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भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 6 | Indian Contract Act Section 6

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-6) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 6 के अनुसार प्रस्थापक द्वारा दूसरे पक्षकार को प्रतिसंहरण की सूचना के संसूचित किए जाने से ऐसी प्रस्थापना में उसके प्रतिग्रहण के लिए विहित समय के बीत जाने से या यदि कोई समय इस प्रकार विहित न हो तो प्रतिग्रहण की संसूचना के बिना युक्तियुक्त समय बीत जाने से प्रस्थापना का प्रतिसंहरण हो जाता है, जिसे IC Act Section-6 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 6 (Indian Contract Act Section-6) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 6 IC Act Section-6 के अनुसार प्रस्थापक द्वारा दूसरे पक्षकार को प्रतिसंहरण की सूचना के संसूचित किए जाने से ऐसी प्रस्थापना में उसके प्रतिग्रहण के लिए विहित समय के बीत जाने से या यदि कोई समय इस प्रकार विहित न हो तो प्रतिग्रहण की संसूचना के बिना युक्तियुक्त समय बीत जाने से प्रस्थापना का प्रतिसंहरण हो जाता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 6 (IC Act Section-6 in Hindi)

प्रतिसंहरण कैसे किया जाता है-

प्रस्थापना का प्रतिसंहरण हो जाता है
(1) प्रस्थापक द्वारा दूसरे पक्षकार को प्रतिसंहरण की सूचना के संसूचित किए जाने से;
(2) ऐसी प्रस्थापना में उसके प्रतिग्रहण के लिए विहित समय के बीत जाने से या यदि कोई समय इस प्रकार विहित न हो तो प्रतिग्रहण की संसूचना के बिना युक्तियुक्त समय बीत जाने से;
(3) प्रतिग्रहण किसी पुरोभाव्य शर्त को पूरा करने में प्रतिगृहीता की असफलता से; अथवा
(4) प्रस्थापक की मृत्यु या उन्मत्तता से, यदि उसकी मृत्यु या उन्मत्तता का तथ्य प्रतिगृहीता के ज्ञान में प्रतिग्रहण से पूर्व आ जाए।

Indian Contract Act Section-6 (IC Act Section-6 in English)

Revocation how made-

A proposal is revoked—
(1) by the communication of notice of revocation by the proposer to the other party;
(2) by the lapse of the time prescribed in such proposal for its acceptance, or, if no time is so prescribed, by the lapse of a reasonable time, without communication of the acceptance;
(3) by the failure of the acceptor to fulfil a condition precedent to acceptance; or
(4) by the death or insanity of the proposer, if the fact of his death or insanity comes to the knowledge of the acceptor before acceptance.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 6 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 5 | Indian Contract Act Section 5

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-5) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 5 के अनुसार प्रस्थापना की संसूचना तब संपूर्ण हो जाती है जब प्रस्थापना उस व्यक्ति के ज्ञान में आ जाती है जिसे वह की गई है। प्रतिग्रहण की संसूचना प्रस्थापक के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब वह उसके प्रति इस प्रकार पारेषण के अनुक्रम में कर दी जाती है कि वह प्रतिगृहीता की शक्ति के बाहर हो जाए, जिसे IC Act Section-5 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 5 (Indian Contract Act Section-5) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 5 IC Act Section-5 के प्रस्थापना की संसूचना तब संपूर्ण हो जाती है जब प्रस्थापना उस व्यक्ति के ज्ञान में आ जाती है जिसे वह की गई है। प्रतिग्रहण की संसूचना प्रस्थापक के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब वह उसके प्रति इस प्रकार पारेषण के अनुक्रम में कर दी जाती है कि वह प्रतिगृहीता की शक्ति के बाहर हो जाए।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 5 (IC Act Section-5 in Hindi)

