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सीआरपीसी की धारा 349 | उत्तर देने या दस्तावेज पेश करने से इंकार करने वाले व्यक्ति को कारावास या उसकी सुपुर्दगी | CrPC Section- 349 in hindi| Imprisonment or committal of person refusing to answer or produce document.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 349 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 349 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 349 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 349 के अन्तर्गत यदि दंड न्यायालय के समक्ष कोई साक्षी या कोई व्यक्ति, जो किसी दस्तावेज या चीज को पेश करने के लिए बुलाया गया है, उन प्रश्नों का, जो उससे किए जाएं, उत्तर देने से या अपने कब्जे या शक्ति में की किसी दस्तावेज या चीज को, जिसे पेश करने की न्यायालय उससे अपेक्षा करे, पेश करने से इंकार करता है और ऐसे इंकार के लिए कोई उचित कारण पेश करने के लिए युक्तियुक्त अवसर दिए जाने पर ऐसा नहीं करता है तो ऐसा न्यायालय उन कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे उसे सात दिन से अनधिक की किसी अवधि के लिए सादा कारावास का दंडादेश दे सकेगा अथवा पीठासीन मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश द्वारा हस्ताक्षरित वारंट द्वारा न्यायालय के किसी अधिकारी की अभिरक्षा के लिए सुपुर्द कर सकेगा, जब तक कि उस बीच ऐसा व्यक्ति अपनी परीक्षा की जाने और उत्तर देने के लिए या दस्तावेज या चीज पेश करने के लिए। सहमत नहीं हो जाता है और उसके इंकार पर डटे रहने की दशा में उसके बारे में धारा 345 या धारा 346 के उपबन्धों के अनुसार कार्यवाही की जा सकेगी।

सीआरपीसी की धारा 349 के अनुसार

उत्तर देने या दस्तावेज पेश करने से इंकार करने वाले व्यक्ति को कारावास या उसकी सुपुर्दगी-
यदि दंड न्यायालय के समक्ष कोई साक्षी या कोई व्यक्ति, जो किसी दस्तावेज या चीज को पेश करने के लिए बुलाया गया है, उन प्रश्नों का, जो उससे किए जाएं, उत्तर देने से या अपने कब्जे या शक्ति में की किसी दस्तावेज या चीज को, जिसे पेश करने की न्यायालय उससे अपेक्षा करे, पेश करने से इंकार करता है और ऐसे इंकार के लिए कोई उचित कारण पेश करने के लिए युक्तियुक्त अवसर दिए जाने पर ऐसा नहीं करता है तो ऐसा न्यायालय उन कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे उसे सात दिन से अनधिक की किसी अवधि के लिए सादा कारावास का दंडादेश दे सकेगा अथवा पीठासीन मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश द्वारा हस्ताक्षरित वारंट द्वारा न्यायालय के किसी अधिकारी की अभिरक्षा के लिए सुपुर्द कर सकेगा, जब तक कि उस बीच ऐसा व्यक्ति अपनी परीक्षा की जाने और उत्तर देने के लिए या दस्तावेज या चीज पेश करने के लिए। सहमत नहीं हो जाता है और उसके इंकार पर डटे रहने की दशा में उसके बारे में धारा 345 या धारा 346 के उपबन्धों के अनुसार कार्यवाही की जा सकेगी।

