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सीआरपीसी की धारा 221 | जहां इस बारे में संदेह है कि कौन सा अपराध किया गया है | CrPC Section- 221 in hindi| Where it is doubtful what offence has been committed.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 221 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 221 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 221 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 221 के अन्तर्गत यदि कोई एक कार्य या कार्यों का क्रम इस प्रकार का है कि यह संदेह है कि उन तथ्यों से, जो सिद्ध किए जा सकते हैं, कई अपराधों में से कौन सा अपराध बनेगा तो अभियुक्त पर ऐसे सब अपराध या उनमें से कोई करने का आरोप लगाया जा सकेगा और ऐसे आरोपों कितनों ही का एक साथ विचारण किया जा सकेगा, या उस पर उक्त अपराधों में से किसी एक को करने का अनुकल्पतः आरोप लगाया जा सकेगा।

सीआरपीसी की धारा 221 के अनुसार

जहां इस बारे में संदेह है कि कौन सा अपराध किया गया है-

(1) यदि कोई एक कार्य या कार्यों का क्रम इस प्रकार का है कि यह संदेह है कि उन तथ्यों से, जो सिद्ध किए जा सकते हैं, कई अपराधों में से कौन सा अपराध बनेगा तो अभियुक्त पर ऐसे सब अपराध या उनमें से कोई करने का आरोप लगाया जा सकेगा और ऐसे आरोपों कितनों ही का एक साथ विचारण किया जा सकेगा, या उस पर उक्त अपराधों में से किसी एक को करने का अनुकल्पतः आरोप लगाया जा सकेगा।
(2) यदि ऐसे मामले में अभियुक्त पर एक अपराध का आरोप लगाया गया है और साक्ष्य से यह प्रतीत होता है कि उसने भिन्न अपराध किया है, जिसके लिए उस पर उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन आरोप लगाया जा सकता था, तो वह उस अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा जिसका उसके द्वारा किया जाना दर्शित है, यद्यपि उसके लिए उस पर आरोप नहीं लगाया गया था।
दृष्टान्त
(क) क पर ऐसे कार्य का अभियोग है जो चोरी की, या चुराई गई संपत्ति प्राप्त करने की, या आपराधिक न्यासभंग की, या छल की कोटि में आ सकता है। उस पर चोरी करने, चुराई हुई संपत्ति प्राप्त करने, आपराधिक न्यासभंग करने और छल करने का आरोप लगाया जा सकेगा अथवा उस पर चोरी करने का या चोरी की सम्पत्ति प्राप्त करने का या आपराधिक न्यासभंग करने का या छल करने का आरोप लगाया जा सकेगा।
(ख) ऊपर वर्णित मामले में क पर केवल चोरी का आरोप है। यह प्रतीत होता है कि उसने आपराधिक न्यासभंग का या चुराई हुई सम्पत्ति प्राप्त करने का अपराध किया है। वह (यथास्थिति) आपराधिक न्यासभंग या चुराई हुई सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा, यद्यपि उस पर उस अपराध का आरोप नहीं लगाया गया था।

Where it is doubtful what offence has been committed–
(1) If a single act or series of acts is of such a nature that it is doubtful which of several offences the facts which can be proved will constitute, the accused may be charged with having committed all or any of such offences, and any number of such charges may be tried at once; or he may be charged in the alternative with having committed some one of the said offences.
(2) If in such a case the accused is charged with one offence, and it appears in evidence that he committed a different offence for which he might have been charged under the provisions of sub-section (1), he may be convicted of the offence which he is shown to have committed, although he was not charged with it.
Illustrations
(a) A is accused of an act which may amount to theft, or receiving stolen property, or criminal breach of trust or cheating. He may be charged with theft, receiving stolen property, criminal breach of trust and cheating, or he may be charged with having committed theft, or receiving stolen property, or criminal breach of trust or cheating.
(b) In the case mentioned, A is only charged with theft. It appears that he committed the offence of criminal breach of trust, or that of receiving stolen goods. He may be convicted of criminal breach of trust or of receiving stolen goods (as the case may be), though he was not charged with such offence.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 221 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 220 | एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण | CrPC Section- 220 in hindi| Trial for more than one offence.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 220 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 220 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 220 का विवरण
दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 220 के अन्तर्गत यदि परस्पर संबद्ध ऐसे कार्यों के, जिनसे एक ही संव्यवहार बनता है, एक क्रम में एक से अधिक अपराध एक ही व्यक्ति द्वारा किए गए हैं तो ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही विचारण में उस पर आरोप लगाया जा सकता है और उसका विचारण किया जा सकता है। आपराधिक न्यासभंग या बेईमानी से सम्पत्ति के दुविर्नियोग के एक या अधिक अपराधों से आरोपित किसी व्यक्ति पर उस अपराध या अपराधों के किए जाने को सुकर बनाने या छिपाने के प्रयोजन से लेखाओं के मिथ्याकरण के एक या अधिक अपराधों का अभियोग है, तब उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही विचारण में आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है।

