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भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 138 | Indian Contract Act Section 138

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-138) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 138 के अनुसार जहां कि सह-प्रतिभू हो वहां लेनदार द्वारा उनमें से एक की निर्मुक्ति अन्यों को उन्मोचित नहीं करती और न यह ऐसे निर्मुक्त प्रतिभू को अन्य प्रतिभूओं के प्रति अपने उत्तरदायित्व से मुक्त करती है, जिसे IC Act Section-138 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 138 (Indian Contract Act Section-138) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 138 IC Act Section-138 के अनुसार जहां कि सह-प्रतिभू हो वहां लेनदार द्वारा उनमें से एक की निर्मुक्ति अन्यों को उन्मोचित नहीं करती और न यह ऐसे निर्मुक्त प्रतिभू को अन्य प्रतिभूओं के प्रति अपने उत्तरदायित्व से मुक्त करती है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 138 (IC Act Section-138 in Hindi)

एक सह-प्रतिभू की निर्मुक्ति अन्यों को उन्मोचित नहीं करती-

जहां कि सह-प्रतिभू हो वहां लेनदार द्वारा उनमें से एक की निर्मुक्ति अन्यों को उन्मोचित नहीं करती और न यह ऐसे निर्मुक्त प्रतिभू को अन्य प्रतिभूओं के प्रति अपने उत्तरदायित्व से मुक्त करती है।

Indian Contract Act Section-138 (IC Act Section-138 in English)

Release of one co-surety does not discharge others-

Where there are co-sureties, a release by the creditor of one of them does not discharge the others; neither does it free the surety so released from his responsibility to the other sureties.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 138 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 137 | Indian Contract Act Section 137

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-137) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 137 के अनुसार मूलऋणी पर वाद लाने से या उसके विरुद्ध किसी अन्य उपचार को प्रवर्तित करने से लेनदार का प्रविरत रहना मात्र, प्रत्याभूति में तत्प्रतिकूल उपबन्ध के अभाव में, प्रतिभू को उन्मोचित नहीं करता, जिसे IC Act Section-137 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 137 (Indian Contract Act Section-137) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 137 IC Act Section-137 के अनुसार मूलऋणी पर वाद लाने से या उसके विरुद्ध किसी अन्य उपचार को प्रवर्तित करने से लेनदार का प्रविरत रहना मात्र, प्रत्याभूति में तत्प्रतिकूल उपबन्ध के अभाव में, प्रतिभू को उन्मोचित नहीं करता।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 137 (IC Act Section-137 in Hindi)

लेनदार का वाद लाने से प्रविरत रहना प्रतिभू को उन्मोचित नहीं करता-

मूलऋणी पर वाद लाने से या उसके विरुद्ध किसी अन्य उपचार को प्रवर्तित करने से लेनदार का प्रविरत रहना मात्र, प्रत्याभूति में तत्प्रतिकूल उपबन्ध के अभाव में, प्रतिभू को उन्मोचित नहीं करता।
दृष्टांत ख एक ऋण का, जिसकी प्रत्याभूति क ने दी है, ग को देनदार है । ऋण देय हो जाता है । ऋण के देय हो जाने के पश्चात् एक वर्ष तक ख पर ग वाद नहीं लाता । क अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित नहीं होता।

Indian Contract Act Section-137 (IC Act Section-137 in English)

Creditor’s forbearance to sue does not discharge surety-

Mere forbearance on the part of the creditor to sue the principal debtor or to enforce any other remedy against him does not, in the absence of any provision in the guarantee to the contrary, discharge the surety.
Illustration
B owes to C a debt guaranteed by A. The debt becomes payable. C does not sue B for a year after the debt has become payable. A is not discharged from his suretyship.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 137 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 136 | Indian Contract Act Section 136

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-136) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 136 के अनुसार जहाँ कि मूलऋणी को समय देने की संविदा लेनदार किसी पर-व्यक्ति से, न कि मूलऋणी से की जाती है वहां प्रतिभू उन्मोचित नहीं होता, जिसे IC Act Section-136 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 136 (Indian Contract Act Section-136) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 136 IC Act Section-136 के अनुसार जहाँ कि मूलऋणी को समय देने की संविदा लेनदार किसी पर-व्यक्ति से, न कि मूलऋणी से की जाती है वहां प्रतिभू उन्मोचित नहीं होता।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 136 (IC Act Section-136 in Hindi)

जब कि मूलऋणी को समय देने का करार पर-व्यक्ति से किया जाता है तब प्रतिभू उन्मोचित नहीं होता–

