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सीआरपीसी की धारा 228 | आरोप विरचित करना | CrPC Section- 228 in hindi| Framing of charge.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 228 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 228 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 228 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 228 के अन्तर्गत यदि पूर्वोक्त रूप से विचार और सुनवाई के पश्चात्, न्यायाधीश की यह राय है कि ऐसी उपधारणा करने का आधार है कि अभियुक्त ने ऐसा अपराध किया है, जो सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय नहीं है तो वह, अभियुक्त के विरुद्ध आरोप विरचित कर सकता है और आदेश द्वारा, मामले को विचारण के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को अन्तरित कर सकता है। वह आरोप अभियुक्त को पढ़कर सुनाया और समझाया जाएगा और अभियुक्त से यह पूछा जाएगा कि क्या वह उस अपराध का, जिसका आरोप लगाया गया है, दोषी होने का अभिवचन करता है या विचारण किए जाने का दावा करता है।

सीआरपीसी की धारा 228 के अनुसार

आरोप विरचित करना-

(1) यदि पूर्वोक्त रूप से विचार और सुनवाई के पश्चात्, न्यायाधीश की यह राय है कि ऐसी उपधारणा करने का आधार है कि अभियुक्त ने ऐसा अपराध किया है, जो-
(क) अनन्यत: सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय नहीं है तो वह, अभियुक्त के विरुद्ध आरोप विरचित कर सकता है और आदेश द्वारा, मामले को विचारण के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को अन्तरित कर सकता है [या कोई अन्य प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट ऐसी तारीख को जो वह ठीक समझे, अभियुक्त को, यथास्थिति, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होने का निर्देश दे सकेगा, और तब ऐसा मजिस्टेट] उस मामले का विचारण पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित वारण्ट मामलों के विचारण के लिए प्रक्रिया के अनुसार करेगा;
(ख) अनन्यतः उस न्यायालय द्वारा विचारणीय है तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप लिखित रूप में विरचित करेगा।
(2) जहां न्यायाधीश उपधारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन कोई आरोप विरचित करता है वहां वह आरोप अभियुक्त को पढ़कर सुनाया और समझाया जाएगा और अभियुक्त से यह पूछा जाएगा कि क्या वह उस अपराध का, जिसका आरोप लगाया गया है, दोषी होने का अभिवचन करता है या विचारण किए जाने का दावा करता है।

Framing of charge-
(1) If, after such consideration and hearing as aforesaid, the Judge is of opinion that there is ground for presuming that the accused has committed an offence which-
(a) is not exclusively triable by the Court of Session, he may, frame a charge against the accused and, by order, transfer the case for trial to the Chief Judicial Magistrate, [or any other Judicial Magistrate of the first class and direct the accused to appear before the Chief Judicial Magistrate, or, as the case may be, the Judicial Magistrate of the first class, on such date as he deems fit, and thereupon such Magistrate] shall try the offence in accordance with the procedure for the trial of warrant-cases instituted on a police report ;
(b) is exclusively triable by the Court, he shall frame in writing a charge against the accused.
(2) Where the Judge frames any charge under clause (b) of sub-section (1), the charge shall be read and explained to the accused, and the accused shall be asked whether he pleads guilty of the offence charged or claims to be tried.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 228 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 227 | उन्मोचन | CrPC Section- 227 in hindi| Discharge.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 227 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 227 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 227 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 227 के अन्तर्गत यदि मामले के अभिलेख और उसके साथ दी गई दस्तावेजों पर विचार कर लेने पर और इस निमित्त अभियुक्त और अभियोजन के निवेदन की सुनवाई कर लेने के पश्चात् न्यायाधीश यह समझता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है तो वह अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और ऐसा करने के अपने कारणों को लेखबद्ध करेगा।

सीआरपीसी की धारा 227 के अनुसार

उन्मोचन–

यदि मामले के अभिलेख और उसके साथ दी गई दस्तावेजों पर विचार कर लेने पर और इस निमित्त अभियुक्त और अभियोजन के निवेदन की सुनवाई कर लेने के पश्चात् न्यायाधीश यह समझता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है तो वह अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और ऐसा करने के अपने कारणों को लेखबद्ध करेगा।

Discharge-
If, upon consideration of the record of the case and the documents submitted therewith, and after hearing the submissions of the accused and the prosecution in this behalf, the Judge considers that there is not sufficient ground for proceeding against the accused, he shall discharge the accused and record his reasons for so doing.

