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कंपनी किसे कहते है, कंपनी की विशेषताये एवंम् दायित्व किसके और क्या होते है | कंपनी अधिनियम् 2013

कंपनी (Companies) व्यापारिक गतिविधियों को संचालित करने के लिए एक संगठन, सास्था जिसे कंपनी कहते है। आज हम इस लेख के माध्यम से जानेंगे कि कंपनी किसे कहते है? (What is the Company Called?) और कंपनी की क्या विशेषतायें है? (Companies Features?) और कंपनी के क्या दायित्व है? (What are the Responsibilities of the Company?) कंपनी अधिनियम् 2013 मे कितनी धाराये है (How many sections are there in the Companies Act 2013?) आज हम सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से जानेंगे।

कंपनी (Companies) वह व्यापारिक सास्था, संगठन होती है, जहां किन्ही व्यक्तियों या शेयरधारकों के एक समूह द्वारा लाभ कमाने के उद्देश्य से व्यावसायिक गतिविधियों में संलग्न होने के लिए बनाई गई एक कानूनी संगठनात्मक संरचना है जो व्यक्तियों को सामान्य लक्ष्यों और उद्देश्यों को व्यवसायिक करने का एक स्वरूप देती है, जहां कोई भी व्यक्ति स्वंय मे मालिक नही होता है, केवल नौकर की ही तरह कंपनी मे काम करता है, जिसे लाभ के रूप मे सैलरी एवंम् उसके लाभ का उसकी हिस्सेदारी का हिस्सा दिया जाता है।

वह संगठन जहां व्यावसायिक लाभ कमाने के लिये दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य एक कानूनी करार बनाया जाता है। जहां प्रत्येक हिस्सेदार या शेयरधारक के हिस्से के अनुरूप लाभ कमाने एक प्रणाली है। इसके अलावा कई व्यक्ति मिलकर अपने कौशल/प्रतिभा के आधार पर एक निकाय का कानूनी रूप निर्माण कर व्यावसाय करने का लाभ प्रदान करता है, जहां वह निकाय समाज मे आर्थिक विकास मे भी वृद्धि कर सके।

कंपनी किसे कहते है? (What is the company called?)

कंपनी Companies सामान्यतः उस संगठन, सास्था को कहते है, जहां कोई मालिक नही कहलाता है, वह सास्था या संगठन मे केवल नौकर होते है, जो केवल नौकरी की तरह ही काम करते है, मालिक नही कहलाये जा सकते है। क्यो कि कंपनी स्वंय मे एक जिम्मेदार पर्सन की भांति सारे दायित्वों को निभाती है, कंपनी कानूनी वाद-विवाद, दायित्व और किसी सम्पत्ति खरीद इत्यादि सभी अधिकार कंपनी को होता है जैसे किसी साधारण व्यवसाय करने वाले व्यक्ति को। कंपनी वैसे कई प्रकार की भी हो सकती हैं। प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी के लिए सदस्यों की संख्या कम से कम दो और अधिकतम 200 तक सीमित है, जबकि पब्लिक लिमिटेड कम्पनी मे ऐसा बिल्कुल भी नही है यहां कम से कम दो और अधिकतम कितनी भी हो सकती है।

कंपनी एक व्यापारिक संगठन/संस्था होती है जो नियमित व्यापारिक गतिविधियों के लिए गठित की जाती है। इसमें दो या अधिक व्यक्ति, संगठन, या संस्था द्वारा संचालित होती है, जिसका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है। कंपनी नियमित रूप से वस्तुओं, सेवाओं, उत्पादों या विभिन्न व्यापार गतिविधियों को विकसित, उत्पादित करता है।

कंपनी के प्रकार (Type of Companies)

कंपनियां विभिन्न प्रकार की होती हैं, जो उनके उद्देश्यों, संरचना और स्वामित्व के आधार पर अलग-अलग हो सकती हैं। यहां कुछ प्रमुख कंपनी जो इस प्रकार हैं:

