नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 410 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 410? साथ ही हम आपको IPC की धारा 410, क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
IPC की धारा 410 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 410 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय दंड संहिता की धारा 410 चुराई हुई संपत्ति (Stolen property) को परिभाषित किया गया है, इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे।
आईपीसी की धारा 410 के अनुसार
चुराई हुई सम्पत्ति-
वह सम्पत्ति, जिसका कब्जा चोरी द्वारा या उद्दापन द्वारा या लूट द्वारा अन्तरित किया गया है, और वह सम्पत्ति जिसका आपराधिक दुर्विनियोग किया गया है या जिसके विषय में आपराधिक न्यास भंग किया गया है, “चुराई हुई सम्पत्ति” कहलाती है, चाहे वह अन्तरण या वह दुर्विनियोग या न्यास- भंग भारत के भीतर किया गया हो या बाहर। किन्तु यदि ऐसी सम्पत्ति तत्पश्चात् ऐसे व्यक्ति के कब्जे में पहुँच जाती है, जो उसके कब्जे के लिये वैध रूप से हकदार है, तो वह चुराई हुई सम्पत्ति नहीं रह जाती।
Stolen property- Property, the possession whereof has been transferred by theft, or by extortion, or by robbery, and property which has been criminally misappropriated or in respect of which criminal breach of trust has been committed, is desginated as “stolen property”, whether the transfer has been made, or the misappropriation or breach of trust has been committed, within or without India. But, if such property subsequently comes into the possession of a person legally entitled to the possession thereof, it then ceases to be stolen property.
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 410 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है। धन्यवाद
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 408 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 408 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 408 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 408 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई लिपिक या सेवक होते हुए, या लिपिक या सेवक के रूप में नियोजित होते हुए, और इस नाते किसी प्रकार सम्पत्ति या सम्पत्ति पर कोई भी अख्त्यार अपने में न्यस्त होते हुए, उस सम्पत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग करेगा, तो वह धारा 408 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।
आईपीसी की धारा 408 के अनुसार
लिपिक या सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग-
जो कोई लिपिक या सेवक होते हुए, या लिपिक या सेवक के रूप में नियोजित होते हुए, और इस नाते किसी प्रकार सम्पत्ति या सम्पत्ति पर कोई भी अख्त्यार अपने में न्यस्त होते हुए, उस सम्पत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
Criminal breach of trust by clerk or servant- Whoever, being a clerk or servant or employed as a clerk or servant, and being in any manner entrusted in such capacity with property, or with any dominion over property, commits criminal breach of trust in respect of that property, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine.
लागू अपराध
लिपिक या सेवक द्वारा अपराधिक न्यासभंग। सजा- सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना। यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।
जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 408 के अंतर्गत जो कोई लिपिक या सेवक होते हुए, या लिपिक या सेवक के रूप में नियोजित होते हुए, और इस नाते किसी प्रकार सम्पत्ति या सम्पत्ति पर कोई भी अख्त्यार अपने में न्यस्त होते हुए, उस सम्पत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
जमानत (Bail) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 408 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नहीं मिल सकेगी।
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नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 407 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 407 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 407 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 407 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई वाहक, घाटवाल या भाण्डागारिक के रूप में अपने पास सम्पत्ति न्यस्त किये जाने पर ऐसी सम्पत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग करेगा, तो वह धारा 407 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।
आईपीसी की धारा 407 के अनुसार
वाहक, आदि द्वारा आपराधिक न्यासभंग-
जो कोई वाहक, घाटवाल या भाण्डागारिक के रूप में अपने पास सम्पत्ति न्यस्त किये जाने पर ऐसी सम्पत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
Criminal breach of trust by carrier, etc- Whoever, being entrusted with property as a carrier, wharfinger or warehouse-keeper, commits criminal breach of trust, in respect of such property, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine.
