Home Blog Page 188

सीआरपीसी की धारा 322 | जिन मामलों का निपटारा मजिस्ट्रेट नहीं कर सकता, उनमें प्रक्रिया | CrPC Section- 322 in hindi| Procedure in cases which Magistrate cannot dispose of.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 322 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 322 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 322 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 322 के अन्तर्गत यदि किसी जिले में किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष अपराध की किसी जांच या विचारण के दौरान उसे साक्ष्य ऐसा प्रतीत होता है कि उसके आधार पर यह उपधारणा की जा सकती है कि उसे मामले का विचारण करने या विचारणार्थ सुपुर्द करने की अधिकारिता नहीं है, अथवा मामला ऐसा है जो जिले के किसी अन्य मजिस्ट्रेट द्वारा विचारित या विचारणार्थ सुपुर्द किया जाना चाहिए, अथवा मामले का विचारण मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाना चाहिए और मामले की ऐसी संक्षिप्त रिपोर्ट सहित, जिसमें मामले का स्वरूप स्पष्ट किया गया है, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को या अधिकारिता वाले अन्य ऐसे मजिस्ट्रेट को, जिसे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट निर्दिष्ट करे, भेज देगा।

सीआरपीसी की धारा 322 के अनुसार

जिन मामलों का निपटारा मजिस्ट्रेट नहीं कर सकता, उनमें प्रक्रिया-

(1) यदि किसी जिले में किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष अपराध की किसी जांच या विचारण के दौरान उसे साक्ष्य ऐसा प्रतीत होता है कि उसके आधार पर यह उपधारणा की जा सकती है कि-
(क) उसे मामले का विचारण करने या विचारणार्थ सुपुर्द करने की अधिकारिता नहीं है, अथवा
(ख) मामला ऐसा है जो जिले के किसी अन्य मजिस्ट्रेट द्वारा विचारित या विचारणार्थ सुपुर्द किया जाना चाहिए, अथवा
(ग) मामले का विचारण मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाना चाहिए,
तो वह कार्यवाही को रोक देगा और मामले की ऐसी संक्षिप्त रिपोर्ट सहित, जिसमें मामले का स्वरूप स्पष्ट किया गया है, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को या अधिकारिता वाले अन्य ऐसे मजिस्ट्रेट को, जिसे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट निर्दिष्ट करे, भेज देगा।
(2) यदि वह मजिस्ट्रेट, जिसे मामला भेजा गया है, ऐसा करने के लिए सशक्त है, तो वह उस मामले का विचारण स्वयं कर सकता है या उसे अपने अधीनस्थ अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट को निर्देशित कर सकता है या अभियुक्त को विचारणार्थ सुपुर्द कर सकता है।

Procedure in cases which Magistrate cannot dispose of-
(1) If, in the course of any inquiry into an offence or a trial before a Magistrate in any district, the evidence appears to him to warrant a presumption-
(a) that he has no jurisdiction to try the case or commit it for trial, or
(b) that the case is one which should be tried or committed for trial by some other Magistrate in the district, or
(c) that the case should be tried by the Chief Judicial Magistrate,
he shall stay the proceedings and submit the case, with a brief report explaining its nature, to the Chief Judicial Magistrate or to such other Magistrate, having jurisdiction, as the Chief Judicial Magistrate directs.
(2) The Magistrate to whom the case is submitted may, if so empowered, either try the case himself, or refer it to any Magistrate subordinate to him having jurisdiction, or commit the accused for trial.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 322 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 323 | प्रक्रिया जब जांच या विचारण के प्रारम्भ के पश्चात् मजिस्ट्रेट को पता चलता है कि मामला सुपुर्द किया जाना चाहिए | CrPC Section- 323 in hindi| Procedure when, after commencement of inquiry or trial, Magistrate finds case should be committed.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 323 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 323 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 323 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 323 के अन्तर्गत यदि किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष अपराध की किसी जांच या विचारण में निर्णय पर हस्ताक्षर करने के पूर्व कार्यवाही के किसी प्रक्रम में उसे यह प्रतीत होता है कि मामला ऐसा है, जिसका विचारण सेशन न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए, तो वह उसे इसमें इसके पूर्व अंतर्विष्ट उपबन्धों के अधीन उस न्यायालय को सुपुर्द कर देगा और तब अध्याय 18 के उपबन्ध ऐसी सुपुर्दगी को लागू होंगे।

