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आईपीसी की धारा 131 | विद्रोह का दुष्प्रेरण या किसी सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक को कर्तव्य से विचलित करने का प्रयत्न करना | IPC Section- 131 in hindi | Abetting mutiny, or attempting to seduce a soldier, sailor or airman from his duty.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 131 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 131? साथ ही हम आपको IPC की धारा 131 सम्पूर्ण जानकारी एवम् क्या सजा मिलेगी और कैसे क्या जमानत मिलेगी। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 131 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 131 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई भारत सरकार की सेना, नौसेना, या वायुसेना द्वारा विद्रोह किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा अथवा उसकी राजनिष्ठा या उसके कर्तव्य से विचलित करने की कोशिश करेगा तो भारतीय दंड संहिता की धारा 131 अप्लाई होगी। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 131 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 131 के अनुसार-

विद्रोह का दुष्प्रेरण या किसी सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक को कर्तव्य से विचलित करने का प्रयत्न करना-

जो कोई भारत सरकार की सेना, नौसेना, या वायुसेना के किसी आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा विद्रोह किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, या किसी ऐसे आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक को उसकी राजनिष्ठा या उसके कर्त्तव्य से विचलित करने का प्रयत्न करेगा, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
स्पष्टीकरण- इस धारा में “आफिसर”, “सैनिक”, “नौसैनिक” और “वायुसैनिक” शब्दों के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति आता है, जो, यथास्थिति, आर्मी ऐक्ट, सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नेवल डिसिप्लिन ऐक्ट, इंडियन नेवी (डिसिप्लिन) ऐक्ट, 1934 (1934 का 34) एयरफोर्स ऐक्ट या वायुसेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अध्यधीन हो।

Abetting mutiny, or attempting to seduce a soldier, sailor or airman from his duty-
Whoever abets the committing of mutiny by an officer, soldier, sailor or airman, in the Army, Navy or Air Force of the Government of India, or attempts to seduce any such officer, soldier, sailor or airman from his allegiance or his duty, shall be punished with imprisonment for life or with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.
Explanation- In this section the words “officer”, “soldier”, “sailor” and “airman” include any person subject to the Army Act, the Army Act, 1950, (46 of 1950) the Naval Discipline Act, the Indian Navy (Discipline) Act, 1934, (34 of 1934) the Air Force Act or the Air Force Act, 1950 (45 of 1959) as the case may be.

लागू अपराध

विद्रोह का दुष्प्रेरण या किसी सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक को उसकी राजनिष्ठा या कर्तव्य से विचलित करने का प्रयत्न करना।
सजा- आजीवन कारावास, या दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
यह एक गैर-जमानतीय, संज्ञेय अपराध है और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नही है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 131 के अंतर्गत जो कोई भारत सरकार की सेना, नौसेना, या वायुसेना को उसकी राजनिष्ठा अथवा उसके कर्तव्य से विचलित करने का प्रयास करेगा वह आजीवन कारावास, या दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी, दण्डनीय होगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

जो कोई व्यक्ति भारत सरकार की सेना, नौसेना, या वायुसेना को उसकी राजनिष्ठा अथवा उसके कर्तव्य से विचलित करने का प्रयास करेगा तो वह व्यक्ति भारतीय दंड संहिता की धारा 131 के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा ऐसे अपराध कारित करने वाले व्यक्ति अपराध के अनुसार ही मामले में पुलिस द्वारा FIR दर्ज करती है यह अपराध गैर-जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
विद्रोह का दुष्प्रेरण या किसी सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक को उसकी राजनिष्ठा या कर्तव्य से विचलित करने का प्रयत्न करना।आजीवन कारावास, या दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।संज्ञेयगैर-जमानतीयसेशन न्यायालय द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 131 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 133 | सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अपने वरिष्ठ आफिसर पर जबकि वह आफिसर अपने पद-निष्पादन में हो, हमले का दुष्प्रेरण | IPC Section- 133 in hindi | Abetment of assault by soldier, sailor or airman on his superior officer, when in execution of his office.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 133 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 133? साथ ही हम आपको IPC की धारा 133 सम्पूर्ण जानकारी एवम् क्या सजा मिलेगी और कैसे क्या जमानत मिलेगी। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 133 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 133 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई भारत सरकार की सेना, नौसेना, या वायुसेना के किसी आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा किसी वरिष्ठ आफिसर पर, जब कि वह आफिसर अपने पद निष्पादन में हो, हमले का दुष्प्रेरण करेगा तो भारतीय दंड संहिता की धारा 133 अप्लाई होगी। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 133 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 133 के अनुसार-

सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अपने वरिष्ठ आफिसर पर जबकि वह आफिसर अपने पद- निष्पादन में हो, हमले का दुष्प्रेरण-

जो कोई भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना के किसी आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा किसी वरिष्ठ आफिसर पर, जब कि वह आफिसर अपने पद निष्पादन में हो, हमले का दुष्प्रेरण करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी, दण्डनीय होगा।

Abetment of assault by soldier, sailor or airman on his superior officer, when in execution of his office-
Whoever abets an assault by an officer, soldier, sailor or airman, in the Army, Navy or Air Force of the Government of India, on any superior officer being in the execution of his office, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three years, and shall also be liable to fine.

लागू अपराध

आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अपने वरिष्ठ आफिसर पर जबकि वह आफिसर अपने पद- निष्पादन में हो, हमले का दुष्प्रेरण।
सजा- तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
यह एक गैर-जमानतीय, संज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नही है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 133 के अंतर्गत जो कोई  भारत सरकार की सेना, नौसेना, या वायुसेना के किसी आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा किसी वरिष्ठ आफिसर पर, जब कि वह आफिसर अपने पद निष्पादन में हो, हमले का दुष्प्रेरण करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी, दण्डनीय होगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

जो कोई व्यक्ति भारत सरकार की सेना, नौसेना, या वायुसेना के किसी आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा किसी वरिष्ठ आफिसर पर, जब कि वह आफिसर अपने पद निष्पादन में हो, हमले का दुष्प्रेरण करेगा तो वह व्यक्ति भारतीय दंड संहिता की धारा 133 के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा ऐसे अपराध कारित करने वाले व्यक्ति अपराध के अनुसार ही मामले में पुलिस द्वारा FIR दर्ज करती है यह अपराध गैर-जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अपने वरिष्ठ आफिसर पर जबकि वह आफिसर अपने पद- निष्पादन में हो, हमले का दुष्प्रेरण।तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।संज्ञेयगैर-जमानतीयप्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 133 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

How to make a firm फर्म कैसे बनाते है, और कितने प्रकार से बनती है?| साझेदारी फर्म किसे कहते है, साथ ही इससे जुडी संपूर्ण जानकारी

दोस्तो नमस्कार स्वागत है आपका अपने Mylegallaw.com ब्लाग मे, आज हम आपको फर्म से सम्बन्धित महत्वपूर्ण जानकारी इस लेख के माध्यम से देगें। इस लेख मे आज हम आपको Firm कैसे बनाते है, क्या क्या ध्यान देना आवश्यक हैं, फर्म बनाने के लिये साथ ही साझेदारी फर्म (Partnership Firm) क्या होती है, कैसे बनानी चाहिये और क्या-क्या शर्ते होना जरूरी है एवंम् इसके साथ ही (Partnership deed Sample format) भी देंगें। हिन्दी एवंम् अंग्रेजी दोनो मे- तो आइये जानते है फर्म किसे कहते है?

फर्म (firm meaning) किसे कहते है?