लागू अपराध
वाहक, घाटवाल आदि द्वारा अपराधिक न्यासभंग। सजा- सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना। यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।
जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 407 के अंतर्गत जो कोई वाहक, घाटवाल या भाण्डागारिक के रूप में अपने पास सम्पत्ति न्यस्त किये जाने पर ऐसी सम्पत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
जमानत (Bail) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 407 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नहीं मिल सकेगी।
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 407 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 403 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 403 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 403 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 403 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई बेईमानी से किसी जंगम सम्पत्ति का दुर्विनियोग करेगा, या उसको अपने उपयोग के लिये सम्परिवर्तित कर लेगा, तो वह धारा 403 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।
आईपीसी की धारा 403 के अनुसार
सम्पत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग-
जो कोई बेईमानी से किसी जंगम सम्पत्ति का दुर्विनियोग करेगा, या उसको अपने उपयोग के लिये सम्परिवर्तित कर लेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा। दृष्टान्त (क) क, य की सम्पत्ति को उस समय जब कि क उस सम्पत्ति को लेता है, यह विश्वास रखते हुये कि वह सम्पत्ति उसी की है, य के कब्जे में से सद्भावपूर्वक लेता है। क चोरी का दोषी नहीं है। किन्तु यदि क अपनी भूल मालूम होने के पश्चात् उस सम्पत्ति का बेईमानी से अपने लिये विनियोग कर लेता है तो वह इस धारा के अधीन अपराध का दोषी है। (ख) क, जो य का मित्र है, य की अनुपस्थिति में य के पुस्तकालय में जाता है और य की अभिव्यक्त सम्मति के बिना एक पुस्तक ले जाता है। यहाँ, यदि क का यह विचार था कि पढ़ने के प्रयोजन के लिये पुस्तक लेने की उसको य की विवक्षित सम्मति प्राप्त है, तो क ने चोरी नहीं की है। किन्तु यदि क बाद में उस पुस्तक को अपने फायदे के लिये बेच देता है, तो वह इस धारा के अधीन अपराध का दोषी है। (ग) क और ख एक घोड़े के संयुक्त स्वामी हैं। क उस घोड़े को उपयोग में लाने के आशय से ख के कब्जे में से उसे ले जाता है। यहाँ, क को उस घोड़े को उपयोग में लाने का अधिकार है; इसलिये, वह उसका बेईमानी से दुर्विनियोग नहीं है किन्तु यदि क उस घोड़े को बेच देता है और सम्पूर्ण आगम का अपने लिये विनियोग कर लेता है, तो वह इस धारा के अधीन अपराध का दोषी है। स्पष्टीकरण 1- केवल कुछ समय के लिये बेईमानी से दुर्विनियोग करना इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत दुर्विनियोग है।
Dishonest misappropriation of property- Whoever, dishonestly misappropriates or converts to his own use any movable property, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, or with fine, or with both. Illustrations (a) A takes property belonging to Z out of Z’s possession, in good faith believing, at any time when he takes it, that the property belongs to himself. A is not guilty of theft; but if A, after discovering his mistake, dishonestly appropriate the property to his own use, he is guilty of an offence under this section. (b) A, being on friendly terms with Z, goes into Z’s library in Z’s absence, and takes away a book without Z’s express consent. Here, if A was under the impression that he had Z’s implied consent to take the book for the purpose of reading it. A has not committed theft. But, if A afterwards sells the book for his own benefit, he is guilty of an offence under this section. (c) A and B, being joint owners of a horse, A takes the horse out of B’s possession. intending to use it. Here, as A has a right to use the horse, he does not dishonestly misappropriate it. But, if A sells the horse and appropriates the whole proceeds to his own use, he is guilty of an offence under this section. Explanation 1- dishonest misappropriation for a time only is a misappropriation within the meaning of this section.