  1. संचालनात्मक कंपनी (Operating Company): इस प्रकार की कंपनी मे व्यापार या उत्पादन करने के लिए स्थानीय, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित की जा सकती है। इनमें विभिन्न उद्योगों की कंपनियां भी शामिल हो सकती हैं जैसे कि विनिर्माण, वित्तीय सेवाएं, खुदरा, वितरण इत्यादि।
  2. निगमित कंपनी (Incorporated Company): निगमित कंपनी संचालनात्मक कंपनी का ही एक प्रकार है, जहां कम से कम दो संचालक (डायरेक्टर्स) होते हैं जो कंपनी की सभी प्रबंधन और नियंत्रण की जिम्मेदारी लेते हैं। इस प्रकार की कंपनी में स्वामित्व की एक विशेष प्रकृति होती है जिसे शेयर धारकों के माध्यम से भी प्रकट किया जाता है।
  3. निजी लिमिटेड कंपनी (Private Limited Company): यह एक निगमित कंपनी होती है जिसमें स्वामित्व को सीमित किया जाता है। इस प्रकार की कंपनी में शेयर धारकों के पास सीमित संपत्ति या हिस्सेदारी होती है, जिसके माध्यम से उन्हें कंपनी के लाभ और हक दिए जाते हैं।
  4. सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी (Public Limited Company): सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी एक ऐसी कंपनी होती है जिसके शेयर सार्वजनिक बाजारों में खरीदे और बेचे जा सकते हैं। ये कंपनियां अपने स्वामित्व को जनता के साथ बांटती हैं और नियमित रूप से निधि इकट्ठा करने के लिए इतने लोगों को संबोधित करती हैं।
  5. सहकारी कंपनी (Co-operative Company): सहकारी कंपनियां सदस्यों के हितों को संघटित करने के लिए गठित की जाती हैं। इन कंपनियों के सदस्य एक साथ मिलकर कंपनी के संचालन में हिस्सा लेते हैं और उनकी हितों को प्राथमिकता देते हैं। उदाहरण के लिए, किसानों की सहकारी कंपनियां कृषि उत्पादों की खरीदारी और विपणन के लिए गठित की जाती हैं।

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कंपनी के विशेषताये (Company Features)

कंपनी की विशेषताएं विभिन्न हो सकती हैं, लेकिन यहां कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं जो कंपनी को परिभाषित करती हैं:

  1. नियमित संरचना: कंपनी एक नियमित संरचना के अंतर्गत संचालित होती है। इसमें संगठित , प्रबंधन संरचना, निर्णायक मंडल और कार्यकारी अधिकारियों की भूमिका शामिल होती है। यह संरचना कंपनी को सुचारु और सुगठित रूप से संचालित करने में मदद करती है।
  2. नियमित व्यापार गतिविधियाँ: कंपनी की मुख्य गतिविधि व्यापार होती है, जिसमें उत्पादों, सेवाओं या वस्तुओं को विकसित, उत्पादित और बिक्री किया जाता है। कंपनी उत्पादों या सेवाओं के वितरण, खरीद, बिक्री, मार्केटिंग और आपूर्ति शामिल गतिविधियों को संचालित कर सकती है।
  3. स्वामित्व और नियंत्रण: कंपनी में स्वामित्व एक महत्वपूर्ण पहलू है। निजी कंपनियों में, एक व्यक्ति या समूह को कंपनी की संपत्ति और नियंत्रण करने का हक होता है। सार्वजनिक कंपनियों में, शेयरधारकों को कंपनी के लाभ और हिस्सेदारी का हक प्राप्त होता है।
  4. आपातकालीनता: कंपनी एक अलग व्यक्तिगत इकाई के रूप में मान्यता प्राप्त करती है, जिससे उसे अपने स्वयं के नाम से संपत्ति को संचालित करने और संबंधित कानूनी कार्रवाई में समर्थन प्राप्त होता है। कंपनी के अपारदर्शिता, देयता, और स्वावलंबितता की विशेषताओं से विश्वासिता और विश्वास प्राप्त होता है।
  5. निगमन: कंपनी के व्यापारिक और कानूनी नियमों के अनुसार निगमित होना। यह कंपनी को संपत्ति का व्यवस्थापन करने, निधि इकट्ठा करने, विनिवेश करने, लोन लेने, अदालती कार्रवाई में शामिल होने और अन्य कानूनी और व्यापारिक कार्यों को संचालित करने की अनुमति देता है।

कंपनी के दायित्व (Company’s Liability)

