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आईपीसी की धारा 494 | पति या पत्नी के जीवन काल में पुनः विवाह करना | IPC Section- 494 in hindi | Marrying again during lifetime of husband or wife.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 494? साथ ही हम आपको IPC की धारा 494 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 494 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा 494 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यदि कोई पति या पत्नी के जीवित होते हुए द्विवाह विवाह करेगा तो ऐसा विवाह, विवाह अधिनियम के अंतर्गत शून्य विवाह माना जाएगा साथ ही वह धारा 494 के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा। इस लेख के माध्यम से हम आपको दंड, जमानत कैसे मिलेगी इत्यादि की जानकारी आप को देगें।

आईपीसी की धारा 494 के अनुसार –

पति या पत्नी के जीवन काल में पुनर्विवाह करना-

जो कोई पति या पत्नी के जीवित होते हुए किसी ऐसी दशा में विवाह करेगा जिसमें ऐसा विवाह इस कारण शून्य है कि वह ऐसे पति या पत्नी के जीवन काल में होता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

Marrying again during lifetime of husband or wife-
Whoever, having a husband aur wife living, marries in any case in which such marriage is void by reason of its taking place during the life of such husband or wife, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine.

यदि किसी पति अथवा पत्नी किसी दोनो के मध्य न्यायालय द्वारा पहले ही उनका विवाह अमान्य घोषित हो चुका है, तो यह धारा अप्लाई नही होगी।

लागू अपराध

पति या पत्नी के जीवन काल में पुनः विवाह करना।
सजा– सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना या दोनों का भागीदार होगा।
यह एक जमानती, गैर-संज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नहीं है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

हमारे हिंदू धर्म में किसी पति अथवा पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करना अपराध की श्रेणी में आता है, अर्थात यदि कोई दूसरा विवाह करता है तो वह अपराध की श्रेणी में आएगा, ऐसे अपराध करने वाले पति अथवा पत्नी FIR दर्ज कराकर अपने पति अथवा पत्नी को सजा दिला सकती है । जिसके लिए वह सात वर्ष कारावास और जुर्माना अथवा दोनो का भागीदार हो सकता है।

धारा- 494 किस किस धर्म पर लागू होती है?

यह धारा हिंदू धर्म, सिख धर्म और बौद्ध धर्म में लागू होती है। धारा मुस्लिम धर्म पर लागू नहीं होती है।
हिंदू विवाह अधिनियम में अगर कोई पति या पत्नी किसी के जीवित होते हुए भी दूसरी शादी करता है, तो वह शून्य मानी जाएगी। द्विविवाह रोकने के लिए भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत की धारा 494 को जोड़ा गया है, जिसके अंतर्गत हिंदू महिलाओं को उनके पति द्वारा दूसरी शादी करने से रोकने का अधिकार है लेकिन अन्य मुस्लिम महिलाओं को उनके पति को दूसरी शादी करने से रोकने के लिए ऐसा अधिकार नहीं दिया गया है।

जमानत (Bail) का प्रावधान

यह अपराध एक जमानतीय, असंज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। यह अपराध जमानतीय होने के कारण आसानी से जमानत मिल जाती है।
ऐसे अपराध में तुरंत दोषी व्यक्ति के ऊपर FIR दर्ज हो जाती है, जिसके पश्चात वह न्यायालय में याचिका दायर कर शीघ्र जमानत प्राप्त कर सकता है। जिसके पश्चात् ट्रायल शुरू होगा।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
पति या पत्नी के जीवन काल में पुनः विवाह करना।सात वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना या दोनों।गैर-संज्ञेयजमानतीयप्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास धारा 494 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, अगर आपके मन में कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है ।