लागू अपराध
जंगम संपत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग या उसे अपने उपयोग के लिए संपरिवर्तित कर लेना। सजा- दो वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना या दोनो। यह अपराध एक जमानतीय और गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह अपराध समझौते योग्य है।
जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 403 के अंतर्गत जो कोई बेईमानी से किसी जंगम सम्पत्ति का दुर्विनियोग करेगा, या उसको अपने उपयोग के लिये सम्परिवर्तित कर लेगा, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा, या जुर्माने से या दोनो से भी दण्डनीय होगा।
जमानत (Bail) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 403 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत मिल सकेगी।
अपराध
सजा
अपराध श्रेणी
जमानत
विचारणीय
जंगम संपत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग या उसे अपने उपयोग के लिए संपरिवर्तित कर लेना।
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 403 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 405 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 405? साथ ही हम आपको IPC की धारा 405, क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
IPC की धारा 405 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 405 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय दंड संहिता की धारा 405 आपराधिक न्यासभंग (Criminal Breach of trust) को परिभाषित किया गया है, इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे।
आईपीसी की धारा 405 के अनुसार
आपराधिक न्यासभंग-
जो कोई सम्पत्ति या सम्पत्ति पर कोई भी अख्त्यार किसी प्रकार अपने को न्यस्त किये जाने पर उस सम्पत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग कर लेता है, या उसे अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर लेता है, या जिस प्रकार ऐसा न्यास निर्वहन किया जाना है, उसको विहित करने वाली विधि के किसी निदेश का, या ऐसे न्यास के निर्वहन के बारे में उसके द्वारा की गयी किसी अभिव्यक्त या विवक्षित वैध संविदा का अतिक्रमण करके बेईमानी से उस सम्पत्ति का उपयोग या व्ययन करता है, या जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति का ऐसा करना सहन करता है, वह ‘आपराधिक न्यासभंग’ करता है। स्पष्टीकरण 1- जो व्यक्ति, 1[ किसी स्थापन का नियोजक होते हुए चाहे वह स्थापन कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबन्ध अधिनियम, 1952 (1952 का 19) की धारा 17 के अधीन छूट प्राप्त है अथवा नहीं] तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा स्थापित भविष्य निधि या कुटुम्ब पेन्शन निधि में जमा करने के लिये कर्मचारी-अभिदाय की कटौती कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से करता है, उसके बारे में यह समझा जायेगा। कि उसके द्वारा इस प्रकार कटौती किये गये अभिदाय की रकम उसे न्यस्त कर दी गई है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय का संदाय करने में, उक्त विधि का अतिक्रमण करके व्यतिक्रम करेगा तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है। स्पष्टीकरण 2– जो व्यक्ति, नियोजक होते हुये, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (1948 का 34 ) के अधीन स्थापित कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा धारित और शासित कर्मचारी राज्य बीमा निगम निधि में जमा करने के लिये कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से कर्मचारी-अभिदाय की कटौती करता है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसे अभिदाय की वह रकम न्यस्त कर दी गई है, जिसको उसने इस प्रकार कटौती की है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय के संदाय करने में उक्त अधिनियम का अतिक्रमण करके, व्यतिक्रम करता है, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है। दृष्टांत (क) क एक मृत व्यक्ति को विल का निष्पादक होते हुए उस विधि की, जो बीजबस्त को विल के अनुसार विभाजित करने के लिये उसको निदेश देती है, बेईमानी से अवज्ञा करता है और उस चीजबस्त को अपने उपयोग के लिये विनियुक्त कर लेता है। कने आपराधिक न्यासभंग किया है। (ख) क भाण्डागारिक है। य यात्रा को जाते हुए अपना फर्नीचर के के पास उस संविदा के अधीन न्यस्त कर जाता है कि वह भाण्डागार के कमरे के लिये ठहराई गई राशि के दे दिये जाने पर लौटा दिया जायेगा। क उस माल को बेईमानी से बेच देता है। क ने आपराधिक न्यासभंग किया है।
Criminal Breach of trust- Whoever, being in any manner entrusted with property, or with any dominion over property, dishonestly misappropriates or converts to his own use that property, or dishonestly uses or disposes of that property in violation of any direction of law prescribing the mode in which such trust is to be discharged, or of any legal contract, express or implied, which he has made touching the discharge of such trust, or wilfully suffers any other person so to do, commits “criminal breach of trust”. Explanation 1- A person being an employer [of an establishment whether exempted under Section 17 of the Employees Provident Funds and Miscellaneous Provisions Act, 1952 (19 of 1952) or not.] who deducts the employee’s contribution from the wages payable to the employee for credit to a Provident Fund or Family Pension Fund established by any law for the time being in force, shall be deemed to have been entrusted with the amount of the contribution so deducted by him and if he makes default in the payment of such contribution to the said fund in violation of the said law, shall be deemed to have dishonestly used the amount of the said contribution in violation of a direction of law as aforesaid. Explanation 2- A person, being an employer, who deducts the employee’s contribution from the wages payable to the employee for credit to the Employees’ State Insurance Fund held and administered by the Employees’ State Insurance Corporation established under the Employees’ State Insurance Act, 1948 (34 of 1948). shall be deemed to have been entrusted with the amount of the contribution so deducted by him and if he makes default in the payment of such contribution to the said Fund in violation of the said Act, shall be deemed to have dishonestly used the amount of the said contribution in violation of a direction of law as aforesaid. Illustrations (a) A. being executor to the will of a deceased person, dishonestly disobeys the law which directs him to divide the effects according to the will, and appropriates them to his own use. A has committed criminal breach of trust. (b) A is a warehouse-keeper, Z, going on a journey, entrust his furniture to A. under a contract that it shall be returned on payment of a stipulated sum for warehouse-room. A dishonestly sells the goods. A has committed criminal breach of trust.