वैसे तो हम सभी लोगो ने सुना होगा, कि फर्म एक तरह से व्यापार करने वाली संस्था को कहते है जो देश-विदेश मे व्यापार करती है, फर्म को हम सभी हिन्दी मे व्यापारिक फर्म भी कह सकते है, अर्थात् ऐसी कोई व्यापारिक प्रतिष्ठान जिसका व्यवसाय अनेक देशों में मजबूती से फैला हो।

फर्म के अनेक अर्थ जैसे हम उसे Concern, Firm, Trade और व्यापारिक प्रतिष्ठान भी बोलते है । लेकिन क्या हम जानते है, कि फर्म भी कई प्रकार से बनायी जाती है।

फर्म (Firm) के प्रकार-

1. प्रोपराइटरशिप (Proprietorship Firm)- एक प्रोपराइटर मालिक होता है ।
2. पार्टनरशिप (Partnership Firm)- दो या दो से अधिक मालिक होते सकते है, लेकिन अधिकतम 50 होंगे।
3. हिंदू अनडिवाइडेड फैमली (HUF Firm)- एकल फैमली, अर्थात् पति, पत्नी और बच्चे।
4. एसोसिएशन ऑफ पार्टनर्स (AOP Firm)- दो या दो से अधिक मालिक होते है ।

साझेदारी फर्म (How to make Partnership firm) किसे कहते है और कैसे बनाते हैं?

किसी व्यापारिक वह संस्था जिसमे दो अथवा दो से अधिक व्यक्ति मिलकर किसी व्यवसाय सुचारू रूप से लाभ और हानि हेतु एक व्यवसाय को शुरू करने और चलाने के लिए एक समझौते (agreement) की जरूरत होती है इसमें भाग लेने वाले लोग साझेदार (partner) होते हैं और इस प्रकार वे फर्म को एक साझेदारी फर्म (Partnership firm) बनती है, और इसे ही Partnership firm कहा जाता है।

साझेदारी विलेख क्या है? (What is partnership deed)

साझेदारी फर्म बनाने के लिये फर्म के प्रत्येक सदस्य को हर मामले जैसे- (लाभ-हानि) दोनो मे बराबरी की हिस्सेदारी होती है। इसके लिये एक तरह से सभी के मध्य एक करारनामा जारी होता है, जिसे हम हिन्दी मे साझेदारी विलेख (Partnership Deed) कहते है। इस विलेख में प्रत्येक पार्टनर्स लिखित रूप से आपसी सहमति अथवा ईमानदारी से सभी शर्तों को स्वीकार कर पार्टनरशिप फर्म का निर्माण करते है ।

साझेदारी विलेख कैसे बनाते है? (How to make partnership deed)

साझेदारी विलेख (Partnership deed) के मुख्य बिंदु-
1.पार्टनरशिप फर्म में सबसे सभी पार्टनरों का पूरा नाम, पता अंकित होता है।
2. फर्म में किस प्रकार का और किस वस्तु का व्यापार किया जाएगा, यह भी अंकित होना आवश्यक है।
3. फर्म किस स्थान पर रजिस्टर्ड है और कहा कहा गोदाम अथवा ब्रांच है, यह भी अंकित होना, बहुत ही आवश्यक है।
4. फर्म, Partnership में कब तक चलेगी। यदि आपको कम समय के लिए साथ व्यापार करना है, तो यह भी होना आवश्यक है, जिससे समय आने पर कोई पार्टनर बेइमानी न कर सके।
5. Partnership फर्म में एक महत्वपूर्ण बात का होना बहुत ही आवश्यक है, कि किस पार्टनर ने कितना Capital Money लगाई है, साथ ही प्रत्येक पार्टनर्स की लाभ और हानि की भागीदारी कितनी क्या रहेगी ।
6. प्रत्येक पार्टनर्स की क्या जिम्मेदारी और क्या दायित्व होंगे, यह सभी प्वाइंट्स होना बहुत जरुरी है।
7. प्रत्येक पार्टनर्स की लाभ एवम् सैलरी अथवा intrest कैसे क्या मिलेगा, यह भी होना बहुत जरूरी है।
8. प्रत्येक पार्टनर्स की शर्ते, बैंक रख-रखाव और उचित पुस्तकें, बैलेंसशीट और फर्म लेखाजोखा के प्रति कैसे क्या होंगे, यह भी अंकित होना जरूरी है।
9. इसके साथ बैंक चलाने के आपसी सहमति अथवा किसे क्या पावर देना, यह भी अंकित होना जरूरी है।
10. प्रत्येक साझेदार का प्रवेश, सेवानिवृत्ति और मृत्यु के समय सद्भावना के आधार पर गणना जैसे प्वाइंट्स का होना भी जरूरी है।
11. अंतिम बिंदु किस पार्टनर को हटाने और जोड़ने अथवा रिटायर्ड करने, साझेदारों के मध्य विवादो के मामलों जैसे प्वाइंट्स का होना भी जरूरी है।