आईपीसी की धारा 397 | मृत्यु या घोर उपहति कारित करने के प्रयत्न के साथ लूट या डकैती | IPC Section- 397 in hindi | robbery or dacoity, with attempt to case death or grievous heart.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 397 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 397? साथ ही हम आपको IPC की धारा 397 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 397 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा 397 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यदि लूट या डकैती करते समय अपराधी किसी आयुध अथवा मृत्यु कारित करने के लिए घोर उपहति करता है या प्रयास करता है, तो वह धारा 397 के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा। इस लेख के माध्यम से हम आपको दंड, जमानत कैसे मिलेगी इत्यादि की जानकारी आप को देगें।

आईपीसी की धारा 397 के अनुसार –

मृत्यु या घोर उपहति कारित करने के प्रयत्न के साथ लूट या डकैती-

यदि लूट या डकैती करते समय अपराधी किसी घातक आयुध का उपयोग करेगा, या किसी व्यक्ति को घोर उपहति कारित करेगा, या किसी व्यक्ति की मृत्यु कार्य करने या उसे घोर उपहति कारित करने का प्रयत्न करेगा, तो वह कारावास, जिससे ऐसा अपराधी दंडित किया जाएगा, सात वर्ष से कम नहीं होगा।

Robbery aur dacoity, with attempt to case death or grievous hurt-
If, at the time of committing robbery or dacoity, the offender uses any deadly weapon, or causes grievous hurt to any person, or attempts to cause death or grievous hurt to any person, the imprisonment with which such of offender shall be punished shall not be less than seven years.

लागू अपराध

मृत्यु या घोर उपहति कारित करने के प्रयत्न के साथ लूट या डकैती
सजा– सात वर्ष से कम न होने वाला कठोर कारावास का भागीदार होगा।
यह एक अजमानती, संज्ञेय अपराध है और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नहीं है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

यदि लूट या डकैती करते समय अपराधी किसी घातक हथियार का प्रयोग करेगा, या किसी व्यक्ति को घोर उपहति कारित करेगा अथवा किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करने के लिए घोर उपहति करने का प्रयत्न जैसा गंभीर अपराध करता है, तो सात वर्ष से कम न होने वाला कठोर कारावास का भागीदार होगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

यह अपराध एक गैर जमानतीय, संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। यह अपराध गैरजमानतीय होने के कारण आसानी से जमानत नहीं मिलना मुश्किल पड़ जाती है।
इस धारा में डाली जा चुकी याचिकाओं में न के बराबर जमानत मिलने के चांस होते है, साथ ऐसे अपराध के दृष्टिकोण पर ध्यान देते हुए, जमानत खारिज कर दी जाती है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
मृत्यु या घोर उपहति कारित करने के प्रयत्न के साथ लूट या डकैती।सात वर्ष से कम न होने वाला कठोर कारावास।संज्ञेयगैर-जमानतीयसेशन न्यायालय द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 397 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 501 | मानहानिकारक जानी हुई बात को मुद्रित या उत्कीर्ण करना | IPC Section- 501 in hindi | Printing or engraving matter known to be defamatory.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 501 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 501? साथ ही हम आपको IPC की धारा 501 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 501 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा 501 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यदि कोई व्यक्ति किसी बात को यह जानते या विश्वास का कारण रखते हुए, ऐसा कार्य करेगा, जिससे व्यक्ति के लिए मानहानिकारक है अथवा मुद्रित करता है या उत्कीर्ण करता है, वह धारा 501 के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा। इस लेख के माध्यम से हम आपको दंड, जमानत कैसे मिलेगी इत्यादि की जानकारी आप को देगें।

आईपीसी की धारा 501 के अनुसार-

मानहानिकारक जानी हुई बात को मुद्रित या उत्कीर्ण करना-

जो कोई किसी बात को यह जानते हुए या विश्वास करने का अच्छा कारण रखते हुए कि ऐसी बात किसी व्यक्ति के लिए मानहानिकारक है, मुद्रित करेगा, या उत्कीर्ण करेगा, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।

Printing or engraving matter known to be defamatory-
Whoever Prints or engraves any matter, knowing or having good reason to believe that such matter is defamatory of any person shall be punished with simple imprisonment for a term which may extend to two years, or with fine, or with both.

