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Hindu Marriage Act-5 (हिन्दू विवाह अधिनियम धारा-5)

हिन्दू विवाह अधिनियम धारा-5 के अन्तर्गत हिन्दू विवाह के प्रमुख शर्तो के आधार पर विवाह मान्य अथवा अमान्य घोषित किया जाता है । हिन्दू विवाह मे प्रमुख शर्ते दोनो पक्षकारो पर लागू होता है, हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-5 की शर्तो के आधार पर विवाह ही विवाह संपन्न होने पर ही विवाह मान्य होगा । हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-5 की शर्ते निम्न प्रकार है-

  • विवाह के समय दोनो पक्षकारों मे से किसी की पत्नी अथवा पति जीवित न हो ।
  • विवाह के समय दोनो पक्षकारों मे से कोई पक्षकार-
  • चित्त विकृति के परिणाम स्वरूप विधिमान्य सम्मति देने मे असमर्थ न हो ।
  • विवाह मे विधिमान्य सम्मति देने मे समर्थ हो, लेकिन इस प्रकार मानसिक विकृति से ग्रसित न हो कि सन्तानोत्पत्ति के आयोग्य हो । 
  • विवाह के दोनो पक्षकारो मे किसी एक को भी उन्मत्ता (पागलपन) का दौरा न पडता हो ।
  • वर की आयु 21 वर्ष एवंम् वधू की आयु 18 वर्ष, अगर पूर्ण होने पर विवाह मान्य होगा ।
  • हिन्दू विवाह के अन्तर्गत विवाह होने वाले दोनो पक्षकारो के मध्य किसी को शासित करने वाली रूढि या प्रथा से उन दोनो के बीच विवाह अनुज्ञात न हो एवंम् पक्षकार निषिद्ध नातेदारी की डिक्रीयो के भीतर न हो अथवा विवाह अमान्य होगा ।
  • हिन्दू विवाह के अन्तर्गत दोनो पक्षकार एक-दूसरे के सापिण्ड न हो, सापिण्ड होगे, तब भी विवाह अमान्य होगा ।

हिन्दू विवाह इन शर्तो को पूर्ण होने ही विवाह मान्य अथवा अमान्य घोषित किया जा सकता है । इनमे से कोई भी शर्त अमान्य होती है तो हिन्दू विवाह विधिपूर्ण विवाह नही माना जायेगा और विवाह अमान्य होगा ।

Hindu Marriage Act 14-15 (हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा- 14 और 15)

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा- 14 के अन्तर्गत विवाह को एक वर्ष के भीतर तलाक देने के लिए कोई याचिका प्रस्तुत नही की जा सकती है । यह अधिनियम केवल यह बताता है कि एक वर्ष के भीतर हिन्दू विवाह भंग नही किया जा सकता है ।

हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत हिन्दू विवाह मे दोनो पक्षो के मध्य किसी बात के होते हुये भी जब तक अज्ञाप्ति व्दारा विवाह भंग लिये याचिका की तारीख जब तक कि उस विवाह की तारीख से अर्जी के उपस्थापन की तारीख तक एक वर्ष बीत न चुका हो, न्यायालय ऐसी याचिका को ग्रहण भी नही करेगा । विवाह की तारीख से एक वर्ष के अवसान से पूर्व विवाह-विच्छेद की याचिक पेश करने की इजाजत के लिये इस धारा के आधीन किसी आवेदन का निपटारा करने में न्यायालय उस विवाह से हुयी, किसी संतति के हितों और इस बात को भी क्या पक्षकारों के बीच उक्त एक वर्ष के अवसान से पूर्व मेल-मिलाप कोई युक्तियुक्त सम्भाव्यता है या नही, ध्यान में रखेंगा।

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा- 15 के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद के पश्चात् पक्षकार कब तक पुनः विवाह कर सकेंगे। हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त होने के पश्चात् विवाह विघटित कर दिया गया हो अथवा डिक्री के विरूद्ध अपील दाखिल करने का कोई अधिकार न हो या अपील का ऐसा अधिकार हो, तो अपील करने के समय का कोई अपील उपस्थापित हुये बिना अवसान हो गया हो या अपील की गयी हो, किन्तु निरस्त कर दी गयी हो, तब विवाह के किसी पक्षकार के लिये पुनः विवाह करना विधिपूर्ण होगा ।

भारत मे तलाक किन-किन परिस्थितियों मे कितने प्रकार से लिया जा सकता है |हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 क्या कहती है?

