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आईपीसी की धारा 111 | दुष्प्रेरक का दायित्व जब एक कार्य का दुष्प्रेरण किया गया है और उससे भिन्न कार्य किया गया है | IPC Section- 111 in hindi| Liability of abettor when one act abetted and different act done.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 111 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 111? साथ ही हम आपको IPC की धारा 111 सम्पूर्ण जानकारी एवम् परिभाषा इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 111 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 111 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा उन अपराधों को परिभाषित करती है, जैसा कि हम जान सकते है जब किसी एक कार्य का दुष्प्रेरण किया गया है और कोई भिन्न कार्य किया जाता है तो यह धारा 111 ऐसे अपराधों को परिभाषित करती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 111 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 111 के अनुसार-

दुष्प्रेरक का दायित्व जब एक कार्य का दुष्प्रेरण किया गया है और उससे भिन्न कार्य किया गया है-

जबकि किसी एक कार्य का दुष्प्रेरण किया जाता है और कोई भिन्न कार्य किया जाता है, तब दुष्प्रेरक उस किए गए कार्य के लिए उसी प्रकार से और उसी विस्तार तक दायित्व के अधीन है, मानो उसने सीधे उसी कार्य का दुष्प्रेरण किया हो :
परन्तुक – परन्तु यह तब जब कि किया गया कार्य दुष्प्रेरण का अधिसंभाव्य परिणाम था और उस उकसाहट के असर के अधीन या उस सहायता से या उस षड्यन्त्र के अनुसरण में किया गया था जिससे वह दुष्प्रेरण गठित होता है।
दृष्टान्त
(क) एक शिशु को य के भोजन में विष डालने के लिए क उकसाता है, और उस प्रयोजन से उसे विष परिदत्त करता है। वह शिशु उस उकसाहट के परिणामस्वरूप भूल से म के भोजन में, जो य के भोजन के पास रखा हुआ है, विष डाल देता है। यहाँ, यदि वह शिशु क के उकसाने के असर के अधीन उस कार्य को कर रहा था, और किया गया कार्य उन परिस्थितियों में उस दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम है, तो क उसी प्रकार और उसी विस्तार तक दायित्व के अधीन है, मानो उसने उस शिशु को म के भोजन में विष डालने के लिये उकसाया हो।
(ख) ख को य का गृह जलाने के लिए क उकसाता है। उस गृह को आग लगा देता है और उसी समय वहाँ सम्पत्ति की चोरी करता है। क यद्यपि गृह को जलाने के दुष्प्रेरण का दोषी है, किन्तु चोरी के दुष्प्रेरण का दोषी नहीं है; क्योंकि वह चोरी एक अलग कार्य थी और उस गृह के जलाने का अधिसम्भाव्य परिणाम नहीं थी।
(ग) ख और ग को बसे हुये गृह में अर्द्धरात्रि में लूट के प्रयोजन से भेदन करने के लिए क उकसाता है, और उनको उस प्रयोजन के लिए आयुध देता है। ख और ग वह गृह भेदन करते हैं, और य द्वारा, जो निवासियों में से एक है, प्रतिरोध किए जाने पर, य की हत्या कर देते हैं। यहाँ, यदि वह हत्या उस दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम थी, तो क हत्या के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय है।

Liability of abettor when one act abetted and different act done-
When an act is abetted, and a different act is done, the abettor is liable for the act done, in the same manner and to the same extent as if he had directly abetted it :
Proviso-Provided the act done was a probable consequence of the abetment, and was committed under the influence of the instigation, or with the aid or in pursuance of the conspiracy which constituted the abetment.
Illustrations
(a) A instigates a child to put poison into the food of Z, and gives him poison for that purpose. The child, in consequence of the instigation, by mistake put the poison into the food of Y, which is by the side of that of Z. Here, if the child was acting under the influence of A’s instigation, and the act done was under the circumstances a probable consequence of the abetment, A is liable in the same manner and to the same extent as if he had instigated the child to put the poison into the food of Y.
(b) A instigates B to burn Z’s house. B sets fire to the house and at the same time commits theft of property there. A, though guilty of abetting the burning of the house, is not guilty of abetting the theft; for the theft was a distinct act, and not a probable consequence of the burning.
(c) A instigates B and C to break into an inhabited house at midnight for the purpose of robbery, and provides them with arms for that purpose. B and C break into the house, and being resisted by Z, one of the inmates, murder Z. Here, if that murder was the probable consequence of the abetment, A is liable to the punishment provided for murder.

