित्सीय उपचार उपलब्ध करायेंगे और ऐसी घटना की पुलिस को तत्काल सूचना देंगे।

Treatment of victims-
All hospitals, public or private, whether run by the Central Government, the State Government, local bodies or any other person, shall immediately, provide the first-aid or medical treatment, free of cost, to the victims of any offence covered under Section 326-A, 376, 1[376A, 376AB, 376B, 376C, 376D, 376DA, 376DB] or Section 376-E of the Indian Penal Code (45 of 1860), and shall immediately inform the police of such incident.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 357C की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 357B | प्रतिकर [भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क, धारा 376कख, 376घ, धारा घंक और धारा 376 घख] के अधीन जुर्माने के अतिरिक्त होगा | CrPC Section- 357B in hindi| Compensation to be in addition to fine [under Section 326A, Section 376AB, Section 376D, Section 376DA and Section 376DB of the Indian Penal Code].

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357B के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357B कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 357B का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357B के अन्तर्गत धारा 357क के अधीन राज्य 376 सरकार द्वारा संदेय प्रतिकर 4[भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क, धारा 376कख, 376घ, धारा 376घक और धारा 376घख] के अधीन पीड़िता को जुर्माने के भुगतान के अतिरिक्त होगा।

सीआरपीसी की धारा 357B के अनुसार

प्रतिकर [भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क, धारा 376कख, 376घ, धारा घंक और धारा 376 घख] के अधीन जुर्माने के अतिरिक्त होगा-
धारा 357क के अधीन राज्य 376 सरकार द्वारा संदेय प्रतिकर 4[भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क, धारा 376कख, 376घ, धारा 376घक और धारा 376घख] के अधीन पीड़िता को जुर्माने के भुगतान के अतिरिक्त होगा।

Compensation to be in addition to fine [under Section 326A, Section 376AB, Section 376D, Section 376DA and Section 376DB of the Indian Penal Code]-
The compensation payable by the State Government under Section 357-A shall be in addition to the payment of fine to the victim 4[under Section 326A, Section 376AB, Section 376D, Section 376DA and Section 376DB of the Indian Penal Code].

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सीआरपीसी की धारा 357A | पीड़ित प्रतिकर योजना | CrPC Section- 357A in hindi| Victim compensation scheme.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357A के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357A कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 357A का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357A के अन्तर्गत प्रत्येक राज्य सरकार केन्द्रीय सरकार के समन्वय में ऐसे पीड़ित अथवा उसके आश्रितों को प्रतिकर के प्रयोजन से निधि प्रदान करने के लिए एक योजना तैयार करेगी जो अपराध के परिणाम स्वरूप हानि अथवा क्षति से पीड़ित हुए हैं। यदि विचारण न्यायालय का, विचारण के समाप्त होने पर, यह समाधान हो जाता है कि धारा 357 के अन्तर्गत अधिनिर्णीत प्रतिकर ऐसे पुनर्वास के लिए पर्याप्त नहीं है या जहाँ मामला दोषमुक्ति या उन्मोचन में समाप्त होता है और पीड़ित का पुनर्वास किया जाना है, तब वह प्रतिकर की संस्तुति कर सकेगा।

