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आईपीसी की धारा 117 | लोक साधारण द्वारा या दस से अधिक व्यक्तियों द्वारा अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण | IPC Section- 117 in hindi| Abetting commission of offence by the public or by more than ten person.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 117 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 117? साथ ही हम आपको IPC की धारा 117 सम्पूर्ण जानकारी एवम् क्या सजा मिलेगी और कैसे क्या जमानत मिलेगी। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 117 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 117 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई सामान्य लोग द्वारा या दस या दस से अधिक व्यक्तियों या किसी वर्ग द्वारा किसी अपराध को किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 117 अप्लाई होगी।  ऐसे अपराधों को परिभाषित करती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 117 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 117 के अनुसार-

लोक साधारण द्वारा या दस से अधिक व्यक्तियों द्वारा अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण-

जो कोई लोक साधारण द्वारा या दस से अधिक व्यक्तियों की किसी भी संख्या या वर्ग द्वारा किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक को हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से, दण्डित किया जायेगा।
दृष्टान्त
क, एक लोक स्थान में एक प्लेकार्ड चिपकाता है, जिसमें एक पन्थ को जिसमें दस से अधिक सदस्य हैं, एक विरोधी पंथ के सदस्यों पर, जबकि वे जुलूस निकालने में लगे हुए हों, आक्रमण करने के प्रयोजन से, किसी निश्चित समय और स्थान पर मिलने के लिए उकसाया गया है। क ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है।

Abetting commission of offence by the public or by more than ten persons-
Whoever abets the commission of an offence by the public generally or by any number or class of persons exceeding ten, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three years, or with fine, or with both.
Illustration
A affixes in a public place a placard instigating a sect consisting of more than ten members to meet at a certain time and place, for the purpose of attacking the members of an adverse sect, while engaged in a procession. A has committed the offence defined in this section.

लागू अपराध

लोक साधारण द्वारा या दस से अधिक व्यक्तियों द्वारा अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण।
सजा- तीन वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना अथवा दोनो।
जो दुष्प्रेरित अपराध के अनुसार ही संज्ञेय, गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आएगा एवम अपराध अनुसार ही जमानत मिलेगी अथवा नही मिलेगी।
उस न्यायालय द्वारा जिसके द्वारा दुष्प्रेरित अपराध विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नही है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 117 के अंतर्गत सामान्य जन  या दस से अधिक व्यक्तियों द्वारा अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा। वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक को हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से, दण्डित किया जायेगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

जब सामान्य पब्लिक अथवा दस अधिक व्यक्तियों अथवा किसी वर्ग द्वारा किसी अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण करता है तो वह अपराधी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध के अनुसार ही मामले में पुलिस द्वारा FIR दर्ज करती है यदि अपराधी व्यक्ति द्वारा जमानतीय अपराध कारित हुआ है तो वह अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाएगी। इसी तरह से यदि गैर-जमानतीय अपराध कारित हुआ है, तो जमानत मिलना मुश्किल हो सकता है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
लोक साधारण द्वारा या दस से अधिक व्यक्तियों द्वारा अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण।तीन वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना अथवा दोनो।अपराधनुसारअपराधनुसारउस न्यायालय द्वारा जिसके द्वारा दुष्प्रेरित अपराध विचारणीय है।

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 117 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 116 | कारावास से दंडनीय अपराध का दुष्प्रेरण-यदि अपराध न किया जाए | IPC Section- 116 in hindi| Abetment of offence punishable with imprison-ment -if offence be not committed.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 116 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 116? साथ ही हम आपको IPC की धारा 116 सम्पूर्ण जानकारी एवम् क्या सजा मिलेगी और कैसे क्या जमानत मिलेगी। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 116 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 116 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा उन अपराधों को परिभाषित करती है, जो कोई कारावास से दंडनीय अपराध का दुष्प्रेरण करेगा, यदि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणाम स्वरूप न किया जाए, और ऐसे दुष्प्रेरण के दंड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध इस संहिता में नहीं किया गया है। यह धारा 116 ऐसे अपराधों को परिभाषित करती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 116 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 116 के अनुसार-

कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण- यदि अपराध न किया जाए-

जो कोई कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण करेगा यदि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप न किया जाए और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध इस संहिता में नहीं किया गया है, तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भांति के कारावास से ऐसी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित दीर्घतम अवधि के एक चौथाई भाग तक की हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा;
यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है, जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना हो— और यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक हो, जिसका कर्तव्य ऐसे अपराध के किए जाने को निवारित करना हो, तो वह दुष्प्रेरक उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भाँति के कारावास से ऐसी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित दीर्घतम अवधि के आधे भाग तक की हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, या दोनों से, दण्डित किया जायगा।
दृष्टान्त
(क) ख को, जो एक लोक सेवक है, ख से पदीय कृत्यों के प्रयोग में क अपने प्रति कुछ अनुग्रह दिखाने के लिए इनाम के रूप में रिश्वत की प्रस्थापना करता है। ख उस रिश्वत को प्रतिगृहीत करने से इन्कार कर देता है। क इस धारा के अधीन दण्डनीय है।
(ख) मिथ्या साक्ष्य देने के लिए ख को क उकसाता है। यहाँ, यदि ख मिथ्या साक्ष्य न दे, तो भी करने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है, और वह तद्नुसार दण्डनीय है।
(ग) क, एक पुलिस आफिसर, जिसका कर्तव्य लूट को निवारित करना है, लूट किए जाने का दुष्प्रेरण करता है। यहाँ, यद्यपि वह लूट नहीं की जाती, क उस अपराध के लिए उपबन्धित कारावास की दीर्घतम अवधि के आधे से,
और जुर्माने से भी, दण्डनीय है।
(घ) क द्वारा, जो एक पुलिस आफिसर है, और जिसका कर्तव्य लूट को निवारित करना है, उस अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण ख करता है यहाँ यद्यपि वह लूट न की जाए, ख लूट के अपराध के लिए उपबन्धित कारावास की दीर्घतम अवधि के आधे से, और जुर्माने से भी, दण्डनीय है।

Abetment of offence punishable with imprison-ment.-If offence be not committed-
Whoever abets an offence punishable with imprisonment shall, if that offence be not committed in consequence of the abetment, and no express provision is made by this Code for the punishment of such abetment, be punished with imprisonment of any description provided for that offence for a term which may extend to one-fourth part of the longest term provided for that offence: or with such fine as is provided for that offence, or with both.
If abettor or person abetted be a public servant whose duty it is to prevent offence.- and if the abettor or the person abetted is a public servant, whose duty it is to prevent the commission of such offence, the abettor shall be punished with imprisonment of any description provided for that offence, for a term which may extend to one-half of the longest term provided for that offence, or with such fine as is provided for the offence, or with both.
Illustrations
(a) A offers a bribe to B, a public servant, as a reward for showing A some exercise of B’s official functions. B refuses to accept the bribe. A is punishable under this section.
(b) A instigates B to give false evidence. Here, if B does not give false evidence, A has nevertheless committed the offence defined in this section and is punishable accordingly.
(c) A, a police officer, whose duty it is to prevent robbery, abets the commission of
robbery. Here, though the robbery be not committed, A is liable to one-half of the longest term of imprisonment provided for that offence, and also to fine.
(d) B abets the commission of a robbery by A, a police officer, whose duty is to prevent that offence. Here, though the robbery be not committed, B is liable to one-half of the longest term of imprisonment provided for the offence of robbery, and also to fine.

लागू अपराध

कारावास से दंडनीय अपराध का दुष्प्रेरण, यदि दुष्प्रेरण के परिणाम-स्वरूप अपराध नहीं किया जाता है।
सजा- उस दीर्घतम अवधि के एक चौथाई भाग तक का कारावास, जो अपराध के लिए उपबन्धित है या जुर्माना अथवा दोनो।
यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक हैं जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना है।
सजा- उस दीर्घतम अवधि के एक आधे भाग तक का कारावास, जो अपराध के लिए उपबन्धित है या जुर्माना अथवा दोनो।
जो दुष्प्रेरित अपराध के अनुसार ही संज्ञेय, गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आएगा एवम अपराध अनुसार ही जमानत मिलेगी अथवा नही मिलेगी।
उस न्यायालय द्वारा जिसके द्वारा दुष्प्रेरित अपराध विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नही है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 116 के अंतर्गत जो कोई कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण करेगा यदि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप न किया जाए तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भांति के कारावास से ऐसी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित दीर्घतम अवधि के एक चौथाई भाग तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से, दण्डित किया जायेगा। इसी तरह से यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है, जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना है, जिसका कर्तव्य ऐसे अपराध के किए जाने को निवारित करना हो, तो वह दुष्प्रेरक उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भाँति के कारावास से ऐसी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित दीर्घतम अवधि के आधे भाग तक की हो सकेगी या जुर्माने से अथवा दोनो से दंडित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

