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सीआरपीसी की धारा 111 | आदेश का दिया जाना | CrPC Section- 111 in hindi| Order to be made.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 111 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 111 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 111 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 111 के अन्तर्गत जब किसी मामले में जो धारा 107, धारा 108, धारा 109 या धारा 110 के अधीन कार्य कर रहा है, यह आवश्यक समझता है कि किसी व्यक्ति से अपेक्षा की जाए कि वह उस धारा के अधीन कारण दर्शित करे तब वह मजिस्ट्रेट प्राप्त इत्तिला का सार, उस बन्धपत्र की रकम, जो निष्पादित किया जाना है, तो वह धारा 111 के अंतर्गत वह अवधि जिसके लिये वह प्रवर्तन में रहेगा और प्रतिभुओं की (यदि कोई हों) अपेक्षित संख्या, प्रकार और वर्ग बताते हुए लिखित आदेश देगा।

सीआरपीसी की धारा 111 के अनुसार

आदेश का दिया जाना-

जब कोई मजिस्ट्रेट, जो धारा 107, धारा 108, धारा 109 या धारा 110 के अधीन कार्य कर रहा है, यह आवश्यक समझता है कि किसी व्यक्ति से अपेक्षा की जाए कि वह उस धारा के अधीन कारण दर्शित करे तब वह मजिस्ट्रेट प्राप्त इत्तिला का सार, उस बन्धपत्र की रकम, जो निष्पादित किया जाना है, वह अवधि जिसके लिये वह प्रवर्तन में रहेगा और प्रतिभुओं की (यदि कोई हों) अपेक्षित संख्या, प्रकार और वर्ग बताते हुए लिखित आदेश देगा।

Order to be made-
When a Magistrate acting under Section 107, Section 108, Section 109 or Section 110, deems it necessary to require any person to show cause under such section, he shall make an order in writing, setting forth the substance of the information received, the amount of the bond to be executed, the term for which it is to be in force, and the number, character and class of sureties (if any) required.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 111 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 110 | आभ्यासिक अपराधियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति | CrPC Section- 110 in hindi| Security for good behaviour from habitual offenders.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 110 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 110 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 110 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 110 के अन्तर्गत जब किसी मामले में किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को इत्तिला मिलती है, कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर कोई ऐसा अभ्यासत: लुटेरा, गृहभेदक, चोर या कूटरचयिता है, चुराई हुई सम्पत्ति का, उसे चुराई हुई जानते हुए, अभ्यासतः प्रापक है,अभ्यासत: चोरों संरक्षा करता है या चोरों को संश्रय देता है या चुराई हुई सम्पत्ति को छिपाने या उसके व्ययन में सहायता देता है अथवा व्यपहरण, अपहरण, उद्दापन, छल या रिष्टि आदि का अपराध करता है, तो वह धारा 110 के अंतर्गत उस न्यायालय के अधिकारी को यह शक्ति होती है कि ऐसे अपराधियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति ले सकते है।

किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को इत्तिला मिलती है, कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर कोई ऐसा व्यक्ति है जो लुटेरा, ग्रहभेदक, चुराई हुई संपत्ति, कूटरचित दस्तावेज, चोरों को संश्रय देना, अपहरण, छल इत्यादि का  दुष्प्रेरण करता है। CrPC की धारा 110 न्यायालय के अधिकारी को यह शक्ति होती है कि ऐसे अपराधियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति ले सकते है।