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 111 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 110 | दुष्प्रेरण का दंड, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति व्यक्ति के आशय से भिन्न आशय से कार्य करता है | IPC Section- 110 in hindi| Punishment of abetment if person abetted does act with a different intention from that of abettor.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 110 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 110? साथ ही हम आपको IPC की धारा 110 सम्पूर्ण जानकारी एवम् परिभाषा इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 110 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 110 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा उन अपराधों को परिभाषित करती है, जैसा कि हम जान सकते है अगर कोई दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न आशय से कोई कार्य करता है, तो वह उसी दंड से दंडित किया जाएगा, जो उस अपराध के लिए उपबंधित है, तो यह धारा 110 परिभाषित करती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 110 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 110 के अनुसार-

दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न आशय से कार्य करता है-

जो कोई किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति ने दुष्प्रेरक के आशय या ज्ञान से भिन्न आशय या ज्ञान से वह कार्य किया हो, तो वह उसी दण्ड से दण्डित किया जाएगा, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, जो किया जाता यदि वह कार्य दुष्प्रेरक के ही आशय या ज्ञान से, न कि किसी अन्य आशय या ज्ञान से किया जाता।

Punishment of abetment if person abetted does act with a different intention from that of abettor-
Whoever abets the commission of an offence shall, if the person abetted does the act with a different intention or knowledge from that of abettor, be punished with the punishment provided for the offence which would have been committed if the act had been done with the intention or knowledge of the abettor and with no other.

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आईपीसी की धारा 109 | दुष्प्रेरण का दंड, यदि दुष्प्रेरित कार्य उसके परिणामस्वरूप किया जाय, और जहां कि उसके दंड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबंध नही है | IPC Section- 109 in hindi| Punishment for abetment in if the act abetted is committed in consequence and where no express provision is made for its punishment.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 109 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 109 साथ ही हम आपको IPC की धारा 109 सम्पूर्ण जानकारी एवम् परिभाषा इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 109 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 109 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यह धारा उन अपराधों को परिभाषित करती है, जैसा कि हम जान सकते है अगर कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के साथ इस तरह से दुष्प्रेरित कार्य दुष्प्रेरण के परिणाम स्वरूप किया गया है, तो वह उसी दंड से दंडित किया जाएगा, जो उस अपराध के लिए उपबंधित नहीं है, तो यह धारा 109 परिभाषित करती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 109 इसी विषय के बारे में बतलाती है।.

आईपीसी की धारा 109 के अनुसार-

दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित कार्य उसके परिणामस्वरूप किया जाए, और जहां कि उसके दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं है-

जो कोई किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है, यदि दुष्प्रेरित कार्य दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाता है, और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए इस संहिता द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है, तो वह उस दण्ड से दण्डित किया जायेगा, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है।
स्पष्टीकरण- कोई कार्य या अपराध दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया तब कहा जाता है, जब वह
उस उकसाहट के परिणामस्वरूप या उस षड्यन्त्र के अनुसरण में या उस सहायता से किया जाता है, जिससे दुष्प्रेरण गठित होता है।
दृष्टांत
(क) ख को, जो एक लोक सेवक है, ख के पदीय कृत्यों के प्रयोग में क पर कुछ अनुग्रह दिखाने के लिए इनाम के रूप में के रिश्वत की प्रस्थापना करता है। ख वह रिश्वत प्रतिगृहीत कर लेता है। क ने धारा 161 में परिभाषित अपराध का दुष्प्रेरण किया है।
(ख) ख को मिथ्या साक्ष्य देने के लिए क उकसाता है। ख उस उकसाहट के परिणामस्वरूप, वह अपराध करता है। क उस अपराध के दुष्प्रेरण का दोषी है, और उसी दण्ड से दण्डनीय है, जिससे ख है।
(ग) य को विष देने का षड्यन्त्र क और ख रचते हैं। क उस षड्यन्त्र के अनुसरण में विष उपाप्त करता है और उसे ख को इसलिए परिदत्त करता है कि वह उसे य को दे ख उस षड्यन्त्र के अनुसरण में वह विष क की अनुपस्थिति में य को देता है और उसके द्वारा य की मृत्यु कारित कर देता है। यहां, ख हत्या का दोषों है। क षड्यन्त्र द्वारा उस अपराध के दुष्प्रेरण का दोषी है और वह हत्या के लिए दण्ड से दण्डनीय है।