सीआरपीसी की धारा 220 के अनुसार

एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण-

(1) यदि परस्पर संबद्ध ऐसे कार्यों के, जिनसे एक ही संव्यवहार बनता है, एक क्रम में एक से अधिक अपराध एक ही व्यक्ति द्वारा किए गए हैं तो ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही विचारण में उस पर आरोप लगाया जा सकता है और उसका विचारण किया जा सकता है।
(2) जब धारा 212 की उपधारा (2) में या धारा 219 की उपधारा (1) में उपबंधित रूप में, आपराधिक न्यासभंग या बेईमानी से सम्पत्ति के दुविर्नियोग के एक या अधिक अपराधों से आरोपित किसी व्यक्ति पर उस अपराध या अपराधों के किए जाने को सुकर बनाने या छिपाने के प्रयोजन से लेखाओं के मिथ्याकरण के एक या अधिक अपराधों का अभियोग है, तब उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही विचारण में आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है।
(3) यदि अभिकथित कार्यों से तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की, जिससे अपराध परिभाषित या दण्डनीय हों, दो या अधिक पृथक् परिभाषाओं में आने वाले अपराध बनते हैं तो जिस व्यक्ति पर उन्हें करने का अभियोग है उस पर ऐसे अपराधों में से प्रत्येक के लिए एक ही विचारण में आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है।
(4) यदि कई कार्य, जिनमें से एक से या एक से अधिक से स्वयं अपराध बनते हैं, मिलकर भिन्न अपराध बनते हैं तो ऐसे कार्यों से मिल कर बने अपराध के लिए और ऐसे कार्यों में से किसी एक या अधिक द्वारा बने किसी अपराध के लिए अभियुक्त व्यक्ति पर एक ही विचारण में आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है।
(5) इस धारा की कोई बात भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 71 पर प्रभाव न डालेगी।
उपधारा (1) के दृष्टांत
(क) क एक व्यक्ति ख को, जो विधिपूर्ण अभिरक्षा में है, छुड़ाता है और ऐसा करने में कांस्टेबल ग को.. जिसकी अभिरक्षा में ख है, घोर उपहति कारित करता है। क पर भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 225 और 333 के अधीन अपराधों के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ख) ख दिन में गृहभेदन इस आशय से करता है कि जारकर्म करे और ऐसे प्रवेश किए गए गृह में रख की पत्नी से जारकर्म करता है। क पर भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 454 और 497 के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।