भारत मे तलाक और देशों की आपेक्षा बहुत ही कम है, भारत के अलावा अन्य देशों मे तलाक होना आम बात है, लेकिन भारत देश मे अन्य देश की तुलना मे न के बराबर है। पति एवंम् पत्नी दोनों के मध्य होमे वाले झगडों से उत्पन्न समस्या ही अंत मे तलाक का रूप ले लेती है, अब बात करे झगड़े की तो आम बात है कि किन्ही वजहो से पति-पत्नी के मध्य होने वाली जड़ जैसे किसी के क्रूरता, परित्याग, व्यभिचार, मानसिक विकार, दुनिया का त्याग और दूसरे धर्म में रूपांतरण शामिल हैं। जिनके आधार पर ही पति एवंम् पत्नी कोई भी विवाह-विच्छेद के लिये अर्जी डाल सकता है। उचित आधारों और कारणों को समझने के पश्चात् न्यायालय दोनो पक्षों को विच्छेद करने की अनुमति दे देता है।

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-13 विवाह-विच्छेद (Divorce) को बताता है। हिन्दू विवाह मे तलाक (Divorce) किस तरह से लिया जा सकता है आइये जानते है ? हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद (Divorce) की प्रकिया कितने प्रकार से होती है–

आपसी सहमति से विवाह-विच्छेद: यह विवाह विच्छेद पति एवंम् पत्नी दोनो के लिये ठीक माना जा सकता है क्योकि जबतक पति एवंम् पत्नी के रिश्तो के बीच प्रेम एवंम् विश्वास न हो तो, विवाह-विच्छेद लेना ही न्यायोचित है । यह प्रक्रिया जल्द से जल्द और आपसी सहमति से बिना समय नष्ट किये, विवाह विच्छेद किया जा सकता है।

विवादित विवाह-विच्छेद: यह विवाह विच्छेद पति या पत्नी दोनों मे से कोई भी यदि विवाह विच्छेद करना चाहता है, तो उसे उन कारणों को स्पष्ट करना होगा, उसके पश्चात् ही विवाह विच्छेद हो सकता है। यह प्रकिया काफी लम्बे समय तक चलती है, क्योकि इन मामलो मे जो पक्ष विवाह विच्छेद चाहता, उसे प्रमाणित करना होगा कि वह किन-किन वजह से दूसरे पक्ष से विवाह विच्छेद करना चाह रहे है ।

विवादित विवाह विच्छेद मे काफी समय के साथ आर्थिक धन की भी दोनो पक्षो को हानि होती है । इसलिये मेरे हिसाब से किसी वजह से पति एवंम् पत्नी मे विवाह-विच्छेद (Divorce) हो और किसी भी तरह से साथ रहने के लिये राजी नही हो रहे है, तो आपसी सहमति से समझौता अथवा तलाक लेना चाहिये ।

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के अन्तर्गत धारा 13 में दिये गये प्रावधानों एवम आधारों के अनुसार विवाह विच्छेद की डिक्री दम्पति में से किसी एक के व्दारा जिला न्यायलय पेश याचिका के आधार पर पारित की जा सकती हैं। धारा-10 न्यायिक पृथक्करण एवंम् विवाह विच्छेद के लिए एक ही आधार है जिनके अनुसार न्यायलय न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित करे या विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करे ऐसा मामला के आधार पर और परिस्थितियों के अनुसार किया जा सकता है।

हिन्दू विधि में आपसी सहमति से विवाह विच्छेद (Mutual Consent Divorce)

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 विवाह-विच्छेद की व्यवस्था भी करता है। लेकिन इस में विवाह के पक्षकारों की सहमति से विवाह विच्छेद की व्यवस्था 1976 तक नहीं थी। मई 1976 में एक संशोधन के माध्यम से इस अधिनियम में धारा 13-ए व धारा 13-बी जोड़ी गईं, तथा धारा 13-बी में सहमति से विवाह विच्छेद की व्यवस्था की गई ।धारा 13-बी में प्रावधान किया गया है कि यदि पति-पत्नी एक वर्ष या उस से अधिक समय से अलग रह रहे हैं तो वे यह कहते हुए जिला न्यायालय अथवा परिवार न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं कि वे एक वर्ष या उस से अधिक समय से अलग रह रहे है, उन का एक साथ निवास करना असंभव है और उन में सहमति हो गई है कि विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर विवाह को समाप्त कर दिया जाए। इस प्रवधान को भी आगे विस्तार पूर्वक विवेचन करेंगे।

धारा 13 –विवाह विच्छेद (Divorce)

  • (1) कोई विवाह, भले वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् अनुष्ठित हुआ हो, या तो पति या पत्नी पेश की गयी याचिका पर तलाक की आज्ञप्ति व्दारा एक आधार पर भंग किया जा सकता है कि –
  • (i) दूसरे पक्षकार ने विवाह के अनुष्ठान के पश्चात् अपनी पत्नी या अपने पति से भिन्न किसी व्यक्ति, के साथ स्वेच्छया मैथुन किया है; या
  • (i-क) विवाह के अनुष्ठान के पश्चात् अर्जीदार के साथ क्रूरता का बर्ताव किया है; या
  • (i-ख) अर्जी के उपस्थापन के ठीक पहले कम से कम दो वर्ष की कालावधि तक अर्जीदार को अभित्यक्त रखा है; या
  • (ii) दूसरा पक्षकार दूसरे धर्म को ग्रहण करने से हिन्दू होने से परिविरत हो गया है, या
  • (iii) दूसरा पक्षकार असाध्य रूप से विकृत-चित रहा है लगातार या आन्तरायिक रूप से इस किस्म के और इस हद तक मानसिक विकार से पीड़ित रहा है कि अर्जीदार से युक्ति-युक्त रूप से आशा नहीं की जा सकती है कि वह प्रत्यर्थी के साथ रहे।

