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सीआरपीसी की धारा 335 | ऐसे आधार पर दोषमुक्त किए गए व्यक्ति का सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध किया जाना | CrPC Section- 335 in hindi| Person acquitted on such ground to be detained in safe custody.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 335 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 335 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 335 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 335 के अन्तर्गत जब कभी निष्कर्ष में यह कथित है कि अभियुक्त ने अभिकथित कार्य किया है तब वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय, जिसके समक्ष विचारण किया गया है, उस दशा में जब ऐसा कार्य उस असमर्थता के न होने के कारण उस व्यक्ति द्वारा ऐसे स्थान में और ऐसी रीति से, जिसे ऐसा मजिस्ट्रेट या न्यायालय ठीक समझे, सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध करने का आदेश देगा; अथवा उस व्यक्ति को उसके किसी नातेदार या मित्र को सौंपने का आदेश देगा। या अभियुक्त को पागलखाने में निरुद्ध करने का उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन कोई आदेश राज्य सरकार द्वारा भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 (1912 का 4) के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार ही किया जाएगा अन्यथा नहीं। ऐसी स्थिति में ऐसे आधार पर दोषमुक्त किए गए व्यक्ति का सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध कार्रवाई की रिपोर्ट राज्य सरकार को देगा।


सीआरपीसी की धारा 335 के अनुसार

ऐसे आधार पर दोषमुक्त किए गए व्यक्ति का सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध किया जाना-

(1) जब कभी निष्कर्ष में यह कथित है कि अभियुक्त व्यक्ति ने अभिकथित कार्य किया है तब वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय, जिसके समक्ष विचारण किया गया है, उस दशा में जब ऐसा कार्य उस असमर्थता के न होने पर, जो पाई गई, अपराध होता,-
(क) उस व्यक्ति को ऐसे स्थान में और ऐसी रीति से, जिसे ऐसा मजिस्ट्रेट या न्यायालय ठीक समझे, सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध करने का आदेश देगा; अथवा
(ख) उस व्यक्ति को उसके किसी नातेदार या मित्र को सौंपने का आदेश देगा।
(2) पागलखाने में अभियुक्त को निरुद्ध करने का उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन कोई आदेश राज्य सरकार द्वारा भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 (1912 का 4) के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार ही किया जाएगा अन्यथा नहीं।
(3) अभियुक्त को उसके किसी नातेदार या मित्र को सौंपने का उपधारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन कोई आदेश उसके ऐसे नातेदार या मित्र के आवेदन पर और उसके द्वारा निम्नलिखित बातों की बाबत मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समाधानप्रद प्रतिभूति देने पर ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं-
(क) सौंपे गए व्यक्ति की समुचित देख-रेख की जाएगी और वह अपने आपको या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुंचाने से निवारित रखा जाएगा;
(ख) सौंपा गया व्यक्ति ऐसे अधिकारी के समक्ष और ऐसे समय और स्थानों पर, जो राज्य सरकार द्वारा निर्दिष्ट किए जाएं, निरीक्षण के लिए पेश किया जाएगा।
(4) मजिस्ट्रेट या न्यायालय उपधारा (1) के अधीन की गई कार्रवाई की रिपोर्ट राज्य सरकार को देगा।

Person acquitted on such ground to be detained in safe custody-
(1) Whenever the finding states that the accused person committed the act alleged, the Magistrate or Court before whom or which the trial has been held, shall, if such act would, but for the incapacity found, have constituted an offence.
(a) order such person to be detained in safe custody in such place and manner as the Magistrate or Court thinks fit: or
(b) order such person to be delivered to any relative or friend of such person.
(2) No order for the detention of the accused in a lunatic asylum shall be made under clause (a) of sub-section (1) otherwise than in accordance with such rules as the State Government may have made under the Indian Lunacy Act, 1912 (4 of 1912).
(3) No order for the delivery of the accused to a relative or friend shall be made under clause (b) of sub-section (1). except upon the application of such relative or friend and on his giving security to the satisfaction of the Magistrate or Court that the person delivered shall-
(a) be properly taken care of and prevented from doing injury to himself or to any other person,
(b) be produced for the inspection of such officer, and at such times and places, as the State Government may direct.
(4) The Magistrate or Court shall report to the State Government the action taken under sub-section (1),

