Home Blog Page 208

सीआरपीसी की धारा 187 | स्थानीय अधिकारिता के परे किए गए अपराध के लिए समन या वारण्ट जारी करने की शक्ति | CrPC Section- 187 in hindi| Power to issue summons or warrant for offence committed beyond local jurisdiction.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 187 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 187 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 187 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 187 के अन्तर्गत जब किसी प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण दिखाई देता है कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर के किसी व्यक्ति ने ऐसी अधिकारिता के बाहर, (चाहे भारत के अन्दर या बाहर) ऐसा अपराध किया है जिसकी जांच या विचारण 177 से 185 तक की धाराओं के (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं), उपबन्धों के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन ऐसी अधिकारिता के अन्दर नहीं किया जा सकता है किन्तु जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन भारत में विचारणीय है तब ऐसा मजिस्ट्रेट उस अपराध की जांच ऐसे कर सकता है। यह धारा 187 स्थानीय अधिकारिता के परे किए गए अपराध के लिए समन या वारण्ट जारी करने की शक्ति, प्रक्रिया को बताता है।

सीआरपीसी की धारा 187 के अनुसार

स्थानीय अधिकारिता के परे किए गए अपराध के लिए समन या वारण्ट जारी करने की शक्ति–

(1) जब किसी प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण दिखाई देता है कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर के किसी व्यक्ति ने ऐसी अधिकारिता के बाहर, (चाहे भारत के अन्दर या बाहर) ऐसा अपराध किया है जिसकी जांच या विचारण 177 से 185 तक की धाराओं के (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं), उपबन्धों के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन ऐसी अधिकारिता के अन्दर नहीं किया जा सकता है किन्तु जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन भारत में विचारणीय है तब ऐसा मजिस्ट्रेट उस अपराध की जांच ऐसे कर सकता है मानो वह ऐसी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर किया गया है और ऐसे व्यक्ति को अपने समक्ष हाजिर होने के लिए इसमें इसके पूर्व उपवन्धित प्रकार से विवश कर सकता है और ऐसे व्यक्ति को ऐसे अपराध की जांच या विचारण करने की अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट के पास भेज सकता है या यदि ऐसा अपराध मृत्यु से या आजीवन कारावास से दण्डनीय नहीं है और ऐसा व्यक्ति इस धारा के अधीन कार्रवाई करने वाले मजिस्ट्रेट को समाधानप्रद रूप में जमानत देने के लिए तैयार और इच्छुक है तो ऐसी अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष उसकी हाजिरी के लिए प्रतिभुओं सहित या रहित बंधपत्र ले सकता है।
(2) जब ऐसी अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट एक से अधिक हैं और इस धारा के अधीन कार्य करने वाला मजिस्ट्रेट अपना समाधान नहीं कर पाता है कि किस मजिस्ट्रेट के पास या समक्ष ऐसा व्यक्ति भेजा जाए या हाजिर होने के लिए आबद्ध किया जाए, तो मामले की रिपोर्ट उच्च न्यायालय के आदेश के लिए की जाएगी।

Power to issue summons or warrant for offence committed beyond local jurisdiction-
(1) When a Magistrate of the first class sees reason to believe that any person within his local jurisdiction has committed outside such jurisdiction (whether within or outside India) an offence which cannot, under the provisions of Sections 177 to 185 (both inclusive), or any other law for the time being in force, be inquired into or tried within such jurisdiction but is under some law for the time being in force triable in India, such Magistrate may inquire into the offence as if it had been committed within such local jurisdiction and compel such person in the manner hereinbefore provided to appear before him, and send such person to the Magistrate having jurisdiction to inquire into or try such offence, or, if such offence is not punishable with death or imprisonment for life and such person is ready and willing to give bail to the satisfaction of the Magistrate acting under this section, take a bond with or without sureties for his appearance before the Magistrate having such jurisdiction.
(2) When there are more Magistrates than one having such jurisdiction and the Magistrate acting under this section cannot satisfy himself as to the Magistrate to or before whom such person should be sent or bound to appear, the case shall be reported for the orders of the High Court.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 187 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 186 | सन्देह की दशा में उच्च न्यायालय का वह जिला विनिश्चित करना जिसमें जांच या विचारण होगा | CrPC Section- 186 in hindi| High Court to decide, in case of doubt, district where inquiry or trial shall take place.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 186 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 186 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 186 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 186 के अन्तर्गत जब जहां दो या अधिक न्यायालय एक ही अपराध का संज्ञान कर लेते हैं और यह प्रश्न उठता है कि उनमें से किसे उस अपराध की जांच या विचारण करना चाहिए, यदि वे न्यायालय एक ही उच्च न्यायालय के अधीनस्थ हैं तो उस उच्च न्यायालय द्वारा; या न्यायालय एक ही उच्च न्यायालय के अधीनस्थ नहीं हैं, तो उस उच्च न्यायालय द्वारा जिसकी अपीली दांडिक अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर कार्यवाही पहले प्रारम्भ की गई है।