स्पष्टीकरण-

(क) इस खण्ड में ‘मानसिक विकार’ अभिव्यक्ति से मानसिक बीमारी, मस्तिष्क का संरोध या अपूर्ण विकास, मनोविक्षेप विकार या मस्तिष्क का कोई अन्य विकार या अशक्तता अभिप्रेत है और इनके अन्तर्गत विखंडित मनस्कता भी है;

(ख) ‘मनोविक्षेप विषयक विकार’ अभिव्यक्ति से मस्तिष्क का दीर्घ स्थायी विकार या अशक्तता (चाहे इसमें वृद्धि की अवसामान्यता हो या नहीं) अभिप्रेत है जिसके परिणामस्वरूप अन्य पक्षकार का आचरण असामान्य रूप से आक्रामक या गम्भीर रूप से अनुत्तरदायी हो जाता है और उसके लिये चिकित्सा उपचार अपेक्षित हो या नहीं, या किया जा सकता हो या नहीं, या

(iv) दूसरा पक्षकार याचिका पेश किये जाने से अव्यवहित उग्र और असाध्य कुष्ठ रोग से पीड़ित रहा है; या

(v) दूसरा पक्षकार याचिका पेश किये जाने से अव्यवहित यौन-रोग से पीड़ित रहा है; या

(vi) दूसरा पक्षकार किसी धार्मिक आश्रम में प्रवेश करके संसार का परित्याग कर चुका है; या

(vii) दूसरे पक्षकार के बारे में सात वर्ष या अधिक कालावधि में उन लोगों के द्वारा जिन्होंने दूसरे पक्षकार के बारे में, यदि वह जीवित होता तो स्वभावत: सुना होता, नहीं सुना गया है कि जीवित है।

इस उपधारा में ‘अभित्यजन’ पद से विवाह के दूसरे पक्षकार व्दारा अर्जीदार का युक्तियुक्त कारण के बिना और ऐसे पक्षकार की सम्मति के बिना या इच्छा के विरुद्ध अभित्यजन अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत विवाह के दूसरे पक्ष व्दारा अर्जीदार की जानबूझकर उपेक्षा भी है और इस पद के व्याकरणिक रूपभेद तथा सजातीय पदों के अर्थ तदनुसार किये जायेंगे।

(1-क) विवाह में का कोई भी पक्षकार चाहे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पहले अथवा पश्चात् अनुष्ठित हुआ हो, तलाक की आज्ञप्ति द्वारा विवाह-विच्छेद के लिए इस आधार पर कि

(i) विवाह के पक्षकारों के बीच में, इस कार्यवाही में जिसमें कि वे पक्षकार थे, न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति के पारित होने के पश्चात् एक वर्ष या उससे अधिक की कालावधि तक सहवास का पुनरारम्भ नहीं हुआ है; अथवा

(ii) विवाह के पक्षकारों के बीच में, उस कार्यवाही में जिसमें कि वे पक्षकार थे, दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की आज्ञप्ति के पारित होने के एक वर्ष पश्चात् एक या उससे अधिक की कालावधि तक, दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन नहीं हुआ है;

याचिका प्रस्तुत कर सकता है।

(2) पत्नी तलाक की आज्ञप्ति व्दारा अपने विवाह-भंग के लिए याचिका :-

(i) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व अनुष्ठित किसी विवाह की अवस्था में इस आधार पर उपस्थित कर सकेगी कि पति ने ऐसे प्रारम्भ के पूर्व फिर विवाह कर लिया है या पति की ऐसे प्रारम्भ से पूर्व विवाहित कोई दूसरी पत्नी याचिकादात्री के विवाह के अनुष्ठान के समय जीवित थी;

परन्तु यह तब जब कि दोनों अवस्थाओं में दूसरी पत्नी याचिका पेश किये जाने के समय जीवित हो; या

(ii) इस आधार पर पेश की जा सकेगी कि पति विवाह के अनुष्ठान के दिन से बलात्कार, गुदामैथुन या पशुगमन का दोषी हुआ है; या