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 335 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 334 | चित्त-विकृति के आधार पर दोषमुक्ति का निर्णय | CrPC Section- 334 in hindi| Judgment of acquittal on ground of unsoundness of mind.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 334 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 334 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 334 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 334 के अन्तर्गत जब कभी कोई व्यक्ति इस आधार पर दोषमुक्त किया जाता है कि उस समय जब यह अभिकथित है कि उसने अपराध किया वह चित्त-विकृति के कारण उस कार्य का स्वरूप, जिसका अपराध होना अभिकथित है, या यह कि वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ था, तब निष्कर्ष में यह विनिर्दिष्टतः कथित होगा कि उसने वह कार्य किया या नहीं किया।

सीआरपीसी की धारा 334 के अनुसार

चित्त-विकृति के आधार पर दोषमुक्ति का निर्णय-

जब कभी कोई व्यक्ति इस आधार पर दोषमुक्त किया जाता है कि उस समय जब यह अभिकथित है कि उसने अपराध किया वह चित्त-विकृति के कारण उस कार्य का स्वरूप, जिसका अपराध होना अभिकथित है, या यह कि वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ था, तब निष्कर्ष में यह विनिर्दिष्टतः कथित होगा कि उसने वह कार्य किया या नहीं किया।

Judgment of acquittal on ground of unsoundness of mind-
Whenever any person is acquitted upon the ground that, at the time at which he is alleged to have committed an offence, he was, by reason of unsoundness of mind, incapable of knowing the nature of the act alleged as constituting the offence, or that it was wrong or contrary to law, the finding shall state specifically whether he committed the act or not.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 334 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 333 | जब यह प्रतीत हो कि अभियुक्त स्वस्थचित्त रहा है | CrPC Section- 333 in hindi| When accused appears to have been of sound mind.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 333 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 333 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 333 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 333 के अन्तर्गत जब अभियुक्त जांच या विचारण के समय स्वस्थचित्त प्रतीत होता है और मजिस्ट्रेट का अपने समक्ष दिए गए साक्ष्य से समाधान हो जाता है कि यह विश्वास करने का कारण है कि अभियुक्त ने ऐसा कार्य किया है, जो यदि वह स्वस्थचित्त होता तो अपराध होता और यह कि वह उस समय जब वह कार्य किया गया था चित्त-विकृति के कारण उस कार्य का स्वरूप या यह जानने में असमर्थ था, कि यह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, तब मजिस्ट्रेट मामले में आगे कार्यवाही करेगा और यदि अभियुक्त का विचारण सेशन न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए तो उसे सेशन न्यायालय के समक्ष विचारण के लिए सुपुर्द करेगा।

सीआरपीसी की धारा 333 के अनुसार

जब यह प्रतीत हो कि अभियुक्त स्वस्थचित्त रहा है-

जब अभियुक्त जांच या विचारण के समय स्वस्थचित्त प्रतीत होता है और मजिस्ट्रेट का अपने समक्ष दिए गए साक्ष्य से समाधान हो जाता है कि यह विश्वास करने का कारण है कि अभियुक्त ने ऐसा कार्य किया है, जो यदि वह स्वस्थचित्त होता तो अपराध होता और यह कि वह उस समय जब वह कार्य किया गया था चित्त-विकृति के कारण उस कार्य का स्वरूप या यह जानने में असमर्थ था, कि यह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, तब मजिस्ट्रेट मामले में आगे कार्यवाही करेगा और यदि अभियुक्त का विचारण सेशन न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए तो उसे सेशन न्यायालय के समक्ष विचारण के लिए सुपुर्द करेगा।

When accused appears to have been of sound mind-
When the accused appears to be of sound mind at the time of inquiry or trial, and the Magistrate is satisfied from the evidence given before him that there is reason to believe that the accused committed an act, which, if he had been of sound mind, would have been an offence, and that he was, at the time when the act was committed, by reason of unsoundness of mind, incapable of knowing the nature of the act or that it was wrong or contrary to law, the Magistrate shall proceed with the case, and, if the accused ought to be tried by the Court of Session, commit him for trial before the Court of Session.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 333 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 332 | मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष अभियुक्त के हाजिर होने पर प्रक्रिया | CrPC Section- 332 in hindi| Procedure on accused appearing before Magistrate or Court.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 332 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 332 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 332 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 332 के अन्तर्गत जब अभियुक्त, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या पुनः लाया जाता है, तब यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय का यह विचार है कि वह अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है तो, जांच या विचारण आगे चलेगा। यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय का यह विचार है कि अभियुक्त अभी अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय, यथास्थिति, धारा 328 या धारा 329 के उपबन्धों के अनुसार कार्यवाही करेगा और यदि अभियुक्त विकृतचित्त और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ पाया जाता है तो ऐसे अभियुक्त के बारे में वह धारा 330 के उपबन्धों के अनुसार कार्यवाही करेगा।