लागू अपराध

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल यह संघ राज्य क्षेत्र के प्रशासक यह मंत्री के विरुद्ध मानहानि करना भी जानते हुए ऐसी बात को मुद्रित या उत्कीर्ण करना, जो उसके लोग कृतियों के निर्वहन में उसके आचरण के बारे में हो जब लोककृत्यो के निर्वहन में उसके आचरण के बारे मे हो, जब लोक अभियोजक ने परिवाद संस्थित किया हो।
सजा – दो वर्ष के लिए सादा कारावास और जुर्माना या दोनों का भागीदार होगा।
किसी अन्य मामले में मानहानिकारक जानते हुए, किसी बात को मुद्रित या उत्कीर्ण करना।
सजा – दो वर्ष के लिए सादा कारावास और जुर्माना या दोनों का भागीदार होगा।
यह एक जमानती, गैर-संज्ञेय अपराध है और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को यह जानते हुए या विश्वास करने का अच्छा कारण रखते हुए कि ऐसी बात किसी व्यक्ति के लिए मानहानिकारक है, मुद्रित करेगा, या उत्कीर्ण करेगा। अर्थात् ऐसी किसी बात को मुद्रित करेगा, जिसे वह जानता है कि यह मानहानिकारक है, तब भी मुद्रित कराता है या करता है, तो वह दो वर्ष का सादा कारावास और जुर्माना अथवा दोनो का भागीदार हो सकता है।

जमानत (Bail) का प्रावधान

यह अपराध एक जमानतीय, असंज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। यह अपराध जमानतीय होने के कारण आसानी से जमानत मिल जाती है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल यह संघ राज्य क्षेत्र के प्रशासक यह मंत्री के विरुद्ध मानहानि करना भी जानते हुए ऐसी बात को मुद्रित या उत्कीर्ण करना, जो उसके लोग कृतियों के निर्वहन में उसके आचरण के बारे में हो जब लोककृत्यो के निर्वहन में उसके आचरण के बारे मे हो, जब लोक अभियोजक ने परिवाद संस्थित किया हो।दो वर्ष के लिए सादा कारावास और जुर्माना या दोनों।गैर-संज्ञेयजमानतीयसेशन न्यायालय द्वारा
किसी अन्य मामले में मानहानिकारक जानते हुए, किसी बात को मुद्रित या उत्कीर्ण करना।दो वर्ष के लिए सादा कारावास और जुर्माना या दोनों।गैर-संज्ञेयजमानतीयसेशन न्यायालय द्वारा

हमारा प्रयास धारा 501 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है ।

आईपीसी की धारा 497 | जारकर्म | IPC Section- 497 in hindi | Adultery.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 497 साथ ही हम आपको IPC की धारा 497 दंड, जुर्माना और जमानत कैसे मिलेगी। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 497 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा 497 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यदि कोई यह जानते हुए कि वह किसी और की पत्नी है और बिना सम्मति के ऐसे मैथुन करेगा, बलात्संग की श्रेणी मे नही आता, वह जारकर्म के अपराध का दोषी होगा, ऐसे मामले में पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दंडनीय नहीं होगी, ऐसा अपराध जो पुरुष करेगा, वह धारा 497 के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा। इस लेख के माध्यम से हम आपको दंड, जमानत कैसे मिलेगी इत्यादि की जानकारी आप को देगें।

आईपीसी की धारा 497 के अनुसार-

जारकर्म-

जो कोई ऐसा व्यक्ति के साथ, जो कि किसी अन्य पुरुष की पत्नी है और जिसका किसी अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष की सम्मति या  मौनानुकूलता के बिना मैथुन किया है, जो बलात्संग की श्रेणी मे नही आता, वह जारकर्म के अपराध का दोषी होगा, और दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जाएगा। ऐसे मामले में पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दंडनीय नहीं होगी।

Adultery-
Whoever has sexual intercourse with a person who is and whom he knows or has reason to believe to be the wife of another man, without the consent or convenience of that man, such sexual intercourse not amounting to the offence of rape, is guilty of the offence of adultery, and shall be punishment with imprisonment of either description for a term which may extend to five years, or with fine, or with both, In such case the wife shall not punished as an abettor.