(iii) कि हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 के अधीन वाद में या दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के अधीन (या दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की तत्स्थानी धारा 488 के अधीन) कार्यवाही में यथास्थिति, डिक्री या आदेश, पति के विरुद्ध पत्नी को भरण-पोषण देने के लिए इस बात के होते हुए भी पारित किया गया है कि वह अलग रहती थी और ऐसी डिक्री या आदेश के पारित किये जाने के समय से पक्षकारों में एक वर्ष या उससे अधिक के समय तक सहवास का पुनरारम्भ नहीं हुआ है; या

(iv) किसी स्त्री ने जिसका विवाह (चाहे विवाहोत्तर सम्भोग हुआ हो या नहीं) उस स्त्री के पन्द्रह वर्ष की आयु प्राप्त करने के पूर्व अनुष्ठापित किया गया था और उसने पन्द्रह वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात् किन्तु अठारह वर्ष की आयु प्राप्त करने के पूर्व विवाह का निराकरण कर दिया है।

यह खण्ड लागू होगा चाहे विवाह, विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 (1976 का 68) के प्रारम्भ के पूर्व अनुष्ठापित किया गया हो या उसके पश्चात्।

13 – क. विवाह-विच्छेद कार्यवाहियों में प्रत्यर्थी को वैकल्पिक अनुतोष –

विवाह-विच्छेद की डिक्री व्दारा विवाह के विघटन के लिए अर्जी पर इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में, उस दशा को छोड़कर जहाँ और जिस हद तक अर्जी धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (ii), (vi) और (vii) में वर्णित आधारों पर है, यदि न्यायालय मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह न्यायोचित समझता है तो विवाह-विच्छेद की डिक्री के बजाय न्यायिक-पृथक्करण के लिए डिक्री पारित कर सकेगा।

13 – ख, पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद-

(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए या दोनों पक्षकार मिलकर विवाह-विच्छेद की डिक्री विवाह के विघटन के लिए अर्जी जिला न्यायालय में, चाहे ऐसा विवाह, विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के प्रारम्भ के पूर्व अनुष्ठापित किया गया हो चाहे उसके पश्चात् इस आधार पर पेश कर सकेंगे कि वे एक वर्ष या उससे अधिक समय से अलग-अलग रह रहे हैं और वे एक साथ नहीं रह सके हैं तथा वे इस बात के लिए परस्पर सहमत हो गये हैं कि विवाह विघटित कर देना चाहिये।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अर्जी के उपस्थापित किये जाने की तारीख से छ: मास के पश्चात् और अठारह मास के भीतर दोनों पक्षकारों द्वारा किये गये प्रस्ताव पर, यदि इस बीच अजीं वापिस नहीं ले ली गई हो तो न्यायालय पक्षकारों को सुनने के पश्चात् और ऐसी जाँच, जैसी वह ठीक समझे, करने के पश्चात् अपना यह समाधान कर लेने पर कि विवाह अनुष्ठापित हुआ है और अर्जी में किये गये प्रकाशन सही हैं यह घोषणा करने वाली डिक्री पारित करेगा कि विवाह डिक्री की तारीख से विघटित हो जाएगा।

Prohibited Marriage (निषिद्ध विवाह)

Void & Voidable Marriage

शून्य विवाह (Void marriages)- एक शून्य विवाह एक विवाह है जो उस क्षेत्राधिकार के कानूनों के तहत गैरकानूनी या अमान्य है जहां इसे दर्ज किया गया है। एक शून्य विवाह वह है जो शुरू से ही शून्य और अमान्य है। यह ऐसा है जैसे कि विवाह कभी भी अस्तित्व में नहीं था और इसे समाप्त करने के लिए कोई औपचारिकता की आवश्यकता नहीं है।

शून्य विवाहों के बच्चों को उनके माता-पिता की वैध संतान माना जाता है, यदि विवाह की तिथि पर, दोनों या दोनों पक्षों ने यथोचित रूप से माना कि विवाह वैध था।

शून्य विवाह के अन्तर्गत पति या पत्नी दोनो मे से कोई भी पहले से शादी-शुदा है और फिर शादी कर रहा है, जबकि पूर्व मे की हुयी शादी अस्तित्व मे है, तो दूसरा विवाह, शून्य विवाह होगा एवंम् उसका दूसरा विवाह भी दण्डनीय होगा, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत 7 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने की सज़ा है ।

शून्य विवाह  के अन्तर्गत पति और पत्नी दोनो मे से प्रत्येक को शासित करने वाली रूढि या प्रथा से अनुज्ञात न हो और दोनो पक्षकारो प्रतिनिष्ध नातेदारी के अन्तर्गत न आते हो । अगर कोई पक्षकार पिता की पांच पीढी और माता की तीन पीढी के अन्तर्गत नातेदारी स्पष्ट होती है, तब भी विवाह शून्य होगा, अगर पक्षकार के परिवार मे कोई रूढि प्रथा न हो ।