जहाँ कि मूलऋणी को समय देने की संविदा लेनदार किसी पर-व्यक्ति से, न कि मूलऋणी से की जाती है वहां प्रतिभू उन्मोचित नहीं होता।
दृष्टांत
ग एक ऐसे अतिशोध्य विनिमय-पत्र का धारक है, जिसे क ने ख के प्रतिभू के रूप में लिखा और ख ने प्रतिगृहीत किया है। ख को समय देने की संविदाङ से ग करता है। क उन्मोचित नहीं होता।

Indian Contract Act Section-136 (IC Act Section-136 in English)

Surety not discharged when agreement made with third person to give time to principal debtor-

Where a contract to give time to the principal debtor is made by the creditor with a third person, and not with the principal debtor, the surety is not discharged.
Illustration
C, the holder of an overdue bill of exchange drawn by A as surety for B, and accepted by B, contracts with M to give time to B. A is not discharged.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 136 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 135 | Indian Contract Act Section 135

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-135) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 135 के अनुसार लेनदार और मूलऋणी के बीच किसी ऐसी संविदा से, जिसके द्वारा मूलऋणी निर्मुक्त हो जाए या लेनदार के किसी ऐसे कार्य या लोप से, जिसका विधिक परिणाम मूलऋणी का उन्मोचन हो, प्रतिभू उन्मोचित हो जाता है, जिसे IC Act Section-135 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 135 (Indian Contract Act Section-135) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 135 IC Act Section-135 के अनुसार लेनदार और मूलऋणी के बीच किसी ऐसी संविदा से, जिसके द्वारा मूलऋणी निर्मुक्त हो जाए या लेनदार के किसी ऐसे कार्य या लोप से, जिसका विधिक परिणाम मूलऋणी का उन्मोचन हो, प्रतिभू उन्मोचित हो जाता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 135 (IC Act Section-135 in Hindi)

प्रतिभू का उन्मोचन जब कि लेनदार मूलऋणी के साथ प्रशमन करता है, उसे समय देता है या उस पर वाद न लाने का करार करता है-

लेनदार और मूलऋणी के बीच ऐसी संविदा जिससे लेनदार मूलऋणी के साथ समझौता कर लेता है या उसे समय देने या उस पर वाद न लाने का वचन देता है, प्रतिभू को तब के सिवाय उन्मोचित कर देती है जब कि प्रतिभू ऐसी संविदा के लिए अनुमति दे देता है।

Indian Contract Act Section-135 (IC Act Section-135 in English)

Discharge of surety when creditor compounds with, gives time to, or agrees not to sue, principal debtor-

A contract between the creditor and the principal debtor, by which the creditor makes a composition with, or promises to give time to, or not to sue, the principal debtor, discharges the surety, unless the surety assents to such contract.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 135 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 134 | Indian Contract Act Section 134

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-134) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 134 के अनुसार लेनदार और मूलऋणी के बीच किसी ऐसी संविदा से, जिसके द्वारा मूलऋणी निर्मुक्त हो जाए या लेनदार के किसी ऐसे कार्य या लोप से, जिसका विधिक परिणाम मूलऋणी का उन्मोचन हो, प्रतिभू उन्मोचित हो जाता है, जिसे IC Act Section-134 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 134 (Indian Contract Act Section-134) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 134 IC Act Section-134 के अनुसार लेनदार और मूलऋणी के बीच किसी ऐसी संविदा से, जिसके द्वारा मूलऋणी निर्मुक्त हो जाए या लेनदार के किसी ऐसे कार्य या लोप से, जिसका विधिक परिणाम मूलऋणी का उन्मोचन हो, प्रतिभू उन्मोचित हो जाता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 134 (IC Act Section-134 in Hindi)