कंपनी में विभिन्न दायित्व हो सकते हैं, जो निम्नलिखित हो सकते हैं:

  1. शेयरधारकों के प्रति दायित्व: कंपनी के शेयरधारकों के प्रति पहला दायित्व होता है। कंपनी के शेयरधारकों को उनके हिस्सेदारी के अनुसार लाभ, आय, वोटिंग अधिकार और अन्य सुविधाएं प्रदान करने का दायित्व होता है।
  2. कर्मचारियों के प्रति दायित्व: कंपनी के कर्मचारियों के प्रति दायित्व विभिन्न रूपों में होता है। यह शामिल कर सकता है कर्मचारी के उच्चतम मानकों में वेतन और लाभ, सुरक्षित और स्वस्थ्यपूर्ण कार्यस्थल, कार्यकारी बनाने के अवसर, प्रशिक्षण और विकास के अवसर, और कार्यसंगठन के नियम और नियमों का पालन करना।
  3. ग्राहकों के प्रति दायित्व: कंपनी के ग्राहकों के प्रति दायित्व होता है उन्हें उत्पादों या सेवाओं की गुणवत्ता, मूल्य, ग्राहक सेवा, संकुचित ग्राहकों की सुरक्षा, उनकी प्राथमिकताओं को पूरा करने का प्रदान करने का दायित्व होता है।
  4. सामाजिक और पर्यावरणीय दायित्व: कंपनी को सामाजिक और पर्यावरणीय दायित्व का ध्यान रखना चाहिए। यह शामिल करता है समाज में उद्यमीता को प्रोत्साहित करना, कारगर सामाजिक प्रयोजनों का समर्थन करना, विभिन्न सामाजिक कार्यों में सहयोग करना, वातावरणीय संरक्षण के प्रयासों में योगदान करना, और सामाजिक न्याय और जिम्मेदारी के प्रतिबद्धता का पालन करना।
  5. कानूनी और नियामक दायित्व: कंपनी को कानूनी और नियामक दायित्व का पालन करना होता है। यह शामिल करता है कंपनी के लिए संबंधित कानूनों, नियमों, निर्देशिकाओं और अन्य नियमों का पालन करना, वित्तीय रिपोर्टिंग और खाता प्रबंधन, कानूनी और न्यायिक जिम्मेदारियों को पूरा करना, और सरकारी और निजी निर्देशों का पालन करना।

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कंपनी अधिनियम् 2013 (Companies Act 2013)

कंपनी अधिनियम 2013 (Companies Act 2013) में कुल 470 धाराएं (Sections) हैं। यह अधिनियम भारतीय कंपनियों के गठन, संचालन और अन्य विषयों को नियंत्रित करने के लिए अवधारित किया गया है। इन धाराओं में कंपनी के निर्माण, मेमोरेंडम और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन, शेयरधारकों के अधिकार, निदेशक मंडल, सार्वजनिक और निजी कंपनियों के बीच अंतर, विनियमित बाजार, संचालन मंडल, लेखा-विवरण, उद्यमी गौरव दिन आदि के विषयों पर प्रावधान किया गया है।

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भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 238 | Indian Contract Act Section 238

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-238) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 238 के अनुसार अपने कारबार के अनुक्रम में अपने मालिकों की ओर से कार्य करते हुए अभिकर्ताओं द्वारा किए गए दुर्व्यपदेशन या कपट ऐसे अभिकर्ताओं द्वारा किए गए करारों पर वे ही प्रभाव रखते हैं मानो ऐसे दुर्व्यपदेशन या कपट उन मालिकों द्वारा किए गए हों, किन्तु अभिकर्ताओं द्वारा ऐसे विषयों में, जो उनके प्राधिकार के भीतर नहीं आते, किए गए दुर्व्यपदेशन या कपट का उनके मालिकों पर प्रभाव नहीं पड़ता, जिसे IC Act Section-238 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 238 (Indian Contract Act Section-238) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 238 IC Act Section-238 के अनुसार अपने कारबार के अनुक्रम में अपने मालिकों की ओर से कार्य करते हुए अभिकर्ताओं द्वारा किए गए दुर्व्यपदेशन या कपट ऐसे अभिकर्ताओं द्वारा किए गए करारों पर वे ही प्रभाव रखते हैं मानो ऐसे दुर्व्यपदेशन या कपट उन मालिकों द्वारा किए गए हों, किन्तु अभिकर्ताओं द्वारा ऐसे विषयों में, जो उनके प्राधिकार के भीतर नहीं आते, किए गए दुर्व्यपदेशन या कपट का उनके मालिकों पर प्रभाव नहीं पड़ता।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 238 (IC Act Section-238 in Hindi)