Imprisonment or committal of person refusing to answer or produce document-
If any witness or person called to produce a document or thing before a Criminal Court refuses to answer such questions as are put to him or to produce any document or thing in his possession or power which the Court requires him to produce, and does not, after a reasonable opportunity has been given to him so to do, offer any reasonable excuse for such refusal, such Court may, for reasons to be recorded in writing, sentence him to simple imprisonment, or by warrant under the hand of the Presiding Magistrate or Judge commit him to the custody of an officer of the Court for any term not exceeding seven days, unless in the meantime, such person consents to be examined and to answer, or to produce the document or thing and in the event of his persisting in his refusal, he may be dealt with according to the provisions of Section 345 or Section 346.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 349 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 348 | माफी मांगने पर अपराधी का उन्मोचन | CrPC Section- 348 in hindi| Discharge of offender on submission of apology.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 348 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 348 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 348 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 348 के अन्तर्गत जब किसी न्यायालय ने किसी अपराधी को कोई बात, जिसे करने की उससे विधिपूर्वक अपेक्षा की गई थी, करने से इंकार करने या उसे न करने के लिए या साशय कोई अपमान करने या विघ्न डालने के लिए धारा 345 के अधीन दण्डित किए जाने के लिए न्याय निर्णीत किया है या धारा 346 के अधीन विचारण के लिए मजिस्ट्रेट के पास भेजा है, तब वह न्यायालय अपने आदेश या अपेक्षा के उसके द्वारा मान लिए जाने पर या उसके द्वारा ऐसे माफी मांगे जाने पर, जिससे न्यायालय का समाधान हो जाए, स्वविवेकानुसार अभियुक्त को उन्मोचित कर सकता है या दण्ड का परिहार कर सकता है।

सीआरपीसी की धारा 348 के अनुसार

माफी मांगने पर अपराधी का उन्मोचन-
जब किसी न्यायालय ने किसी अपराधी को कोई बात, जिसे करने की उससे विधिपूर्वक अपेक्षा की गई थी, करने से इंकार करने या उसे न करने के लिए या साशय कोई अपमान करने या विघ्न डालने के लिए धारा 345 के अधीन दण्डित किए जाने के लिए न्याय निर्णीत किया है या धारा 346 के अधीन विचारण के लिए मजिस्ट्रेट के पास भेजा है, तब वह न्यायालय अपने आदेश या अपेक्षा के उसके द्वारा मान लिए जाने पर या उसके द्वारा ऐसे माफी मांगे जाने पर, जिससे न्यायालय का समाधान हो जाए, स्वविवेकानुसार अभियुक्त को उन्मोचित कर सकता है या दण्ड का परिहार कर सकता है।

Discharge of offender on submission of apology-
When any Court has under Section 345 adjudged an offender to punishment, or has under Section 346 forwarded him to a Magistrate for trial, for refusing or omitting to do anything which he was lawfully required to do or for any intentional insult or interruption, the Court may in its discretion, discharge the offender or remit the punishment on his submission to the order or requisition of such Court, or on apology being made to its satisfaction.

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सीआरपीसी की धारा 347 | रजिस्ट्रार या उप-रजिस्ट्रार कब सिविल न्यायालय समझा जाएगा | CrPC Section- 347 in hindi| When Registrar or Sub-Registrar to be deemed a Civil Court.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 347 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 347 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 347 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 347 के अन्तर्गत जब राज्य सरकार ऐसा निदेश दे तब कोई भी रजिस्ट्रार या कोई भी उप-रजिस्ट्रार, जो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन नियुक्त है, धारा 345 और 346 के अर्थ में सिविल न्यायालय समझा जाएगा।

सीआरपीसी की धारा 347 के अनुसार

रजिस्ट्रार या उप-रजिस्ट्रार कब सिविल न्यायालय समझा जाएगा-
जब राज्य सरकार ऐसा निदेश दे तब कोई भी रजिस्ट्रार या कोई भी उप-रजिस्ट्रार, जो [***] रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन नियुक्त है, धारा 345 और 346 के अर्थ में सिविल न्यायालय समझा जाएगा।

When Registrar or Sub-Registrar to be deemed a Civil Court-
When the State Government so directs, any Registrar or any Sub-Registrar appointed under the [***] Registration Act, 1908 (16 of 1908), shall be deemed to be a Civil Court within the meaning of Sections 345 and 346.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 347 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

 