सीआरपीसी की धारा 357A के अनुसार

पीड़ित प्रतिकर योजना-
(1) प्रत्येक राज्य सरकार केन्द्रीय सरकार के समन्वय में ऐसे पीड़ित अथवा उसके आश्रितों को प्रतिकर के प्रयोजन से निधि प्रदान करने के लिए एक योजना तैयार करेगी जो अपराध के परिणाम स्वरूप हानि अथवा क्षति से पीड़ित हुए हैं।
(2) जब कभी न्यायालय द्वारा प्रतिकर हेतु कोई संस्तुति की जाती है तब जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, या राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, यथास्थिति योजना, जैसा उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, के अधीन प्रतिकर की मात्रा अधिनिर्णीत किए जाने का विनिश्चय करेगा।
(3) यदि विचारण न्यायालय का, विचारण के समाप्त होने पर, यह समाधान हो जाता है कि धारा 357 के अन्तर्गत अधिनिर्णीत प्रतिकर ऐसे पुनर्वास के लिए पर्याप्त नहीं है या जहाँ मामला दोषमुक्ति या उन्मोचन में समाप्त होता है और पीड़ित का पुनर्वास किया जाना है, तब वह प्रतिकर की संस्तुति कर सकेगा।
(4) जहाँ अपराधी का पता नहीं चलता या उसकी शिनाख्त नहीं की जाती है किन्तु पीड़ित की शिनाख्त कर ली जाती है, और जहाँ कोई विचारण नहीं होता है, तब पीड़ित या उसके आश्रित प्रतिकर के अधिनिर्णय के लिए राज्य या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के समक्ष आवेदन कर सकेंगे।
(5) ऐसी संस्तुतियों के प्राप्त होने पर या उपधारा (4) के अधीन आवेदन पत्र पर राज्य या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण सम्यक् जाँच करने के पश्चात् दो माह के भीतर जाँच पूर्ण कर पर्याप्त प्रतिकर अधिनिर्णीत करेगा।
(6) राज्य या जिला विधिक सेवा अधिकरण, यथास्थिति, पीड़ित की पीड़ा का शमन करने के लिए पुलिस अधिकारी जो पुलिस थाना के भारसाधक अधिकारी की श्रेणी से निम्न न हो या सम्बन्धित क्षेत्र के मजिस्ट्रेट के प्रमाण-पत्र पर तुरन्त ही प्राथमिक चिकित्सा सुविधा या चिकित्सा लाभ निःशुल्क उपलब्ध कराये जाने अथवा कोई अन्य अन्तरिम अनुतोष का आदेश कर सकेगा जैसा समुचित प्राधिकारी उचित समझे।

Victim compensation scheme-
(1) Every State Government in co ordination with the Central Government shall prepare a scheme for providing funds for the purpose of compensation to the victim or his dependents who have suffered loss or injury as a result of the crime and who require rehabilitation.
(2) Whenever a recommendation is made by the Court for compensation, the District Legal Service Authority or the State Legal Service Authority, as the case may be, shall decide the quantum of compensation to be awarded under the scheme referred to in sub-section (1).
(3) If the trial Court, at the conclusion of the trial, is satisfied, that the compensation awarded under section 357 is not adequate for such rehabilitation, or where the cases end in acquittal or discharge and the victim has to be rehabilitated, it may make recommendation for compensation.
(4) Where the offender is not traced or identified, but the victim is identified, and where no trial takes place, the victim or his dependents may make an application to the State or the District Legal Services Authority for award of compensation.
(5) On receipt of such recommendations or on the application under sub-section(4), the State or the District Legal Services Authority shall, after due enquiry award adequate compensation by completing the enquiry within two months.
(6) The State or the District Legal Services Authority, as the case may be, to alleviate the suffering of the victim, may order for immediate first-aid facility or medical benefits to be made available free of cost on the certificate of the police officer not below the rank of the officer-in-charge of the police station or a Magistrate of the area concerned, or any other interim relief as the appropriate authority deems fit.

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सीआरपीसी की धारा 357 | प्रतिकर देने का आदेश | CrPC Section- 357 in hindi| Order to pay compensation.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 357 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357 के अन्तर्गत जब कोई न्यायालय जुर्माने का दंडादेश देता है या कोई ऐसा दंडादेश (जिसके अन्तर्गत मृत्यु दंडादेश भी है) देता है जिसका भाग जुर्माना भी है, तब निर्णय देते समय वह न्यायालय यह आदेश दे सकता है कि वसूल किए गए सब जुर्माने या उसके किसी भाग का उपयोजन किसी हानि या क्षति का प्रतिकर देने में किया जाए, यदि न्यायालय की राय में ऐसे व्यक्ति द्वारा प्रतिकर सिविल न्यायालय में वसूल किया जाता है।

