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दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 8B | दहेज प्रतिषेध अधिकारी | Dowry Prohibition Act, Section- 8B in in hindi | Dowry Prohibition Officers.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 8B के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दहेज प्रतिषेध की धारा- 8B, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 8B का विवरण

दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा -8B के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस धारा के अन्तर्गत राज्य सरकार उतने दहेज प्रतिषेध अधिकारी नियुक्त कर सकेगी जितने वह ठीक समझे और वे क्षेत्र विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिनकी बाबत वे अपनी अधिकारिता और शक्तियों का प्रयोग इस अधिनियम के अधीन करेंगे।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 8B के अनुसार

दहेज प्रतिषेध अधिकारी-

(1) राज्य सरकार उतने दहेज प्रतिषेध अधिकारी नियुक्त कर सकेगी जितने वह ठीक समझे और वे क्षेत्र विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिनकी बाबत वे अपनी अधिकारिता और शक्तियों का प्रयोग इस अधिनियम के अधीन करेंगे।
(2) प्रत्येक दहेज प्रतिषेध अधिकारी निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का पालन करेगा, अर्थात्‌ :-
(क) यह देखना कि इस अधिनियम के उपबंधों का अनुपालन किया जाता है ;
(ख) दहेज देने या दहेज लेने को दुष्प्रेरित करने या दहेज मांगने को यथासंभव रोकना ;
(ग) इस अधिनियम के अधीन अपराध करने वाले व्यक्तियों के अभियोजन के लिए ऐसा साक्ष्य एकत्र करना जो आवश्यक हो ; और
ऐसे अतिरिक्त कार्य करना जो राज्य सरकार द्वारा उसे सौंपे जाएं या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(3) राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा दहेज प्रतिषेध अधिकारी को किसी पुलिस अधिकारी की ऐसी शक्तियां प्रदत्त कर सकेगी जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग ऐसी परिसीमाओं और शर्तों के अधीन रहते हुए करेगा जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं।
(4) राज्य सरकार दहेज प्रतिषेध अधिकारी को इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के दक्ष पालन में सलाह देने और सहायता करने के प्रयोजन के लिए, एक सलाहकार बोर्ड नियुक्त कर सकेगी जिसमें उस क्षेत्र से, जिसकी बाबत ऐसा दहेज प्रतिषेध अधिकारी उपधारा (1) के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करता है, पांच से अनधिक समाज कल्याण कार्यकर्ता होंगे (जिनमें से कम से कम दो महिलाएं होंगी)।

Dowry Prohibition Officers—
(1) The State Government may appoint as many Dowry Prohibition Officers as it thinks fit and specify the areas in respect of which they shall exercise their jurisdiction and powers under this Act.
(2) Every Dowry Prohibition Officer shall exercise and perform the following powers and functions, namely:—
(a) to see that the provisions of this Act are complied with;
(b) to prevent, as far as possible, the taking or abetting the taking of, or the demanding of, dowry;
(c) to collect such evidence as may be necessary for the prosecution of persons committing offences under the Act; and
(d) to perform such additional functions as may be assigned to him by the State Government, or as may be specified in the rules made under this Act.
(3) The State Government may, by notification in the Official Gazette, confer such powers of a police officer as may be specified in the notification on the Dowry Prohibition Officer who shall exercise such powers subject to such limitations and conditions as may be specified by rules made under this Act.(4) The State Government may, for the purpose of advising and assisting Dowry Prohibition Officers in the efficient performance of their functions under this Act, appoint an advisory board consisting of not more than five social welfare workers (out of whom at least two shall be women) from the area in respect of which such Dowry Prohibition Officer exercises jurisdiction under sub-section (1).

