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भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 12 | नुकसानी के लिए वादों में रकम अवधारित करने के लिए न्यायालय को समर्थ करने की प्रवृत्ति रखने वाले तथ्य सुसंगत हैं | Indian Evidence Act Section- 12 in hindi| In suits for damages, facts tending to enable Court to determine amount are relevant.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 12 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 12, साथ ही क्या बतलाती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 12 का विवरण

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 12 के अन्तर्गत जब किसी मामले में किसी नुकसानी का दावा किया गया है, कोई भी तथ्य सुसंगत है जिससे न्यायालय नुकसानी की वह रकम अवधारित करने के लिए समर्थ हो जाये, तो वह तथ्य भीं साक्ष्य का रूप ले सकेंगे।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 12 के अनुसार

नुकसानी के लिए वादों में रकम अवधारित करने के लिए न्यायालय को समर्थ करने की प्रवृत्ति रखने वाले तथ्य सुसंगत हैं-

उन वादों में, जिनमें नुकसानी का दावा किया गया है, कोई भी तथ्य सुसंगत है जिससे न्यायालय नुकसानी की वह रकम अवधारित करने के लिए समर्थ हो जाये, जो अधिनिर्णीत की जानी चाहिये।

In suits for damages, facts tending to enable Court to determine amount are relevant-
In suits in which damages are claimed, any fact which will enable the Court to determine the amount of damages which ought to be awarded, is relevant.

हमारा प्रयास भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 12 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 10 | सामान्य परिकल्पना के बारे में षड्यन्त्रकारी द्वारा कही या की गई बातें | Indian Evidence Act Section- 10 in hindi| Things said or done by conspirator in reference to common design.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 10 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 10, साथ ही क्या बतलाती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 10 का विवरण

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 10 के अन्तर्गत जब किसी मामले में दो या दो से अधिक व्यक्तियों ने अपराध या अनुयोज्य दोष करने के लिए मिलकर षड्यन्त्र किया है, और उनमें से किसी व्यक्ति ने किसी के द्वारा बनाए गए षड्यन्त्र के बारे में न्यायालय में लिखित अथवा कोई भौतिक बात कही, जिससे षड्यन्त्र का अस्तित्व साबित करने के प्रयोजनार्थ उसी प्रकार सुसंगत तथ्य है, इसके अलावा न्यायालय अथवा जांच अधिकारी को यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है, तो वह तथ्य भीं साक्ष्य का रूप ले सकेंगे।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 10 के अनुसार

सामान्य परिकल्पना के बारे में षड्यन्त्रकारी द्वारा कही या की गई बातें-

जहाँ कि यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि दो या अधिक व्यक्तियों ने अपराध या अनुयोज्य दोष करने के लिए मिलकर षड्यन्त्र किया है, वहाँ उनके सामान्य आशय के बारे में उनमें से किसी एक व्यक्ति द्वारा उस समय के पश्चात्, जब ऐसा आशय उनमें से किसी एक ने प्रथम बार मन में धारण किया, कही, की, या लिखी गई कोई बात उन व्यक्तियों में से हर एक व्यक्ति के विरुद्ध, जिनके बारे में विश्वास किया जाता है कि उन्होंने इस प्रकार षड्यन्त्र किया है, षड्यन्त्र का अस्तित्व साबित करने के प्रयोजनार्थ उसी प्रकार सुसंगत तथ्य है जिस प्रकार यह दर्शित करने के प्रयोजनार्थ कि ऐसा कोई व्यक्ति उसका पक्षकार था।

Things said or done by conspirator in reference to common design-
Where there is reasonable ground to believe that two or more persons have conspired together to commit an offence or an actionable wrong, anything said, done or written by any one of such persons in reference to their common intention, after the time when such intention was first entertained by any one of them, is a relevant fact as against each of the persons believed to be so conspiring, as well for the purpose of proving the existence of the conspiracy as for the purpose of showing that any such person was a party to it.