प्रस्थापनाओं और प्रतिग्रहणों का प्रतिसंहरण-

कोई भी प्रस्थापना उसके प्रतिग्रहण की संसूचना प्रस्थापक के विरुद्ध संपूर्ण हो जाने से पूर्व किसी भी समय प्रतिसंहृत की जा सकेगी, किन्तु उसके पश्चात् नहीं।
कोई भी प्रतिग्रहण उस प्रतिग्रहण की संसूचना, प्रतिगृहीता के विरुद्ध संपूर्ण हो जाने से पूर्व किसी भी समय प्रतिसंहृत किया जा सकेगा, किन्तु उसके पश्चात् नहीं।
दृष्टांत
क अपना गृह ख को बेचने की प्रस्थापना डाक से भेजे गए एक पत्र द्वारा करता है।
ख प्रस्थापना को डाक से भेजे गए पत्र द्वारा प्रतिगृहीत करता है।
क अपनी प्रस्थापना को ख द्वारा अपने प्रतिग्रहण का पत्र डाक में डाले जाने से पूर्व किसी भी समय या डाले जाने के क्षण प्रतिसंहृत कर सकेगा, किन्तु उसके पश्चात् नहीं।
ख अपने प्रतिग्रहण को, उसे संसूचित करने वाला पत्र क को पहुंचने के पूर्व किसी भी समय या पहुंचने के क्षण प्रतिसंहृत कर सकेगा, किन्तु उसके पश्चात् नहीं।

Indian Contract Act Section-5 (IC Act Section-5 in English)

Revocation of proposals and acceptances-

A proposal may be revoked at any time before the communication of its acceptance is complete as against the proposer, but not afterwards.
An acceptance may be revoked at any time before the communication of the acceptance is complete as against the acceptor, but not afterwards.
Illustrations
A proposes, by a letter sent by post, to sell his house to B.
B accepts the proposal by a letter sent by post.
A may revoke his proposal at any time before or at the moment when B posts his letter of acceptance, but not afterwards.
B may revoke his acceptance at any time before or at the moment when the letter communicating it reaches A, but not afterwards.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 5 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 4 | Indian Contract Act Section 4

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-4) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 4 के अनुसार प्रस्थापना की संसूचना तब संपूर्ण हो जाती है जब प्रस्थापना उस व्यक्ति के ज्ञान में आ जाती है जिसे वह की गई है। प्रतिग्रहण की संसूचना प्रस्थापक के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब वह उसके प्रति इस प्रकार पारेषण के अनुक्रम में कर दी जाती है कि वह प्रतिगृहीता की शक्ति के बाहर हो जाए, जिसे IC Act Section-4 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 4 (Indian Contract Act Section-4) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 4 IC Act Section-4 के प्रस्थापना की संसूचना तब संपूर्ण हो जाती है जब प्रस्थापना उस व्यक्ति के ज्ञान में आ जाती है जिसे वह की गई है। प्रतिग्रहण की संसूचना प्रस्थापक के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब वह उसके प्रति इस प्रकार पारेषण के अनुक्रम में कर दी जाती है कि वह प्रतिगृहीता की शक्ति के बाहर हो जाए।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 4 (IC Act Section-4 in Hindi)