सीआरपीसी की धारा 186 के अनुसार

सन्देह की दशा में उच्च न्यायालय का वह जिला विनिश्चित करना जिसमें जांच या विचारण होगा–

जहां दो या अधिक न्यायालय एक ही अपराध का संज्ञान कर लेते हैं और यह प्रश्न उठता है कि उनमें से किसे उस अपराध की जांच या विचारण करना चाहिए, वहां वह प्रश्न-
(क) यदि वे न्यायालय एक ही उच्च न्यायालय के अधीनस्थ हैं तो उस उच्च न्यायालय द्वारा;
(ख) यदि वे न्यायालय एक ही उच्च न्यायालय के अधीनस्थ नहीं हैं, तो उस उच्च न्यायालय द्वारा • जिसकी अपीली दांडिक अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर कार्यवाही पहले प्रारम्भ की गई है,
विनिश्चित किया जाएगा, और तब उस अपराध के सम्बन्ध में अन्य सब कार्यवाहियां बन्द कर दी जाएंगी।

High Court to decide, in case of doubt, district where inquiry or trial shall take place-
Where two or more Courts have taken cognizance of the same offence and a question arises as to which of them ought to inquire into or try that offence, the question shall be decided-
(a) if the Courts are subordinate to the same High Court, by that High Court;
(b) if the Courts are not subordinate to the same High Court, by the High Court within the local limits of whose appellate criminal jurisdiction the proceedings were first commenced.
and thereupon all other proceedings in respect of that offence shall be discontinued.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 186 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 185 | विभिन्न सेशन खण्डों में मामलों के विचारण का आदेश देने की शक्ति | CrPC Section- 185 in hindi| Power to order cases to be tried in different sessions divisions.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 185 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 185 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 185 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 185 के अन्तर्गत जब कोई राज्य सरकार निर्देश दे सकती है कि ऐसे किन्हीं मामलों का या किसी वर्ग के मामलों का विचारण, जो किसी जिले में विचारणार्थ सुपुर्द हो चुके हैं, किसी भी सेशन खंड में किया जा सकता है। उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान के अधीन या इस संहिता के या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन पहले ही जारी किए गए किसी निदेश के विरुद्ध नहीं है।

सीआरपीसी की धारा 185 के अनुसार

विभिन्न सेशन खण्डों में मामलों के विचारण का आदेश देने की शक्ति-

इस अध्याय के पूर्ववर्ती उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार निर्देश दे सकती है कि ऐसे किन्हीं मामलों का या किसी वर्ग के मामलों का विचारण, जो किसी जिले में विचारणार्थ सुपुर्द हो चुके हैं, किसी भी सेशन खंड में किया जा सकता है :
परन्तु यह तब जब कि ऐसा निर्देश उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान के अधीन या इस संहिता के या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन पहले ही जारी किए गए किसी निदेश के विरुद्ध नहीं है।

Power to order cases to be tried in different sessions divisions-
Notwithstanding anything contained in the preceding provisions of this Chapter, the State Government may direct that any cases or class of cases committed for trial in any district may be tried in any sessions division:
Provided that such direction is not repugnant to any direction previously issued by the High Court or the Supreme Court under the Constitution, or under this Code or any other law for the time being in force.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 185 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 184 | एक साथ विचारणीय अपराधों के लिए विचारण का स्थान-जहाँ | CrPC Section- 184 in hindi| Place of trial for offences triable together-Where.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 184 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 184 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 184 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 184 के अन्तर्गत किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध ऐसे हैं कि प्रत्येक ऐसे अपराध के लिए धारा 219, धारा 220 या धारा 221 के उपबन्धों के आधार पर एक ही विचारण में उस पर आरोप लगाया जा सकता है और उसका विचारण किया जा सकता है, अथवा कई व्यक्तियों द्वारा किया गया अपराध या किए गए अपराध ऐसे हैं कि उनके लिए उन पर धारा 223 के उपबन्धों के आधार पर एक साथ आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है।

सीआरपीसी की धारा 184 के अनुसार

एक साथ विचारणीय अपराधों के लिए विचारण का स्थान- -जहाँ-

(क) किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध ऐसे हैं कि प्रत्येक ऐसे अपराध के लिए धारा 219, धारा 220 या धारा 221 के उपबन्धों के आधार पर एक ही विचारण में उस पर आरोप लगाया जा सकता है और उसका विचारण किया जा सकता है, अथवा
(ख) कई व्यक्तियों द्वारा किया गया अपराध या किए गए अपराध ऐसे हैं कि उनके लिए उन पर धारा 223 के उपबन्धों के आधार पर एक साथ आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है,
वहां अपराध की जांच या विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जो उन अपराधों में से किसी की जांच या विचारण करने के लिए सक्षम है।