सीआरपीसी की धारा 323 के अनुसार

प्रक्रिया जब जांच या विचारण के प्रारम्भ के पश्चात् मजिस्ट्रेट को पता चलता है कि मामला सुपुर्द किया जाना चाहिए-

यदि किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष अपराध की किसी जांच या विचारण में निर्णय पर हस्ताक्षर करने के पूर्व कार्यवाही के किसी प्रक्रम में उसे यह प्रतीत होता है कि मामला ऐसा है, जिसका विचारण सेशन न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए, तो वह उसे इसमें इसके पूर्व अंतर्विष्ट उपबन्धों के अधीन उस न्यायालय को सुपुर्द कर देगा [ और तब अध्याय 18 के उपबन्ध ऐसी सुपुर्दगी को लागू होंगे।

Procedure when, after commencement of inquiry or trial, Magistrate finds case should be committed-
If, in any inquiry into an offence or a trial before a Magistrate, it appears to him at any stage of the proceedings before signing judgment that the case is one which ought to be tried by the Court of Session, he shall commit it to that Court under the provisions hereinbefore contained [and thereupon the provisions of Chapter XVIII shall apply to the commitment so made.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 323 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 319 | अपराध के दोषी प्रतीत होने वाले अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की शक्ति | CrPC Section- 319 in hindi| Procedure where accused does not understand proceedings.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 319 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 के अन्तर्गत जहां किसी अपराध की जांच या विचारण के दौरान साक्ष्य से यह प्रतीत होता है कि किसी व्यक्ति ने, जो अभियुक्त नहीं है, कोई ऐसा अपराध किया है, जिसके लिए ऐसे व्यक्ति का अभियुक्त के साथ विचारण किया जा सकता है, वहाँ न्यायालय उस व्यक्ति के विरुद्ध उस अपराध के लिए जिसका उसके द्वारा किया जाना प्रतीत होता है, कार्यवाही कर सकता है। जहां ऐसा व्यक्ति न्यायालय में हाजिर नहीं है वहां पूर्वोक्त प्रयोजन के लिए उसे मामले की परिस्थितियों की अपेक्षानुसार, गिरफ्तार या समन किया जा सकता है।

सीआरपीसी की धारा 319 के अनुसार

अपराध के दोषी प्रतीत होने वाले अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की शक्ति–(1) जहां किसी अपराध की जांच या विचारण के दौरान साक्ष्य से यह प्रतीत होता है कि किसी व्यक्ति ने, जो अभियुक्त नहीं है, कोई ऐसा अपराध किया है, जिसके लिए ऐसे व्यक्ति का अभियुक्त के साथ विचारण किया जा सकता है, वहाँ न्यायालय उस व्यक्ति के विरुद्ध उस अपराध के लिए जिसका उसके द्वारा किया जाना प्रतीत होता है, कार्यवाही कर सकता है।
(2) जहां ऐसा व्यक्ति न्यायालय में हाजिर नहीं है वहां पूर्वोक्त प्रयोजन के लिए उसे मामले की परिस्थितियों की अपेक्षानुसार, गिरफ्तार या समन किया जा सकता है।
(3) कोई व्यक्ति जो गिरफ्तार या समन न किए जाने पर भी न्यायालय में हाजिर है, ऐसे न्यायालय द्वारा उस अपराध के लिए, जिसका उसके द्वारा किया जाना प्रतीत होता है, जाँच या विचारण के प्रयोजन के लिए। निरुद्ध किया जा सकता है।
(4) जहां न्यायालय किसी व्यक्ति के विरुद्ध उपधारा (1) के अधीन कार्यवाही करता है वहां-
(क) उस व्यक्ति के बारे में कार्यवाही फिर से प्रारम्भ की जाएगी और साक्षियों को फिर से सुना जाएगा।a
(ख) खंड (क) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए मामले में ऐसे कार्यवाही की जा सकती है, मानो वह व्यक्ति उस समय अभियुक्त व्यक्ति था जब न्यायालय ने उस अपराध का संज्ञान किया था जिस पर जांच या विचारण प्रारम्भ किया गया था।