सीआरपीसी की धारा 346 | जहां न्यायालय का विचार है कि मामले में धारा 345 के अधीन कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए वहां प्रक्रिया | CrPC Section- 346 in hindi| Procedure where Court considers that case should not be dealt with under Section 345.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 346 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 346 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 346 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 346 के अन्तर्गत यदि किसी मानले में न्यायालय का यह विचार है कि धारा 345 में निर्दिष्ट और उसकी दृष्टिगोचरता या उपस्थिति में किए गए अपराधों में से किसी के लिए अभियुक्त व्यक्ति जुर्माना देने में व्यतिक्रम करने से अन्यथा कारावासित किया जाना चाहिए या उस पर दो सौ रुपए से अधिक जुर्माना अधिरोपित किया जाना चाहिए या किसी अन्य कारण से उस न्यायालय की यह राय है कि मामला धारा 345 के अधीन नहीं निपटाया जाना चाहिए तो वह न्यायालय उन तथ्यों को जिनसे अपराध बनता है और अभियुक्त के कथन को इसमें इसके पूर्व उपबंधित प्रकार से अभिलिखित करने के पश्चात्, मामला उसका विचारण करने की अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को भेज सकेगा और ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसे व्यक्ति की हाजिरी के लिए प्रतिभूति दी जाने की अपेक्षा कर सकेगा, अथवा यदि पर्याप्त प्रतिभूति न दी जाए तो ऐसे व्यक्ति को अभिरक्षा में ऐसे मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा।

सीआरपीसी की धारा 346 के अनुसार

जहां न्यायालय का विचार है कि मामले में धारा 345 के अधीन कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए वहां प्रक्रिया-
(1) यदि किसी मानले में न्यायालय का यह विचार है कि धारा 345 में निर्दिष्ट और उसकी दृष्टिगोचरता या उपस्थिति में किए गए अपराधों में से किसी के लिए अभियुक्त व्यक्ति जुर्माना देने में व्यतिक्रम करने से अन्यथा कारावासित किया जाना चाहिए या उस पर दो सौ रुपए से अधिक जुर्माना अधिरोपित किया जाना चाहिए या किसी अन्य कारण से उस न्यायालय की यह राय है कि मामला धारा 345 के अधीन नहीं निपटाया जाना चाहिए तो वह न्यायालय उन तथ्यों को जिनसे अपराध बनता है और अभियुक्त के कथन को इसमें इसके पूर्व उपबंधित प्रकार से अभिलिखित करने के पश्चात्, मामला उसका विचारण करने की अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को भेज सकेगा और ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसे व्यक्ति की हाजिरी के लिए प्रतिभूति दी जाने की अपेक्षा कर सकेगा, अथवा यदि पर्याप्त प्रतिभूति न दी जाए तो ऐसे व्यक्ति को अभिरक्षा में ऐसे मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा।
(2) वह मजिस्ट्रेट, जिसे कोई मामला इस धारा के अधीन भेजा जाता है, जहां तक हो सके इस प्रकार कार्यवाही करने के लिए अग्रसर होगा मानो वह मामला पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित है।

Procedure where Court considers that case should not be dealt with under Section 345-
(1) If the Court in any case considers that a person accused of any of the offences referred to in Section 345 and committed in its view or presence should be imprisoned otherwise than in default of payment of fine, or that a fine exceeding two hundred rupees should be imposed upon him, or such Court is for any other reason of opinion that the case should not be disposed of under Section 345, such Court, after recording the facts constituting the offence and the statement of the accused as hereinbefore provided, may forward the case to a Magistrate having jurisdiction to try the same, and may require security to be given for the appearance of such person before such Magistrate, or if sufficient security is not given shall forward such person in custody to such Magistrate.
(2) The Magistrate to whom any case is forwarded under this section shall proceed to deal with, as far as may be, as if it were instituted on a police report.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 346 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

 

सीआरपीसी की धारा 345 | अवमान के कुछ मामलों में प्रक्रिया | CrPC Section- 345 in hindi| Procedure in certain cases of contempt.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 345 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 345 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 345 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 345 के अन्तर्गत जब कोई ऐसा अपराध, जैसा भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 175, धारा 178, धारा 179, धारा 180 या धारा 228 में वर्णित है, किसी सिविल, दण्ड या राजस्व न्यायालय की दृष्टिगोचरता या उपस्थिति में किया जाता है तब न्यायालय अभियुक्त को अभिरक्षा में निरुद्ध करा सकता है और उसी दिन न्यायालय के उठने के पूर्व किसी समय, अपराध का संज्ञान कर सकता है और अपराधी को ऐसा कारण दर्शित करने का, कि क्यों न उसे इस धारा के अधीन दंडित किया जाए, उचित अवसर देने के पश्चात् अपराधी को दो सौ रुपए से अनधिक जुर्माने का और जुर्माना देने में व्यतिक्रम होने पर एक मास तक की अवधि के लिए, जब तक कि ऐसा जुर्माना उससे पूर्वतर न दे दिया जाए, सादा कारावास का दंडादेश दे सकता है।