Trial for more than one offence-
(1) If, in one series of acts so connected together as to form the same transaction, more offences than one are committed by the same person, he may be charged with, and tried at one trial for, every such offence.
(2) When a person charged with one or more offences of criminal breach of trust or dishonest misappropriation of property as provided in sub-section (2) of Section 212 or in sub-section (1) of Section 219, is accused of committing, for the purpose of facilitating or concealing the commission of that offence or those offences, one or more offences of falsification of accounts, he may be charged with, and tried at one trial for, every such offence.
(3) If the acts alleged constitute an offence falling within two or more separate definitions of any law in force for the time being by which offences are defined or punished, the person accused of them may be charged with, and tried at one trial for, each of such offences.
(4) If several acts, of which one or more than one would by itself or themselves constitute an offence, constitute when combined a different offence, the person accused of them may be charged with, and tried at one trial for the offence constituted by such acts when combined, and for any offence constituted by any one, or more, of such acts.
(5) Nothing contained in this section shall affect Section 71 of the Indian Penal Code (45 of 1860).
Illustrations to sub-sections (1)
(a) A rescues B, a person in lawful custody, and in so doing causes grievous hurt to C, a constable in whose custody B was. A may be charged with, and convicted of, offences under Sections 225 and 333 of the Indian Penal Code (45 of 1860).
(b) A commits house-breaking by day with intent to commit adultery, and commits, in the house so entered, adultery with B’s wife. A may be separately charged with, and convicted of. offences under Sections 454 and 497 of the Indian Penal Code (45 of 1860).

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 220 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 219 | एक ही वर्ष में किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा | CrPC Section- 219 in hindi| Three offences of same kind within year may be charged together.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 219 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 219 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 219 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 219 के अन्तर्गत जब किसी व्यक्ति पर एक ही किस्म के ऐसे एक से अधिक अपराधों का अभियोग है जो उन अपराधों में से पहले अपराध से लेकर अंतिम अपराध तक बारह मास के अन्दर ही किए गए हैं, चाहे वे एक ही व्यक्ति के बारे में किए गए हों या नहीं, तब उस पर उनमें से तीन से अनधिक कितने ही अपराधों के लिए एक ही विचारण में आरोप लगाया और विचारण किया जा सकता है। यह धारा 219 एक ही वर्ष में किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाये जाने की प्रक्रिया मे लागू होगा।

सीआरपीसी की धारा 219 के अनुसार

एक ही वर्ष में किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा-

(1) जब किसी व्यक्ति पर एक ही किस्म के ऐसे एक से अधिक अपराधों का अभियोग है जो उन अपराधों में से पहले अपराध से लेकर अंतिम अपराध तक बारह मास के अन्दर ही किए गए हैं, चाहे वे एक ही व्यक्ति के बारे में किए गए हों या नहीं, तब उस पर उनमें से तीन से अनधिक कितने ही अपराधों के लिए एक ही विचारण में आरोप लगाया और विचारण किया जा सकता है।
(2) अपराध एक ही किस्म के तब होते हैं जब वे भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) या किसी विशेष या स्थानीय विधि की एक ही धारा के अधीन दण्ड की समान मात्रा से दण्डनीय होते हैं। :
परन्तु इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि भारतीय दण्ड संहिता, (1860 का 45) की धारा 379 के अधीन दण्डनीय अपराध उसी किस्म का अपराध है जिस किस्म का उक्त संहिता की धारा 380 के अधीन दण्डनीय अपराध है, और भारतीय दण्ड संहिता या किसी विशेष या स्थानीय विधि की किसी धारा के अधीन दण्डनीय अपराध उसी किस्म का अपराध है जिस किस्म का ऐसे अपराध करने का प्रयत्न है, जब ऐसा प्रयत्न अपराध हो।

Three offences of same kind within year may be charged together-
(1) When a person is accused of more offences than one of the me kind committed within the space of twelve months from the first to the last of such offences, whether in respect of the same person or not, he may be charged with, and tried at one trial for, any number of them not exceeding three.
(2) Offences are of the same kind when they are punishable with the same amount of punishment under the same section of the Indian Penal Code (45 of 1860) or of any special or local laws :
Provided that, for the purposes of this section, an offence punishable under Section 379 of the Indian Penal Code (45 of 1860) shall be deemed to be an offence of the same kind as an offence punishable under Section 380 of the said Code, and that an offence punishable under any section of the said Code, or of any special or local law, shall be deemed to be an offence of the same kind as an attempt to commit such offence, when such an attempt is an offence.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 219 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 218 | सुभिन्न अपराधों के लिए पृथक् आरोप | CrPC Section- 218 in hindi| Separate charges for distinct offences.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 218 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 218 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 218 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 218 के अन्तर्गत प्रत्येक सुभिन्न अपराध के लिए, जिसका किसी व्यक्ति पर अभियोग है, पृथक आरोप होगा और ऐसे प्रत्येक आरोप का विवरण पृथक्तः किया जाएगा परन्तु जहां अभियुक्त व्यक्ति लिखित आवेदन द्वारा, ऐसा चाहता है और मजिस्ट्रेट की राय है कि उससे ऐसे व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा वहां मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति के विरुद्ध विरचित सभी या किन्हीं आरोपों का विचारण एक साथ कर सकता है।