Punishment of abetment if the act abetted is committed in consequence and where no express provision is made for its punishment-
Whoever abets any offence shall, if the act abetted is committed in consequence of the abetment, and no express provision is made by this Code for the punishment of such abetment, be punished with the punishment provided for the offence.
Explanation-An act or offence is said to be committed in consequence of abetment, when it is committed in consequence of the instigation, or in pursuance of the conspiracy, or with the aid which constitutes the abetment.
Illustrations
(a) A offers a bribe to B, a public servant, as a reward for showing A some favour in the exercise of B’s official functions. B accepts the bribe. A has abetted the offence defined in Section 161.
(b) A instigates B to give false evidence. B, in consequence of the instigation, commits that offence. A is guilty of abetting that offence, and is liable to the same punishment as B.
(c) A and B conspire to poison Z. A, in pursuance of the conspiracy, procures the poison and delivers it to B in order that he may administer it to Z. B, in pursuance of the conspiracy. administers the poison to Z, in A’s absence and thereby causes Zs death. Here B is guilty of murder. A is guilty of abetting that offence by conspiracy, and is liable to the punishment for murder.

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आईपीसी की धारा 108 | दुष्प्रेरक | IPC Section- 108 in hindi| Abettor.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 108 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 108 साथ ही हम आपको IPC की धारा 108 सम्पूर्ण जानकारी एवम् परिभाषा इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 108 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 108 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। वह व्यक्ति अपराध का दुष्प्रेरण करता है, जो अपराध के किए जाने के लिए दुष्प्रेरण करता है, अर्थात किसी व्यक्ति ने किसी व्यक्ति को अपराध करने के लिए बहकाना (Abettor) दुष्प्रेरक करना कहा जाता है। हमारे कानून में यदि किसी व्यक्ति ने किसी व्यक्ति को, कोई अपराध करने के आशय से भड़काता हैं तो यह धारा 108 दुष्प्रेरक को परिभाषित करती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 108 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 108 के अनुसार-

दुष्प्रेरक –

वह व्यक्ति अपराध का दुष्प्रेरण करता है, जो अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है या ऐसे कार्य के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है, जो अपराध होता, यदि यह कार्य अपराध करने के लिए विधि अनुसार समर्थ व्यक्ति द्वारा उसी आशय या ज्ञान से, जो दुष्प्रेरक का है, किया जाता।
स्पष्टीकरण 1-किसी कार्य के अवैध लोप का दुष्प्रेरण अपराध की कोटि में आ सकेगा, चाहे दुष्प्रेरक उस कार्य को करने के लिए स्वयं आबद्ध न हो।
स्पष्टीकरण 2- दुष्प्रेरण का अपराध गठित होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरित कार्य किया। जाए या अपराध गठित करने के लिए अपेक्षित प्रभाव कारित हो।
दृष्टांत
(क) ग की हत्या करने के लिए ख को क उकसाता है। ख वैसा करने से इन्कार कर देता है। क हत्या करने के लिए ख के दुष्प्रेरण का दोषी है।
(ख) घ की हत्या करने के लिए ख को क उकसाता है। ख ऐसी उकसाइट के अनुसरण में घ को विद्ध करता है। घ का घाव अच्छा हो जाता है। क हत्या करने के लिए ख को उकसाने का दोषी है।स्पष्टीकरण 3- यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरित व्यक्ति अपराध करने के लिए विधि अनुसार समर्थ हो, या उसका वही दूषित आशय या ज्ञान हो, जो दुष्प्रेरक का है, या कोई भी दूषित आशय या ज्ञान हो।