अभिकर्ता द्वारा दुर्व्यपदेशन या कपट का करार पर प्रभाव-

अपने कारबार के अनुक्रम में अपने मालिकों की ओर से कार्य करते हुए अभिकर्ताओं द्वारा किए गए दुर्व्यपदेशन या कपट ऐसे अभिकर्ताओं द्वारा किए गए करारों पर वे ही प्रभाव रखते हैं मानो ऐसे दुर्व्यपदेशन या कपट उन मालिकों द्वारा किए गए हों, किन्तु अभिकर्ताओं द्वारा ऐसे विषयों में, जो उनके प्राधिकार के भीतर नहीं आते, किए गए दुर्व्यपदेशन या कपट का उनके मालिकों पर प्रभाव नहीं पड़ता।
दृष्टांत
(क) क, जो माल के विक्रय के लिए ख का अभिकर्ता है, एक दुर्व्यपदेशन द्वारा जिसे करने के लिए वह ख द्वारा प्राधिकृत नहीं था, ग को उसे खरीदने के लिए उत्प्रेरित करता है। जहां तक कि ख और ग के बीच का संबंध है, संविदा ग के विकल्प पर शून्यकरणीय है।
(ख) ख के पोत का कप्तान क, वहनपत्रों पर, उनमें वर्णित माल को पोत पर प्राप्त किए बिना ही हस्ताक्षर करता है। जहां तक ख और अपदेशी परेषक का संबंध है, वहनपत्र शून्य है।

Indian Contract Act Section-238 (IC Act Section-238 in English)

Effect, on agreement, of misrepresentation of fraud, by agent-

Misrepresentation made, or frauds committed, by agents acting in the course of their business for their principals, have the same effect on agreements made by such agents as if such misrepresentations or frauds had been made or committed by the principals; but misrepresentations made, or frauds committed, by agents, in matters which do not fall within their authority, do not affect their principals.
Illustrations
(a) A, being B‟s agent for the sale of goods, induces C to buy them by a misrepresentation, which he was not authorized by B to make. The contract is voidable, as between B and C, at the option of C.
(b) A, the captain of B‟s ship, signs bills of lading without having received on board the goods mentioned therein. The bills of lading are void as between B and the pretended cosignor.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 238 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 237 | Indian Contract Act Section 237

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-237) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 237 के अनुसार जब कि अभिकर्ता ने प्राधिकार के बिना अपने मालिक की ओर से कार्य किए हों या पर-व्यक्तियों के प्रति बाध्यताएं उपगत की हों तब मालिक ऐसे कार्यों या बाध्यताओं से आबद्ध होगा, यदि मालिक ने अपने शब्दों या आचरण से ऐसे पर-व्यक्तियों को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित किया हो कि ऐसे कार्य और बाध्यताएं उस अभिकर्ता के प्राधिकार के विस्तार के भीतर थी, जिसे IC Act Section-237 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 237 (Indian Contract Act Section-237) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 237 IC Act Section-237 के अनुसार जब कि अभिकर्ता ने प्राधिकार के बिना अपने मालिक की ओर से कार्य किए हों या पर-व्यक्तियों के प्रति बाध्यताएं उपगत की हों तब मालिक ऐसे कार्यों या बाध्यताओं से आबद्ध होगा, यदि मालिक ने अपने शब्दों या आचरण से ऐसे पर-व्यक्तियों को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित किया हो कि ऐसे कार्य और बाध्यताएं उस अभिकर्ता के प्राधिकार के विस्तार के भीतर थी।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 237 (IC Act Section-237 in Hindi)

यह विश्वास उत्प्रेरित करने वाले मालिक का दायित्व कि अभिकर्ता के अप्राधिकृत कार्य प्राधिकृत थे-