हमारा प्रयास भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 10 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 483 | न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर अधीक्षण का निरंतर प्रयोग करने का उच्च न्यायालय का कर्तव्य | CrPC Section- 483 in hindi| Duty of High Court to exercise continuous superintendence over Courts of Judicial Magistrates.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 483 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 483 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 483 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 483 के अन्तर्गत प्रत्येक उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर अपने अधीक्षण का प्रयोग इस प्रकार करेगा जिससे यह सुनिश्चित हो जाए कि ऐसे मजिस्ट्रेटों द्वारा मामलों का निपटारा शीघ्र और उचित रूप से किया जाता है।

सीआरपीसी की धारा 483 के अनुसार

न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर अधीक्षण का निरंतर प्रयोग करने का उच्च न्यायालय का कर्तव्य-

प्रत्येक उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर अपने अधीक्षण का प्रयोग इस प्रकार करेगा जिससे यह सुनिश्चित हो जाए कि ऐसे मजिस्ट्रेटों द्वारा मामलों का निपटारा शीघ्र और उचित रूप से किया जाता है।

Duty of High Court to exercise continuous superintendence over Courts of Judicial Magistrates-
Every High Court shall so exercise its superintendence over the Courts of Judicial Magistrates subordinate to it as to ensure that there is an expeditious and proper disposal of cases by such Magistrates.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 483 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 482 | उच्च न्यायालय की अन्तर्निहित शक्तियों की व्यावृत्ति | CrPC Section- 482 in hindi| Saving of inherent powers of High Court.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 482 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के अन्तर्गत इस संहिता की कोई बात उच्च न्यायालय की ऐसे आदेश देने की अन्तर्निहित शक्ति को सीमित या प्रभावित करने वाली न समझी जाएगी। जैसे इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के लिए या किसी न्यायालय की कार्यवाही का दुरुपयोग निवारित करने के लिए या किसी अन्य प्रकार से न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो।

सीआरपीसी की धारा 482 के अनुसार

उच्च न्यायालय की अन्तर्निहित शक्तियों की व्यावृत्ति-

इस संहिता की कोई बात उच्च न्यायालय की ऐसे आदेश देने की अन्तर्निहित शक्ति को सीमित या प्रभावित करने वाली न समझी जाएगी। जैसे इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के लिए या किसी न्यायालय की कार्यवाही का दुरुपयोग निवारित करने के लिए या किसी अन्य प्रकार से न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो।

Saving of inherent powers of High Court-
Nothing in this Code shall be deemed to limit or affect the inherent powers of the High Court to make such orders as may be necessary to give effect to any order under this Code, or to prevent abuse of the process of any Court or otherwise to secure the ends of justice.

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सीआरपीसी की धारा 481 | विक्रय से संबद्ध लोक सेवक का सम्पत्ति का क्रय न करना और उसके लिए बोली न लगाना | CrPC Section- 481 in hindi| Public servant concerned in sale not to purchase or bid for property.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 481 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 481 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 481 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 481 के अन्तर्गत कोई लोक सेवक, जिसे इस संहिता के अधीन संपत्ति के विक्रय के बारे में किसी कर्तव्य का पालन करना है, उस सम्पत्ति का न तो क्रय करेगा और न उसके लिए बोली लगाएगा।

सीआरपीसी की धारा 481 के अनुसार

विक्रय से संबद्ध लोक सेवक का सम्पत्ति का क्रय न करना और उसके लिए बोली न लगाना–

कोई लोक सेवक, जिसे इस संहिता के अधीन संपत्ति के विक्रय के बारे में किसी कर्तव्य का पालन करना है, उस सम्पत्ति का न तो क्रय करेगा और न उसके लिए बोली लगाएगा।

Public servant concerned in sale not to purchase or bid for property-
A public servant having any duty to perform in connection with the sale of any property under this Code shall not purchase or bid for the property.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 481 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 480 | विधि-व्यवसाय करने वाले प्लीडर का कुछ न्यायालयों में मजिस्ट्रेट के तौर पर न बैठना | CrPC Section- 480 in hindi| Practising pleader not to sit as Magistrate in certain Courts.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 480 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 480 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 480 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 480 के अन्तर्गत कोई प्लीडर, जो किसी मजिस्ट्रेट के न्यायालय में विधि-व्यवसाय करता है, उस न्यायालय में या उस न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता के अन्दर किसी न्यायालय में मजिस्ट्रेट के तौर पर न बैठेगा।

सीआरपीसी की धारा 480 के अनुसार

विधि-व्यवसाय करने वाले प्लीडर का कुछ न्यायालयों में मजिस्ट्रेट के तौर पर न बैठना–

कोई प्लीडर, जो किसी मजिस्ट्रेट के न्यायालय में विधि-व्यवसाय करता है, उस न्यायालय में या उस न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता के अन्दर किसी न्यायालय में मजिस्ट्रेट के तौर पर न बैठेगा।

Practising pleader not to sit as Magistrate in certain Courts-
No pleader who practises in the Court of any Magistrate shall sit as a Magistrate in that Court or in any Court within the local jurisdiction of that Court.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 480 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।