Abettor-
A person abets an offence, who abets either the commission of an offence, or the commission of an act which would be an offence, if committed by a person capable by law of committing an offence with the same intention or knowledge as that of the abettor.
Explanation 1- The abetment of the illegal omission of an act may amount to an offence although the abettor may not himself be bound to do that act.
Explanation 2- To constitute the offence of abetment it is not necessary that the act abetted should be committed, or that the effect requisite to constitute the offence should be caused.
Illustrations
(a) A instigates B to murder C. B refuses to do so. A is guilty of abetting B to commit murder.(b) A instigates B to murder D. B in pursuance of the instigation stabs D. D recovers from the wound. A is guilty of instigating B to commit murder.
Explanation 3- It is not necessary that the person abetted should be capable by law of committing an offence, or that he should have the same guilty intention or knowledge as that of the abettor, or any guilty intention or knowledge.

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 108 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 130 | ऐसे कैदी के निकल भागने में सहायता देना, उसे छुड़ाना या संश्रय देना | IPC Section- 130 in hindi | Aiding escape of, rescuing or harbouring such prisoner.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 130 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 130? साथ ही हम आपको IPC की धारा 130 सम्पूर्ण जानकारी एवम् क्या सजा मिलेगी और कैसे क्या जमानत मिलेगी। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 130 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 130 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई किसी ऐसे राजकैदी या युद्ध कैदी को विधिपूर्ण अभिरक्षा में मदद् या सहायता देगा, या किसी कैदी को छुड़ाएगा या छुड़ाने का प्रयत्न करेगा अथवा संश्रय देगा या छिपाएगा तो भारतीय दंड संहिता की धारा 130 अप्लाई होगी। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 130 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 130 के अनुसार-

ऐसे कैदी के निकल भागने में सहायता देना, उसे छुड़ाना या संश्रय देना-

जो कोई जानते हुए, किसी राजकैदी या युद्धकैदी को विधिपूर्ण अभिरक्षा से निकल भागने में मदद या सहायता देगा, या किसी ऐसे कैदी को छुड़ाएगा, या छुड़ाने का प्रयत्न करेगा, या किसी ऐसे कैदी को, जो विधिपूर्ण अभिरक्षा से निकल भागा है, संश्रय देगा या छिपाएगा या ऐसे कैदी के फिर से पकड़े जाने का प्रतिरोध करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी, दण्डनीय होगा।
स्पष्टीकरण–कोई राजकैदी या युद्धकैदी जिसे अपने पैरोल पर भारत में कतिपय सीमाओं के भीतर यथेच्छ विचरण की अनुज्ञा है, विधिपूर्ण अभिरक्षा से निकल भागा है, यह तब कहा जाता है, जब वह उन सीमाओं से परे चला जाता है, जिनके भीतर उसे यथेच्छ विचरण की अनुज्ञा है।

Aiding escape of, rescuing or harbouring such prisoner-
Whoever, knowingly aids or assists any State prisoner or prisoner of war in escaping from lawful custody, or rescues or attempts to rescue any such prisoner or harbours or conceals any such prisoner who has escaped from lawful custody, or offers or attempts to offer any resistance to the recapture of such prisoner, shall be punished with imprisonment for life, or with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.
Explanation-A State prisoner or prisoner of war, who is permitted to be at large on his parole within certain limits in India, is said to escape from lawful custody if he goes beyond the limits within which he is allowed to be at large.