जब कि अभिकर्ता ने प्राधिकार के बिना अपने मालिक की ओर से कार्य किए हों या पर-व्यक्तियों के प्रति बाध्यताएं उपगत की हों तब मालिक ऐसे कार्यों या बाध्यताओं से आबद्ध होगा, यदि मालिक ने अपने शब्दों या आचरण से ऐसे पर-व्यक्तियों को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित किया हो कि ऐसे कार्य और बाध्यताएं उस अभिकर्ता के प्राधिकार के विस्तार के भीतर थी।
दृष्टांत
(क) क विक्रय के लिए माल ख को प्रेषित रखता है और उसे अनुदेश देता है कि वह उसे नियत कीमत से कम पर न बेचे। ख को दिए गए अनुदेशों को न जानते हुए ग आरक्षित कीमत से कम कीमत पर उस माल को खरीदने की ख से संविदा करता है । क उस संविदा से आबद्ध है।
(ख) क ऐसी परक्राम्य लिखत, जिन पर निरंक पृष्ठांकन है, ख के पास न्यस्त करता है। क के प्राइवेट आदेशों का अतिक्रमण कर ख उन्हें ग को बेच देता है। विक्रय ठीक है।

Indian Contract Act Section-237 (IC Act Section-237 in English)

Liability of principal inducing belief that agent’s unauthorized acts were authorized-

When an agent has, without authority, done acts or incurred obligations to third persons on behalf of his principal, the principal is bound by such acts or obligations, if he has by his words or conduct induced such third persons to believe that such acts and obligations were within the scope of the agent‟s authority.
Illustrations
(a) A consigns goods to B for sale, and gives him instructions not to sell under a fixed price. C, being ignorant of B‟s instructions, enters into a contract with B to buy the goods at a price lower than the reserved price. A is bound by the contract.
(b) A entrusts B with negotiable instruments endorsed in blank. B sells them to C in violation of private orders from A. The sale is good.

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भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 236 | Indian Contract Act Section 236

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-236) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 236 के अनुसार वह व्यक्ति, जिससे अभिकर्ता की हैसियत में संविदा की गई है, उसके पालन की अपेक्षा करने का हकदार नहीं है, यदि वह वास्तव में अभिकर्ता के तौर पर नहीं, वरन् स्वयं अपने लेखे कार्य कर रहा था, जिसे IC Act Section-236 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 236 (Indian Contract Act Section-236) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 236 IC Act Section-236 के अनुसार वह व्यक्ति, जिससे अभिकर्ता की हैसियत में संविदा की गई है, उसके पालन की अपेक्षा करने का हकदार नहीं है, यदि वह वास्तव में अभिकर्ता के तौर पर नहीं, वरन् स्वयं अपने लेखे कार्य कर रहा था।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 236 (IC Act Section-236 in Hindi)

मिथ्या रूप से अभिकर्ता के तौर पर संविदा करने वाला व्यक्ति पालन कराने का हकदार नहीं है-

वह व्यक्ति, जिससे अभिकर्ता की हैसियत में संविदा की गई है, उसके पालन की अपेक्षा करने का हकदार नहीं है, यदि वह वास्तव में अभिकर्ता के तौर पर नहीं, वरन् स्वयं अपने लेखे कार्य कर रहा था।

Indian Contract Act Section-236 (IC Act Section-236 in English)

Person falsely contracting as agent not entitled to performance-

A person with whom a contract has been entered into in the character of agent, is not entitled to require the performance of it, if he was in reality acting, not as agent, but on his own account.

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भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 235 | Indian Contract Act Section 235

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-235) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 235 के अनुसार जो व्यक्ति अपने को किसी दूसरे का प्राधिकृत अभिकर्ता होना असत्यतः व्यपदिष्ट करता है और तद्वारा किसी पर-व्यक्ति को उत्प्रेरित करता है कि वह उसे अभिकर्ता मान कर उसके साथ व्यवहार करे, यदि उसका अभिकथित नियोजक उसके कार्यों का अनुसमर्थन न करे तो, वह उस पर-व्यक्ति की उस हानि या नुकसान के बारे में जो उस पर-व्यक्ति ने ऐसे व्यवहार करने द्वारा उठाया है, प्रतिकर देने का दायी होगा, जिसे IC Act Section-235 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 235 (Indian Contract Act Section-235) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 235 IC Act Section-235 के अनुसार जो व्यक्ति अपने को किसी दूसरे का प्राधिकृत अभिकर्ता होना असत्यतः व्यपदिष्ट करता है और तद्वारा किसी पर-व्यक्ति को उत्प्रेरित करता है कि वह उसे अभिकर्ता मान कर उसके साथ व्यवहार करे, यदि उसका अभिकथित नियोजक उसके कार्यों का अनुसमर्थन न करे तो, वह उस पर-व्यक्ति की उस हानि या नुकसान के बारे में जो उस पर-व्यक्ति ने ऐसे व्यवहार करने द्वारा उठाया है, प्रतिकर देने का दायी होगा।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 235 (IC Act Section-235 in Hindi)