शून्यकरणीय विवाह (Voidable marriages)- यह विवाह भी एक शून्य विवाह ही होता है, जो कानूनी रूप से वैधता के निर्णय द्वारा रद्द किए जाने तक वैध है। इसके बाद फैसला सुनाए जाने के रद्द कर दिया जाता है ।

शून्य विवाह ही शून्यकरणीय विवाह  होता है केवल फर्क सिर्फ इतना सा होता है कि शून्य विवाह अगर कोई पक्षकार व्दि-विवाह करता है तो वह दूसरा विवाह शून्य होगा और पक्षकार मे पति अथवा पत्नी कोई मानसिक स्थिति सामान्य नही है तो उनके व्दारा दी गयी सहमति स्वीकारी नही जा सकती है, उनका विवाह भी शून्य होगा । बस फर्क मात्र इतना है कि विवाह को शून्य घोषित करने के लिए एक पक्ष व्दारा अदालत में आवेदन किए जाने के बाद ही शून्य विवाह अमान्य होगा।

विवाह शून्य होने के लिए निम्नलिखित आधार हैं-

  • शादियां जो ठीक से नहीं की गई हैं- उस विवाह सास्थां व्दारा वैध तरीके से विवाह न होना और दोनो पक्षकारो के कम से कम परिवार के दो सदस्यो गवाहों की उपस्थिति न होने पर विवाह शून्य कहलायेगा ।
    • करीबी रिश्तेदारों के बीच विवाह- जैसे दोनो पक्षकार आपसी कोई परिवार का सदस्य अथवा सापिण्ड परिवार मे न हो ।
    • कम उम्र की शादी- लडके की उम्र 21 वर्ष एवंम् लडकी की उम्र 18 वर्ष होना अनिवार्य है वरना विवाह शून्य कहलायेगा ।
    • विवाह को अकारण नहीं किया गया है क्योंकि दोनों पक्ष ऐसा करने में असमर्थ हैं जैसे- मानसिक विकार के कारण शादी के लिए वैध रूप से सहमति नहीं दी गयी, तब भी विवाह शून्य है ।
    • शादी के समय, एक पक्ष यौन संचारित रोग के एक संक्रमित रूप से पीड़ित था अथवा किसी ऐसी गम्भीर बीमारी से पीड़ित था ।
    • शादी के समय पत्नी अपने पति के अलावा किसी और से गर्भवती थी।

बलात्कार के लिये सख्त कानून एवंम् आत्मरक्षा और पॉक्सो क्या है ?

face, eyes, no
आये दिन सुन रहे व देख भी रहे कि लडकियों और महिलाओ के साथ बडी बर्बता के साथ रेप और मर्डर हो रहे है। जैसा कि हम सभी लोग जानते है 16 दिसम्बर 2012 मूवी देखकर वापस बस से घर लौट रही छात्रा का रेप बडी बर्बता से किया गया, जिसका उपचार होते हुये दिनांक 29 दिसम्बर 2012 को मृत्यु हो गयी थी । जिसके पश्चात् लगभग् 7 वर्ष पश्चात् दिनांक 20 मार्च 2020 को निर्भया रेप काण्ड मे दोषियो को फांसी की सजा सुनाई गयी थी । अब आप अनुमान लगा सकते है कि हमारे देश की न्यायव्यवस्था कैसी है । निर्भया रेप काण्ड के बाद सरकार व्दारा ऐसे बडी बर्बता से होने वाले रेप के मामलो को फास्ट ट्रैक कोर्ट को भेजने तथा जल्द से जल्द सुनवाई कराकर दोषी को जल्द से जल्द सजा दिलाने के लिये कानून मे संसोधन किया गया था । इसके पश्चात् भी सरकार को ऐसे माललो अतिशीघ्र सुनवाई पूर्ण कराकर आरोपी को सख्त से सख्त दण्ड दिया जाना चाहिये ।पीडित महिलाओ एवंम् लडकिया अपने भारत मे अधिकतर् ऐसे मामलो मे छिपाने का प्रयास करती है क्योकि उन्हे समाजिक एवंम् परिवारिक मान एवंम् प्रतिष्ठा को बचाने के लिये करती है और कुछ महिलाओ को पुलिस प्रशासन व्दारा डरा एवंम् धमका कर भगा दिया जाता है इसके कारण भी दोषियों को और छूट मिलती है, जिसके उपरान्त वह लोग भविष्य मे और जघन्य अपराध और ऐसे कृत्य करते रहते है । आज हम सभी देख रहे है हमारे भारत मे ऐसे मामले अत्यधिक तेजी से बढ रहे है । ऐसे लोगो को कानून व्यवस्था व्दारा अत्यधिक शक्ति लाने की अवश्यकता है और कठोर से कठोर दण्ड देने की अवश्यकता है । हमारे भारत के संविधान मे भी लडकियो और महिलाओ को अपनी ऐसी स्थिति के लिये भी बहुत से कानून बनाये गये है जो बहुत सी महिलाओ एवंम् लडकियो को ठीक से पता तक नही है । आइये जानते है वह ऐसे कौन से कानून बनाये गये है जो महिलाओ व लडकियो के लिये सहायक हो सकते है ।

