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जमानत कब और किसे किन-किन अपराधो मे मिल सकती है? (When and who can get bail in which crimes?)

अक्सर हम लोगो ने देखा है कि कोई व्यक्ति अथवा फिल्मी दुनिया का कोई अभिनेता, अपराध करके बड़े मजे से बाहर घूम रहा है तो हमारे मन मे यह प्रश्न जरूर उठता है कि इसे तो कुछ दिन पहले, इस मामले मे पुलिस गिरफ्तार करके ले गयी थी और यह व्यक्ति अब बाहर कैसे घूम रहा है, तो आज हम बात करेंगें कि ( What is bail? When can I get bail ), किसी अभियुक्त को जमानत/बेल कैसे मिल सकती है और जेल से बाहर जमानत, पर किन-किन परिस्थितियों मे कैसे निकला जाये, इसके आलावा जमानत पर बाहर आने वाले अभि़युक्त को न्यायालय किन शर्तो पर जमानत देता है

मुचलका/ पर्सनल बॉन्ड क्या है?

जमानत लेने के लिये हमारी कानून व्यवस्था मे दो प्रकार से किसी व्यक्ति को बॉन्ड/सिक्योरिटी लेकर जमानत देने का अधिकार दिया गया है पहला एक सिक्योरिटी बॉन्ड और दूसरा पर्सनल बॉन्ड। आमतौर पर अदालत दोनों तरह के बॉन्ड जारी करने का आदेश देती है। जब कि कानून यह भी कहता है कि अदालत किसी को भी सिर्फ पर्सनल बॉन्ड पर भी छोड़ सकती है। सामान्य हिंदुस्तानी भाषा में सिक्योरिटी बॉन्ड को जमानत और पर्सनल बॉन्ड को मुचलका कहा जाता है।

अपराध के प्रकार और जमानत की प्रक्रिया-

वैसे हम पहले समझते है अपराध कितने प्रकार के होते है। अपराध की दो श्रेणी होती है- जमानतीय अपराध (Bailable Offence) और गैर-जमानतीय अपराध (Non-Bailable Offence)

जमानतीय अपराध वे अपराध होते है जैसे कोई किसी गैर-कानूनी जनसभा का सदस्य है, झगड़ा करना, घातक हथियार रखना, उपद्रव करना, शांति भंग करना इत्यादि जो गम्भीर प्रकृति के नही होते है वह सभी जमानतीय अपराध की श्रेणी मे आते है, इसी तरह से गैर-जमानती अपराध जैसे- किसी हत्या करना, हत्या का प्रयास करना, रेप करना, गम्भीर चोट पहुचाना, अपहरण करना इत्यादि अपराध गैर-जमानती श्रेणी मे आते है।

किसी अभियुक्त व्दारा यदि जमानतीय अपराध किया गया है, तो पुलिस अधिकारी अथवा न्यायालय उसे जमानत दे देता है। जमानत देने का तात्पर्य यह नही कि अभियुक्त व्दारा गम्भीर अपराध नही किया गया है, ब्लकि जमानत देना या न देना न्यायालय के न्यायविवेक पर निर्भर करता है, अगर न्यायालय को जब यह लगने लगता है, कि अभियुक्त सबूत मिटाने या फरार होने की कोशिश कर सकता है अथवा यह कृत्य यह व्यक्ति बार-बार करता आ रहा है, तो भी न्यायालय अभियुक्त की जमानत याचिका को खारिज कर सकता है। जमानतीय अपराधो मे जांच अधिकारी/पुलिस अधिकारी अभियुक्त स्वयं ही मुचलके पर या बेलबॉन्ड के माध्यम से जमानत दे सकता है।

मुचलके पर जमानत का प्रावधान-

मुचलके पर जमानत का प्रावधान उन मामलों मे लागू होता है, जहां किसी अभियुक्त को पुलिस (अपनी हिरासत मे लिये है), तो वह अभियुक्त को मुचलके पर जमानत दे सकता है। मुचलके का अर्थ पर्सनल बाॉन्ड (बिना गारन्टी) भराकर भी जमानत दे सकता है। यह उन साधारण मामले जैसे सार्वजनिक स्थान पर झगड़ा, गाली-गलौज और हल्की फुल्की मारपीट इत्यादि पर आसानी से मुचलके पर जमानत देने का अधिकार होता है।