सीआरपीसी की धारा 357 के अनुसार

प्रतिकर देने का आदेश-
(1) जब कोई न्यायालय जुर्माने का दंडादेश देता है या कोई ऐसा दंडादेश (जिसके अन्तर्गत मृत्यु दंडादेश भी है) देता है जिसका भाग जुर्माना भी है, तब निर्णय देते समय वह न्यायालय यह आदेश दे सकता है कि वसूल किए गए सब जुर्माने या उसके किसी भाग का उपयोजन-
(क) अभियोजन में उचित रूप से उपगत व्ययों को चुकाने में किया जाए:
(ख) किसी व्यक्ति को उस अपराध द्वारा हुई किसी हानि या क्षति का प्रतिकर देने में किया जाए, यदि न्यायालय की राय में ऐसे व्यक्ति द्वारा प्रतिकर सिविल न्यायालय में वसूल किया जाता है;
(ग) उस दशा में, जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित करने के, या ऐसे अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करने के लिए दोषसिद्ध किया जाता है, उन व्यक्तियों को, जो ऐसी मृत्यु से अपने को हुई हानि के लिए दण्डादिष्ट व्यक्ति से नुकसानी वसूल करने के लिए घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855 (1855 का 13) के अधीन हकदार है, प्रतिकर देने में किया जाए;
(घ) जब कोई व्यक्ति, किसी अपराध के लिए, जिसके अन्तर्गत चोरी, आपराधिक दुर्विनियोग, आपराधिक न्यास-भंग या छल भी है, चुराई हुई सम्पत्ति को उस दशा में जब वह यह जानता है या उसको यह विश्वास करने का कारण है कि वह चुराई हुई है बेईमानी से प्राप्त करने या रखे रखने के लिए या उसके व्ययन में स्वेच्छा या सहायता करने के लिए दोषसिद्ध किया जाए, तब ऐसी सम्पत्ति के सद्भावपूर्ण क्रेता को, ऐसी सम्पत्ति उसके हकदार व्यक्ति के कब्जे में लौटा दी जाने की दशा में उसकी हानि के लिए प्रतिकर देने में किया जाए।
(2) यदि जुर्माना ऐसे मामले में किया जाता है जो अपीलनीय है तो ऐसा कोई संदाय, अपील उपस्थित करने के लिए अनुज्ञात अवधि के बीत जाने से पहले या यदि अपील उपस्थित की जाती है तो उसके से विनिश्चय के पूर्व, नहीं किया जायेगा।
(3) जब न्यायालय ऐसा दंड अधिरोपित करता है जिसका भाग जुर्माना नहीं है तब न्यायालय निर्णय पारित करते समय, अभियुक्त व्यक्ति को यह आदेश दे सकता है कि उस कार्य के कारण जिसके लिए उसे ऐसा दंडादेश दिया गया है, जिस व्यक्ति को कोई हानि या क्षति उठानी पड़ी है, उसे वह प्रतिकर के रूप में इतनी रकम दे जितनी आदेश में विनिर्दिष्ट है।
(4) इस धारा के अधीन आदेश, अपील न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय द्वारा भी किया जा सकेगा जब वह अपनी पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो।
(5) उसी मामले से संबंधित किसी पश्चात्वर्ती सिविल वाद में प्रतिकर अधिनिर्णीत करते समय न्यायालय ऐसी किसी राशि को, जो इस धारा के अधीन प्रतिकर के रूप में दी गई है या वसूल की गई है, हिसाब में लेगा।