Power to proceed against other persons appearing to be guilty of offence-
(1) Where, in the course of any inquiry into, or trial of, an offence, it appears from the evidence that any person not being the accused has committed any offence for which such person could be tried together with the accused, the Court may proceed against such person for the offence which he appears to have committed.
(2) Where such person is not attending the Court, he may be arrested or summoned, as the circumstances of the case may require, for the purpose aforesaid.
(3) Any person attending the Court, although not under arrest or upon a summons, may be detained by such Court for the purpose of the inquiry into, or trial of, the offence which he appears to have committed.
(4) Where the Court proceeds against any person under sub-section (1) then-
(a) the proceedings in respect of such person shall be commenced afresh, and the witnesses re-heard ;
(b) subject to the provisions of clause (a), the case may proceed as if such person had been an accused person when the Court took cognizance of the offence upon which the inquiry or trial was commenced.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 319 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 318 | प्रक्रिया जहां अभियुक्त कार्यवाही नहीं समझता है | CrPC Section- 318 in hindi| Procedure where accused does not understand proceedings.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 318 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 318 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 318 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 318 के अन्तर्गत यदि अभियुक्त विकृतचित्त न होने पर भी ऐसा है कि उसे कार्यवाही समझाई नहीं जा सकती तो न्यायालय जांच या विचारण में अग्रसर हो सकता है; और उच्च न्यायालय से भिन्न न्यायालय की दशा में, यदि ऐसी कार्यवाही का परिणाम दोषसिद्धि है, तो कार्यवाही को मामले की परिस्थितियों की रिपोर्ट के साथ उच्च न्यायालय भेज दिया जायगा और उच्च न्यायालय उस पर ऐसा आदेश देगा जैसा वह ठीक समझे।

सीआरपीसी की धारा 318 के अनुसार

प्रक्रिया जहां अभियुक्त कार्यवाही नहीं समझता है-

यदि अभियुक्त विकृतचित्त न होने पर भी ऐसा है कि उसे कार्यवाही समझाई नहीं जा सकती तो न्यायालय जांच या विचारण में अग्रसर हो सकता है; और उच्च न्यायालय से भिन्न न्यायालय की दशा में, यदि ऐसी कार्यवाही का परिणाम दोषसिद्धि है, तो कार्यवाही को मामले की परिस्थितियों की रिपोर्ट के साथ उच्च न्यायालय भेज दिया जायगा और उच्च न्यायालय उस पर ऐसा आदेश देगा जैसा वह ठीक समझे।

Procedure where accused does not understand proceedings-
If the accused, though not of unsound mind, cannot be made to understand the proceedings, the Court may proceed with the inquiry or trial; and, in the case of a Court other than a High Court, if such proceedings result in a conviction, the proceedings shall be forwarded to the High Court with a report of the circumstances of the case, and the High Court shall pass thereon such order as it thinks fit.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 318 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 317 | कुछ मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति में जांच और विचारण किए जाने के लिए उपबन्ध | CrPC Section- 317 in hindi| Provision for inquiries and trial being held in the absence of accused in certain cases.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 317 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 317 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 317 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 317 के अन्तर्गत इस संहिता के अधीन जाँच या विचारण के किसी प्रक्रम में यदि न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट का उन कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएंगे, समाधान हो जाता है कि न्यायालय के समक्ष अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी न्याय हित में आवश्यक नहीं है या अभियुक्त न्यायालय की कार्यवाही में बार-बार विघ्न डालता है, तो ऐसे अभियुक्त का प्रतिनिधित्व प्लीडर द्वारा किए जाने की दशा में, वह न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट उसकी हाजिरी से उसे अभिमुक्ति दे सकता है और उसकी अनुपस्थिति में ऐसी जाँच या विचारण करने के लिए अग्रसर हो सकता है और कार्यवाही के किसी पश्चात्वर्ती प्रक्रम में ऐसे अभियुक्त को वैयक्तिक हाजिरी का निदेश दे सकता है।