सीआरपीसी की धारा 332 के अनुसार

मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष अभियुक्त के हाजिर होने पर प्रक्रिया–

(1) जब अभियुक्त, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या पुनः लाया जाता है, तब यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय का यह विचार है कि वह अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है तो, जांच या विचारण आगे चलेगा।
(2) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय का यह विचार है कि अभियुक्त अभी अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय, यथास्थिति, धारा 328 या धारा 329 के उपबन्धों के अनुसार कार्यवाही करेगा और यदि अभियुक्त विकृतचित्त और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ पाया जाता है तो ऐसे अभियुक्त के बारे में वह धारा 330 के उपबन्धों के अनुसार कार्यवाही करेगा।

Procedure on accused appearing before Magistrate or Court-
(1) If, when the accused appears or is again brought before the Magistrate or Court, as the case may be, the Magistrate or Court considers him capable of making his defence, the inquiry or trial shall proceed.
(2) If the Magistrate or Court considers the accused to be still incapable of making his defence, the Magistrate or Court shall act according to the provisions of Section 328 or Section 329, as the case may be, and if the accused is found to be of unsound mind and consequently incapable of making his defence, shall deal with such accused in accordance with the provisions of Section 330.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 332 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 325 | प्रक्रिया जब मजिस्ट्रेट पर्याप्त कठोर दण्ड का आदेश नहीं दे सकता | CrPC Section- 325 in hindi| Procedure when Magistrate cannot pass sentence sufficiently severe.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 325 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 325 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 325 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 325 के अन्तर्गत जब कभी अभियोजन और अभियुक्त का साक्ष्य सुनने के पश्चात् मजिस्ट्रेट की यह राय है कि अभियुक्त दोषी है और उसे उस प्रकार के दण्ड से भिन्न प्रकार का दण्ड या उस दण्ड से अधिक कठोर दण्ड, जो वह मजिस्ट्रेट देने के लिए सशक्त है, दिया जाना चाहिए अथवा द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट होते हुए उसकी यह राय है कि अभियुक्त से धारा 106 के अधीन बन्धपत्र निष्पादित करने की अपेक्षा की जानी चाहिए तब वह अपनी राय अभिलिखित कर सकता है और कार्यवाही तथा अभियुक्त को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को, जिसके वह अधीनस्थ हो, भेज सकता है।

सीआरपीसी की धारा 325 के अनुसार

प्रक्रिया जब मजिस्ट्रेट पर्याप्त कठोर दण्ड का आदेश नहीं दे सकता-

(1) जब कभी अभियोजन और अभियुक्त का साक्ष्य सुनने के पश्चात् मजिस्ट्रेट की यह राय है कि अभियुक्त दोषी है और उसे उस प्रकार के दण्ड से भिन्न प्रकार का दण्ड या उस दण्ड से अधिक कठोर दण्ड, जो वह मजिस्ट्रेट देने के लिए सशक्त है, दिया जाना चाहिए अथवा द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट होते हुए उसकी यह राय है कि अभियुक्त से धारा 106 के अधीन बन्धपत्र निष्पादित करने की अपेक्षा की जानी चाहिए तब वह अपनी राय अभिलिखित कर सकता है और कार्यवाही तथा अभियुक्त को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को, जिसके वह अधीनस्थ हो, भेज सकता है।
(2) जब एक से अधिक अभियुक्तों का विचारण एक साथ किया जा रहा है और मजिस्ट्रेट ऐसे अभियुक्तों में से किसी के बारे में उपधारा (1) के अधीन कार्यवाही करना आवश्यक समझता है तब वह उन सभी अभियुक्तों को, जो उसकी राय में दोषी हैं, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेज देगा।
(3) यदि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, जिसके पास कार्यवाही भेजी जाती है, ठीक समझता है तो पक्षकारों की परीक्षा कर सकता है और किसी साक्षी को, जो पहले ही मामले में साक्ष्य दे चुका है, पुन: बुला सकता है और उसकी परीक्षा कर सकता है और कोई अतिरिक्त साक्ष्य मांग सकता है और ले सकता है और मामले में ऐसा निर्णय, दंडादेश या आदेश देगा, जो वह ठीक समझता है और जो विधि के अनुसार है।