न्यायालय आमतौर पर गैर-गम्भीर अपराधों मे जमानत दे देती है, ऐसे मामलो मे जमानत या तो पुलिस अधिकारी (जिसकी हिरासत मे है) या न्यायालय दे सकता है, अभियुक्त को जमानत गारन्टी या बिना गारन्टी के जमानत “प्रतिज्ञापत्र” को निष्पादित कर जमानत पर रिहा किया जा सकता है। जमानत बाण्डं के कुछ नियम एवंम् शर्ते जैसे अभियुक्त न्यायाल या पुलिस अधिकारी के अनुमति के बिना राज्य के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र को छोड़ कर नही जा सकेगा, हर बार अभियुक्त की अवश्यकता पड़ने पर पुलिस अधिकारी या न्यायालय के समक्ष उपस्थिति होना पड़ेगा। अभियुक्त जांच मे पूर्ण समर्थन करेगा, किसी भी दस्तावेजों के साथ छेडछाड़ नही करेंगा और न ही किसी सबूत और गवाह को डराने या मिटाने का प्रयास करेगा। जो अभियुक्त जमानत की शर्तो का पालन करने मे विफल रहता है, तो न्यायालय अभियुक्त को जमानत देेने से इन्कार करने का अधिकार भी है, क्यो न वह अपराध जमानती हो।

इसी तरह से गैर-जमानतीय अपराध वह अपराध होते है जो गम्भीर प्रकृति के होते है, इन अपराधों मे न्यायालय इतनी आसानी से जमानत नही देताा है। काफी समय जमानत मिलने मे लग जाता है, इसके अलावा न्यायालय यह भी देखता कि अभियुक्त इस अपराध मे कितना इनवाल्व है और इस व्यक्ति का पुराना क्या रिकार्ड है क्या पहले भी कभी किसी दूसरे गम्भीर अपराध मे लिप्त तो नही है। गैर-जमानतीय मामलों मे जांच अधिकारी/पुलिस अधिकारी अभियुक्त को जमानत नही दे सकते है, केवल मजिस्ट्रेट/न्यायाधीश ही जमानत दे सकेगें।

इसके अलावा यदि पुलिस समय पर आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल नही करते है, तब भी अभियुक्त को जमानत दी जा सकती है, चाहे मामला गम्भीर क्यों न हो। जिन अपराधों मे दस साल की सजा है, यदि उसमे 90 दिन मे आरोप-पत्र पेश नही किया, तो भी जमानत देने का प्रावधान है।

गैर-जमानतीय अपराध वाले मामलों मे यदि न्यायालय को यह भान हो जाता है कि अभियुक्त को वादी व्दारा केवल परेशान करने उद्देश्य से फसांया है और वह इस अपराध मे पूर्णतयाः लिप्त नही है, अथवा साक्ष्यो को देखने और मामले की जांच करने के पश्चात् अगर न्यायालय को ज्ञात हो जाता है कि अभियुक्त पर यह झूठा आरोप लगाया गया है अथवा जमानत की सुनवाई के समय यह सिद्द कर ले जाते है, तब भी असानी से जमानत/बेल मिल जाती है।

जमानत/बेल (Bail) के प्रकार-

जमानत/बेल (Types of Bail) दो प्रकार से मिलती है, अर्थात् जब कोई अपराध कारित होता है, तो अभियुक्त को न्यायालय एवंम् पुलिस अधिकारी के समक्ष उपस्थित ही होना पड़ता है, इसके अलावा यदि उपस्थित होंगे तो अभियुक्त को यह भी खतरा बना रहता है कि यदि हम न्यायालय अथवा पुलिस के समक्ष ऐसे ही उपस्थित हो जायेंगे, तो कही ऐसा न हो पुलिस अधिकारी अथवा न्यायालय हमे जेल न भेज दे, इसलिये अभियुक्त को बेल का सहारा लेना पड़ता है, तो आज हम जानेंगे। जमानत/बेल के प्रकार और यह बेल कब तक, किस तरह से काम मे आती है।

