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भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 215 | Indian Contract Act Section 215

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-215) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 215 के अनुसार यदि कोई अभिकर्ता अपने मालिक की सम्मति पहले से अभिप्राप्त किए बिना और उसको उन सब तात्त्विक परिस्थितियों से, जो उस विषय पर उसके अपने ज्ञान में आई हों, परिचित कराए बिना, अभिकरण के कारबार में अपने ही लेखे व्यवहार करे तो, यदि मामले से यह दर्शित हो कि या तो कोई तात्त्विक तथ्य अभिकर्ता द्वारा बेईमानी से मालिक से छिपाया गया है या अभिकर्ता के व्यवहार मालिक के लिए अहितकार रहे हैं, तो मालिक उस व्यवहार का निराकरण कर सकेगा, जिसे IC Act Section-215 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 215 (Indian Contract Act Section-215) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 215 IC Act Section-215 के अनुसार यदि कोई अभिकर्ता अपने मालिक की सम्मति पहले से अभिप्राप्त किए बिना और उसको उन सब तात्त्विक परिस्थितियों से, जो उस विषय पर उसके अपने ज्ञान में आई हों, परिचित कराए बिना, अभिकरण के कारबार में अपने ही लेखे व्यवहार करे तो, यदि मामले से यह दर्शित हो कि या तो कोई तात्त्विक तथ्य अभिकर्ता द्वारा बेईमानी से मालिक से छिपाया गया है या अभिकर्ता के व्यवहार मालिक के लिए अहितकार रहे हैं, तो मालिक उस व्यवहार का निराकरण कर सकेगा।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 215 (IC Act Section-215 in Hindi)

मालिक का अधिकार जब कि अभिकर्ता अभिकरण के कारबार में मालिक की सम्मति के बिना अपने ही लेखे व्यवहार करता है-

यदि कोई अभिकर्ता अपने मालिक की सम्मति पहले से अभिप्राप्त किए बिना और उसको उन सब तात्त्विक परिस्थितियों से, जो उस विषय पर उसके अपने ज्ञान में आई हों, परिचित कराए बिना, अभिकरण के कारबार में अपने ही लेखे व्यवहार करे तो, यदि मामले से यह दर्शित हो कि या तो कोई तात्त्विक तथ्य अभिकर्ता द्वारा बेईमानी से मालिक से छिपाया गया है या अभिकर्ता के व्यवहार मालिक के लिए अहितकार रहे हैं, तो मालिक उस व्यवहार का निराकरण कर सकेगा।
दृष्टांत
(क) क अपनी सम्पदा बेचने का निदेश ख को देता है। ख उस सम्पदा को ग के नाम में अपने लिए खरीद लेता है यह पता लगने पर कि ख ने सम्पदा अपने लिए खरीदी है क उस विक्रय का निराकरण कर सकेगा यदि वह यह दर्शित कर सके कि ख ने बेईमानी से कोई तात्विक तथ्य छिपाया है या वह विक्रय उसके लिए अहितकर रहा है।
(ख) क अपनी सम्पदा बेचने का निदेश ख को देता है । ख बेचने से पूर्व उस सम्पदा को देखने पर यह जान जाता है कि सम्पदा में एक खान है जो क को ज्ञात नहीं है। क को ख सूचित करता है कि वह सम्पदा अपने लिए खरीदना चाहता है किन्तु खान की बात छिपा लेता है। क खान के अस्तित्व को न जानते हुए ख को खरीदने देता है। क यह जानने पर कि ख सम्पदा को खरीदने के समय खान के बारे में जानता था, उस विक्रय को अपने विकल्प पर निराकृत या अंगीकृत कर सकेगा।

Indian Contract Act Section-215 (IC Act Section-215 in English)

Right of principal when agent deals, on his own account, in business of agency without principal’s consent-

If an agent deals on his own account in the business of the agency, without first obtaining the consent of his principal and acquainting him with all material circumstances which have come to his own knowledge on the subject, the principal may repudiate the transaction, if the case shows, either that any material fact has been dishonestly concealed from him by the agent, or that the dealings of the agent have been disadvantageous to him.
Illustrations
(a) A directs B to sell A‟s estate. B buys the estate for himself in the name of C. A, on discovering that B has bought the estate for himself, may repudiate the sale, if he can show that B has dishonestly concealed any material fact, or that the sale has been disadvantageous to him.
(b) A directs B to sell A‟s estate B, on looking over the estate before selling it, finds a mine on the estate which is unknown to A. B informs A that he wishes to buy the estate for himself, but conceals the discovery of the mine. A allows B to buy, in ignorance of the existence of the mine. A, on discovering that B knew of the mine at the time he bought the estate, may either repudiate or adopt the sale at his option.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 215 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 214 | Indian Contract Act Section 214