सीआरपीसी की धारा 110 के अनुसार

आभ्यासिक अपराधियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति-

जब किसी [कार्यपालक मजिस्ट्रेट] को यह इत्तिला मिलती है कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर कोई ऐसा व्यक्ति है, जो-
(क) अभ्यासत: लुटेरा, गृहभेदक, चोर या कूटरचयिता है; अथवा
(ख) चुराई हुई सम्पत्ति का, उसे चुराई हुई जानते हुए, अभ्यासतः प्रापक है; अथवा
(ग) अभ्यासत: चोरों संरक्षा करता है या चोरों को संश्रय देता है या चुराई हुई सम्पत्ति को छिपाने या उसके व्ययन में सहायता देता है; अथवा
(घ) व्यपहरण, अपहरण, उद्दापन, छल या रिष्टि का अपराध या भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45 ) के अध्याय 12 के अधीन या उस संहिता की धारा 489क, धारा 489ख, धारा 489ग या धारा 489घ के अधीन दण्डनीय कोई अपराध अभ्यासत: करता है या करने का प्रयत्न करता है या करने का दुष्प्रेरण करता है; अथवा
(ङ) ऐसे अपराध अभ्यासतः करता है या करने का प्रयत्न करता है या करने का दुष्प्रेरण करता है, जिनमें परिशान्ति भंग समाहित है; अथवा
(च) कोई ऐसा अपराध अभ्यासतः करता है या करने का प्रयत्न करता है या करने का दुष्प्रेरण करता है जो
(i) निम्नलिखित अधिनियमों में से एक या अधिक के अधीन कोई अपराध है, अर्थात् :-
(क) औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (1940 का 23 );
(ख) विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) ];
(ग) कर्मचारी भविष्य निधि [और कुटुम्ब पेंशन निधि] अधिनियम, 1952 (1952 का 19);
(घ) खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 (1954 का 37);
(ङ) आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (1955 का 10);
(च) अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 (1955 का 22 );
(छ) सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) ;
(ज) विदेशियो विषयक अधिनियम, 1946.

Security for good behaviour from habitual offenders-
When an [Executive Magistrate] receives information that there is within his local jurisdiction a person who-
(a) is by habit a robber, house-breaker, thief, or forger, or
(b) is by habit a receiver of stolen property knowing the same to have been stolen, or
(c) habitually protects or harbours thieves, or aids in the concealment or disposal of stolen property, or
(d) habitually commits, or attempts to commit, or abets the commission of, the offence of kidnapping, abduction, extortion, cheating or mischief, or any offence punishable under Chapter XII of the Indian Penal Code (45 of 1860), or under Section 489-A, Section 489-B, Section 489-C or Section 489-D of that Code, or
(e) habitually commits, or attempts to commit, or abets the commission of, offences, involving a breach of the peace, or
(f) habitually commits, or attempts to commit, or abets the commission of
(i) any offence under one or more of the following Acts, namely :-
(a) the Drugs and Cosmetics Act, 1940 (23 of 1940);
(b) the Foreign Exchange Regulation Act, 1973 (46 of 1973);
(c) the Employees’ Provident Fund 4[and Family Pension Fund] Act, 1952 (19 of 1952);
(d) the Prevention of Food Adulteration Act, 1954 (37 of 1954);
(e) the Essential Commodities Act, 1955 (10 of 1955);
(f) the Untouchability (Offences) Act, 1955 (22 of 1955);
(g) the Customs Act, 1962 (52 of 1962) ;
(h) the Foreigners Act, 1946; or

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सीआरपीसी की धारा 109 | संदिग्ध व्यक्तियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति | CrPC Section- 109 in hindi| Security for good behaviour from suspected persons.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 109 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 109 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 109 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 109 के अन्तर्गत जब किसी मामले में किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को इत्तिला मिलती है, कि उसकी स्थानीय अन्दर अपनी उपस्थिति छिपाने के लिए पूर्वावधानियां बरत रहा है और यह विश्वास करने का कारण है कि वह कोई संज्ञेय अपराध कराने की दृष्टि से ऐसा कर रहा है, तो वह धारा 109 के अंतर्गत उस न्यायालय के अधिकारी को यह शक्ति होती है कि वह संदिग्ध व्यक्तियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति एक निश्चित समय के लिए ले सकता है।

किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को इत्तिला मिलती है, कि उसकी स्थानीय अधिकारिता में कोई संदिग्ध व्यक्ति, किसी ऐसे व्यक्ति को छिपाने का प्रयास कर रहा है CrPC की धारा 109 न्यायालय के अधिकारी को यह शक्ति होती है कि एक वर्ष से अनधिक की इतनी अवधि के लिए, जितनी वह मजिस्ट्रेट ठीक समझे उसे अपने सदाचार के लिए प्रतिभुओं सहित या रहित बन्धपत्र निष्पादित करने के लिए आदेश क्यों न दिया जाए।

सीआरपीसी की धारा 109 के अनुसार

संदिग्ध व्यक्तियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति-

जब किसी [कार्यपालक मजिस्ट्रेट] को इत्तिला मिलती है कि कोई व्यक्ति उसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर अपनी उपस्थिति छिपाने के लिए पूर्वावधानियां बरत रहा है और यह विश्वास करने का कारण है कि वह कोई संज्ञेय अपराध कराने की दृष्टि से ऐसा कर रहा है, तब वह मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति से इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित रीति से अपेक्षा कर सकता है कि वह कारण दर्शित करे कि एक वर्ष से अनधिक की इतनी अवधि के लिए, जितनी वह मजिस्ट्रेट ठीक समझे उसे अपने सदाचार के लिए प्रतिभुओं सहित या रहित बन्धपत्र निष्पादित करने के लिए आदेश क्यों न दिया जाए।

Security for good behaviour from suspected persons-
When an [Executive Magistrate] receives information that there is within his local jurisdiction a person taking precautions to conceal his presence and that there is reason to believe that he is doing so with a view to committing a cognizable offence, the Magistrate may, in the manner hereinafter provided, require such person to show cause why he should not be ordered to execute a bond, with or without sureties, for his good behaviour for such period, not exceeding one year, as the Magistrate thinks fit.

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सीआरपीसी की धारा 107 | अन्य दशाओं में परिशान्ति कायम रखने के लिए प्रतिभूति | CrPC Section- 107 in hindi| Security for keeping the peace in other cases.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 107 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 107 के अन्तर्गत जब किसी मामले में किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को इत्तिला मिलती है कि संभाव्य है कि कोई व्यक्ति परिशान्ति भंग करेगा या लोक प्रशान्ति विक्षुब्ध करेगा या कोई ऐसा सदोष कार्य करेगा जिससे सम्भाव्यतः परिशान्ति भंग हो जाएगी या लोक प्रशान्ति विक्षुब्ध हो जाएगी, तो वह धारा 107 के अंतर्गत उस न्यायालय को यह शक्ति होती है अगर चाहे तो, किसी मामले में परिशान्ति कायम रखने के लिए प्रतिभूति ले सकता है।

किसी न्यायालय के मजिस्ट्रेट को जब ऐसा प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति परिशान्ति भंग करेगा या लोक प्रशान्ति विक्षुब्ध करेगा या कोई ऐसा सदोष कार्य करेगा जिससे सम्भाव्यतः परिशान्ति भंग हो जाएगी या लोक प्रशान्ति विक्षुब्ध हो जाएगी तब CrPC की धारा 107 के अंतर्गत न्यायालय के अधिकारी को यह शक्ति होती है अगर चाहे तो, किसी मामले में परिशान्ति कायम रखने के लिए प्रतिभूति ले सकता है।