अग्रिम जमानत/बेल-

अग्रिम जमानत (Anticipatory bail) बेल उन अभियुक्त पर लागू होता है, जिन्हे न्यायालय अथवा पुलिस अधिकारी तलब कर रही है, कि अभियुक्त न्यायालय अथवा पुलिस अधिकारी के समक्ष उपस्थित हो, इसलिये सम्मन जारी करती है। ऐसे मामलो मे जब प्राथमिक रिपोर्ट/एनसीआर दर्ज की जाती है, तो पुलिस अधिकारी अभियुक्त को सूचित करती है, कि आइये और मामले की सही जांच हेतु प्रस्तुत होकर प्रकरण को समझाइये आकर, लेकिन कभी-कभी मामले की गम्भीरता को देखते हुये गिरफ्तार करने की भी शक्ति होती है। यदि पुलिस अधिकारी व्दारा रिपोर्ट दर्ज कर ली गयी है, तो भी अभियुक्त न्यायालय मे इस आधार पर अन्तरिम जमानत हेतु आवेदन कर सकता है कि अभियुक्त निर्दोष है, केवल झूठे मामले मे फसांया गया और यदि जो भी कारण अभियुक्त को निर्दोष साबित करने के लिये हो, सभी कारणों को ढंग से बतलाने के पश्चात् न्यायालय आरोप सिद्ध होने तक अग्रिम जमानत दे सकती है।

अग्रिम जमानत का उद्धेश्य केवल अभियुक्त की बेगुनाही साबित करने तक ही मान्य होती है, अर्थात् अभियुक्त को पुलिस की पूरी मदद् करनी होगी, पुलिस आपको गिरफ्तार नही करेगी और आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल होने तक पुलिस अधिकारी एवंम् आपसे कुछ नही बोलेगी, लेकिन जब आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल हो जायेगी, तो फिर आपको रेगूलर बेल करानी ही होगी।

रेगुलर जमानत/बेल-

रेगुलर बेल (Regular bail) प्रत्येक मामले मे गिरफ्तारी से बचने के लिये लेना ही पड़ता है, इसके अलावा अभियुक्त को यह बेल केवल गिरफ्तारी से बचाती है और न्यायालय और पुलिस अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने के लिये बाध्य भी करती है, दोनो सूरतो मे यदि अभियुक्त समयानुसार न्यायालय अथवा पुलिस अधिकारी के समक्ष उपस्थित नही होता है, तो यह जमानत/बेल स्वतः ही समाप्त हो जाती है।

वैसे आमतौर पर बेल बॉन्ड भराने का एक मुख्य उद्देश्य यह भी होता है, कि अभियुक्त को जब भी न्यायालय अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने हेतु बुलाया जायेगा, तो वह उपस्थित होगा। किसी दूसरे राज्य मे बिना अग्रिम सूचना दिये कही नही जा सकेगा। इसके अलावा रेगुलर बेल के जो भी जमानतगीर व्दारा अभियुक्त की उपस्थित कराने हेतु गारन्टर लगे है, यह उनकी भी जिम्मेदारी होती है, कि अभियुक्त को समय पर उपस्थित कराये। अन्यथा जमानत स्वतः ही निरस्त हो जाती है।

जमानत की शर्ते-

किसी मामले मे अभियुक्त को जब जमानत मंजूर हो जाती है, तो अभियुक्त का भी दायित्व होता है कि वह जमानत की पूर्ण शर्तो का ढंग से पालन करे। अभियुक्त को यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि यदि न्यायालय ने जमानत दी है तो हमे क्या-क्या सावधानियां रखनी होगी। अन्यथा कही ऐसा न हो कि अभियुक्त की थोड़ी सी लापरवाही अभियुक्त को जेल न पहुचा दे।

न्यायालय/पुलिस अधिकारी किसी अभियुक्त को किन-किन आधारों पर जमानत/बेल पर रिहा करती है-

  • रिहा होने के बाद आप वादी को परेशान नहीं करेंगे।
  • जमानत पर रिहा होने के बाद अभियुक्त किसी भी सबूत या गवाह को मिटाने की कोशिश नहीं करेंगे ।
  • बेल पर रिहा होने वाले अभियुक्त विदेश यात्रा नहीं कर सकेंगे।
  • जमानत/बेल मिलने के पश्चात् अभियुक्त बिना अग्रिम सूचना दिये राज्य एवंम् जिला छोड़कर नही जा सकेंगे।

उपरोक्त लेख के माध्यम दी गयी जानकारी आप समझ ही गये होंगे, फिर भी आपके मन मे किसी भी प्रकार की कोई शंका हो, तो आप कमेन्ट के माध्यम जानकारी ले सकते है।