मूलऋणी की निर्मुक्ति या उन्मोचन से प्रतिभू का उन्मोचन-

लेनदार और मूलऋणी के बीच किसी ऐसी संविदा से, जिसके द्वारा मूलऋणी निर्मुक्त हो जाए या लेनदार के किसी ऐसे कार्य या लोप से, जिसका विधिक परिणाम मूलऋणी का उन्मोचन हो, प्रतिभू उन्मोचित हो जाता है।
दृष्टांत
(क) ग द्वारा ख को प्रदाय किए जाने वाले माल के लिए ग को क प्रत्याभूति देता है। ख को ग माल प्रदाय करता है और तत्पश्चात् ख संकट में पड़ जाता है और अपने लेनदारों से (जिनके अंतर्गत ग भी है। उनकी मांगों से अपने को निर्मुक्त किए जाने के प्रतिफलस्वरूप, उनको अपनी सम्पत्ति समनुदेशित करने की संविदा करता है। यहां ग के साथ की गई इस संविदा द्वारा ख अपने ऋण से निर्मुक्त हो जाता है और क अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित हो जाता है।
(ख) क अपनी भूमि पर नील की फसल उगाने और उसे नियत दर पर ख को परिदत्त करने की संविदा ख से करता है और ग इस संविदा के क द्वारा पालन किए जाने की प्रत्याभूति देता है । ख एक जलधारा को, जो क की भूमि की सिंचाई के लिए आवश्यक है, मोड़ देता है और तद्द्वारा उसे नील उगाने से निवारित कर देता है । ग अब अपनी प्रत्याभूति पर दायी नहीं रहा।
(ग) ख के लिए एक गुह अनुबद्ध समय के भीतर और नियत कीमत पर बनाने की संविदा ख से क करता है, जिसके लिए आवश्यक काष्ठ ख द्वारा दिया जाएगा। ग इस संविदा के क द्वारा पालन किए जाने की प्रत्याभूति देता है। ख काष्ठ देने का लोप करता है । ग अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित हो जाता है।

Indian Contract Act Section-134 (IC Act Section-134 in English)

Discharge of surety by release or discharge of principal debtor-

The surety is discharged by any contract between the creditor and the principal debtor, by which the principal debtor is released, or by any act or omission of the creditor, the legal consequence of which is the discharge of the principal debtor.
Illustrations
(a) A gives a guarantee to C for goods to be supplied by C to B. C supplies goods to B, and afterwards B becomes embarrassed and contracts with his creditors (including C) to assign to them his property in consideration of their releasing him from their demands. Here B is released from his debt by the contract with C, and A is discharged from his suretyship.
(b) A contracts with B to grow a crop of indigo on A‟s land and to deliver it to B at a fixed rate, and C guarantees A‟s performance of this contract. B diverts a stream of water which is necessary for the irrigation of A‟s land and thereby prevents him from raising the indigo. C is no longer liable on his guarantee.
(c) A contracts with B for a fixed price to build a house for B within a stipulated time, B supplying the necessary timber. C guarantees A‟s performance of the contract. B omits to supply the timber. C is discharged from his suretyship.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 134 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 133 | Indian Contract Act Section 133

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-133) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 133 के अनुसार जो भी फेरकार मूल [ऋणी] और लेनदार के बीच की संविदा के निबंधनों में प्रतिभ् की सम्मति के बिना किया जाए वह उस फेरफार के पश्चात्वर्ती संव्यवहारों के बारे में प्रतिभूति का उन्मोचन कर देता है, जिसे IC Act Section-133 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 133 (Indian Contract Act Section-133) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 133 IC Act Section-133 के अनुसार जो भी फेरकार मूल [ऋणी] और लेनदार के बीच की संविदा के निबंधनों में प्रतिभ् की सम्मति के बिना किया जाए वह उस फेरफार के पश्चात्वर्ती संव्यवहारों के बारे में प्रतिभूति का उन्मोचन कर देता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 133 (IC Act Section-133 in Hindi)