सीआरपीसी की धारा 317 के अनुसार

कुछ मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति में जांच और विचारण किए जाने के लिए उपबन्ध-

(1) इस संहिता के अधीन जाँच या विचारण के किसी प्रक्रम में यदि न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट का उन कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएंगे, समाधान हो जाता है कि न्यायालय के समक्ष अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी न्याय हित में आवश्यक नहीं है या अभियुक्त न्यायालय की कार्यवाही में बार-बार विघ्न डालता है, तो ऐसे अभियुक्त का प्रतिनिधित्व प्लीडर द्वारा किए जाने की दशा में, वह न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट उसकी हाजिरी से उसे अभिमुक्ति दे सकता है और उसकी अनुपस्थिति में ऐसी जाँच या विचारण करने के लिए अग्रसर हो सकता है और कार्यवाही के किसी पश्चात्वर्ती प्रक्रम में ऐसे अभियुक्त को वैयक्तिक हाजिरी का निदेश दे सकता है।
(2) यदि ऐसे किसी मामले में अभियुक्त का प्रतिनिधित्व प्लीडर द्वारा नहीं किया जा रहा है अथवा यदि न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट का यह विचार है कि अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी आवश्यक है तो, यदि वह ठीक समझे तो, उन कारणों से, जो उसके द्वारा लेखबद्ध किए जाएंगे, वह या तो ऐसी जांच या विचारण स्थगित कर सकता है, या आदेश दे सकता है कि ऐसे अभियुक्त का मामला अलग से लिया जाए या विचारित किया जाए।

Provision for inquiries and trial being held in the absence of accused in certain cases-
(1) At any stage of an inquiry or trial under this Code, if the Judge or Magistrate is satisfied, for reasons to be recorded, that the personal attendance of the accused before the Court is not necessary in the interests of justice, or that the accused persistently disturbs the proceedings in Court, the Judge or Magistrate may, if the accused is represented by a pleader, dispense with his attendance and proceed with such inquiry or trial in his absence, and may, at any subsequent stage of the proceedings, direct the personal attendance of such accused.
(2) If the accused in any such case is not represented by a pleader, or if the Judge or Magistrate considers his personal attendance necessary, he may, if he thinks fit and for reasons to be recorded by him, either adjourn such inquiry or trial, or order that the case of such accused be taken up or tried separately.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 317 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 316 | प्रकटन उत्प्रेरित करने के लिए किसी असर का काम में न लाया जाना | CrPC Section- 316 in hindi| No influence to be used to induce disclosure.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 316 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 316 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 316 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 316 के अन्तर्गत जब धारा 306 और धारा 307 जैसे मामलों में जैसा उपबन्धित है, उसके सिवाय, किसी वचन या धमकी द्वारा या अन्यथा कोई असर अभियुक्त व्यक्ति पर इस उद्देश्य से नहीं डाला जाएगा कि उसे अपनी जानकारी की किसी बात को प्रकट करने या न करने के लिए उत्प्रेरित किया जाय।

सीआरपीसी की धारा 316 के अनुसार

प्रकटन उत्प्रेरित करने के लिए किसी असर का काम में न लाया जाना-

धारा 306 और धारा 307 में जैसा उपबन्धित है, उसके सिवाय, किसी वचन या धमकी द्वारा या अन्यथा कोई असर अभियुक्त व्यक्ति पर इस उद्देश्य से नहीं डाला जाएगा कि उसे अपनी जानकारी की किसी बात को प्रकट करने या न करने के लिए उत्प्रेरित किया जाय।

No influence to be used to induce disclosure-
Except as provided in Sections 306 and 307, no influence, by means of any promise or threat or otherwise, shall be used to an accused person to induce him to disclose or withhold any matter within his knowledge.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 316 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।