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सीआरपीसी की धारा 226 | अभियोजन के मामले के कथन का आरम्भ | CrPC Section- 226 in hindi| Opening case for prosecution.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 226 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 226 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 226 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 226 के अन्तर्गत जब अभियुक्त धारा 209 के अधीन मामले की सुपुर्दगी के अनुसरण में न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है तब अभियोजक अपने मामले का कथन, अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोप का वर्णन करते हुए और यह बताते हुए आरम्भ करेगा कि वह अभियुक्त के दोष को किस साक्ष्य से साबित करने की प्रस्थापना करता है।

सीआरपीसी की धारा 226 के अनुसार

अभियोजन के मामले के कथन का आरम्भ-

जब अभियुक्त धारा 209 के अधीन मामले की सुपुर्दगी के अनुसरण में न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है तब अभियोजक अपने मामले का कथन, अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोप का वर्णन करते हुए और यह बताते हुए आरम्भ करेगा कि वह अभियुक्त के दोष को किस साक्ष्य से साबित करने की प्रस्थापना करता है।

Opening case for prosecution-
When the accused appears or is brought before the Court in pursuance of a commitment of the case under Section 209, the prosecutor shall open his case by describing the charge brought against the accused and stating by what evidence he proposes to prove the guilt of the accused.

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सीआरपीसी की धारा 225 | विचारण का संचालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाना | CrPC Section- 225 in hindi| Trial to be conducted by Public Prosecutor.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 225 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 225 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 225 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 225 के अन्तर्गत सेशन न्यायालय के समक्ष प्रत्येक विचारण में, अभियोजन का संचालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाएगा।

सीआरपीसी की धारा 225 के अनुसार

विचारण का संचालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाना-

सेशन न्यायालय के समक्ष प्रत्येक विचारण में, अभियोजन का संचालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाएगा।

Trial to be conducted by Public Prosecutor-
In every trial before a Court of Session, the prosecution shall be conducted by a Public Prosecutor.

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सीआरपीसी की धारा 224 | कई आरोपों में से एक के लिए दोषसिद्धि पर शेष आरोपों को वापस लेना | CrPC Section- 224 in hindi| Withdrawal of remaining charges on conviction on one of several charges.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 224 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 224 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 224 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 224 के अन्तर्गत जब एक ही व्यक्ति के विरुद्ध ऐसा आरोप विरचित किया जाता है जिसमें एक से अधिक शीर्ष हैं और, जब उनमें से एक या अधिक के लिए, दोषसिद्धि कर दी जाती है तब परिवादी, या अभियोजन का संचालन करने वाला अधिकारी न्यायालय की सम्मति से शेष आरोप या आरोपों को वापस ले सकता है अथवा न्यायालय ऐसे आरोप या आरोपों की जांच या विचारण स्वप्रेरणा से रोक सकता है और ऐसे वापस लेने का प्रभाव ऐसे आरोप या आरोपों से दोषमुक्ति होगा; किन्तु यदि दोषसिद्धि अपास्त कर दी जाती है तो उक्त न्यायालय (दोषसिद्धि अपास्त करने वाले न्यायालय के आदेश के अधीन रहते हुए) ऐसे वापस लिए गए आरोप या आरोपों की जांच या विचारण में आगे कार्यवाही कर सकता है।

सीआरपीसी की धारा 224 के अनुसार

कई आरोपों में से एक के लिए दोषसिद्धि पर शेष आरोपों को वापस लेना-

जब एक ही व्यक्ति के विरुद्ध ऐसा आरोप विरचित किया जाता है जिसमें एक से अधिक शीर्ष हैं और, जब उनमें से एक या अधिक के लिए, दोषसिद्धि कर दी जाती है तब परिवादी, या अभियोजन का संचालन करने वाला अधिकारी न्यायालय की सम्मति से शेष आरोप या आरोपों को वापस ले सकता है अथवा न्यायालय ऐसे आरोप या आरोपों की जांच या विचारण स्वप्रेरणा से रोक सकता है और ऐसे वापस लेने का प्रभाव ऐसे आरोप या आरोपों से दोषमुक्ति होगा; किन्तु यदि दोषसिद्धि अपास्त कर दी जाती है तो उक्त न्यायालय (दोषसिद्धि अपास्त करने वाले न्यायालय के आदेश के अधीन रहते हुए) ऐसे वापस लिए गए आरोप या आरोपों की जांच या विचारण में आगे कार्यवाही कर सकता है।