अपदेशी अभिकर्ता का दायित्व-

जो व्यक्ति अपने को किसी दूसरे का प्राधिकृत अभिकर्ता होना असत्यतः व्यपदिष्ट करता है और तद्वारा किसी पर-व्यक्ति को उत्प्रेरित करता है कि वह उसे अभिकर्ता मान कर उसके साथ व्यवहार करे, यदि उसका अभिकथित नियोजक उसके कार्यों का अनुसमर्थन न करे तो, वह उस पर-व्यक्ति की उस हानि या नुकसान के बारे में जो उस पर-व्यक्ति ने ऐसे व्यवहार करने द्वारा उठाया है, प्रतिकर देने का दायी होगा।

Indian Contract Act Section-235 (IC Act Section-235 in English)

Liability of pretended agent-

A person untruly representing himself to be the authorized agent of another, and thereby inducing a third person to deal with him as such agent, is liable, if his alleged employer does not ratify his acts, to make compensation to the other in respect of any loss or damage which he has incurred by so dealing.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 235 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 234 | Indian Contract Act Section 234

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-234) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 234 के अनुसार जबकि कोई व्यक्ति, जिसने किसी अभिकर्ता से संविदा की हो उस अभिकर्ता को इस विश्वास पर कार्य करने के लिए उत्प्रेरित करे कि केवल मालिक ही दायी ठहराया जाएगा या मालिक को इस विश्वास पर कार्य करने के लिए उत्प्रेरित करे कि केवल अभिकर्ता ही दायी ठहराया जाएगा तब वह, यथास्थिति, अभिकर्ता या मालिक को तत्पश्चात् दायी नहीं ठहरा सकता, जिसे IC Act Section-234 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 234 (Indian Contract Act Section-234) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 234 IC Act Section-234 के अनुसार जबकि कोई व्यक्ति, जिसने किसी अभिकर्ता से संविदा की हो उस अभिकर्ता को इस विश्वास पर कार्य करने के लिए उत्प्रेरित करे कि केवल मालिक ही दायी ठहराया जाएगा या मालिक को इस विश्वास पर कार्य करने के लिए उत्प्रेरित करे कि केवल अभिकर्ता ही दायी ठहराया जाएगा तब वह, यथास्थिति, अभिकर्ता या मालिक को तत्पश्चात् दायी नहीं ठहरा सकता।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 234 (IC Act Section-234 in Hindi)

अभिकर्ता या मालिक को इस विश्वास पर कार्य करने के लिए उत्प्रेरित करने का परिणाम न कि केवल मालिक या केबल अभिकर्ता दायी ठहराया जाएगा-

जबकि कोई व्यक्ति, जिसने किसी अभिकर्ता से संविदा की हो उस अभिकर्ता को इस विश्वास पर कार्य करने के लिए उत्प्रेरित करे कि केवल मालिक ही दायी ठहराया जाएगा या मालिक को इस विश्वास पर कार्य करने के लिए उत्प्रेरित करे कि केवल अभिकर्ता ही दायी ठहराया जाएगा तब वह, यथास्थिति, अभिकर्ता या मालिक को तत्पश्चात् दायी नहीं ठहरा सकता।

Indian Contract Act Section-234 (IC Act Section-234 in English)

Consequence of inducing agent or principal to act on belief that principal or agent will be held exclusively liable-

When a person who has made a contract with an agent induces the agent to act upon the belief that the principal only will be held liable, or induces the principal to act upon the belief that the agent only will be held liable, he cannot afterwards hold liable the agent or principal respectively.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 234 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।