हमारा प्रयास दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा 8B की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 8A | कुछ मामलों में सबूत का भार | Dowry Prohibition Act, Section- 8A in in hindi | Burden of proof in certain cases.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 8A के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दहेज प्रतिषेध की धारा- 8A, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 8A का विवरण

दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा -8A के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस धारा के अन्तर्गत जहां कोई व्यक्ति धारा 3 के अधीन कोई दहेज लेने या दहेज का लेना दुष्प्रेरित करने के लिए या धारा 4 के अधीन दहेज मांगने के लिए अभियोजित किया जाता है वहां यह साबित करने का भार उसी पर होगा कि उसने उन धाराओं के अधीन कोई अपराध नहीं किया है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 8A के अनुसार

कुछ मामलों में सबूत का भार-
जहां कोई व्यक्ति धारा 3 के अधीन कोई दहेज लेने या दहेज का लेना दुष्प्रेरित करने के लिए या धारा 4 के अधीन दहेज मांगने के लिए अभियोजित किया जाता है ।

Burden of proof in certain cases—
Where any person is prosecuted for taking or abetting the taking of any dowry under section 3, or the demanding of dowry under section 4, the burden of proving that he had not committed an offence under those sections shall be on him.वहां यह साबित करने का भार उसी पर होगा कि उसने उन धाराओं के अधीन कोई अपराध नहीं किया है।

हमारा प्रयास दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा 8A की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 8 | अपराधों का कुछ प्रयोजनों के लिए संज्ञेय होना तथा जमानतीय और अशमनीय होना | Dowry Prohibition Act, Section- 8 in in hindi | Offences to be cognizable for certain purposes and to be bailable andnon-compoundable.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 8 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दहेज प्रतिषेध की धारा- 8, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 8 का विवरण

दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा -8 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस धारा के अन्तर्गत दहेज मामलो मे अपराधों का कुछ प्रयोजनों के लिए संज्ञेय होना तथा जमानतीय और अशमनीय होना प्रक्रिया को बताते है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 8 के अनुसार

अपराधों का कुछ प्रयोजनों के लिए संज्ञेय होना तथा जमानतीय और अशमनीय होना-

(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) इस अधिनियम के अधीन अपराधों को वैसे ही लागू होगी मानो वे –
(क) ऐसे अपराधों के अन्वेषण के प्रयोजनों के लिए; और
(ख) निम्नलिखित से भिन्न विषयों के प्रयोजनों के लिए –
(i) उस संहिता की धारा 42 में विनिर्दिष्ट विषय; और
(ii) किसी व्यक्ति की वारण्ट के बिना या मजिस्ट्रेट के किसी आदेश के बिना गिरफ्तारी, संज्ञेय अपराध हों ।
(2) इस अधिनियम के अधीन प्रत्येक अपराध [अजमानतीय] और अशमनीय होगा।

Offences to be cognizable for certain purposes and to be bailable and
non-compoundable—
(1) The Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974) shall apply to offences
under this Act as if they were cognizable offences—
(a) for the purposes of investigation of such offences; and
(b) for the purposes of matters other than—
(i) matters referred to in section 42 of that Code; and
(ii) the arrest of a person without a warrant or without an order of a Magistrate.
(2) Every offence under this Act shall be [non-bailable] and non-compoundable.

हमारा प्रयास दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा 8 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 7 | अपराधों का संज्ञान | Dowry Prohibition Act, Section- 7 in in hindi | Cognizance of offences.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 7 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दहेज प्रतिषेध की धारा- 7, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 7 का विवरण

दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा -7 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस धारा के अन्तर्गत वह मामले जिनमे दहेज लेेने या देने के लिये किसी पक्ष को मानसिक प्रताडित करता या दबाव बनाता है तो न्यायाल उनके अपराधो को संज्ञान मे लेते हुये न्यायिक कार्यवाही करती है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 7 के अनुसार

अपराधों का संज्ञान-

(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, –
(क) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा;
(ख) कोई न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान, –
(i) अपनी जानकारी पर या ऐसे अपराध को गठित करने वाले तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर, या
(ii) अपराध से व्यथित व्यक्ति या ऐसे व्यक्ति के माता-पिता या अन्य नातेदार द्वारा अथवा किसी मान्यताप्राप्त कल्याण संस्था या संगठन द्वारा किए गए परिवाद पर, ही करेगा, अन्यथा नहीं;
(ग) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराए गए किसी व्यक्ति के विरुद्ध, इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत कोई दण्डादेश पारित करे ।
स्पष्टीकरण – इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, मान्यताप्राप्त कल्याण संस्था या संगठन” से कोई ऐसी समाज कल्याण संस्था या संगठन अभिप्रेत है जिसे इस निमित्त केन्द्रीय या राज्य सरकार द्वारा मान्यता दी गई है ।
(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय 36 की कोई बात इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध को लागू नहीं होगी ।]
(3) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, अपराध से व्यथित व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कथन ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन अभियोजन का भागी नहीं बनाएगा।