जो कोई कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण करेगा एवम यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक हैं जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना है करता है तो वह अपराधी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध के अनुसार ही मामले में पुलिस द्वारा FIR दर्ज करती है यदि अपराधी व्यक्ति द्वारा जमानतीय अपराध कारित हुआ है तो वह अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाएगी। इसी तरह से यदि गैर-जमानतीय अपराध कारित हुआ है, तो जमानत मिलना मुश्किल हो सकता है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
कारावास से दंडनीय अपराध का दुष्प्रेरण, यदि दुष्प्रेरण के परिणाम-स्वरूप अपराध नहीं किया जाता है।उस दीर्घतम अवधि के एक चौथाई भाग तक का कारावास, जो अपराध के लिए उपबन्धित है या जुर्माना अथवा दोनो।अपराधनुसारअपराधनुसारउस न्यायालय द्वारा जिसके द्वारा दुष्प्रेरित अपराध विचारणीय है।
यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक हैं जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना है।उस दीर्घतम अवधि के एक आधे भाग तक का कारावास, जो अपराध के लिए उपबन्धित है या जुर्माना अथवा दोनो।अपराधनुसारअपराधनुसारउस न्यायालय द्वारा जिसके द्वारा दुष्प्रेरित अपराध विचारणीय है।

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 116 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 115 | मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण, यदि अपराध नहीं किया जाता है | IPC Section- 115 in hindi| Abetment of offence punishable with death or imprisonment for life-if offence not committed.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 115 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 115? साथ ही हम आपको IPC की धारा 115 सम्पूर्ण जानकारी एवम् क्या सजा मिलेगी और कैसे क्या जमानत मिलेगी। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 115 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 115 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा उन अपराधों को परिभाषित करती है, जो कोई मृत्यु अथवा आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, यदि यह अपराध  उस दुष्प्रेरण के परिणाम स्वरूप न किया जाए, और ऐसे दुष्प्रेरण के दंड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध इस संहिता में नहीं किया गया है। यह धारा 115 ऐसे अपराधों को परिभाषित करती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 115 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 115 के अनुसार-

मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण- यदि अपराध नहीं किया जाता-

जो कोई मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध के किये जाने का दुष्प्रेरण करेगा, यदि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप न किया जाए, और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध इस संहिता में नहीं किया गया है, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
यदि अपहानि करने वाला कार्य परिणामस्वरूप किया जाता है- और यदि ऐसा कोई कार्य कर दिया जाए, जिसके लिए दुष्प्रेरक उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप दायित्व के अधीन हो और जिससे किसी व्यक्ति को उपहति कारित हो तो दुष्प्रेरक दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।
दृष्टान्त
ख को य की हत्या करने के लिए क उकसाता है। वह अपराध नहीं किया जाता है। यदि य की हत्या ख कर देता है, तो वह मृत्यु या आजीवन कारावास के दण्ड से दण्डनीय होता। इसलिए क कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय है और जुर्माने से भी दण्डनीय है; और यदि दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप य को कोई उपहति हो जाती है, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

Abetment of offence punishable with death or imprisonment for life-if offence not committed-
Whoever abets the commission of an offence punishable with death or imprisonment for life, shall, if that offence be not committed in consequence of the abetment, and no express provision is made by this Code for the punishment of such abetment, be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine :
If act causing harm be done in consequence.- and if any act for which the abettor is liable in consequence of the abetment, and which causes hurt to any person. is done, the abettor shall be liable to imprisonment of either description for a term which may extend to fourteen years, and shall also be liable to fine.
Illustrations
A instigates B to murder Z. The offence is not committed. If B had murdered Z, he would have been subject to the punishment of death or imprisonment for life. Therefore, A is liable to imprisonment for a term which may extend to seven years and also to a fine; and, if any hurt be done to Z in consequence of the abetment, he will be liable to imprisonment for a term which may extend to fourteen years, and to fine.

लागू अपराध

मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण- यदि दुष्प्रेरण के परिणाम स्वरूप अपराध नहीं किया जाता है।
सजा- सात वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना ।
यदि अपहानि करने वाला कार्य दुष्प्रेरण के परिणाम स्वरूप किया जाता है।
सजा- चौदह वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना । जो दुष्प्रेरित अपराध के अनुसार ही संज्ञेय, गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आएगा एवम अपराध अनुसार ही जमानत मिलेगी अथवा नही मिलेगी। उस न्यायालय द्वारा जिसके द्वारा दुष्प्रेरित अपराध विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नही है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 115 के अंतर्गत जो मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण करेगा यदि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप न किया जाए तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भांति के कारावास से सात वर्ष के तक की, और जुर्माने से दण्डित किया जायेगा। इसी तरह से यदि अपहानि करने वाला कार्य दुष्प्रेरण के परिणाम स्वरूप किया जाये, तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भांति के कारावास से चौदह वर्ष के तक की, और जुर्माने से दण्डित किया जायेगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