(Partnership deed) साझेदारी विलेख में क्या क्या देखना आवश्यक हैं-

पार्टनरशिप डीड बनाते समय हमे बहुत सी सावधानियां बरतनी चाहिए, क्योंकि भगवान न करे कल किसी के साथ ऐसा हो जाए कि कोई पार्टनर आपके हक को मार दे या बेईमानी कर ले, इसलिए पार्टनरशिप डीड को अच्छी तरह से सोच समझ कर ही जुड़े। अब बात करते ऐसी क्या सावधानियां रखनी चाहिए-
Partnership deed बनाते समय प्रत्येक पार्टनर्स ईमानदार होना बहुत आवश्यक है, तभी साझेदारी चलेगी।
प्रत्येक साझेदार अपने कारोबार को बढ़ाने के साथ साथ अपने कर्तव्यों का निर्वाहन ढंग से ही करे, ऐसा करार डीड में भी होना आवश्यक है।
साझेदार आपसी मतभेद वाला व्यक्ति न हो, तो ही साझेदारी करे।
साझेदारी फर्म में किसी साझेदार को जोड़ने, हटाने अथवा निष्कासित करने के प्वाइंट भी होना आवश्यक है।
सबसे मुख्य बिंदु यह है कि firm को पार्टनरशिप एक्ट के अनुसार साझेदारी फर्म को पंजीकृत करा ले, क्योंकि पार्टनरशिप फर्म में विवाद की स्थिति उत्पन्न होनें पर अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, इसलिए हमेशा लिखित पार्टनरशिप डीड तैयार करना और फर्म को रजिस्ट्रार ऑफ फर्म के साथ पंजीकृत करना उचित होता है।।

पार्टनरशिप डीड का पंजीकरण कैसे करे? (How to register partnership deed)

भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 द्वारा शासित होती है। पार्टनरशिप एक्ट के अनुसार साझेदारी फर्म को पंजीकृत करना वैकल्पिक है, अर्थात पार्टनर अपनी पार्टनरशिप को पंजीकृत कर सकते हैं या नहीं भी कर सकते हैं। परन्तु फर्म का रजिस्ट्रेशन न होनें पर विवाद की स्थिति उत्पन्न होनें पर अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, इसलिए हमेशा लिखित पार्टनरशिप डीड तैयार करना और फर्म को रजिस्ट्रार ऑफ फर्म के साथ पंजीकृत करना उचित होता है।
भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 के अंतर्गत यदि साझेदारों एवम् किसी अन्य दूसरे व्यक्ति के मध्य विवाद होता है, तो जब तक आपकी फर्म साझेदारी अधिनियम के अंतर्गत रजिस्टर्ड नही होगी, तब तक वह कोई लीगल प्रकिया नही कर सकती है।इसलिए रजिस्टर्ड करना बहुत ही आवश्यक है।

साझेदारी फर्म रजिस्टर्ड कराने के लिए प्रत्येक जिले में रजिस्ट्रार कार्यालय बने हुए हैं वहां प्रत्येक पार्टनर्स लिखित डीड, अपनी आईडी और शपथपत्र ले जाकर सेवा शुल्क जमा कर रजिस्टर्ड करा सकते है।
साझेदारी फर्म का नाम, सभी पार्टनर्स का नाम और पता, व्यवसाय का स्थान, साझेदारी की अवधि, पार्टनर्स के शामिल होने की तिथि, बिजनेस शुरू करने की तिथि।
पार्टनरशिप डीड की विधिवत हस्ताक्षरित प्रति (जिसमें सभी नियम और शर्तें शामिल हैं) को रजिस्ट्रार के साथ भरना होगा।
आवश्यक शुल्क जमा करें और शुल्क का भुगतान करें।
एक बार जब रजिस्ट्रार आवेदन को मंजूरी दे देता है, तो फर्म को रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा और रजिस्ट्रार निगमन का प्रमाण पत्र भी जारी करेगा। इस तरह पंजीकरण प्रक्रिया पूरी हो जाएगी और आपकी फर्म को कानूनी मान्यता मिल जाएगी।