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-214) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 214 के अनुसार अभिकर्ता का यह कर्तव्य है कि कठिनाई की दशाओं में अपने मालिक से सम्पर्क रखने और उसके अनुदेश अभिप्राप्त करने में समस्त युक्तियुक्त तत्परता बरते, जिसे IC Act Section-214 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 214 (Indian Contract Act Section-214) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 214 IC Act Section-214 के अनुसार अभिकर्ता का यह कर्तव्य है कि कठिनाई की दशाओं में अपने मालिक से सम्पर्क रखने और उसके अनुदेश अभिप्राप्त करने में समस्त युक्तियुक्त तत्परता बरते।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 214 (IC Act Section-214 in Hindi)

मालिक से सम्पर्क रखने का अभिकर्ता का कर्तव्य-

अभिकर्ता का यह कर्तव्य है कि कठिनाई की दशाओं में अपने मालिक से सम्पर्क रखने और उसके अनुदेश अभिप्राप्त करने में समस्त युक्तियुक्त तत्परता बरते।

Indian Contract Act Section-214 (IC Act Section-214 in English)

Agent’s duty to communicate with principal-

It is the duty of an agent, in cases of difficulty, to use all reasonable diligence in communicating with his principal, and in seeking to obtain his instructions.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 214 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 213 | Indian Contract Act Section 213

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-213) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 213 के अनुसार अभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान उन सब उपाभिकर्ताओं के, जो उसने नियुक्त किए हों, प्राधिकार का (उन नियमों के अध्यधीन, जो अभिकर्ता के प्राधिकार के पर्यवसान के बारे में एतस्मिन् अन्तर्विष्ट है) पर्यवसान कारित कर देता है, जिसे IC Act Section-213 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 213 (Indian Contract Act Section-213) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 213 IC Act Section-213 के अनुसार अभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान उन सब उपाभिकर्ताओं के, जो उसने नियुक्त किए हों, प्राधिकार का (उन नियमों के अध्यधीन, जो अभिकर्ता के प्राधिकार के पर्यवसान के बारे में एतस्मिन् अन्तर्विष्ट है) पर्यवसान कारित कर देता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 213 (IC Act Section-213 in Hindi)

अभिकर्ता के लेखा-

अभिकर्ता अपने मालिक की मांग पर उचित लेखा देने के लिए आबद्ध है।

Indian Contract Act Section-213 (IC Act Section-213 in English)

Agent’s accounts-

An agent is bound to render proper accounts to his principal on demand.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 213 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 212 | Indian Contract Act Section 212

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-212) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 212 के अनुसार अभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान उन सब उपाभिकर्ताओं के, जो उसने नियुक्त किए हों, प्राधिकार का (उन नियमों के अध्यधीन, जो अभिकर्ता के प्राधिकार के पर्यवसान के बारे में एतस्मिन् अन्तर्विष्ट है) पर्यवसान कारित कर देता है, जिसे IC Act Section-212 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 212 (Indian Contract Act Section-212) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 212 IC Act Section-212 के अनुसार अभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान उन सब उपाभिकर्ताओं के, जो उसने नियुक्त किए हों, प्राधिकार का (उन नियमों के अध्यधीन, जो अभिकर्ता के प्राधिकार के पर्यवसान के बारे में एतस्मिन् अन्तर्विष्ट है) पर्यवसान कारित कर देता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 212 (IC Act Section-212 in Hindi)