सीआरपीसी की धारा 107 के अनुसार

अन्य दशाओं में परिशान्ति कायम रखने के लिए प्रतिभूति-

(1) जब किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को इत्तिला मिलती है कि संभाव्य है कि कोई व्यक्ति परिशान्ति भंग करेगा या लोक प्रशान्ति विक्षुब्ध करेगा या कोई ऐसा सदोष कार्य करेगा जिससे सम्भाव्यतः परिशान्ति भंग हो जाएगी या लोक प्रशान्ति विक्षुब्ध हो जाएगी तब यदि उसकी राय में कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है तो वह, ऐसे व्यक्ति से इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति से अपेक्षा कर सकता है कि वह कारण दर्शित करे कि एक वर्ष से अनधिक की इतनी अवधि के लिए, जितनी मजिस्ट्रेट नियत करना ठीक समझे, परिशान्ति कायम रखने के लिए उसे [प्रतिभुओं सहित या रहित] बन्धपत्र निष्पादित करने के लिए आदेश क्यों न दिया जाए।
(2) इस धारा के अधीन कार्यवाही किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष तब की जा सकती है जब या तो वह स्थान जहां परिशान्ति भंग या विक्षोभ की आशंका है, उसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर है या ऐसी अधिकारिता के अन्दर कोई ऐसा व्यक्ति है, जो ऐसी अधिकारिता के परे सम्भाव्यतः परिशान्ति भंग करेगा या लोक प्रशान्ति विक्षुब्ध करेगा या यथापूर्वोक्त कोई सदोष कार्य करेगा।

Security for keeping the peace in other cases-
(1) When an Executive Magistrate receives information that any person is likely to commit a breach of the peace or disturb the public tranquillity or to do any wrongful act that may probably occasion a breach of the peace or disturb the public tranquillity and is of opinion that there is sufficient ground for proceeding, he may, in the manner hereinafter provided, require such person to show cause why he should not be ordered to execute a bond, [with or without sureties] for keeping the peace for such period, not exceeding one year, as the Magistrate thinks fit.
(2) Proceedings under this section may be taken before any Executive Magistrate when either the place where the breach of the peace or disturbance is apprehended is within his local jurisdiction or there is within such jurisdiction a person who is likely to commit a breach of the peace or disturb the public tranquillity or to do any wrongful act as aforesaid beyond such jurisdiction.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 107 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 106 | दोषसिद्धि पर परिशान्ति कायम रखने के लिए प्रतिभूति | CrPC Section- 106 in hindi| Security for keeping the peace on conviction.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 106 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 106 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 106 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 106 के अन्तर्गत जब न्यायालय किसी अपराध के लिए या किसी ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण के लिए सिद्धदोष ठहराता है और उसको यह राय है कि यह आवश्यक है कि परिशान्ति कायम रखने के लिए ऐसे व्यक्ति से प्रतिभूति ली जाए, तब न्यायालय ऐसे व्यक्ति को दण्डादेश देते समय उसे आदेश दे सकता है कि वह तीन वर्ष से अनधिक इतनी अवधि के लिए, जितनी वह ठीक समझे, परिशान्ति कायम रखने के लिए, प्रतिभुओं सहित या रहित, बन्धपत्र निष्पादित करे, तो वह धारा 106 के अंतर्गत उस न्यायालय को यह शक्ति होती है कि अगर चाहे तो, किसी मामले में दोषसिद्धि पर परिशान्ति कायम रखने के लिए प्रतिभूति ले सकते है।

जब न्यायालय किसी मामले में किसी व्यक्ति पर दोषसिद्धि ठहराती है, तो न्यायालय के मजिस्ट्रेट को यह शक्ति होती है कि वह उस व्यक्ति से दोषसिद्धि पर परिशान्ति कायम रखने के लिए प्रतिभूति ले सकते है CrPC की धारा 106 न्यायालय में दोषसिद्धि पर परिशान्ति कायम रखने के लिए प्रतिभूति को परिभाषित करती है।