Cognizance of offences—
(1) Notwithstanding anything contained in the Code of Criminal
Procedure, 1973 (2 of 1974),—
(a) no Court inferior to that of a Metropolitan Magistrate or a Judicial Magistrate of the first class shall try any offence under this Act;
(b) no court shall take cognizance of an offence under this Act except upon—
(i) its own knowledge or a police report of the facts which constitute such offence, or
(ii) a complaint by the person aggrieved by the offence or a parent or other relative of such person, or by any recognised welfare institution or organisation;
(c) it shall be lawful for a Metropolitan Magistrate or a Judicial Magistrate of the first class to pass any sentence authorised by this Act on any person convicted of an offence under this Act.
Explanation— For the purposes of this sub-section, “recognised welfare institution or organisation” means a social welfare institution or organisation recognised in this behalf by the Central or State Government.
(2) Nothing in Chapter XXXVI of the Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974), shall apply to any offence punishable under this Act.
(3) Notwithstanding anything contained in any law for the time being in force a statement made by the person aggrieved by the offence shall not subject such person to a prosecution under this Act.

हमारा प्रयास दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा 7 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 6 | दहेज का पत्नी या उसके वारिसों के फायदे के लिए होना | Dowry Prohibition Act, Section- 6 in in hindi | Dowry to be for the benefit of the wife or her heirs.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 6 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दहेज प्रतिषेध की धारा- 6, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 6 का विवरण

दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा -6 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस धारा के अन्तर्गत जहां कोई दहेज ऐसी स्त्री से भिन्न, जिसके विवाह के संबंध में वह दिया गया है, किसी व्यक्ति द्वारा प्राप्त किया जाता है, वहां वह व्यक्ति, उस दहेज को, विवाह से पूर्व प्राप्त किया गया था।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 6 के अनुसार

दहेज का पत्नी या उसके वारिसों के फायदे के लिए होना-

(1) जहां कोई दहेज ऐसी स्त्री से भिन्न, जिसके विवाह के संबंध में वह दिया गया है, किसी व्यक्ति द्वारा प्राप्त किया जाता है, वहां वह व्यक्ति, उस दहेज को, –
(क) यदि वह दहेज विवाह से पूर्व प्राप्त किया गया था तो विवाह की तारीख के पश्चात्‌ [तीन मास] के भीतर ; या
(ख) यदि वह दहेज विवाह के समय या उसके पश्चात्‌ प्राप्त किय़ा गया था, तो उसकी प्राप्ति की तारीख के पश्चात्‌ [तीन मास] के भीतर; या
(ग) यदि वह उस समय जब स्त्री अवयस्क थी तब प्राप्त किया गया था तो उसके अठारह वर्ष आयु प्राप्त करने के पश्चात्‌ [तीन मास] के भीतर, स्त्री को अन्तरित कर देगा और ऐसे अन्तरण तक उसे न्यास के रूप में स्त्री के फायदे के लिए धारण करेगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) द्वारा अपेक्षित किसी संपत्ति का, उसके लिए विनिर्दिष्ट परिसीमा काल के भीतर [या उपधारा (3) द्वारा अपेक्षित] अन्तरण करने में असमर्थ रहेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से कम की नहीं होगी किन्तु दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, [जो पांच हजार रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु दस हजार रुपए तक का हो सकेगा] या दोनों से, दंडनीय होगा।
(3) जहां उपधारा (1) के अधीन किसी संपत्ति के लिए हकदार स्त्री की उसे प्राप्त करने के पूर्व मृत्यु हो जाती है, वह स्त्री के वारिस उसे तत्समय धारण करने वाले व्यक्ति से दावा करने के हकदार होंगे :
[परन्तु जहां ऐसी स्त्री की मृत्यु उसके विवाह के सात वर्ष के भीतर प्राकृतिक कारणों से अन्यथा हो जाती है वहां ऐसी संपत्ति, –
(क) यदि उसकी कोई संतान नहीं है तो उसके माता-पिता को अंतरित की जाएगी, या
(ख) यदि उसकी संतान है तो उसकी ऐसी संतान को अंतरित की जाएगी और ऐसे अंतरण तक ऐसी संतान के लिए न्यास के रूप में धारण की जाएगी ।
(3क) जहां उपधारा (1) [या उपधारा (3)] द्वारा अपेक्षित संपत्ति का अंतरण करने में असफल रहने के लिए, उपधारा (2) के अधीन सिद्धदोष ठहराए गए किसी व्यक्ति ने, उस उपधारा के अधीन उसके सिद्धदोष ठहराए जाने के पूर्व, ऐसी संपत्ति का, उसके लिए हकदार स्त्री को या, यथास्थिति, [उसके वारिसों, माता-पिता या संतानट को अंतरण नहीं किया है वहां, न्यायालय उस उपधारा के अधीन दण्ड अधिनिर्णीत करने के अतिरिक्त, लिखित आदेश द्वारा, यह निदेश देगा कि ऐसा व्यक्ति, ऐसी संपत्ति का, यथास्थिति, ऐसी स्त्री या [उसके वारिसों, माता-पिता या संतानट को ऐसी अवधि के भीतर जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, अंतरण करे और यदि ऐसा व्यक्ति ऐसे निदेश का इस प्रकार विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अनुपालन करने में असफल रहेगा तो संपत्ति के मूल्य के बराबर रकम उससे ऐसे वसूल की जा सकेगी मानो वह ऐसे न्यायालय द्वारा अधिरोपित जुर्माना हो और उसका, यथास्थिति, उस स्त्री या [उसके वारिसों, माता-पिता या संतानट को संदाय किया जा सकेगा ।
(4) इस धारा की कोई बात धारा 3 या धारा 4 के उपबंधों पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