जारकर्म का अर्थ-

जारकर्म अर्थात् कोई व्यक्ति किसी स्त्री से जबरदस्ती अवैध रूप से उसकी स्वेच्छा के विपरीत यौनसंबंध बनाना, जारकर्म कहलाता है।
धारा 497 ऐसे अपराध उन आरोपित व्यक्तियो पर लागू होते हैं, जो किसी स्त्री को यह जानते हुए, कि यह किसी और व्यक्ति की पत्नी है, फिर भी जबरदस्ती अवैध रूप से उसकी मर्जी के विपरीत यौन संबंध बनाते या बनाने का प्रयास करते है तो वह धारा 497 के अंतर्गत अपराधी होंगे।

लागू अपराध

जारकर्म।
सजा – पांच वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना या दोनों का भागीदार होगा।
यह एक जमानती, गैर-संज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

कोई व्यक्ति किसी स्त्री से जबरदस्ती अवैध रूप से उसकी स्वेच्छा के विपरीत यौनसंबंध बनाता है, जबकि वह यह जानता है कि यह किसी और व्यक्ति की पत्नी है, फिर भी ऐसा अपराध करता है, तो वह पांच वर्ष कारावास और जुर्माना अथवा दोनो का भागीदार हो सकता है।

जमानत (Bail) का प्रावधान

यह अपराध एक जमानतीय, असंज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। यह अपराध जमानतीय होने के कारण आसानी से जमानत मिल जाती है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
जारकर्म।पांच वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना या दोनों।गैर-संज्ञेयजमानतीयप्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास धारा 497 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, अगर आपके मन में कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है ।

आईपीसी की धारा 498 | विवाहिता स्त्री को आपराधिक आशय से फुसलाकर ले जाना या निरुद्ध रखना | IPC Section- 498 in hindi | Enticing or taking away or detaining with criminal intent a married woman.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 498 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 498 साथ ही हम आपको IPC की धारा 498 के अंतर्गत दंड, जुर्माना और जमानत कैसे मिलेगी। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

स्पष्ट भाषा में कोई व्यक्ति, किसी की पत्नी की देखरेख में उसे इस आशय से ले जायेगा या बहला फुसलाकर ले जायेगा अथवा किसी यौनसंबध बनाने के आशय से छिपाएगा या निरुद्ध करेगा। वह धारा 498 के अंतर्गत अपराधी होगा।

धारा 498 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा 498 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यदि कोई यह जानते हुए कि वह किसी और की पत्नी है, और उसके पति की संज्ञान में देखरेख करता है, साथ ही वह इस आशय से बहला फुसलाकर ले जायेगा अथवा यौन संबंध बनाने के आशय से छिपाएगा या निरुद्ध करेगा, तो वह धारा 498 के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा। इस लेख के माध्यम से हम आपको दंड, जमानत कैसे मिलेगी इत्यादि की जानकारी आप को देगें।

आईपीसी की धारा 498 के अनुसार-

विवाहित स्त्री को अपराधी आशय से फुसलाकर ले जाना या निरुद्ध रखना-

जो कोई किसी स्त्री को, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है और जिसका किसी अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है, या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष के पास या किसी ऐसे व्यक्ति के पास से, जो उस पुरुष की ओर से उसकी देख-रेख करता है, इस आशय से ले जाएगा, या फुसलाकर कर ले जाएगा कि वह किसी व्यक्ति के साथ अयुक्त संभोग करे या इस आशय से ऐसी किसी स्त्री को छिपाएगा या निरुद्ध करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जाएगा।

Enticing aur talking away are detaining with criminal intent a married woman-
Whoever takes or entices away any woman who is and whom he knows or has reason to believe to be the wife of any other man, from that man, or from any person having the care of her on behalf of that man, with intent that she may have illicit intercourse with any person or conceals or detains with that intent any such women, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, or with fine, or with both.