Withdrawal of remaining charges on conviction on one of several charges-
When a charge containing more heads than one is framed against the same person, and when a conviction has been had on one or more of them, the complainant, or the officer conducting the prosecution, may, with the consent of the Court, withdraw the remaining charge or charges, or the Court of its own accord may stay the inquiry into, or trial of, such charge or charges and such withdrawal shall have the effect of an acquittal on such charge or charges, unless the conviction be set aside, in which case the said Court (subject to the order of the Court setting aside the conviction) may proceed with the inquiry into, or trial of, the charge or charges so withdrawn.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 224 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 222 | जब वह अपराध, जो साबित हुआ है, आरोपित अपराध के अन्तर्गत है | CrPC Section- 222 in hindi| When offence proved included in offence charged.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 222 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 222 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 222 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 222 के अन्तर्गत जब किसी व्यक्ति पर ऐसे अपराध का आरोप है जिसमें कई विशिष्टियां हैं जिनमें से केवल कुछ के संयोग से एक पूरा छोटा अपराध बनता है और ऐसा संयोग साबित हो जाता है किन्तु शेष विशिष्टियां साबित नहीं होती हैं तब वह उस छोटे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है यद्यपि उस पर उसका आरोप नहीं था। जब किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया है और ऐसे तथ्य साबित कर दिए। जाते हैं जो उसे घटाकर छोटा अपराध कर देते हैं तब वह छोटे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है। यद्यपि उस पर उसका आरोप नहीं था।

सीआरपीसी की धारा 222 के अनुसार

जब वह अपराध, जो साबित हुआ है, आरोपित अपराध के अन्तर्गत है-

(1) जब किसी व्यक्ति पर ऐसे अपराध का आरोप है जिसमें कई विशिष्टियां हैं जिनमें से केवल कुछ के संयोग से एक पूरा छोटा अपराध बनता है और ऐसा संयोग साबित हो जाता है किन्तु शेष विशिष्टियां साबित नहीं होती हैं तब वह उस छोटे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है यद्यपि उस पर उसका आरोप नहीं था।
(2) जब किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया है और ऐसे तथ्य साबित कर दिए। जाते हैं जो उसे घटाकर छोटा अपराध कर देते हैं तब वह छोटे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है। यद्यपि उस पर उसका आरोप नहीं था।
(3) जब किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप है तब वह उस अपराध को करने के प्रयत्न के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है यद्यपि प्रयत्न के लिए पृथक् आरोप न लगाया गया हो।
(4) इस धारा की कोई बात किसी छोटे अपराध के लिए उस दशा में दोषसिद्ध प्राधिकृत करने वाली न समझी जाएगी जिसमें ऐसे छोटे अपराध के बारे में कार्यवाही शुरू करने के लिए अपेक्षित शर्तें पूरी नहीं हुई है।
दृष्टान्त
(क) क पर उस सम्पत्ति के बारे में, जो वाहक के नाते उसके पास न्यस्त है, आपराधिक न्यासभंग के लिए भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 407 के अधीन आरोप लगाया गया है। यह प्रतीत होता है कि उस सम्पत्ति के बारे में धारा 406 के अधीन उसने आपराधिक न्यासभंग तो किया है किन्तु वह उसे वाहक के रूप में न्यस्त की गई थी। वह धारा 406 के अधीन आपराधिक न्यासभंग के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ख) क पर घोर उपहति कारित करने के लिए भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 325 के अधीन आरोप है। वह साबित कर देता है कि उसने घोर और आकस्मिक प्रकोपन पर कार्य किया था। वह उस संहिता की धारा 335 के अधीन दोषसिद्ध किया जा सकेगा।

When offence proved included in offence charged-
(1) When a person is charged with an offence consisting of several particulars, a combination of some only of which constitutes a complete minor offence, and such combination is proved, but the remaining particulars are not proved, he may be convicted of the minor offence, though he was not charged with it.
(2) When a person is charged with an offence and facts are proved which reduce it to a minor offence, he may be convicted of the minor offence, although he is not charged with it.
(3) When a person is charged with an offence, he may be convicted of an attempt to commit such offence although the attempt is not separately charged.
(4) Nothing in this section shall be deemed to authorise a conviction of any minor offence where the conditions requisite for the initiation of proceedings in respect of that minor offence have not been satisfied.
Illustrations
(a) A is charged, under Section 407 of the Indian Penal Code (45 of 1860), with criminal breach of trust in respect of property entrusted to him as a carrier. It appears, that he did commit criminal breach of trust under Section 406 of that Code in respect of the property, but that it was not enstrusted to him as a carrier. He may be convicted of criminal breach of trust under the said Section 406.
(b) A is charged, under Section 325 of the Indian Penal Code (45 of 1860), with causing grievous hurt. He proves that he acted on grave and sudden provocation. He may be convicted under Section 335 of that Code.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 222 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।