जो कोई मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण- यदि दुष्प्रेरण के परिणाम स्वरूप अपराध नहीं किया जाता है और यदि अपहानि करने वाला कार्य दुष्प्रेरण के परिणाम स्वरूप किया जाता है। तो वह अपराधी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध के अनुसार ही मामले में पुलिस द्वारा FIR दर्ज करती है यदि अपराधी व्यक्ति द्वारा जमानतीय अपराध कारित हुआ है तो वह अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल जाएगी। इसी तरह से यदि गैर-जमानतीय अपराध कारित हुआ है, तो जमानत मिलना मुश्किल हो सकता है।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण- यदि दुष्प्रेरण के परिणाम स्वरूप अपराध नहीं किया जाता है।सात वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना।अपराधनुसारअपराधनुसारउस न्यायालय द्वारा जिसके द्वारा दुष्प्रेरित अपराध विचारणीय है।
यदि अपहानि करने वाला कार्य दुष्प्रेरण के परिणाम स्वरूप किया जाता है।चौदह वर्ष के लिए कारावास या जुर्मानाअपराधनुसारअपराधनुसारउस न्यायालय द्वारा जिसके द्वारा दुष्प्रेरित अपराध विचारणीय है।

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 115 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 114 | अपराध किए जाते समय दुष्प्रेरक की उपस्थिति | IPC Section- 114 in hindi| Abettor present when offence is committed.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 114 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 114? साथ ही हम आपको IPC की धारा 114 सम्पूर्ण जानकारी एवम् परिभाषा इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 114 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 114 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा उन अपराधों को परिभाषित करती है, जब कोई व्यक्ति अनुपस्थित होने पर दुष्प्रेरक के नाते दंडनीय नही हो सकता है अर्थात् जब वह उस कार्य या अपराध के समय उपस्थित नही था, तो दंडनीय नही होगा और यदि उस समय उपस्थित हो, जब वह कार्य या अपराध कारित किया गया हो, तब वह दुष्प्रेरण के परिणाम स्वरूप दंडनीय होगा। यह धारा 114 ऐसे अपराधों को परिभाषित करती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 114 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 114 के अनुसार-

अपराध किए जाते समय दुष्प्रेरक की उपस्थिति –

जब कभी कोई व्यक्ति, जो अनुपस्थित होने पर दुष्प्रेरक के नाते दण्डनीय होता, उस समय उपस्थित हो जब वह कार्य या अपराध किया जाए जिसके लिए वह दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप दण्डनीय होता तब यह समझा जाएगा कि उसने ऐसा कार्य या अपराध किया है।

Abettor present when offence is committed-
Whenever any person, who if absent would be liable to be punished as an abettor, is present when the act or offence for which he would be punishable in consequence of the abetment is committed, he shall be deemed to have committed such act or offence.

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 114 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 113 | दुष्प्रेरित कार्य से कारित उस प्रभाव के लिए दुष्प्रेरक का दायित्व जो दुष्प्रेरक द्वारा आशायित से भिन्न हो | IPC Section- 113 in hindi| Liability of abettor for an effect caused by the act abetted different from that intended by the abettor.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 113 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 113? साथ ही हम आपको IPC की धारा 113 सम्पूर्ण जानकारी एवम् परिभाषा इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 113 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 113 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा उन अपराधों को परिभाषित करती है, जब किसी कार्य का दुष्प्रेरण, दुष्प्रेरक द्वारा किसी विशिष्ट प्रभाव डालने के आशय से किया गया हो और वह प्रभाव से भिन्न प्रभाव कारित करता है। यह धारा 113 ऐसे अपराधों को परिभाषित करती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 113 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 113 के अनुसार-

दुष्प्रेरित कार्य से कारित उस प्रभाव के लिए दुष्प्रेरक का दायित्व जो दुष्प्रेरक द्वारा आशयित से भिन्न हो-