लागू अपराध

विवाहित स्त्री को अपराधी आशय से फुसलाकर ले जाना या निरुद्ध रखना।
सजा– दो वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना या दोनों का भागीदार होगा।
यह एक जमानती, गैर-संज्ञेय अपराध है और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

कोई व्यक्ति, किसी की पत्नी की देखरेख में  उसे इस आशय से ले जायेगा या बहला फुसलाकर ले जायेगा अथवा किसी यौनसंबध बनाने के आशय से छिपाएगा या निरुद्ध करेगा, तो वह दो वर्ष कारावास और जुर्माना अथवा दोनो का भागीदार हो सकता है।

जमानत (Bail) का प्रावधान

यह अपराध एक जमानतीय, असंज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। यह अपराध जमानतीय होने के कारण आसानी से जमानत मिल जाती है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
विवाहित स्त्री को अपराधी आशय से फुसलाकर ले जाना या निरुद्ध रखना।दो वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना या दोनों।गैर-संज्ञेयजमानतीयकिसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास धारा 498 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है ।

सीआरपीसी धारा 161 | पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा | CrPC Section- 161 in hindi | Examination of Witnesses by police.

CrPC- 161

नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका अपने ब्लॉग Mylegallaw.com में, आज हम आपको सीआरपीसी  की रोचक धारा 161 के विषय में बताएंगे। इस धारा के अंतर्गत “पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा” Examination of Witnesses by police.

पीड़ित व्यक्ति द्वारा बयान के लिए उपयोग में लाया जाता है। अर्थात् जब कभी किसी के साथ कोई घटना घटित होती है, तब हम लोगो ने देखा होगा, पुलिस अधिकारी अथवा ऐसे किसी जांच अधिकारी हमसे सवाल करते हैं, साथ ही पूर्ण मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच करते, साथ ही तथ्यो और परिस्थितियों के आधार पर मौखिक पूछताछ की जाती है, जिसे हम पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा कहते है। इसे ही हम दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 बयान देना कहते है। आइए जानते है, क्या कहती है धारा 161? और कब लागू होती और कब नहीं लागू होती यह भी बात करेंगे। साथ ही सम्पूर्ण जानकारी आपको इस लेख के माध्यम से देंगे।

धारा 161 का विवरण

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अंतर्गत अपराध के तथ्य और मामले को दर्ज कराकर मामले की जांच हेतु पीड़ित व्यक्ति से पूछताछ के पश्चात् ही दोषी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही की जाती है । इसलिए धारा 161 का बयान पीड़ित व्यक्ति को देना अत्यंत ही आवश्यक है। आज हम आपको बताएंगे कब कब और किन किन अपराधों में पुलिस अधिकारी द्वारा पीड़ित व्यक्ति से बयान लिया जा सकता है।

सीआरपीसी की धारा 502 के अनुसार Examination of Witnesses by police.-

पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा-

(1) कोई पुलिस अधिकारी, जो इस अध्याय के अधीन अन्वेषण (जांच) कर रहा है या ऐसे अधिकारी की उपेक्षा पर कार्य करने वाला कोई पुलिस अधिकारी, जो ऐसी पंक्ति में निम्नतर पंक्ति का नहीं है जिसे राज्य सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा निमित्त विहित करें, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को परिचित समझे जाने वाले किसी व्यक्ति की मौखिक परीक्षा कर सकता है।
(2) ऐसा व्यक्ति उन प्रश्नों के सिवाय, जिनके उत्तरों की प्रवृत्ति उसे आपराधिक आरोप या शास्ति समपहरण की आशंका में डालने की है, ऐसे मामले में संबंधित उन सब प्रश्नों का सही-सही उत्तर देने के लिए आबद्ध होगा जो ऐसा अधिकारी उससे पूछता है।
(3) पुलिस अधिकारी इस धारा के अधीन परीक्षा के दौरान उसके समक्ष किए गए किसी भी कथन को लेखबद्ध कर सकता है और यदि वह ऐसा करता है तो वह प्रत्येक ऐसे व्यक्ति के कथन का पृथक् और सही अभिलेख बनाएगा, जिसका कथन वह अभिलिखित करता है।