पार्टनरशिप डीड प्रारूप (Partnership deed Formet)

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Partner Retirement Deed Formet (पार्टनर सेवा निवृत्ति प्रारूप)

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इसी प्रकार से कंपनी एक्ट के तहत कंपनी भी कई प्रकार से होती है, तो आइए जानते हैं-

1. प्राइवेट लिमिटेड कंपनी (Private Ltd Company)- इस कंपनी में सभी मालिक एक तरह से कंपनी के नौकर ही होते है, जिन्हे हम डायरेक्टर कहते है, इस कंपनी में उन्ही डायरेक्टरों के ही शेयर होते है।
2. पब्लिक लिमिटेड कंपनी (Public Ltd Company)- इस कंपनी में सभी मालिक कंपनी के शेयर्स खदीदने वाले वह आम पब्लिक होती है, जिन्होंने कंपनी के शेयर्स को खरीदा साथ ही जिसके पास कंपनी के सबसे ज्यादा शेयर्स होंगे वह ही main डायरेक्टर होते है। ऐसी कंपनियों में डायरेक्टर्स बदलते रहते हैं।
3. लिमिटेड लैबिलिटीज कंपनी (LLP Company)- यह कंपनी एक्ट के तहत ही रजिस्टर होगी। यह भी एक सीमित देयता साझेदारी (LLP) एक साझेदारी है जिसमें कुछ या सभी भागीदारों (क्षेत्राधिकार के आधार पर) की सीमित देयता होती है। इसलिए यह भागीदारी और निगमों के तत्वों को प्रदर्शित करता है। एक एलएलपी में एक साथी दूसरे भागीदारों के कदाचार या लापरवाही के लिए जिम्मेदार या उत्तरदायी नहीं है। यह एक असीमित साझेदारी का एक महत्वपूर्ण अंतर है।

हमारा प्रयास फर्म कैसे बनाए, पार्टनरशिप फर्म कैसे बनाए, और कंपनी के प्रकार की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 137 | मास्टर की उपेक्षा से किसी वाणिज्यिक जलयान पर छिपा हुआ अभित्याजक | IPC Section- 137 in hindi | Deserter concealed on board merchant vessel through negligence of master.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 137 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 137? साथ ही हम आपको IPC की धारा 137 सम्पूर्ण जानकारी एवम् क्या सजा मिलेगी और कैसे क्या जमानत मिलेगी। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 137 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 137 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई वाणिज्यिक जलयान, जिस पर भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना का कोई अभित्याजक छिपा हुआ, यद्यपि वह ऐसे छिपने के सम्बन्ध में अनभिज्ञ हो, यदि उसे ऐसे छिपने का ज्ञान हो सकता था, किन्तु केवल इस कारण नहीं हुआ कि ऐसे मास्टर या भार-साधक व्यक्ति के नाते उसके कर्त्तव्य में कुछ उपेक्षा हुई, या उस जलयान पर अनुशासन का कुछ अभाव था। तो भारतीय दंड संहिता की धारा 137 अप्लाई होगी। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 137 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 137 के अनुसार-