सीआरपीसी की धारा 218 के अनुसार

सुभिन्न अपराधों के लिए पृथक् आरोप-

(1) प्रत्येक सुभिन्न अपराध के लिए, जिसका किसी व्यक्ति पर अभियोग है, पृथक आरोप होगा और ऐसे प्रत्येक आरोप का विवरण पृथक्तः किया जाएगा :
परन्तु जहां अभियुक्त व्यक्ति लिखित आवेदन द्वारा, ऐसा चाहता है और मजिस्ट्रेट की राय है कि उससे ऐसे व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा वहां मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति के विरुद्ध विरचित सभी या किन्हीं आरोपों का विचारण एक साथ कर सकता है
(2) उपधारा (1) की कोई बात धारा 219, 220, 221 और 223 के उपबंधों के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी।
दृष्टान्त
क पर एक अवसर पर चोरी करने और दूसरे किसी अवसर पर घोर उपहति कारित करने का अभियोग है। चोरी के लिए और घोर उपहति कारित करने के लिए क पर पृथक्-पृथक् आरोप लगाने होंगे और उसका विचारण पृथकत: करना होगा।

Separate charges for distinct offences-
(1) For every distinct offence of which any person is accused there shall be a separate charge, and every such charge shall be tried separately :
Provided that where the accused person, by an application in writing, so desires and the Magistrate is of opinion that such person is not likely to be prejudiced thereby, the Magistrate may try together all or any number of the charges framed against such person.
(2) Nothing in sub-section (1) shall affect the operation of the provisions of Sections 219, 220, 221 and 223.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 218 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 217 | जब आरोप परिवर्तित किया जाता है तब साक्षियों का पुनः बुलाया जाना | CrPC Section- 217 in hindi| Recall of witnesses when charge altered.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 217 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 217 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 217 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 217 के अन्तर्गत जब किसी मामले मे न्यायालय व्दारा किसी साक्षी व्दारा किसी अपराध मे परीक्षा की जा चुकी है, फिर भी न्यायालय अगर चाहेगा तो, पुनः साक्षी को समन भेजकर परीक्षा करने की अनुज्ञा दी जाये। यदि न्यायालय आवश्यक समझे, तो वह साक्षी को पुनः बुलाया जा सकेगा, साथ ही साक्षी को न्यायालय मे उपस्थित होना पडेंगा।

सीआरपीसी की धारा 217 के अनुसार

जब आरोप परिवर्तित किया जाता है तब साक्षियों का पुनः बुलाया जाना-

जब कभी विचारण प्रारम्भ होने के पश्चात् न्यायालय द्वारा आरोप परिवर्तित या परिवर्धित किया जाता है तब अभियोजक और अभियुक्त को-
(क) किसी ऐसे साक्षी को, जिसकी परीक्षा की जा चुकी है, पुनः बुलाने की या पुनः समन करने की और उसकी ऐसे परिवर्तन या परिवर्धन के बारे में परीक्षा करने की अनुज्ञा दी जाएगी जब तक न्यायालय का ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह विचार नहीं है कि, यथास्थिति, अभियोजक या अभियुक्त तंग करने के या विलम्ब करने के या न्याय के उद्देश्यों को विफल करने के प्रयोजन से ऐसे साक्षी को पुन: बुलाना या उसकी पुनः परीक्षा करना चाहता है;
(ख) किसी अन्य ऐसे साक्षी को भी, जिसे न्यायालय आवश्यक समझे, बुलाने की अनुज्ञा दी जाएगी।