Examination of witnesses by police-
(1) Any police officer making an investigation under this chapter or, any police officer not be do such rank as the state government may, by general or special order, prescribe in this behalf, acting on the requisition of such officer, may examine orally any person supposed to be acquainted with the facts and circumstances of the case.
(2) Such person shall be bound to answer truly all question relating to such case put to him by such officer, other than question the answer to which would have a tendency to expose him to a criminal charge or to a penalty or forfeiture.
(3) The police officer may reduce into writing any statement made to him in the course of an examination under this section; and if he does so, he shall make a separate and true record of this statement of each such person whose statement he records.

[परन्तु यह कि इस उपधारा के आधीन किए गए किसी कथन का अभिलेखन ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक साधनों से भी किया जा सकेगा]
[परन्तु यह और कि उस स्त्री का, जिसके विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 376, (धारा 376क, धारा 376कख, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ, धारा 376घक, धारा 376घख), धारा 376ड या धारा 509 के आधीन अपराध कारित करने का प्रयत्न किए जाने का अभिकथन किया गया है, कथन, महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी द्वारा अभिलिखित किया जाएगा।]

अन्य न्यायिक रूलिंग

ऐसे अनेक मामले आए हैं जिनमें गवाह न्यायालय में धारा 161 में भी बदल जाते है। जब भी कोई अपराध होता है तो यह पुलिस की जिम्मेदारी होती है कि वह गवाह और पीड़ित की रक्षा करे। पीड़ित और गवाह दोनों की ही कोर्ट में और कोर्ट के बाहर स्थिति पीड़ा जनक रहती है। कई बार इनको धमकियां भी मिलती हैं। कभी सामाजिक बहिष्कार का सामना करना होता है। इनके कारण कई बार गवाह बदलना स्वाभाविक हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 161 के अंतर्गत बयान को मान्यता दी गई है जिसको लेकर बहुत सी रूलिंग बनाई गई है- जिसमे पीड़ित एवम् गवाह दोनो की सुरक्षा का दायित्व पुलिस अधिकारी को दिया है, फिर भी ऐसे बहुत से मामले है, जिनमे गवाह न्यायालय के समक्ष उपस्थित होते ही बदल गए। साथ ही पुलिस अधिकारी को पुनः जांच करनी पड़ती है।

न्यायमूर्ति एके सिकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने उड़ीसा हाईकोर्ट के 25 जनवरी 2017 के फैसले के खिलाफ अपील की सुनवाई कर रहे थे। इस मामले में आईपीसी की धारा 304 के तहत 5 साल के लिए कारावास की सजा निचली अदालत ने सुनाई थी जिसके खिलाफ हाईकोर्ट ने अपील ठुकरा दी थी।

अपीलकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि धारा 161 के तहत घायल व्यक्ति के बयान को मर रहे व्यक्ति का बयान नहीं माना जा सकता। वकील ने इस बारे में लक्ष्मण बनाम महाराष्ट्र राज्य (2002) के फैसले का उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि पुलिस द्वारा धारा 161 के तहत दर्ज किया गया बयान जो कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 के क्लॉज़ (1) के तहत आता है, स्पष्ट रूप से संगत है और इसको स्वीकार किया जा सकता है।

पीठ द्वारा कहा गया, “निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों ने घायल व्यक्ति के बयान को संगत माना है और उस बयान पर भरोसा जताया है”।

“हमने गौर किया है कि कोर्ट ने कहा है कि सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दिया गया बयान संगत और मान्य है। इस तरह, हम इस मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले और इस बारे में हाईकोर्ट का जांच अधिकारी द्वारा 5 दिसंबर 1990 को दर्ज किए गए बयान पर भरोसा करने के फैसले में कुछ भी गलती नहीं देख रहे हैं”।

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 161 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।