मास्टर की उपेक्षा से किसी वाणिज्यिक जलयान पर छिपा हुआ अभित्याजक–

किसी ऐसे वाणिज्यिक जलयान का, जिस पर भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना का कोई अभित्याजक छिपा हुआ हो, मास्टर या भारसाधक व्यक्ति, यद्यपि वह ऐसे छिपने के सम्बन्ध में अनभिज्ञ हो, ऐसी शास्ति से दण्डनीय होगा जो पांच सौ रुपए से अधिक नहीं होगी, यदि उसे ऐसे छिपने का ज्ञान हो सकता था, किन्तु केवल इस कारण नहीं हुआ कि ऐसे मास्टर या भार-साधक व्यक्ति के नाते उसके कर्त्तव्य में कुछ उपेक्षा हुई, या उस जलयान पर अनुशासन का कुछ अभाव था।

Deserter concealed on board merchant vessel through negligence of master-
The master or person in charge of a merchant vessel, on board of which any deserter from the Army, Navy or Air Force of the Government of India is concealed, shall, though ignorant of such concealment, be liable to a penalty not exceeding five hundred rupees, if he might have known of such concealment but for some neglect of his duty as such master or person in charge, or but for some want of discipline on board of the vessel.

लागू अपराध

मास्टर या भारसाधक व्यक्ति की उपेक्षा से वाणिज्यिक जलयान पर छिपा हुआ अभित्याजक।
सजा- पांच सौ रुपए का जुर्माना।
यह एक जमानतीय, गैर-संज्ञेय अपराध है और किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नही है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 137 के अंतर्गत जो कोई वाणिज्यिक जलयान पर भारत सरकार की सेना, नौसेना, या वायुसेना का कोई अभित्याजक छिपा हुआ हो, लेकिन वह छिपाने के संबंध में अनभिज्ञ हो, अथवा उसे छिपाने का ज्ञान हो सकता हो था, किंतु जलयान पर अनुशासन का कुछ आभाव था तो वह पांच सौ रुपए जुर्माने से दण्डनीय होगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

जो कोई वाणिज्यिक जलयान पर भारत सरकार की सेना, नौसेना, या वायुसेना का कोई अभित्याजक छिपा हुआ हो, लेकिन वह छिपाने के संबंध में अनभिज्ञ हो, अथवा उसे छिपाने का ज्ञान हो सकता हो था, किंतु जलयान पर अनुशासन का कुछ आभाव था तो वह व्यक्ति भारतीय दंड संहिता की धारा 137 के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा यह अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
मास्टर या भारसाधक व्यक्ति की उपेक्षा से वाणिज्यिक जलयान पर छिपा हुआ अभित्याजक।पांच सौ रुपए का जुर्माना।गैर-संज्ञेयजमानतीयकिसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 137 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 138 | सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अनधीनता के कार्य का दुष्प्रेरण | IPC Section- 138 in hindi | Deserter concealed on board merchant vessel through negligence of master.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 138 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 138? साथ ही हम आपको IPC की धारा 138 सम्पूर्ण जानकारी एवम् क्या सजा मिलेगी और कैसे क्या जमानत मिलेगी। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 138 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 138 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई ऐसी बात का दुष्प्रेरण करेगा जिसे कि वह भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना के किसी आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अनधीनता का कार्य जानता हो, यदि अनधीनता का ऐसा कार्य उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाए तो भारतीय दंड संहिता की धारा 138 अप्लाई होगी। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 138 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 138 के अनुसार-

सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अनधीनता के कार्य का दुष्प्रेरण-

जो कोई ऐसी बात का दुष्प्रेरण करेगा जिसे कि वह भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना के किसी आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अनधीनता का कार्य जानता हो, यदि अनधीनता का ऐसा कार्य उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाए, तो वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

Abetment of act of insubordination by soldier, sailor or airman-
Whoever abets what he knows to be an act of insubordination by an officer, soldier. sailor or airman, in the Army, Navy or Air Force of the Government of India, shall, if such act of insubordination be committed in consequence of that abetment, be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to six months, or with fine, or with both.