जबकि कार्य का दुष्प्रेरण दुष्प्रेरक द्वारा किसी विशिष्ट प्रभाव को कारित करने के आशय से किया जाता है और दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप जिस कार्य के लिए दुष्प्रेरक दायित्व के अधीन है, वह कार्य दुष्प्रेरक के द्वारा आशयित प्रभाव से भिन्न प्रभाव कारित करता है तब दुष्प्रेरक कारित प्रभाव के लिए उसी प्रकार और उसी विस्तार तक दायित्व के अधीन है मानो उसने उस कार्य का दुष्प्रेरण उसी प्रभाव को कारित
करने के आशय से किया हो, परन्तु यह तब जबकि वह यह जानता था कि दुष्प्रेरित कार्य से यह प्रभाव कारित होना सम्भाव्य है।
दृष्टान्त
य को घोर उपहति करने के लिए ख को क उकसाता है। ख उस उकसाहट के परिणामस्वरूप य को घोर उपहति कारित करता है। परिणामतः य की मृत्यु हो जाती है। यहाँ, यदि के यह जानता था कि दुष्प्रेरित घोर उपहति से मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है, तो क हत्या के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय है।

Liability of abettor for an effect caused by the act abetted different from that intended by the abettor-
When an act is abetted with the intention on the part of the abettor of causing a particular effect, and an act for which the abettor is liable in consequence of the abetment, causes a different effect from that intended by the abettor, the abettor is liable for the effect caused, in the same manner and to the same extent as if he had abetted the act with the intention of causing that effect, provided he knew that the act abetted was likely to cause that effect.
Illustration
A instigates B to cause grievous hurt to Z. B, in consequence of the instigation, causes grievous hurt to Z. Z dies in consequence. Here, if A knew that the grievous hurt abetted was likely to cause death, A is liable to be punished with the punishment provided for murder.

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आईपीसी की धारा 112 | दुष्प्रेरक कब दुष्प्रेरित कार्य के लिए और किए गए कार्य के लिए आकलित दंड से दंडनीय है | IPC Section- 112 in hindi| Abettor when liable to cumulative punishment for act abetted and for act done.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 112 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 112? साथ ही हम आपको IPC की धारा 112 सम्पूर्ण जानकारी एवम् परिभाषा इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 112 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 112 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा उन अपराधों को परिभाषित करती है, जैसा कि हम जान सकते है यदि वह कार्य जिसके लिए दुष्प्रेरक अंतिम पूर्वगामी धारा के अनुसार दायित्व के अधीन है दुष्प्रेरित कार्य के अतिरिक्त किया जाता है और वह कोई सुभिन्न अपराध गठित करता है, तो दुष्प्रेरक उन अपराधों में से हर एक के लिए दंडनीय नही है। यह धारा 112 ऐसे अपराधों को परिभाषित करती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 112 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 112 के अनुसार-

दुष्प्रेरक कब दुष्प्रेरित कार्य के लिए और किए गए कार्य के लिए आकलित दण्ड से दण्डनीय है-

यदि वह कार्य जिसके लिए दुष्प्रेरक अन्तिम पूर्वगामी धारा के अनुसार दायित्व के अधीन है दुष्प्रेरित कार्य के अतिरिक्त किया जाता है और वह कोई सुभिन्न अपराध गठित करता है तो दुष्प्रेरक उन अपराधों में से हर एक के लिये दण्डनीय नहीं है।
दृष्टान्त
ख को एक लोक सेवक द्वारा किए गए करस्थम् का बलपूर्वक प्रतिरोध करने के लिए क उकसाता है। ख परिणामस्वरूप उस करस्थम् का प्रतिरोध करता है। प्रतिरोध करने में ख करस्थम् का निष्पादन करने वाले आफिसर को स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है। ख ने करस्थम् का प्रतिरोध करने और स्वेच्छया घोर उपइति कारित करने के दो अपराध किए हैं। इसलिए ख दोनों अपराधों के लिए दण्डनीय है, और यदि क यह सम्भाव्य जानता था कि उस करस्थम् का प्रतिरोध करने में ख स्वेच्छया घोर उपहति कारित करेगा, तो कभी उनमें से हर एक अपराध के लिए दण्डनीय होगा।

Abettor when liable to cumulative punishment for act abetted and for act done-
If the act for which the abettor is liable under the last preceding section is committed in addition to the act abetted, and constitutes a distinct offence, the abettor is liable to punishment for each of the offences.
Illustration
A instigates B to resist by force a distress made by a public servant. B, in consequence resists that distress. In offering the resistance, B voluntarily causes grievous hurt to the officer executing the distress. As B has committed both the offence of resisting the distress. and the offence of voluntarily causing grievous hurt, B is liable to punishment for both these offences; and, if A knew that B was likely voluntarily to cause grievous hurt in resisting the distress, A will also be liable to punishment for each of the offences.

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 112 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।