सीआरपीसी की धारा 345 के अनुसार

अवमान के कुछ मामलों में प्रक्रिया-
(1) जब कोई ऐसा अपराध, जैसा भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 175, धारा 178, धारा 179, धारा 180 या धारा 228 में वर्णित है, किसी सिविल, दण्ड या राजस्व न्यायालय की दृष्टिगोचरता या उपस्थिति में किया जाता है तब न्यायालय अभियुक्त को अभिरक्षा में निरुद्ध करा सकता है और उसी दिन न्यायालय के उठने के पूर्व किसी समय, अपराध का संज्ञान कर सकता है और अपराधी को ऐसा कारण दर्शित करने का, कि क्यों न उसे इस धारा के अधीन दंडित किया जाए, उचित अवसर देने के पश्चात् अपराधी को दो सौ रुपए से अनधिक जुर्माने का और जुर्माना देने में व्यतिक्रम होने पर एक मास तक की अवधि के लिए, जब तक कि ऐसा जुर्माना उससे पूर्वतर न दे दिया जाए, सादा कारावास का दंडादेश दे सकता है।
(2) ऐसे प्रत्येक मामले में न्यायालय वे तथ्य जिनसे अपराध बनता है, अपराधी द्वारा किए गए कथन के (यदि कोई हो) सहित, तथा निष्कर्ष और दंडादेश भी अभिलिखित करेगा।
(3) यदि अपराध भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 228 के अधीन है तो अभिलेख में यह दर्शित होगा कि जिस न्यायालय के कार्य में विघ्न डाला गया था या जिसका अपमान किया गया था, उसकी बैठक किस प्रकार की न्यायिक कार्यवाही के संबंध में और उसके किस प्रक्रम पर हो रही थी और किस प्रकार का विघ्न डाला गया या अपमान किया गया था।

Procedure in certain cases of contempt-
(1) When any such offence as is described in Section 175, Section 178, Section 179, Section 180 or Section 228 of the Indian Penal Code (45 of 1860) is committed in the view or presence of any Civil, Criminal or Revenue Court, the Court may cause the offender to be detained in custody and may, at any time before the rising of the Court on the same day, take cognizance of the offence and, after giving the offender a reasonable opportunity of showing cause why he should not be punished under this section, sentence the offender to fine not exceeding two hundred rupees, and, in default of payment of fine, to simple imprisonment for a term which may extend to one month, unless such fine be sooner paid.
(2) In every such case the Court shall record the facts constituting the offence. with the statement (if any) made by the offender, as well as the finding and sentence. (3) If the offence is under Section 228 of the Indian Penal Code (45 of 1860), the record shall show the nature and stage of the judicial proceeding in which the Court interrupted or insulted was sitting, and the nature of the interruption or insult.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 345 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 344 | मिथ्या साक्ष्य देने पर विचारण के लिए संक्षिप्त प्रक्रिया | CrPC Section- 344 in hindi| Summary procedure for trial for giving false evidence.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 344 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 344 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 344 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 344 के अन्तर्गत यदि किसी न्यायिक कार्यवाही को निपटाते हुए निर्णय या अंतिम आदेश देते समय कोई सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट यह राय व्यक्त करता है कि ऐसी कार्यवाही में होने वाले किसी साक्षी ने जानते हुए या जानबूझकर मिथ्या साक्ष्य दिया है या इस आशय से मिथ्या साक्ष्य गढ़ा है कि ऐसा साक्ष्य ऐसी कार्यवाही में प्रयुक्त किया जाए, तो अगर उसका समाधान हो जाता है कि न्याय के हित में यह आवश्यक और समीचीन है कि साक्षी का, यथास्थिति, मिथ्या साक्ष्य देने या गढ़ने के लिए संक्षेपत: विचारण किया जाना चाहिए तो वह ऐसे अपराध का संज्ञान कर सकेगा और अपराधी को ऐसा कारण दर्शित करने का कि क्यों न उसे अपराध के लिए दण्डित किया जाए, उचित अवसर देने के पश्चात् ऐसे अपराधी का संक्षेपतः विचारण कर सकेगा।