लागू अपराध

आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अनधीनता के कार्य का दुष्प्रेरण, यदि उसके परिणामस्वरूप वह अपराध किया जाता है।
सजा- छह माह के लिए कारावास, या जुर्माना, या दोनो।
यह एक जमानतीय, संज्ञेय अपराध है और किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता योग्य नही है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 138 के अंतर्गत जो कोई ऐसी बात का दुष्प्रेरण करेगा जिसे कि वह भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना के किसी आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अनधीनता का कार्य जानता हो, यदि अनधीनता का ऐसा कार्य उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाए तो वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

जो कोई ऐसी बात का दुष्प्रेरण करेगा जिसे कि वह भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना के किसी आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अनधीनता का कार्य जानता हो, यदि अनधीनता का ऐसा कार्य उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाए तो वह व्यक्ति भारतीय दंड संहिता की धारा 138 के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा यह अपराध जमानतीय होने के कारण जमानत आसानी से मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
आफिसर, सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अनधीनता के कार्य का दुष्प्रेरण, यदि उसके परिणामस्वरूप वह अपराध किया जाता है।छह माह के लिए कारावास, या जुर्माना, या दोनो।संज्ञेयजमानतीयकिसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 138 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 150 | विधिविरुद्ध जमाव में सम्मिलित करने के लिए व्यक्तियों का भाड़े पर लेना या भाड़े पर लेने के प्रति मौनानुकूलता | IPC Section- 150 in hindi | Hiring, or conniving at hiring, of persons to join unlawful assembly.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 150 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 150? साथ ही हम आपको IPC की धारा 150 सम्पूर्ण जानकारी एवम् परिभाषा भी जानेंगे। इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 150 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 150 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। वैसे हमने देखा होगा, कभी कभी किसी गैरकानूनी जनसभा में विधिविरुद्ध जमाव में हिंसा करने के उद्देश्य से व्यक्तियों को भाड़े पर लाना। यदि कोई व्यक्ति हिंसा करने के उद्देश्य से विधिविरुद्ध जमाव में भाड़े पर व्यक्तियों को रखेगा तो भारतीय दंड संहिता की धारा 150 बल्वा को परिभाषित करती है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 150 इसी विषय के बारे में बतलाती है।

आईपीसी की धारा 150 के अनुसार-

विधिविरुद्ध जमाव में सम्मिलित करने के लिए व्यक्तियों का भाड़े पर लेना या भाड़े पर लेने के प्रति मौनानुकूलता –

जो कोई किसी व्यक्ति को किसी विधिविरुद्ध जमाव में सम्मिलित होने या उसका सदस्य बनाने के लिए भाड़े पर लेगा या वचनबद्ध या नियोजित करेगा या भाड़े पर लिए जाने का, वचनबद्ध या नियोजित करने का संप्रवर्तन करेगा या के प्रति मौनानुकूल बना रहेगा, वह ऐसे विधिविरुद्ध जमाव के सदस्य के रूप में, और किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा ऐसे विधिविरुद्ध जमाव के सदस्य के नाते ऐसे भाड़े पर लेने, वचनबद्ध या नियोजन के अनुसरण में किए गए किसी भी अपराध के लिए उसी प्रकार दण्डनीय होगा, मानो वह ऐसे विधिविरुद्ध जमाव का सदस्य रहा था या ऐसा अपराध उसने स्वयं किया था।

Hiring, or conniving at hiring, of persons to join unlawful assembly-
Whoever hires or engages, or employs, or promotes or connives at the hiring, engagement or employment of any person to join or become a member of any unlawful assembly, shall be punishable as a member of such unlawful assembly, and for any offence which may be committed by any such person as a member of such unlawful assembly in pursuance of such hiring, engagement or employment, in the same manner as if he had been a member of such unlawful assembly, or himself had committed such offence.

जब कोई व्यक्ति किसी विधिविरुद्ध जमाव में हिंसा करने के उद्देश्य से व्यक्तियों को भाड़े पर रखता है तो वह भी उस जमाव के सदस्य माना जाएगा, साथ ही अनुसरण में किए गए किसी भी अपराध के लिए उसी प्रकार दण्डनीय होगा, मानो वह ऐसे विधिविरुद्ध जमाव का सदस्य रहा था या ऐसा अपराध उसने स्वयं किया था।

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 150 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।