सीआरपीसी की धारा 106 के अनुसार

दोषसिद्धि पर परिशान्ति कायम रखने के लिए प्रतिभूति-

(1) जब सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट का न्यायालय किसी व्यक्ति को उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट अपराध में से किसी अपराध के लिए या किसी ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण के लिए सिद्धदोष ठहराता है और उसको यह राय है कि यह आवश्यक है कि परिशान्ति कायम रखने के लिए ऐसे व्यक्ति से प्रतिभूति ली जाए, तब न्यायालय ऐसे व्यक्ति को दण्डादेश देते समय उसे आदेश दे सकता है कि वह तीन वर्ष से अनधिक इतनी अवधि के लिए, जितनी वह ठीक समझे, परिशान्ति कायम रखने के लिए, प्रतिभुओं सहित या रहित, बन्धपत्र निष्पादित करे।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अपराध निम्नलिखित हैं-
(क) भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 8 के अधीन दण्डनीय कोई अपराध जो धारा 153क या धारा 153ख या धारा 154 के अधीन दण्डनीय अपराध से भिन्न है;
(ख) कोई ऐसा अपराध जो, या जिसके अन्तर्गत हमला आपराधिक बल का प्रयोग या रिष्टि करना;
(ग) आपराधिक अभित्रास का कोई अपराध;
(घ) कोई अन्य अपराध, जिससे परिशान्ति भंग हुई है या जिससे परिशान्ति भंग आशयित है, या जिसके बारे में ज्ञात था कि उससे परिशान्ति भंग सम्भाव्य है।
(3) यदि दोषसिद्धि अपील पर या अन्यथा अपास्त कर दी जाती है तो वह बन्धपत्र, जो ऐसे निष्पादित किया गया था, शून्य हो जाएगा।
(4) इस धारा के अधीन आदेश अपील न्यायालय द्वारा या किसी न्यायालय द्वारा भी, जब वह पुनरीक्षण की अपनी शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो, किया जा सकेगा।

Security for keeping the peace on conviction-
(1) When a Court of Session or Court of a Magistrate of the first class convicts a person of any of the offences specified in sub-section (2) or of abetting any such offence and is of opinion that it is necessary to take security from such person for keeping the peace, the Court may, at the time of passing sentence on such person, order him to execute a bond, with or without sureties, for keeping the peace for such period, not exceeding three years, as it thinks fit.
(2) The offences referred to in sub-section (1) are-
(a) any offence punishable under Chapter VIII of the Indian Penal Code (45 of 1860), other than an offence punishable under Section 153-A or Section 153-B or Section 154 thereof;
(b) any offence which consists of, or includes, assault or using criminal force or committing mischief;
(c) any offence of criminal intimidation;
(d) any other offence which caused or was intended or known to be likely to cause, a breach of the peace.
(3) If the conviction is set aside on appeal or otherwise, the bond so executed shall
become void.
(4) An order under this section may also be made by an Appellate Court or by a Court when exercising its powers of revision.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 106 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 108 | राजद्रोहात्मक बातों को फैलाने वाले व्यक्तियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति | CrPC Section- 108 in hindi| Security for good behaviour from persons disseminating seditious matters.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 108 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 108 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 108 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 108 के अन्तर्गत जब किसी मामले में किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को इत्तिला मिलती है, कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर कोई ऐसा व्यक्ति है जो ऐसी अधिकारिता के अन्दर या बाहर राजद्रोहात्मक बातों को फैला रहा है, फैलाने का प्रयास कर रहा है या मौखिक रूप से या लिखित रूप या किसी अन्य रूप से निम्नलिखित बातें साशय फैलाता है या फैलाने का प्रयत्न करता है या फैलाने का दुष्प्रेरण करता है, तो वह धारा 108 के अंतर्गत उस न्यायालय के अधिकारी को यह शक्ति होती है कि राजद्रोहात्मक बातों को फैलाने वाले व्यक्तियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति ले सकता है।

किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को इत्तिला मिलती है, कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर कोई ऐसा व्यक्ति है जो ऐसी अधिकारिता के अन्दर या बाहर राजद्रोहात्मक बातों को फैला रहा है, फैलाने का प्रयास कर रहा है या मौखिक रूप से या लिखित रूप या किसी अन्य रूप से निम्नलिखित बातें साशय फैलाता है या फैलाने का प्रयत्न करता है या फैलाने का दुष्प्रेरण करता है। CrPC की धारा 108 न्यायालय के अधिकारी को यह शक्ति होती है कि राजद्रोहात्मक बातों को फैलाने वाले व्यक्तियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति लेने को परिभाषित करता है।

सीआरपीसी की धारा 108 के अनुसार

राजद्रोहात्मक बातों को फैलाने वाले व्यक्तियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति–