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 405 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है। धन्यवाद
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 404 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 404 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
धारा 404 का विवरण
भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 404 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई किसी सम्पत्ति को यह जानते हुये कि ऐसी सम्पत्ति किसी व्यक्ति की मृत्यु के समय उस मृत व्यक्ति के कब्जे में थी, और तब से किसी व्यक्ति के कब्जे में नहीं रही है, जो ऐसे कब्जे का वैध रूप से हकदार है, बेईमानी से दुर्विनियोजित करेगा या अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर लेगा, तो वह धारा 404 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।
आईपीसी की धारा 404 के अनुसार
ऐसी सम्पत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग जो मृत व्यक्ति की मृत्यु के समय उसके कब्जे में थी-
जो कोई किसी सम्पत्ति को यह जानते हुये कि ऐसी सम्पत्ति किसी व्यक्ति की मृत्यु के समय उस मृत व्यक्ति के कब्जे में थी, और तब से किसी व्यक्ति के कब्जे में नहीं रही है, जो ऐसे कब्जे का वैध रूप से हकदार है, बेईमानी से दुर्विनियोजित करेगा या अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर लेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा और यदि वह अपराधी, ऐसे व्यक्ति की मृत्यु के समय लिपिक या सेवक के रूप में उसके द्वारा नियोजित था, तो कारावास सात वर्ष तक का हो सकेगा। दृष्टान्त य के कब्जे में फर्नीचर और धन था। वह मर जाता है। उसका सेवक क, उस धन के किसी ऐसे व्यक्ति के कब्जे में आने से पूर्व, जो ऐसे कब्जे का हकदार है, बेईमानी से उसका दुर्विनियोग करता है। क ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है।
Dishonest misappropriation of property possessed by deceased person at the time of his death- Whoever dishonestly misappropriates or converts to his own use property, knowing that such property was in the possession of a deceased person at the time of that person’s decease, and has not since been in the possession of any person legally entitled to such possession, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three years, and shall also be liable to fine; and if the offender at the time of such person’s decease was employed by him as a clerk or servant, the imprisonment may extend to seven years. Illustration Z dies in possession of furniture and money. His servant A, before the money comes into the possession of any person entitled to such possession, dishonestly misappropriates it. A has committed the offence defined in this section.
लागू अपराध
किसी सम्पत्ति का, यह जानते हुए बेईमानी से दुर्विनियोग कि वह मृत व्यक्ति के कब्जे में उसकी मृत्यु के समय उसके थी और तब से वह उसके वैध रूप से हकदार व्यक्ति कब्जे में नहीं रही है। सजा- तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना। यदि वह अपराध, मृत व्यक्ति द्वारा नियोजित लिपिक या सेवक के रूप में व्यक्ति द्वारा किया जाता है। सजा- सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना। यह अपराध एक जमानतीय और गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह अपराध समझौते योग्य है।
जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 404 के अंतर्गत जो कोई किसी सम्पत्ति को यह जानते हुये कि ऐसी सम्पत्ति किसी व्यक्ति की मृत्यु के समय उस मृत व्यक्ति के कब्जे में थी, और तब से किसी व्यक्ति के कब्जे में नहीं रही है, जो ऐसे कब्जे का वैध रूप से हकदार है, बेईमानी से दुर्विनियोजित करेगा या अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर लेगा, तो वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा और यदि वह अपराधी, ऐसे व्यक्ति की मृत्यु के समय लिपिक या सेवक के रूप में उसके द्वारा नियोजित था, तो कारावास सात वर्ष तक का हो सकेगा।
जमानत (Bail) का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता की धारा 404 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में जमानतीय (Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत मिल सकेगी।
अपराध
सजा
अपराध श्रेणी
जमानत
विचारणीय
किसी सम्पत्ति का, यह जानते हुए बेईमानी से दुर्विनियोग कि वह मृत व्यक्ति के कब्जे में उसकी मृत्यु के समय उसके थी और तब से वह उसके वैध रूप से हकदार व्यक्ति कब्जे में नहीं रही है।
तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
गैर-संज्ञेय
जमानतीय
प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा
यदि वह अपराध, मृत व्यक्ति द्वारा नियोजित लिपिक या सेवक के रूप में व्यक्ति द्वारा किया जाता है।
हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 404 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।