Procedure when Magistrate cannot pass sentence sufficiently severe-
(1) Whenever a Magistrate is of opinion, after hearing the evidence for the prosecution and the accused, that the accused is guilty, and that he ought to receive a punishment different in kind from, or more severe than, that which such Magistrate is empowered to inflict, or, being a Magistrate of the second class, is of opinion that the accused ought to be required to execute a bond under Section 106, he may record the opinion and submit his proceedings, and forward the accused, to the Chief Judicial Magistrate to whom he is subordinate.
(2) When more accused than one are being tried together, and the Magistrate considers it necessary to proceed under sub-section (1), in regard to any of such accused, he shall forward all the accused, who are in his opinion guilty, to the Chief Judicial Magistrate.
(3) The Chief Judicial Magistrate to whom the proceedings are submitted may, if he thinks fit, examine the parties and recall and examine any witness who has already given evidence in the case and may call for and take any further evidence, and shall pass such judgment, sentence or order in the case as he thinks fit, and as is according to law.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 325 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 324 | सिक्के, स्टाम्प विधि या सम्पत्ति के विरुद्ध अपराधों के लिए तत्पूर्व दोषसिद्ध व्यक्तियों का विचारण | CrPC Section- 324 in hindi| Trial of persons previously convicted of offences against coinage, stamp law or property.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 324 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 324 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 324 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 324 के अन्तर्गत जहां कोई व्यक्ति भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 12 या अध्याय 17 के अधीन तीन वर्ष या अधिक की अवधि के लिए कारावास से दण्डनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध किए जा चुकने पर उन अध्यायों में से किसी के अधीन तीन वर्ष या अधिक की अवधि के लिए कारावास से दण्डनीय किसी अपराध के लिए पुनः अभियुक्त है, और उस मजिस्ट्रेट का, जिसके समक्ष मामला लम्बित है, समाधान हो जाता है कि यह उपधारणा करने के लिए आधार है कि ऐसे व्यक्ति ने अपराध किया है तो वह उस दशा के सिवाय विचारण के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजा जाएगा या सेशन न्यायालय के सुपुर्द किया जाएगा।

सीआरपीसी की धारा 324 के अनुसार

सिक्के, स्टाम्प विधि या सम्पत्ति के विरुद्ध अपराधों के लिए तत्पूर्व दोषसिद्ध व्यक्तियों का विचारण-

(1) जहां कोई व्यक्ति भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 12 या अध्याय 17 के अधीन तीन वर्ष या अधिक की अवधि के लिए कारावास से दण्डनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध किए जा चुकने पर उन अध्यायों में से किसी के अधीन तीन वर्ष या अधिक की अवधि के लिए कारावास से दण्डनीय किसी अपराध के लिए पुनः अभियुक्त है, और उस मजिस्ट्रेट का, जिसके समक्ष मामला लम्बित है, समाधान हो जाता है कि यह उपधारणा करने के लिए आधार है कि ऐसे व्यक्ति ने अपराध किया है तो वह उस दशा के सिवाय विचारण के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजा जाएगा या सेशन न्यायालय के सुपुर्द किया जाएगा, जब मजिस्ट्रेट मामले का विचारण करने के लिए सक्षम है और उसकी यह राय है कि यदि अभियुक्त दोषसिद्ध किया गया तो वह स्वयं उसे पर्याप्त दण्ड का आदेश दे सकता है।
(2) जब उपधारा (1) के अधीन कोई व्यक्ति विचारण के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजा जाता है या सेशन न्यायालय को सुपुर्द किया जाता है तब कोई अन्य व्यक्ति, जो उसी जांच या विचारण में उसके साथ संयुक्तत: अभियुक्त है, वैसे ही भेजा जाएगा या सुपुर्द किया जाएगा जब तक ऐसे अन्य व्यक्ति को मजिस्ट्रेट, यथास्थिति, धारा 239 या धारा 245 के अधीन उन्मोचित न कर दे।

Trial of persons previously convicted of offences against coinage, stamp law or property-
(1) Where a person, having been convicted of an offence punishable under Chapter XII or Chapter XVII of the Indian Penal Code (45 of 1860) with imprisonment for a term of three years or upwards, is again accused of any offence punishable under either of those Chapters with imprisonment for a term of three years or upwards, and the Magistrate before whom the case is pending is satisfied that there is ground for presuming that such person has committed the offence, he shall be sent for trial to the Chief Judicial Magistrate or committed to the Court of Session, unless the Magistrate is competent to try the case and is of opinion that he can himself pass an adequate sentence if the accused is convicted.
(2) When any person is sent for trial to the Chief Judicial Magistrate or committed to the Court of Session under sub-section (1) any other person accused jointly with him in the same inquiry or trial shall be similarly sent or committed, unless the Magistrate discharges such other person under Section 239 or Section 245, as the case may be.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 324 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।