संसूचना कब संपूर्ण हो जाती है-

प्रस्थापना की संसूचना तब संपूर्ण हो जाती है जब प्रस्थापना उस व्यक्ति के ज्ञान में आ जाती है जिसे वह की गई है। प्रतिग्रहण की संसूचना प्रस्थापक के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब वह उसके प्रति इस प्रकार पारेषण के अनुक्रम में कर दी जाती है कि वह प्रतिगृहीता की शक्ति के बाहर हो जाए;
प्रतिगृहीता के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब वह प्रस्थापक के ज्ञान में आती है। प्रतिसंहरण की संसूचना
उसे करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है, जब वह उस व्यक्ति के प्रति, जिससे प्रतिसंहरण किया गया हो, इस प्रकार पारेषण के अनुक्रम में कर दी जाती है कि वह उस व्यक्ति की शक्ति के बाहर हो जाए, जो उसे करता है। उस व्यक्ति के विरुद्ध, जिससे प्रतिसंहरण किया गया है, तब संपूर्ण हो जाती है, जब वह उसके ज्ञान में आती है।
दृष्टांत
(क) अमुक कीमत पर ख को गृह बेचने की पत्र द्वारा प्रस्थापना करता है।
प्रस्थापना की संसूचना तब संपूर्ण हो जाती है जब ख को पत्र प्राप्त होता है।
(ख) क की प्रस्थापना का ख डाक से भेजे गए पत्र को प्रतिग्रहण करता है।
प्रस्थापना की संसूचना तब संपूर्ण हो जाती है जब ख से पत्र प्राप्त होता है। प्रतिग्रहण की संसूचना
क के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब पत्र डाक में डाल दिया जाता है;
ख के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब क को पत्र प्राप्त होता है। (ग) क अपनी प्रस्थापना का प्रतिसंहरण तार द्वारा करता है।
क के विरुद्ध प्रतिसंहरण तब संपूर्ण हो जाता है जब तार प्रेषित किया जाता है । ख के विरुद्ध प्रतिसंहरण तब संपूर्ण हो जाता है जब ख को तार प्राप्त होता है।
ख अपने प्रतिग्रहण का प्रतिसंहरण तार द्वारा करता है । ख का प्रतिसंहरण ख के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाता है जब तार प्रेषित किया जाता है और क के विरुद्ध तब, जब तार उसके पास पहुंचता है।

Indian Contract Act Section-4 (IC Act Section-4 in English)

Communication when complete-

The communication of a proposal is complete when it comes to the knowledge of the person to whom it is made.
The communication of an acceptance is complete,—
as against the proposer, when it is put in a course of transmission to him, so as to be out of the power of the acceptor;
as against the acceptor, when it comes to the knowledge of the proposer.
The communication of a revocation is complete,—
as against the person who makes it, when it is put into a course of transmission to the person to whom it is made, so as to be out of the power of the person who makes it;
as against the person to whom it is made, when it comes to his knowledge.
Illustrations
(a) A proposes, by letter, to sell a house to B at a certain price.
The communication of the proposal is complete when B receives the letter.
(b) B accepts A‟s proposal by a letter sent by post.
The communication of the acceptance is complete,
as against A when the letter is post;
as against B, when the letter is received by A.
(c) A revokes his proposal by telegram.
The revocation is complete as against A when the telegram is despatched. It is complete as against B when B receives it.
B revokes his acceptance by telegram. B‟s revocation is complete as against B when the telegram is despatched, and as against A when it reaches him.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 4 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 3 | Indian Contract Act Section 3

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-3) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 3 के अनुसार प्रस्थापनाओं का प्रतिग्रहण और प्रस्थापनाओं तथा प्रतिग्रहणों का प्रतिसंहरण क्रमश: प्रस्थापना करने वाले, प्रतिग्रहण करने वाले या प्रतिसंहरण करने वाले पक्षकार के किसी ऐसे कार्य या लोप से हुआ समझा जाता है, जिसके द्वारा वह ऐसी प्रस्थापना, प्रतिग्रहण या प्रतिसंहरण को संसूचित करने का आशय रखता हो, या जो उसे संसूचित करने का प्रयास रखता हो, जिसे IC Act Section-3 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 3 (Indian Contract Act Section-3) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 3 IC Act Section-3 के तहत प्रस्थापनाओं का प्रतिग्रहण और प्रस्थापनाओं तथा प्रतिग्रहणों का प्रतिसंहरण क्रमश: प्रस्थापना करने वाले, प्रतिग्रहण करने वाले या प्रतिसंहरण करने वाले पक्षकार के किसी ऐसे कार्य या लोप से हुआ समझा जाता है, जिसके द्वारा वह ऐसी प्रस्थापना, प्रतिग्रहण या प्रतिसंहरण को संसूचित करने का आशय रखता हो, या जो उसे संसूचित करने का प्रयास रखता हो।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 3 (IC Act Section-3 in Hindi)