पॉक्सो कानून के तहत 18 साल से कम उम्र

पॉक्सो कानून के तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का सेक्शुअल अपराध इस कानून के दायरे में आता है। इस कानून के तहत 18 साल से कम उम्र के लड़के या लड़की दोनों को ही प्रॉटेक्ट किया गया है। इस एक्ट के तहत बच्चों को सेक्शुअल असॉल्ट, सेक्शुअल हैरसमेंट और पॉर्नोग्रफी जैसे अपराध से प्रॉटेक्ट किया गया है। 2012 में बने इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा का प्रावधान किया गया है। पॉक्सो कानून की धारा-3 के तहत पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट को परिभाषित किया गया है। इसके तहत कानून कहता है कि अगर कोई शख्स किसी बच्चे के शरीर के किसी भी हिस्से में प्राइवेट पार्ट डालता है या फिर बच्चे के प्राइवेट पार्ट में कोई भी ऑब्जेक्ट या फिर प्राइवेट पार्ट डालता है या फिर बच्चों को किसी और के साथ ऐसा करने के लिए कहा जाता है या फिर बच्चे से कहा जाता है कि वह ऐसा उसके (आरोपी) साथ करे तो यह सेक्शन-3 के तहत अपराध होगा और इसके लिए धारा-4 में सजा का प्रावधान किया गया है। इसके तहत दोषी पाए जाने पर अपराधी को कम से कम 7 साल और ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया गया है।

प्राइवेट पार्ट टच करने पर

अगर कोई शख्स किसी बच्चे के प्राइवेट पार्ट को टच करता है या फिर अपने प्राइवेट पार्ट को बच्चों से टच कराता है तो ऐसे मामले में दोषी पाए जाने पर धारा-8 के तहत 3 साल से 5 साल तक कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। अगर कोई शख्स बच्चों का इस्तेमाल पॉर्नोग्रफी के लिए करता है तो वह भी गंभीर अपराध है और ऐसे मामले में उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। बच्चों के साथ ऐसा कोई काम करते हुए अगर उसकी पॉर्नोग्रफी की जाती है तो वैसे मामले में कम से कम 10 साल और ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद तक हो सकती है।

ऐंटी-रेप लॉ में क्या है

16 दिसंबर 2012 को निर्भया गैंग रेप और हत्या के बाद की वारदात के बाद रेप और छेड़छाड़ से संबंधित कानून को सख्त करने के लिए सड़क से लेकर संसद तक बहस चली और फिर वर्मा कमिशन की सिफारिश के बाद सरकार ने कानून में तमाम बदलाव किए थे। संसद में बिल पास किया गया और दो अप्रैल 2013 को नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया। सीनियर वकील रमेश गुप्ता के मुताबिक, मौजूदा समय में रेप व छेड़छाड़ के मामले में जो कानूनी प्रावधान हैं, उसके तहत रेप के कारण अगर कोई महिला मरणासन्न अवस्था में पहुंच जाती है या फिर मौत हो जाती है तो उस स्थिति में दोषियों को फांसी तक की सजा हो सकती है। साथ ही रेप मामले में अगर कोई शख्स दूसरी बार दोषी पाया जाता है, तो उसे फांसी की सजा तक हो सकती है।

रेप की परिभाषा

आईपीसी की धारा-375 में रेप मामले में विस्तार से परिभाषित किया गया है। इसके तहत बताया गया है कि अगर किसी महिला के साथ कोई पुरुष जबरन शारीरिक सम्बन्धं बनाता है तो वह रेप होगा। साथ ही मौजूदा प्रावधान के तहत महिला के साथ किया गया यौनाचार या दुराचार दोनों ही रेप के दायरे में होगा। इसके अलावा महिला के शरीर के किसी भी हिस्से में अगर पुरुष अपना प्राइवेट पार्ट डालता है, तो वह भी रेप के दायरे में होगा।

रेप में उम्रकैद तक की सजा

महिला की उम्र अगर 18 साल से कम है और उसकी सहमति भी है तो भी वह रेप ही होगा। अगर कोई महिला विरोध न कर पाए इसका मतलब सहमति है, ऐसा नहीं माना जाएगा। आईपीसी की धारा-376 के तहत कम से कम 7 साल और ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया गया।