Place of trial for offences triable together- Where-
(a) the offences committed by any person are such that he may be charged with, and tried at one trial for, each such offence by virtue of the provisions of Section 219, Section 220 or Section 221, or
(b) the offence or offences committed by several persons are such that they may be charged with and tried together by virtue of the provisions of Section 223,
the offences may be inquired into or tried by any Court competent to inquire into or try any of the offences.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 184 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 183 | यात्रा या जलयात्रा में किया गया अपराध | CrPC Section- 183 in hindi| Offence committed on journey or voyage.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 183 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 183 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 183 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 183 के अन्तर्गत यदि कोई अपराध उस समय किया गया है जब वह व्यक्ति, जिसके द्वारा, या वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध, या वह चीज जिसके बारे में वह अपराध किया गया, किसी यात्रा या जलयात्रा पर है, तो उसकी जांच या विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है, जिसकी स्थानीय अधिकारिता में होकर या उसके अन्दर वह व्यक्ति या चीज उस यात्रा या जल यात्रा के दौरान गई है।

सीआरपीसी की धारा 183 के अनुसार

यात्रा या जलयात्रा में किया गया अपराध-

यदि कोई अपराध उस समय किया गया है जब वह व्यक्ति, जिसके द्वारा, या वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध, या वह चीज जिसके बारे में वह अपराध किया गया, किसी यात्रा या जलयात्रा पर है, तो उसकी जांच या विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है, जिसकी स्थानीय अधिकारिता में होकर या उसके अन्दर वह व्यक्ति या चीज उस यात्रा या जल यात्रा के दौरान गई है।

Offence committed on journey or voyage-
When an offence is committed whilst the person by or against whom, or the thing in respect of which, the offence is committed is in the course of performing a journey or voyage, the offence may be inquired into or tried by a Court through or into whose local jurisdiction that person or thing passed in the course of that journey or voyage.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 183 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 182 | पत्रों, आदि द्वारा किए गए अपराध | CrPC Section- 182 in hindi| Offences committed by letters, etc.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 182 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 182 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 182 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 182 के अन्तर्गत किसी ऐसे अपराध की, जिसमें छल करना भी है, जांच या उनका विचारण, उस दशा में जिसमें ऐसी प्रवंचना पत्रों या दूरसंचार संदेशों के माध्यम से की गई है ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर ऐसे पत्र या संदेश भेजे गए हैं। या प्राप्त किए गए हैं तथा छल करने और बेईमानी से सम्पत्ति का परिदान उत्प्रेरित करने वाले किसी अपराध की जांच या उनका विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। यदि अपराधी ने प्रथम विवाह किया और अपनी पत्नी या पति के साथ अन्तिम बार निवास किया है। [या प्रथम विवाह की पत्नी अपराध के किए जाने के पश्चात् स्थायी रूप से निवास करती है ऐसे मामले मे यह धारा लागू होगी।

सीआरपीसी की धारा 182 के अनुसार

पत्रों, आदि द्वारा किए गए अपराध-

(1) किसी ऐसे अपराध की, जिसमें छल करना भी है, जांच या उनका विचारण, उस दशा में जिसमें ऐसी प्रवंचना पत्रों या दूरसंचार संदेशों के माध्यम से की गई है ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर ऐसे पत्र या संदेश भेजे गए हैं। या प्राप्त किए गए हैं तथा छल करने और बेईमानी से सम्पत्ति का परिदान उत्प्रेरित करने वाले किसी अपराध की जांच या उनका विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर सम्पत्ति, प्रवंचित व्यक्ति द्वारा परिदत्त की गई है या अभियुक्त व्यक्ति द्वारा प्राप्त की गई है।
(2) भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 494 या धारा 495 के अधीन दण्डनीय किसी अपराध की जांच या उनका विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर अपराध किया गया है या अपराधी ने प्रथम विवाह की अपनी पत्नी या पति के साथ अन्तिम बार निवास किया है। [या प्रथम विवाह की पत्नी अपराध के किए जाने के पश्चात् स्थायी रूप से निवास करती है।

Offences committed by letters, etc-
(1) Any offence which includes cheating may, if the deception is practised by means of letters or telecommunication messages, be inquired into or tried by any Court within whose local jurisdiction such letters or messages were sent or were received; and any offence of cheating and dishonestly inducing delivery of property may be inquired into or tried by a Court within whose local jurisdiction the property was delivered by the person deceived or was received by the accused person.
(2) Any offence punishable under Section 494 or Section 495 of the Indian Penal Code (45 of 1860) may be inquired into or tried by a Court within whose local jurisdiction the offence was committed or the offender last resided with his or her spouse by the first marriage, or the wife by the first marriage has taken up permanent residence after the commission of the offence.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 182 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।