प्रस्थापनाओं की संसूचना, प्रतिग्रहण और प्रतिसंहरण-

प्रस्थापनाओं की संसूचना, प्रस्थापनाओं का प्रतिग्रहण और प्रस्थापनाओं तथा प्रतिग्रहणों का प्रतिसंहरण क्रमश: प्रस्थापना करने वाले, प्रतिग्रहण करने वाले या प्रतिसंहरण करने वाले पक्षकार के किसी ऐसे कार्य या लोप से हुआ समझा जाता है, जिसके द्वारा वह ऐसी प्रस्थापना, प्रतिग्रहण या प्रतिसंहरण को संसूचित करने का आशय रखता हो, या जो उसे संसूचित करने का प्रयास रखता हो।

Indian Contract Act Section-3 (IC Act Section-3 in English)

Communication, acceptance and revocation of proposals-

The communication of proposals the acceptance of proposals, and the revocation of proposals and acceptances, respectively, are deemed to be made by any act or omission of the party proposing, accepting or revoking by which he intends to communicate such proposal, acceptance or revocation, or which has the effect of communicating it.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 3 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 | Indian Contract Act Section 2

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-2) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 के अनुसार जब कि एक व्यक्ति, किसी बात को करने या करने से प्रविरत रहने की अपनी रजामन्दी किसी अन्य को इस दृष्टि से संज्ञापित करता है कि ऐसे कार्य या प्रविरति के प्रति उस अन्य की अनुमति अभिप्राप्त करे तब वह प्रस्थापना करता है तो इसे प्रस्थापना कहते है, जिसे IC Act Section-2 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 (Indian Contract Act Section-2) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 IC Act Section-2 के तहत जब एक व्यक्ति, किसी बात को करने या करने से प्रविरत रहने की अपनी रजामन्दी किसी अन्य को इस दृष्टि से संज्ञापित करता है कि ऐसे कार्य या प्रविरति के प्रति उस अन्य की अनुमति अभिप्राप्त करे तब वह प्रस्थापना करता है तो इसे प्रस्थापना कहते है। इस धारा के अन्तर्गत प्रस्थापना को परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 (IC Act Section-2 in Hindi)

व्याख्या-उपवाक्य-

इस अधिनियम में, निम्नलिखित शब्दों और पदों का निम्नलिखित भावों में प्रयोग किया गया है, जब तक कि संदर्भ से प्रतिकूल आशय प्रतीत न हो
(क) जब कि एक व्यक्ति, किसी बात को करने या करने से प्रविरत रहने की अपनी रजामन्दी किसी अन्य को इस दृष्टि से संज्ञापित करता है कि ऐसे कार्य या प्रविरति के प्रति उस अन्य की अनुमति अभिप्राप्त करे तब वह प्रस्थापना करता है, यह कहा जाता है।
(ख) जब कि वह व्यक्ति, जिससे प्रस्थापना की जाती है उसके प्रति अपनी अनुमति संज्ञापित करता है तब वह प्रस्थापना प्रतिगृहीत हुई कही जाती है। प्रस्थापना प्रतिगृहीत हो जाने पर वचन हो जाती है;
(ग) प्रस्थापना करने वाला व्यक्ति, “वचनदाता” कहलाता है और प्रस्थापना प्रतिगृहीत करने वाला व्यक्ति “वचनगृहीता” कहलाता है;
(घ) जब कि वचनदाता की वांछा पर वचनगृहीता या कोई अन्य व्यक्ति कुछ कर चुका है या करने से विरत रहा है, या करता है या करने से प्रविरत रहता है, या करने का या करने से प्रविरत रहने का वचन देता है, तब ऐसा कार्य या प्रविरति या वचन उस वचन के लिए प्रतिफल कहलाता है;
(ङ) हर एक वचन और ऐसे वचनों का हर एक संवर्ग, जो एक दूसरे के लिए प्रतिफल हो, करार है;
(च) वे वचन जो एक दूसरे के लिए प्रतिफल या प्रतिफल का भाग हों, व्यतिकारी वचन कहलाते हैं;
(छ) वह करार जो विधितः प्रवर्तनीय न हो, शून्य कहलाता है;
(ज) वह करार, जो विधितः प्रवर्तनीय हो, संविदा है;
(झ) वह करार, जो उसके पक्षकारों में से एक या अधिक के विकल्प पर तो विधि द्वारा प्रवर्तनीय हो, किंतु अन्य पक्षकार या पक्षकारों के विकल्प पर नहीं, शून्यकरणीय संविदा है;
(ञ) जो संविदा विधित: प्रवर्तनीय नहीं रह जाती वह तब शून्य हो जाती है जब वह प्रवर्तनीय नहीं रह जाती।