लागू अपराध

ऐसे कैदी के निकल भागने में सहायता देना, उसे छुड़ाना या संश्रय देना या ऐसे कैदी के फिर से पकड़े जाने का प्रतिरोध करना।
सजा- आजीवन कारावास, या दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
यह एक गैर-जमानतीय, संज्ञेय अपराध है और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नही है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 130 के अंतर्गत जो कोई  राज्यकैदी या युद्ध कैदी को अभिरक्षा निकल भागने या भागने में मदद् या सहायता देगा, या किसी कैदी को छुड़ाएगा या छुड़ाने का प्रयत्न करेगा अथवा संश्रय देगा या छिपाएगा वह आजीवन कारावास, या दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी, दण्डनीय होगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

जो कोई व्यक्ति राज्यकैदी या युद्ध कैदी को अभिरक्षा निकल भागने या भागने में मदद् या सहायता देगा, या किसी कैदी को छुड़ाएगा या छुड़ाने का प्रयत्न करेगा अथवा संश्रय देगा या छिपाएगा तो वह व्यक्ति राज्यद्रोह के अपराध का भी भागीदार होगा। ऐसे अपराध कारित करने वाले व्यक्ति राज्यद्रोह का अपराधी द्वारा किए गए अपराध के अनुसार ही मामले में पुलिस द्वारा FIR दर्ज करती है यह अपराध गैर-जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
ऐसे कैदी के निकल भागने में सहायता देना, उसे छुड़ाना या संश्रय देना या ऐसे कैदी के फिर से पकड़े जाने का प्रतिरोध करना।आजीवन कारावास, या दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।संज्ञेयगैर-जमानतीयसेशन न्यायालय द्वारा

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आईपीसी की धारा 129 | उपेक्षा से लोक सेवक का ऐसे कैदी का निकल भागना सहन करना | IPC Section- 129 in hindi| Public servant negligently suffering such prisoner to escape.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 129 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 129? साथ ही हम आपको IPC की धारा 129 सम्पूर्ण जानकारी एवम् क्या सजा मिलेगी और कैसे क्या जमानत मिलेगी। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 129 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 129 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई लोक सेवक होते हुए, किसी राजकैदी या युद्ध कैदी की अभिरक्षा में रखते हुए, लापरवाही (Negligently) से निकल भागता है तो भारतीय दंड संहिता की धारा 129 अप्लाई होगी। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 129 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 129 के अनुसार-

उपेक्षा से लोक सेवक का ऐसे कैदी का निकल भागना सहन करना-

जो कोई लोक सेवक हुए और किसी राजकैदी या युद्धकैदी को अभिरक्षा में रखते हुए उपेक्षा में ऐसे कैदी का किसी ऐसे होते परिरोध स्थान से, जिसमें ऐसा कैदी परिरुद्ध है, निकल भागना सहन करेगा, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी, दण्डनीय होगा।

Public servant negligently suffering such prisoner to escape-
Whoever, being a public servant and having the custody of any State prisoner or prisoner of war, negligently suffers such prisoner to escape from any place of confinement in which such prisoner is confined, shall be punished with simple imprisonment for a term which may extend to three years, and shall also be liable to fine.

लागू अपराध

उपेक्षा से लोक सेवक का ऐसे कैदी का निकल भागना सहन करना।
सजा- तीन वर्ष के लिए सादा कारावास और जुर्माना।
यह एक जमानतीय, संज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नही है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 129 के अंतर्गत जो कोई लोक सेवक होते हुए, स्वेच्छया से राज्यकैदी या युद्ध कैदी को अभिरक्षा से लापरवाही के कारण निकल भागता है। वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी, दण्डनीय होगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

जो कोई व्यक्ति लोक सेवक होते हुए भी राज्यकैदी या युद्ध कैदी को अभिरक्षा से लापरवाही के कारण, निकल भागना सहन करता है तो वह व्यक्ति राज्यद्रोह के अपराध का भागीदार होगा।  ऐसे अपराध कारित करने वाले व्यक्ति राज्यद्रोह व लोक सेवक से भी निष्कासित कर दिया जाता है साथ ही अपराधी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध के अनुसार ही मामले में पुलिस द्वारा FIR दर्ज करती है यह अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
उपेक्षा से लोक सेवक का ऐसे कैदी का निकल भागना सहन करना।तीन वर्ष के लिए सादा कारावास और जुर्माना।संज्ञेयजमानतीयप्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा

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