अभिकर्ता से अपेक्षित कौशल और तत्परता-

अभिकर्ता अभिकरण के कारबार का संचालन उतने कौशल से करने के लिए आबद्ध है जितना वैसे कारबार में लगे हुए व्यक्तियों में साधारणतः होता है, जब तक कि मालिक को उसके कौशल के अभाव की सूचना न हो । अभिकर्ता सदा ही युक्तियुक्त तत्परता से कार्य करने के लिए और उसका जितना कौशल है उसे उपयोग में लाने के लिए और अपनी स्वयं की उपेक्षा, कौशल के अभाव या अवचार के प्रत्यक्ष परिणामों की बाबत अपने मालिक को प्रतिकर देने के लिए आबद्ध है, किन्तु ऐसी हानि या नुकसान की बाबत नहीं जो ऐसी उपेक्षा, कौशल के अभाव या अवचार से अप्रत्यक्षतः या दूरस्थतः कारित हो।
दृष्टांत
(क) कलकत्ते के एक वणिक क का एक अभिकर्ता ख लन्दन में है जिसे ख के लेखे में कुछ धन इस आदेश के साथ दिया जाता है कि वह उसे भेज दे। ख उस धन को बहुत समय तक रखे रखता है। उस धन के न मिलने के फलस्वरूप क दिवालिया हो जाता है। ख उस धन के लिए और जिस तारीख को वह दे दिया जाना चाहिए था उस तारीख से प्राविक दर पर, ब्याज के लिए और किसी प्रत्यक्ष हानि के लिए, उदाहरणार्थ विनिमय दर में फेरफार के लिए दायी है, किन्तु इससे अतिरिक्त के लिए नहीं।
(ख) माल के विक्रय के लिए एक अभिकर्ता क, जिसे उधार बेचने का प्राधिकार है, ख की शोधनक्षमता के बारे में उचित और प्रायिक जांच किए बिना ख को उधार माल बेचता है । इस विक्रय के समय ख दिवालिया है। उससे हुई हानि के लिए क अपने मालिक को प्रतिकर देगा।
(ग) पोत का बीमा करने के लिए ख द्वारा नियोजित एक बीमा-दलाल क इस बात का ध्यान रखने का लोप करता है कि बीमे की पालिसी में वे उपबन्ध रखे जाएं, जो प्रायः रखे जाते हैं। तत्पश्चात पोत नष्ट हो जाता है। उन उपबन्धों के न होने के परिणामस्वरूप निम्नांककों से कुछ वसूल नहीं किया जा सकता । ख की उस हानि की प्रतिपूर्ति करने के लिए क आबद्ध है।
(घ) इंगलैंड का एक वणिक क, मुम्बई के अपने अभिकर्ता ख को जिसने, अभिकरण प्रतिगृहीत किया है, रुई की 100 गांठे अमुक पोत में अपने को भेजने का निदेश देता है । ख की शक्ति में यह बात थी कि वह रुई भेज दे किन्तु वह ऐसा करने का लोप करता है । वह पोत सकुशल इंगलैंड पहुंच जाता है । उसके पहुंचने के तुरन्त पश्चात् रुई की कीमत चढ़ जाती है । ख उस लाभ की प्रतिपूर्ति क के प्रति करने को आबद्ध है जो क रुई की उन 100 गांठों में से उस समय कमाता जिस समय पोत पहुंचा किन्तु उस लाभ की पूर्ति के लिए नहीं जो उस पश्चात्वर्ती बढ़ोत्तरी के कारण होता।

Indian Contract Act Section-212 (IC Act Section-212 in English)

Skill and diligence required from agent-

An agent is bound to conduct the business of the agency with as much skill as is generally possessed by persons engaged in similar business unless the principal has notice of his want of skill. The agent is always bound to act with reasonable diligence, and to use such skill as he possesses; and to make compensation to his principal in respect of the direct consequences of his own neglect, want of skill or misconduct, but not in respect of loss or damage which are indirectly or remotely caused by such neglect, want of skill, or misconduct.
Illustrations
(a) A, a merchant in Calcutta, has an agent, B, in London, to whom a sum of money is paid on A‟s account, with orders to remit. B retains the money for a considerable time. A, in consequence of not receiving the money, becomes insolvent. B is liable for the money and interest from the day on which it ought to have been paid, according to the usual rate, and for any further direct loss-as, e.g., by variation of rate of exchange-but not further.
(b) A, an agent for the sale of goods, having authority to sell on credit, sells to B on credit, without making the proper and usual enquiries as to the solvency of B. B, at the time of such sale, is insolvent. A must make compensation to his principal in respect of any loss thereby sustained.
(c) A, an insurance-broker employed by B to effect an insurance on a ship, omits to see that the usual clauses are inserted in the policy. The ship is after wards lost. In consequence of the omission of the clauses nothing can be recovered from the underwriters. A is bound to make good the loss to B.
(d) A, a merchant in England, directs B, his agent at Bombay, who accepts the agency, to send him 100 bales of cotton by a certain ship. B, having it in his power to send the cotton, omits to do so. The ship arrives safely in England. Soon after her arrival the price of cotton rises. B is bound to make good to A the profit which he might have made by the 100 bales of cotton at the time the ship arrived, but not any profit he might have made by the subsequent rise.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 212 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 211 | Indian Contract Act Section 211