रेप में कब फांसी

इसके अलावा आईपीसी की धारा-376 ए के तहत प्रावधान किया गया कि अगर रेप के कारण महिला Die situation (मरने जैसी स्थिति) में चली जाए तो दोषी को अधिकतम फांसी की सजा हो सकती है। साथ ही गैंग रेप के लिए 376 डी के तहत सजा का प्रावधान किया गया, जिसके तहत कम से कम 20 साल और ज्यादा से ज्यादा उम्रभर के लिए जेल (नेचरल लाइफ तक के लिए जेल) का प्रावधान किया गया। साथ ही 376 ई के तहत प्रावधान किया गया कि अगर कोई शख्स रेप के लिए पहले दोषी करार दिया गया हो और वह दोबारा अगर रेप या गैंग रेप के लिए दोषी पाया जाता है तो उसे उम्रकैद से लेकर फांसी तक की सजा होगी।

आत्म रक्षा के अधिकार

आईपीसी की धारा 96 से लेकर 106 तक राइट टू सेल्फ डिफेंस का प्रावधान है. इसके तहत हर व्यक्ति को अपनी सुरक्षा, अपनी पत्नी की सुरक्षा, अपने बच्चों की सुरक्षा, अपने करीबियों और अपनी संपत्ति की सुरक्षा कर सकता है, कुछ परिस्थितियों में अगर आत्मरक्षा में किसी की जान चली जाती है तो राइट टू सेल्फ डिफेंस के तहत रियायत मिल सकती है ।

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा-100

आत्म रक्षा (Right to Private) के अन्तर्गत कोई व्यक्ति हो या 5-6 व्यक्ति आपके ऊपर किसी भी तरह से हमला करते है और आपको ऐसा प्रतीत होता हो कि यह हमारी जान भी ले सकते है या आपको शारीरिक नुकसान जैसे सेक्शुअल असॉल्ट, सेक्शुअल हैरसमेंट पहुचाना चाहते है, तो आप उनको अपनी आत्म रक्षा के लिये जान से तक की मार सकते है । इन्हे भारतीय दण्ड संहिता की धारा-100 के अतर्गत रखा गया है आईये जानते है किन किन परिस्थियों मे –

  • बलात्कार करने के इरादे से हमला;
  • अस्वाभाविक वासना को तृप्त करने के इरादे से चौथा-एक हमला;
  • अपहरण या अपहरण के इरादे से हमला;
  • तेजाब फेकने का कार्य या प्रयास करना जिससे यथोचित रूप से आशंका कारित हो कि अन्यथा ऐसे कृत्य का परिणाम घोर क्षति होगा

आईये जानते है भारतीय दण्ड संहिता (IPC) 1860 के बारे मे –

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) 1860 कुल 511 धाराये है, जिन्हे 23 अध्यायों मे बांटा गया है । जिसे महाराज्यपाल की अनुमति 6 अक्टूबर 1860 को दी गयी थी, इसे पश्चात् 1 जनवरी 1962 को लागू किया गया था ।आइये हम जानते है, भारतीय दण्ड संहिता (IPC) 1860 को कम शब्दो मे, (IPC) की कुल 511 धाराओ को 23 अध्यायो के अधार पर जानेंगे कि किस अध्याय मे किन धाराओं को बांटा गया है- अध्याय (Chapter) -1 प्रस्तावना (Introduction) –

Section 1-5

अध्याय (Chapter) -2 साधारण स्पष्टीकरण (General Explanation)

Section 6-52A

अध्याय (Chapter) -3 दण्डों के विषय मे (Punishment)

Section 53-75

अध्याय (Chapter) -4 साधारण अपवाद (General Exception)

इन्हे दो भागो मे बांटा गया है ।

Section 76-106

  • सामान्य रक्षा (General Defense)

Section 76-95

  • निजी अधिकार (Right to Private)

Section 96-106

अध्याय (Chapter) -5 दुष्प्रेरण के विषय (Abetment)

Section 107-120

अध्याय (Chapter) -5A अपराधिक षड्यत्र (Criminal Conspiracy)

Section 120A-120B

अध्याय (Chapter) -6 राज्य के विरूद्ध अपराधो के विषय मे (Offence against State)

Section 121-130

अध्याय (Chapter) -7 सेना, नौ-सेना, वायु सेना से सम्बन्धित अपराधो के विषय मे (Offence Relating to Army, Navy and Air Force)

Section 131-140

अध्याय (Chapter) -8 लोक प्रशान्ति के विरूद्ध अपराधो के विषय मे (Offence Against the Public Tranquility)

Section 141-160

(Section 161 to 165 A Repealed by the Prevention of corruption Act, 1988)

अध्याय (Chapter) -9 लोक सेवको व्दारा या उनसे सम्बन्धित अपराधो के विषय मे (Offence Relating to Public Servants)

Section 166-171

अध्याय (Chapter) -9A निर्वाचन सम्बन्धी अपराधो के विषय मे (Offence Relating to Election)

Section 171A-171I

अध्याय (Chapter) -10 लोक सेवको के विधिपूर्ण प्राधिकार के अवमान के विषय मे (Contempt of Lawful Authority of Public Servant)