ईट भट्ठों मामलों में 01.04.2022 से महत्वपूर्ण कर संबंधी बदलाव

जीएसटी काउंसिल ने अपनी 45वी मीटिंग में Brick kiln tax change in GST ईट भट्ठों पर जीएसटी टैक्स दर पर चर्चा की थी, तो आज हम जानेंगे कि जीएसटी में कम्पोजीशन एवंम् रेगुलर करदाताओं की क्या स्थिति होगी। इसके अलावा हम जानेंगे कि किन-किन मामलों मे कम्पोजीशन स्कीम को ले सकेंगे और कब नही ले सकेंगे, साथ ही ईट भट्टों पर जीएसटी की कर देयता क्या होगी। यह सभी जानकारी आपके साथ साझा करेंगे।

जीएसटी काउंसिल GST Council द्वारा 01.04.2022 से ईट भट्ठों के मामले में नई कर दर लागू करने का निर्णय लिया गया था। जो 5 प्रतिशत कर दर के स्थान पर 12 प्रतिशत कर दर लागू होगी।

कब कम्पोजीशन स्कीम लागू नही होगी?

यह भी प्रावधान किया गया है कि ईट के उत्पादकों पर धारा 10 के तहत कम्पोजीशन के लागू नहीं होंगे। हालांकि ट्रेडर्स कम्पोजीशन का लाभ उठा सकते है।

ईटों पर जीएसटी दर बिना इनपुट टैक्स क्रेडिट क्लेम किये 6 प्रतिशत तथा इनपुट टैक्स क्रेडिट करने पर 12 प्रतिशत ट्रेडर्स को छोड़कर सभी करदाताओ पर लागू होगी। (6 प्रतिशत करदेयता कम्पोजीशन स्कीम पर ही लागू होगी)

कब कम्पोजीशन स्कीम लागू होगी?

जो करदाता कम्पोजीशन स्कीम Composition Scheme for Brick Kilns लेना चाहते है, यदि करदाता ट्रेडर्स है, तो असानी से कम्पोजीशन स्कीम अथवा रेगुलर स्कीम मे से कोई भी स्कीम ले सकते है। इसके अलावा कम्पोजीशन स्कीम मे इनपुट टैक्स का लाभ नही मिलेगा और बिक्री पर 6 प्रतिशत की करदेयता होगी।

कम्पोजीशन स्कीम सभी ट्रेडर्स पर लागू होता है, जो केवल खरीद-बिक्री का कारोबार करते है, इसके अलावा यह स्कीम ट्रेडर्स के लिये भी वैकल्पिक है, चाहे तो कम्पोजीशन स्कीम अथवा रेगुलर स्कीम दोनो मे से किसी भी विकल्प का चुनाव कर सकेंगे।

नई कर दरे (महत्वपूर्ण बदलाव) New tax rate in brick kilns

  1. ईटों पर जीएसटी दर 12 प्रतिशत की गई [अधिसूचना संख्या 01/2022 सीटी (रेट) दिनांक – 31-03-22
  2. इंटों पर इनपुट टैक्स क्लेम न करने पर 6 प्रतिशत जीएसटी [अधिसूचना संख्या 02/2022 सीटी (रेट) दिनांक 31-03-2022]
  3. (3) इंटों से संबंधित प्रोडक्ट पर रजिस्ट्रेशन के लिए निर्धारित 40 लाख रु. की टर्नओवर का लाभ नहीं [अधिसूचना संख्या 03/2022 सीटी दिनांक 31-03-20221]
  4. ईंटों से संबंधित प्रोडक्ट के उत्पादों को कम्पोजीशन का लाभ नहीं [ अधिसूचना संख्या 04/2022 सीटी दिनांक 31-03-2022]

कौन-सी ईटो पर लागू होगे ये प्रावधान

एचएसएन कोडवस्तु का नाम
6815फ्लाई ऐश बिक्स या फ्लाई ऐश जिसमे 90 प्रतिशत से
अधिक फ्लाई ऐश कन्टेन्ट हो, फ्लाई ऐश ब्लोक
6901 00 10ब्रिक्स ऑफ फोसिल मील्स या मिलती-जुलती सिलीसिओस अर्थस्
6904 10 00बिल्डिंग ब्रिक्स
605 10 00अर्थन या रूफिंग टाइल्स