Recall of witnesses when charge altered-
Whenever a charge is altered or added to by the Court after the commencement of the trial, the prosecutor and the accused shall be allowed-
(a) to recall or re-summon, and examine with reference to such alteration or addition, any witness who may have been examined, unless the Court, for reasons to be recorded in writing, considers that the prosecutor or the accused, as the case may be, desires to recall or re-examine such witness for the purpose of vexation or delay or for defeating the ends of justice;
(b) also to call any further witness whom the Court may think to be material.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 217 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 216 | न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकता है | CrPC Section- 216 in hindi| Court may alter charge.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 216 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 216 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 216 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 216 के अन्तर्गत कोई भी न्यायालय निर्णय सुनाए जाने के पूर्व किसी समय किसी भी आरोप में परिवर्तन या परिवर्धन कर सकता है। ऐसा प्रत्येक परिवर्तन या परिवर्धन अभियुक्त को पढ़ कर सुनाया और समझाया जाएगा। यदि आरोप में किया गया परिवर्तन या परिवर्धन ऐसा है कि न्यायालय की राय में विचारण को तुरन्त आगे चलाने से अभियुक्त पर अपनी प्रतिरक्षा करने में या अभियोजक पर मामले के संचालन में कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है, तो न्यायालय ऐसे परिवर्तन या परिवर्धन के पश्चात् स्वविवेकानुसार विचारण को ऐसे आगे चला सकता है।

सीआरपीसी की धारा 216 के अनुसार

न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकता है-

(1) कोई भी न्यायालय निर्णय सुनाए जाने के पूर्व किसी समय किसी भी आरोप में परिवर्तन या परिवर्धन कर सकता है।
(2) ऐसा प्रत्येक परिवर्तन या परिवर्धन अभियुक्त को पढ़ कर सुनाया और समझाया जाएगा।
(3) यदि आरोप में किया गया परिवर्तन या परिवर्धन ऐसा है कि न्यायालय की राय में विचारण को तुरन्त आगे चलाने से अभियुक्त पर अपनी प्रतिरक्षा करने में या अभियोजक पर मामले के संचालन में कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है, तो न्यायालय ऐसे परिवर्तन या परिवर्धन के पश्चात् स्वविवेकानुसार विचारण को ऐसे आगे चला सकता है मानों परिवर्तित या परिवर्धित आरोप ही मूल आरोप है।
(4) यदि परिवर्तन या परिवर्धन ऐसा है कि न्यायालय की राय में विचारण को तुरन्त आगे चलाने से इस बात की संभावना है कि अभियुक्त या अभियोजक पर पूर्वोक्त रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा तो न्यायालय या तो नए विचारण का निदेश दे सकता है या विचारण को इतनी अवधि के लिए जितनी आवश्यक हो, स्थगित कर सकता है।
(5) यदि परिवर्तित या परिवर्धित आरोप में कथित अपराध ऐसा है, जिसके अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता है, तो उस मामले में ऐसी मंजूरी अभिप्राप्त किए बिना कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी जब तक कि उन्हीं तथ्यों के आधार पर, जिन पर परिवर्तित या परिवर्धित आरोप आधारित हैं, अभियोजन के लिए मंजूरी पहले ही अभिप्राप्त नहीं कर ली गई है।

Court may alter charge-
(1) Any Court may alter or add to any charge at any time before judgment is pronounced.
(2) Every such alteration or addition shall be read and explained to the accused.
(3) If the alteration or addition to a charge is such that proceeding immediately with the trial is not likely, in the opinion of the Court, to prejudice the accused in his defence or the prosecutor in the conduct of the case, the Court may, in its discretion, after such alteration or addition has been made, proceed with the trial as if the altered or added charge had been the original charge.
(4) If the alteration or addition is such that proceeding immediately with the trial is likely, in the opinion of the Court, to prejudice the accused or the prosecutor as aforesaid, the Court may either direct a new trial or adjourn the trial for such period as may be necessary.
(5) If the offence stated in the altered or added charge is one for the prosecution of which previous sanction is necessary, the case shall not be proceeded with until such sanction is obtained, unless sanction has been already obtained for a prosecution on the same facts as those on which the altered or added charge is founded.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 216 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।