Dowry to be for the benefit of the wife or her heirs—
(1) Where any dowry is received by any person other than the woman in connection with whose marriage it is given, that person shall transfer it to
the woman—
(a) if the dowry was received before marriage, within [three months] after the date of marriage; or
(b) if the dowry was received at the time of or after the marriage, within
[three months] after the date of its receipt; or
(c) if the dowry was received when the woman was a minor, within
[three months] after she has attained the age of eighteen years;
and pending such transfer, shall hold it in trust for the benefit of the woman.
(2) If any person fails to transfer any property as required by sub-section (1) within the time limit specified therefor [or as required by sub-section (3), he shall be punishable with imprisonment for a term which shall not be less than six months, but which may extend to two years or with fine [which
shall not be less than five thousand rupees, but which may extend to ten thousand rupees] or with both.]
(3) Where the woman entitled to any property under sub-section (1) dies before receiving it, the heirs of the woman shall be entitled to claim it from the person holding it for the time being:
Provided that where such woman dies within seven years of her marriage, otherwise than due to natural causes, such property shall,—
(a) if she has no children, be transferred to her parents, or
(b) if she has children, be transferred to such children and pending such transfer, be held in trust for such children.
(3A) Where a person convicted under sub-section (2) for failure to transfer any property as required by sub-section (1) [or sub-section (3)] has not, before his conviction under that sub-section, transferred such property to the woman entitled thereto or, as the case may be, [her heirs, parents or children] the Court shall, in addition to awarding punishment under that sub-section, direct, by order in writing, that such person shall transfer the property to such woman or, as the case may be, [her heirs, parents or children] within such period as may be specified in the order, and if such person fails to comply with the direction within the period so specified, an amount equal to the value of the property may be recovered from him as if it were a fine imposed by such Court and paid to such woman or, as the case may be, [her heirs, parents or children].
(4) Nothing contained in this section shall affect the provisions of section 3 or section 4.

हमारा प्रयास दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा 6 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 5 | दहेज देने या लेने के लिए करार का शून्य होना | Dowry Prohibition Act, Section- 5 in in hindi | Agreement for giving or taking dowry to be void.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 5 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दहेज प्रतिषेध की धारा- 5, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 5 का विवरण

दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा -5 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस धारा के अन्तर्गत यदि कोई व्यक्ति, यथास्थिति, वधू या वर के माता-पिता या अन्य नातेदार या संरक्षक के मध्य दहेज देने या लेने के लिए करार शून्य होगा।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 5 के अनुसार

दहेज देने या लेने के लिए करार का शून्य होना-

दहेज देने या लेने के लिए करार शून्य होगा।

Agreement for giving or taking dowry to be void—
Any agreement for the giving or taking of dowry shall be void.

हमारा प्रयास दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा 5 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।