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-211) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 211 के अनुसार अभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान उन सब उपाभिकर्ताओं के, जो उसने नियुक्त किए हों, प्राधिकार का (उन नियमों के अध्यधीन, जो अभिकर्ता के प्राधिकार के पर्यवसान के बारे में एतस्मिन् अन्तर्विष्ट है) पर्यवसान कारित कर देता है, जिसे IC Act Section-211 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 211 (Indian Contract Act Section-211) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 211 IC Act Section-211 के अनुसार अभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान उन सब उपाभिकर्ताओं के, जो उसने नियुक्त किए हों, प्राधिकार का (उन नियमों के अध्यधीन, जो अभिकर्ता के प्राधिकार के पर्यवसान के बारे में एतस्मिन् अन्तर्विष्ट है) पर्यवसान कारित कर देता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 211 (IC Act Section-211 in Hindi)

मालिक के कारबार के संचालन में अभिकर्ता का कर्तव्य-

अभिकर्ता अपने मालिक के कारबार का संचालन मालिक द्वारा दिए गए निदेशों के अनुसार, या ऐसे निदेशों के अभाव में, उस रूढ़ि के अनुसार, करने के लिए आबद्ध है जो उस स्थान पर, जहां अभिकर्ता ऐसे कारबार का संचालन करता है, उसी किस्म का कारबार करने में प्रचलित हो। जबकि अभिकर्ता अन्यथा कार्य करे तब यदि कोई हानि हो तो उसे उसके लिए अपने मालिक की प्रतिपूर्ति करनी होगी और यदि कोई लाभ हो तो उसे उसका लेखा लेना होगा।
दृष्टांत
(क) क, एक अभिकर्ता, जो ख की ओर से ऐसा कारबार करने में लगा है, जिसमें यह रूढ़ि है कि समय-समय पर जो रुपए हाथ में आएं उसे ब्याज पर विनिहित कर दिया जाए, उसका वैसा विनिधान करने का लोप करता है। ख के प्रति उस ब्याज की प्रतिपूर्ति, जो इस प्रकार के विनिधानों से प्रायः अभिप्राप्त होती है, क को करनी होगी।
(ख) एक दलाल, ख जिसके कारबार में उधार बेचने की रूढ़ि नहीं है, क का माल ग को जिसका प्रत्यय उस समय बहुत ऊंचा है, उधार बेचता है। ग, संदाय करने से पूर्व दिवालिया हो जाता है । क की इस हानि की प्रतिपूर्ति ख को करनी होगी।

Indian Contract Act Section-211 (IC Act Section-211 in English)

Agent’s duty in conducting principal’s business-

An agent is bound to conduct the business of his principal according to the directions given by the principal, or, in the absence of any such directions, according to the custom which prevails in doing business of the same kind at the place where the agent conducts such business. When the agent acts otherwise, if any loss be sustained, he must make it good to his principal, and if any profit accrues, he must account for it.
Illustrations
(a) A, an agent engaged in carrying on for B a business, in which it is the custom to invest from time to time, at interest, the moneys which may be in hand, omits to make such investment. A must make good to B the interest usually obtained by such investments.
(b) B, a broker, in whose business it is not the custom to sell on credit, sells goods of A on credit to C, whose credit at the time was very high. C, before payment, becomes insolvent. B must make good the loss to A.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 211 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 210 | Indian Contract Act Section 210

भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-210) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 210 के अनुसार अभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान उन सब उपाभिकर्ताओं के, जो उसने नियुक्त किए हों, प्राधिकार का (उन नियमों के अध्यधीन, जो अभिकर्ता के प्राधिकार के पर्यवसान के बारे में एतस्मिन् अन्तर्विष्ट है) पर्यवसान कारित कर देता है, जिसे IC Act Section-210 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 210 (Indian Contract Act Section-210) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 210 IC Act Section-210 के अनुसार अभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान उन सब उपाभिकर्ताओं के, जो उसने नियुक्त किए हों, प्राधिकार का (उन नियमों के अध्यधीन, जो अभिकर्ता के प्राधिकार के पर्यवसान के बारे में एतस्मिन् अन्तर्विष्ट है) पर्यवसान कारित कर देता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 210 (IC Act Section-210 in Hindi)

उपाभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान-

अभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान उन सब उपाभिकर्ताओं के, जो उसने नियुक्त किए हों, प्राधिकार का (उन नियमों के अध्यधीन, जो अभिकर्ता के प्राधिकार के पर्यवसान के बारे में एतस्मिन् अन्तर्विष्ट है) पर्यवसान कारित कर देता है।

Indian Contract Act Section-210 (IC Act Section-210 in English)

Termination of sub-agent’s authority-

The termination of the authority of an agent causes the termination (subject to the rules herein contained regarding the termination of an agent‟s authority) of the authority of all sub-agents appointed by him.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 210 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।