Section 172-190

अध्याय (Chapter) -11 मिथ्या साक्ष्य और लोक न्याय के विरूद्ध अपराधो के विषय मे (False Evidence and offence Against Public Justice)

Section 191-229A

अध्याय (Chapter) -12 सिक्को तथा सरकारी स्टाम्पों से सम्बन्धित अपराधो के विषय मे (Relating to Coin and Governments Stamp)

Section 230-263A

अध्याय (Chapter) -13 बांटो तथा मापो से सम्बन्धित अपराधो के विषय मे (Relating to weight and measure)

Section 264-267

अध्याय (Chapter) -14 लोक स्वास्थ, क्षेम, सुविधा शिष्टता और सदाचार पर प्रभाव डालने वाले अपराधो के विषय मे (Affecting the Public health, Safety, harm, convenience, and morality)

Section 268-294A

अध्याय (Chapter) -15 धर्म से सम्बन्धित अपराधो के विषय मे (Relating to Religion)

Section 295-298

अध्याय (Chapter) -16 मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले अपराधो के विषय मे (Affecting the Human Body)

इन्हे आठ भागो मे बांटा गया है ।

Section 299-377

  • जीवन के लिये संकटकारी अपराधो के विषय मे (Relating to Life-threatening crimes)

Section 299-311

  • गर्भपात कारित करने, अज्ञात शिशुओ को क्षति कारित करने, शिशुओं को अरक्षित छोडने और जन्म छिपाने के विषय मे (Causing of Miscarriage of Injuries to unborn Children of the Exposure of infants and of the concealment of Births)

Section 312-318

  • उपहति के विषय मे (Hurt)

Section 319-338

  • सदोष अवरोध और सदोष परिरोध के विषय मे (Wrongful Restraint and wrongful Confinement)

Section 339-348

  • अपराधिक बल और हमले के विषय मे (Criminal Force and Assault)

Section 349-358

  • व्यपहरण, अपहरण, दासत्व, बलातृश्रम के विषय मे (Kidnapping, Abduction, Slavery and force labor)

Section 359-374

  • यौन अपराध (Sexual offense)

Section 375-376E

  • प्रकृति विरूद्ध अपराधो के विषय मे (Unnatural offence)

Section 377-

अध्याय (Chapter) -17 सम्पत्ति के विरूद्ध अपराधो के विषय मे (offence Against Property)

इन्हे दस भागो मे बांटा गया है ।

Section 378-462

  • चोरी (Theft)

Section 378-382

  • उद्दापन के विषय मे (Extortion)

Section 383-389

  • लूट डकैती के विषय मे (Robbery and Dacoit)

Section 390-402

  • सम्पत्ति के अपराधिक दुर्विनियोग के विषय मे (Criminal misappropriation of Property)

Section 403-404

  • अपराधिक न्यास भंग के विषय मे (Criminal Breach of Trust)

Section 405-409

  • चुराई हुयी सम्पत्ति प्राप्त करने के विषय मे (Receiving of Stolen Property)

Section 410-414

  • छल के विषय मे (Cheating)

Section 415-420

  • कपट पूर्ण विलेखो और सम्पत्ति व्ययनो के विषय मे (Fraudulent Deeds and dispositions of Property)

Section 421-424

  • रिष्टि के विषय मे (Mischief)

Section 425-440

  • अपराधिक अतिचार के विषय मे (Criminal Trespass)

Section 441-462

अध्याय (Chapter) -18 दस्तावेजो और सम्पत्ति सम्बन्धी अपराधो के विषय मे (Relating to documents and Property marks)

इन्हे तीन भागो मे बांटा गया है ।

Section 463-489E

  • क्षमा और अन्य प्रावधान (Forgery and other Provisions)

Section 463-477A

  • सम्पत्ति चिन्हों और अन्य चिन्हों के विषय मे (Property and other marks)

Section 478-489

  • करैन्सी नोटो और बैंक नोटो के विषय मे (Currency Notes and Bank Notes)

Section 489A-489E

अध्याय (Chapter) -19 सेवा संविदाओ के अपराधिक भंग के विषय मे (Criminal Breach of Contracts of Service)

Section 490-492

अध्याय (Chapter) -20 विवाह सम्बन्धी अपराधो के विषय मे (offence Relating to marriage)

Section 493-498

अध्याय (Chapter) -20A पति या पति के नातेदार व्दारा क्रूरता के विषय मे (Cruelty by husband or relation of husband)

Section 498A

अध्याय (Chapter) -21 मानहानि के विषय मे (Defamation)

Section 499-502

अध्याय (Chapter) -22 अपराधिक, अभिप्रास, अपमान और क्षोभ के विषय मे (Criminal Intimidation, Insult and Annoyance)

Section 503-510

अध्याय (Chapter) -23 अपराधों को करने के प्रयत्न के विषय मे (Attempts of Commit offences)

Section 511