सीआरपीसी की धारा 344 के अनुसार

मिथ्या साक्ष्य देने पर विचारण के लिए संक्षिप्त प्रक्रिया–
(1) यदि किसी न्यायिक कार्यवाही को निपटाते हुए निर्णय या अंतिम आदेश देते समय कोई सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट यह राय व्यक्त करता है कि ऐसी कार्यवाही में होने वाले किसी साक्षी ने जानते हुए या जानबूझकर मिथ्या साक्ष्य दिया है या इस आशय से मिथ्या साक्ष्य गढ़ा है कि ऐसा साक्ष्य ऐसी कार्यवाही में प्रयुक्त किया जाए तो यदि उसका समाधान हो जाता है कि न्याय के हित में यह आवश्यक और समीचीन है कि साक्षी का, यथास्थिति, मिथ्या साक्ष्य देने या गढ़ने के लिए संक्षेपत: विचारण किया जाना चाहिए तो वह ऐसे अपराध का संज्ञान कर सकेगा और अपराधी को ऐसा कारण दर्शित करने का कि क्यों न उसे अपराध के लिए दण्डित किया जाए, उचित अवसर देने के पश्चात् ऐसे अपराधी का संक्षेपतः विचारण कर सकेगा और उसे कारावास से जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से, दण्डित कर सकेगा।
(2) ऐसे प्रत्येक मामले में न्यायालय संक्षिप्त विचारणों के लिए विहित प्रक्रिया का यथासाध्य अनुसरण करेगा।
(3) जहां न्यायालय इस धारा के अधीन कार्यवाही करने के लिए अग्रसर नहीं होता है वहां इस धारा की कोई बात, अपराध के लिए धारा 340 के अधीन परिवाद करने की उस न्यायालय की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी।
(4) जहां, उपधारा (1) के अधीन किसी कार्यवाही के प्रारम्भ किए जाने के पश्चात् सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत कराया जाता है कि उस निर्णय या आदेश के विरुद्ध जिसमें उस उपधारा में विनिर्दिष्ट राय अभिव्यक्त की गई है अपील या पुनरीक्षण के लिए आवेदन किया गया है वहां वह, यथास्थिति, अपील या पुनरीक्षण के आवेदन के निपटाए जाने तक आगे विचारण की कार्यवाहियों को रोक देगा और तब आगे विचारण की कार्यवाहियां अपील या पुनरीक्षण के आवेदन के परिणामों के अनुसार होंगी।

Summary procedure for trial for giving false evidence-
(1) If, at the time of delivery of any judgment or final order disposing of any judicial proceeding, a Court of Session or Magistrate of the first class expresses an opinion to the effect that any witness appearing in such proceeding had knowingly or wilfully given false evidence or had fabricated false evidence with the intention that such evidence should be used in such proceeding, it or he may, if satisfied that it is necessary and expedient in the interest of justice that the witness should be tried summarily for giving or fabricating, as the case may be, false evidence, take cognizance of the offence and may, after giving the offender a reasonable opportunity of showing cause why he should not be punished for such offence, try such offender summarily and sentence him to imprisonment for a term which may extend to three months, or to fine which
may extend to five hundred rupees, or with both.
(2) In every such case the Court shall follow, as nearly as may be practicable, the procedure prescribed for summary trials.
(3) Nothing in this section shall affect the power of the Court to make a complaint under Section 340 for the offence, where it does not choose to proceed under this section.
(4) Where, after any action is initiated under sub-section (1), it is made to appear to the Court of Session or Magistrate of the first class that an appeal or an application for revision has been preferred or filed against the judgment or order in which the opinion referred to in that sub-section has been expressed, it or he shall stay further proceedings of the trial until the disposal of the appeal or the application for revision, as the case may be, and thereupon the further proceedings of the trial shall abide by the results of the appeal or application for revision.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 344 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।