Indian Contract Act Section-2 (IC Act Section-2 in English)

Interpretation-clause

In this Act the following words and expressions are used in the following senses, unless a contrary intention appears from the context:—
(a) When one person signifies to another his willingness to do or to abstain from doing anything, with a view to obtaining the assent of that other to such act or abstinence, he is said to make a proposal;
(b) When the person to whom the proposal is made signifies his assent thereto, the proposal is said to be accepted. A proposal, when accepted, becomes a promise;
(c) The person making the proposal is called the “promisor”, and the person accepting the proposal is called the “promisee”;
(d) When, at the desire of the promisor, the promisee or any other person has done or abstained from doing, or does or abstains from doing, or promises to do or to abstain from doing, something, such act or abstinence or promise is called a consideration for the promise;
(e) Every promise and every set of promises, forming the consideration for each other, is an agreement;
(f) Promises which form the consideration or part of the consideration for each other are called reciprocal promises;
(g) An agreement not enforceable by law is said to be void;
(h) An agreement enforceable by law is a contract;
(i) An agreement which is enforceable by law at the option of one or more of the parties thereto, but not at the option of the other or others, is a voidable contract;
(j) A contract which ceases to be enforceable by law becomes void when it ceases to be enforceable.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 2 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 1 | Indian Contract Act Section 1

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-1) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 1 के अनुसार इस अधिनियम का नाम संक्षिप्त वर्णन जैसे लागू कहां से कहां तक होगा इत्यादि की जानकारी प्रदान करता है, जिसे IC Act Section-1 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 1 (Indian Contract Act Section-1) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 1 IC Act Section-1 के तहत इस अधिनियम के अंतर्गत संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ कब से होगा इत्यादि जानकारी प्रदान करता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 1 (IC Act Section-1 in Hindi)

संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-

सका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है [The words “except the State of Jammu and Kashmir” omitted by Act 34 of 2019, s. 95 and the Fifth Schedule (w.e.f. 31-10- 2019)] और यह 1872 के सितम्बर के प्रथम दिन को प्रवृत्त होगा।
व्यावृत्ति — इसमें अंतर्विष्ट कोई भी बात, एतद्द्वारा अभिव्यक्त रूप से निरसित न किए गए किसी स्टेट्यूट, अधिनियम या विनियम के उपबंधों पर व्यापार की किसी प्रथा या रूढ़ि पर अथवा किसी संविदा की किसी प्रसंगति पर, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, प्रभाव न डालेगी।

Indian Contract Act Section-1 (IC Act Section-1 in English)

Short title, Extent and Commencement-

It extends to the whole of India [The words “except the State of Jammu and Kashmir” omitted by Act 34 of 2019, s. 95 and the Fifth Schedule (w.e.f. 31-10- 2019)] and it shall come into force on the first day of September, 1872.
Saving – Nothing herein contained shall affect the provisions of any Statute, Act or Regulation not hereby expressly repealed, nor any usage or custom of trade, nor any incident of any contract, not inconsistent with the provisions of this Act.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 1 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।