Order to pay compensation-
(1) When a Court imposes a sentence of fine or a sentence (including a sentence of death) of which fine forms a part, the Court may, when passing judgment, order the whole or any part of the fine recovered to be applied-
(a) in defraying the expenses properly incurred in the prosecution;
(b) in the payment to any person of compensation for any loss or injury caused by the offence, when compensation in the opinion of the Court, recoverable by such person in a Civil Court;
(c) when any person is convicted of any offence for having caused the death of another person or of having abetted the commission of such an offence, in paying compensation to the persons who are, under the Fatal Accidents Act, 1855 (13 of 1855), entitled to recover damages from the person sentenced for the loss resulting to them from such death;
(d) when any person is convicted of any offence which includes theft, criminal misappropriation, criminal breach of trust, or cheating, or of having dishonestly received or retained, or of having voluntarily assisted in disposing of, stolen property knowing or having reason to believe the same to be stolen, in compensating any bonafide purchaser of such property for the loss of the same if such property is restored to the possession of the person entitled thereto.
(2) If the fine is imposed in a case which is subject to appeal, no such payment shall be made before the period allowed for presenting the appeal has elapsed, or, if an appeal be presented, before the decision of the appeal.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 357 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 350 | समन के पालन में साक्षी के हाजिर न होने पर उसे दण्डित करने के लिए संक्षिप्त प्रक्रिया | CrPC Section- 350 in hindi| Summary procedure for punishment for non-attendance by a witness in obedience to summons.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 350 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 350 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 350 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 350 के अन्तर्गत यदि किसी दण्ड न्यायालय के समक्ष हाजिर होने के लिए समन किए जाने पर कोई साक्षी समन के पालन में किसी निश्चित स्थान और समय पर हाजिर होने के लिए वैध रूप से आबद्ध है और न्यायसंगत कारण के बिना, उस स्थान या समय पर हाजिर होने में उपेक्षा या हाजिर होने से इंकार करता है अथवा उस स्थान से, जहां उसे हाजिर होना है, उस समय से पहले चला जाता है जिस समय चला जाना उसके लिए विधिपूर्ण है और जिस न्यायालय के समक्ष उस साक्षी को हाजिर होना है उसका समाधान हो जाता है कि न्याय के हित में यह समीचीन है कि ऐसे साक्षी का संक्षेपतः विचारण किया जाए तो वह न्यायालय उस अपराध का संज्ञान कर सकता है और अपराधी को इस बात का कारण दर्शित करने का कि क्यों न उसे इस धारा के अधीन दण्डित किया जाए अवसर देने के पश्चात् उसे एक सौ रुपए से अनधिक जुर्माने का दंडादेश दे सकता है। ऐसे प्रत्येक मामले में न्यायालय उस प्रक्रिया का यथासाध्य अनुसरण करेगा जो संक्षिप्त विचारणों के लिए विहित है।

सीआरपीसी की धारा 350 के अनुसार

समन के पालन में साक्षी के हाजिर न होने पर उसे दण्डित करने के लिए संक्षिप्त प्रक्रिया-
(1) यदि किसी दण्ड न्यायालय के समक्ष हाजिर होने के लिए समन किए जाने पर कोई साक्षी समन के पालन में किसी निश्चित स्थान और समय पर हाजिर होने के लिए वैध रूप से आबद्ध है और न्यायसंगत कारण के बिना, उस स्थान या समय पर हाजिर होने में उपेक्षा या हाजिर होने से इंकार करता है अथवा उस स्थान से, जहां उसे हाजिर होना है, उस समय से पहले चला जाता है जिस समय चला जाना उसके लिए विधिपूर्ण है और जिस न्यायालय के समक्ष उस साक्षी को हाजिर होना है उसका समाधान हो जाता है कि न्याय के हित में यह समीचीन है कि ऐसे साक्षी का संक्षेपतः विचारण किया जाए तो वह न्यायालय उस अपराध का संज्ञान कर सकता है और अपराधी को इस बात का कारण दर्शित करने का कि क्यों न उसे इस धारा के अधीन दण्डित किया जाए अवसर देने के पश्चात् उसे एक सौ रुपए से अनधिक जुर्माने का दंडादेश दे सकता है।
(2) ऐसे प्रत्येक मामले में न्यायालय उस प्रक्रिया का यथासाध्य अनुसरण करेगा जो संक्षिप्त विचारणों के लिए विहित है।

Summary procedure for punishment for non-attendance by a witness in obedience to summons-
(1) If any witness being summoned to appear before a Criminal Court is legally bound to appear at a certain place and time in obedience to the summons and without just excuse neglects or refuses to attend at that place or time or departs from the place where he has to attend before the time at which it is lawful for him to depart, and the Court before which the witness is to appear is satisfied that it is expedient in the interests of justice that such a witness should be tried summarily, the Court may take cognizance of the offence and after giving the offender an opportunity of showing cause why he should not be punished under this section, sentence him to fine not exceeding one hundred rupees.
(2) In every such case the Court shall follow, as nearly as may be practicable, the procedure prescribed for summary trials.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 350 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।