संविदा के निबंधनों में फेरफार से प्रतिभू का उन्मोचन-

जो भी फेरकार मूल [ऋणी] और लेनदार के बीच की संविदा के निबंधनों में प्रतिभ् की सम्मति के बिना किया जाए वह उस फेरफार के पश्चात्वर्ती संव्यवहारों के बारे में प्रतिभूति का उन्मोचन कर देता है।
दृष्टांत
(क) ग के बैंक में प्रबंधक के तौर पर ख के आचरण के लिए ग के प्रति क प्रतिभू होता है। तत्पश्चात क की सम्मति के बिना ख और ग संविदा करते हैं कि ख का संबलम् बढ़ा दिया जाएगा और औवर-ड्राफ्टों से हई हानि की एक चौथाई का ख दायी है। ख एक ग्राहक को ओवरड्राफ्ट करने देता है और बैंक को कुछ धन की हानि होती है । क उसकी सम्मति के बिना किए गए फेरफार के कारण, अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित हो जाता है, और इस हानि को पूरा करने का दायी नहीं है।
(ख) क एक ऐसे पद पर ख के रहते हुए उसके अवचार के विरुद्ध ग को प्रत्याभूति देता है जिस पद पर ग द्वारा ख नियुक्त किया जाता है और जिसके कर्तव्य विधान-मंडल के एक अधिनियम द्वारा परिभाषित हैं। एक पश्चात्वर्ती अधिनियम द्वारा उस पद की प्रकृति तात्त्विक रूप से बदल दी जाती है। तत्पश्चात् ख अवचार करता है। इस तब्दीली के कारण क अपनी प्रत्याभूति के अधीन भावी दायित्व से उन्मोचित हो जाता है, यद्यपि ख का वह अवचार ऐसे कर्तव्य के संबंध में है जिस पर पश्चात्वर्ती अधिनियम का प्रभाव नहीं पड़ता।
(ग) ग अपना माल बेचने के लिए वार्षिक संबलम् पर ख को अपना लिपिक नियुक्त करने का करार इस बात पर करता है कि ऐसे लिपिक के नाते ख द्वारा प्राप्त धन का उसके द्वारा सम्यक् हिसाब किए जाने के लिए ग के प्रति क प्रतिभू हो जाए। तत्पश्चात् क के ज्ञान या सम्मति के बिना ग और ख करार करते हैं कि ख को पारिश्रमिक उसके द्वारा बेचे गए माल पर कमीशन के रूप में न कि नियत संबलम् के रूप में, दिया जाएगा। ख के पश्चात्वर्ती अवचार के लिए क दायी नहीं है।
(घ) ग द्वारा ख को उधार प्रदाय किए जाने वाले तेल के लिए क 3,000 रुपए तक की चलत प्रत्याभूति ग को देता है। तत्पश्चात् ख संकट में पड़ जाता है और क के ज्ञान के बिना ख और ग संविदा करते हैं कि ख को ग नकद धन पर तेल प्रदाय करता रहेगा और वे संदाय जो किए जाएं, ख और ग के उस समय वर्तमान ऋणों के लिए उपयोजित किए जाएंगे। क इस नए ठहराव के पश्चात् दिए गए किसी भी माल के लिए अपनी प्रत्याभूति के अधीन संदाय का दायी नहीं है।
(ङ) ख को पहली मार्च को 5,000 रुपए उधार देने की संविदा ग करता है। क उस ऋण से प्रतिसंदाय की प्रत्याभूति करता है। ग 5,000 रुपए ख को पहली जनवरी को दे देता है। क अपने दायित्व से उन्मोचित हो जाता है, क्योंकि संविदा में यह फेरफार हो गया है कि ग रुपयों के लिए ख पर पहली मार्च से पूर्व वाद ला सकता है।

Indian Contract Act Section-133 (IC Act Section-133 in English)

Discharge of surety by variance in terms of contract-

Any variance, made without the surety‟s consent, in the terms of the contract between the principal 1[debtor] and the creditor, discharges the surety as to transactions subsequent to the variance.
Illustrations
(a) A becomes surety to C for B‟s conduct as a manager in C‟s bank. Afterwards, B and C contract, without A‟s consent, that B‟s salary shall be raised, and that he shall become liable for one-fourth of the losses on overdrafts. B allows a customer to overdraw, and the bank loses a sum of money. A is discharged from his suretyship by the variance made without his consent, and is not liable to make good this loss.
(b) A guarantees C against the misconduct of B in an office to which B is appointed by C, and of which the duties are defined by an Act of the Legislature. By a subsequent Act, the nature of the office is materially altered. Afterwards, B misconducts himself. A is discharged by the change from future liability under his guarantee, though the misconduct of B is in respect of a duty not affected by the later Act.
(c) C agrees to appoint B as his clerk to sell goods at a yearly salary, upon A‟s becoming surety to C for B‟s duly accounting for moneys received by him as such clerk. Afterwards, without A‟s knowledge or consent, C and B agree that B should be paid by a commission on the goods sold by him and not by a fixed salary. A is not liable for subsequent misconduct of B.
(d) A gives to C a continuing guarantee to the extent of 3,000 rupees for any oil supplied by C to B on credit. Afterwards B becomes embarrassed, and, without the knowledge of A, B and C contract that C shall continue to supply B with oil for ready money, and that the payments shall be applied to the then, existing debts between B and C. A is not liable on his guarantee for any goods supplied after: this new arrangement.
(e) C contracts to lend B 5,000 rupees on the 1st March. A guarantees repayment. C pays the 5,000 rupees to B on the 1st January. A is discharged from his liability, as the contract has been varied, inasmuch as C might sue B for the money before the 1st of March.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 133 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।