(1) जब किसी [कार्यपालक मजिस्ट्रेट] को इत्तिला मिलती है कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर कोई ऐसा व्यक्ति है जो ऐसी अधिकारिता के अन्दर या बाहर-
(i) या तो मौखिक रूप से या लिखित रूप या किसी अन्य रूप से निम्नलिखित बातें साशय फैलाता है या फैलाने का प्रयत्न करता है या फैलाने का दुष्प्रेरण करता है, अर्थात् :- (क) कोई ऐसी बात, जिसका प्रकाशन भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 124क या धारा 153क या धारा 153ख या धारा 295क के अधीन दण्डनीय है; अथवा
(ख) किसी न्यायाधीश से, जो अपने पदीय कर्तव्यों के निर्वहन में कार्य कर रहा है या कार्य करने का तात्पर्य रखता है, सम्बद्ध कोई बात जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अधीन आपराधिक अभित्रास या मानहानि की कोटि में आती है; अथवा
(ii) भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 292 में यथानिर्दिष्ट कोई अश्लील वस्तु विक्रय के लिए बनाता, उत्पादित करता, प्रकाशित करता या रखता है, आयात करता है, निर्यात करता है, प्रवहण करता है, विक्रय करता है, भाड़े पर देता है, वितरित करता है, सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करता है या किसी अन्य प्रकार से परिचालित करता है,
और उस मजिस्ट्रेट की राय में कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है तब ऐसा मजिस्ट्रेट, ऐसे व्यक्ति से इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति से अपेक्षा कर सकता है कि वह कारण दर्शित करे कि एक वर्ष से अनधिक की इतनी अवधि के लिए जितनी वह मजिस्ट्रेट ठीक समझे, उसे अपने सदाचार के लिए प्रतिभूओं सहित या रहित बन्धपत्र निष्पादित करने के लिए आदेश क्यों न दिया जाए।
(2) प्रेस और पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1867 (1867 का 25) में दिए गए नियमों के अधीन रजिस्ट्रीकृत, और उनके अनुरूप सम्पादित, मुद्रित और प्रकाशित किसी प्रकाशन में अन्तर्विष्ट किसी बात के बारे में कोई कार्यवाही ऐसे प्रकाशन के सम्पादक, स्वत्वधारी, मुद्रक या प्रकाशक के विरुद्ध राज्य सरकार के, या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त किए गए किसी अधिकारी के आदेश से या उसके प्राधिकार के अधीन ही की जाएगी, अन्यथा नहीं।

Security for good behaviour from persons disseminating seditious matters-
(1) When [an Executive Magistrate] receives information that there is within his local jurisdiction any person who, within or without such jurisdiction,-
(i) either orally or in writing or in any other manner, intentionally disseminates or attempts to disseminate or abets the dissemination of,-
(a) any matter the publication of which is punishable under Section 124 A or Section 153-A or Section 153-B or Section 295-A of the Indian Penal Code (45 of 1860), or
(b) any matter concerning a Judge acting or purporting to act in the discharge of his official duties which amounts to criminal intimidation or defamation under the Indian Penal Code (45 of 1860),
(ii) makes, produces, publishes or keeps for sale, imports, exports, conveys, sells, lets to hire, distributes, publicly exhibits or in any other manner puts into circulation any obscene matter such as is referred to in Section 292 of the Indian Penal Code (45 of 1860),
and the Magistrate is of opinion that there is sufficient ground for proceeding, the Magistrate may, in the manner hereinafter provided, require such person to show cause why he should not be ordered to execute a bond, with or without sureties, for his good behaviour for such period, not exceeding one year, as the Magistrate thinks fit.
(2) No proceedings shall be taken under this section against the editor, proprietor, printer or publisher of any publication registered under, and edited, printed and published in conformity with, the rules laid down in the Press and Registration of Books Act, 1867 (25 of 1867), with reference to any matter contained in such publication except by the order or under the authority of the State Government or some officer empowered by the State Government in this behalf.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 108 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।