संविधान क्या है | What is Constitution | संविधान की परिभाषा क्या है | What is the definition of Constitution | भारतीय संविधान | Indian Constitution in Hindi

भारतीय संविधान Indian Constitution in Hindi | संविधान क्या है? प्रत्येक देश का अपना एक समाजिक, न्यायिक, राजनैतिक ढांचा है, जिसके अन्तर्गत ही न्याय व्यवस्था, समाजिक व्यव्स्था एवंम् समाज मे रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार को एक दिशा प्रदान करता है या कह सकते है रूप रेखा प्रदान करता है। जिसे ही हम संविधान कहते है।

भारतीय संविधान Indian Constitution in Hindi का सीधा अर्थ हम समझ सकते है, जो हमारे समाज एवंम् समाज रहने वाले प्रत्येक नागरिकों के लिये उचित ढंग, न्याय, व्यवहार एवंम् समाजिक रूप-रेखा को चलाने के नियम एवंम् कानून का पालन कराता है, वह संविधान कहलाता है। संविधान ही प्रत्येक देश का मूल मंत्र होता है। जो प्रत्येक नागरिक को रहने, खाने, घूमने, बोलने जैसी आजादी प्रदान करता है।

संविधान की परिभाषा (Define Constitution in Hindi)

संविधान ही हमारे राजनैतिक, समाजिक एवंम् न्यायिक क्रिया-कलाप को सुव्यवस्थित बनाये रखने के लिये एक सही ढंग प्रदान करता है, अर्थात् संविधान ही बतलाता है कि समाज को कैसे चलाये, किसी आम नागरिक को किसी तकलीफ न हो और किसी व्यक्ति के अधिकारो को हनन न हो। समाज मे प्रत्येक सकारात्मक व्यावस्था एवंम् सुचारू रूप से क्रिया-कलाप को चलाने के लिये संविधान का गठन किया गया जिससे समाज मे रहने वाले प्रत्येक नागरिकों को किसी प्रकार की असुविधा न हो और न ही किसी के मौलिक अधिकारो का हनन हो। संविधान के आधार पर ही देश की शासन व्यवस्था को संचालित किया जाता है|

भारत का संविधान (The constitution of India)

भारत का संविधान, भारत का सर्वोच्च विधान है जो दिनांक द्वारा 26 नवम्बर 1949 को पारित हुआ तथा दिनांक 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। यह दिन (26 नवम्बर) भारत के संविधान दिवस के रूप में घोषित किया गया है । जबकि 26 जनवरी का दिन भारत में गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत का संविधान के निर्माता डॉ भीमराव अम्बेडकर है। भारत का संविधान विश्व के सभी गणतान्त्रिक देश का सबसे लम्बा लिखित संविधान है।

भारत के संविधान में वर्तमान समय में भी केवल 395 अनुच्छेद, तथा 12 अनुसूचियाँ हैं और ये 25 भागों में विभाजित है। परन्तु इसके निर्माण के समय मूल संविधान में 395 अनुच्छेद जो 22 भागों में विभाजित थे इसमें केवल 8 अनुसूचियाँ थीं।

भारत के संविधान मे केन्‍द्रीय संसद की परिषद् में राष्‍ट्रपति तथा दो सदन है जिन्‍हें राज्‍यों की परिषद राज्‍यसभा तथा लोगों का सदन लोकसभा के नाम से जाना जाता है। संविधान में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि राष्‍ट्रपति की सहायता करने तथा उसे परामर्श देने के लिए एक रूप होगा जिसका प्रमुख प्रधानमन्त्री होगा, राष्‍ट्रपति इस मन्त्रिपरिषद की सलाह के अनुसार अपने कार्यों का निष्‍पादन करेगा। इस प्रकार वास्‍तविक कार्यकारी शक्ति मन्त्रिपरिषद में निहित है। मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोगों के सदन (लोक सभा) के प्रति उत्तरदायी है। प्रत्‍येक राज्‍य में एक विधानसभा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक,आन्ध्रप्रदेश और तेलंगाना में एक ऊपरी सदन है जिसे विधानपरिषद् कहा जाता है। राज्‍यपाल राज्‍य का प्रमुख है। प्रत्‍येक राज्‍य का एक राज्‍यपाल होगा तथा राज्‍य की कार्यकारी शक्ति उसमें निहित होगी। मन्त्रिपरिषद, जिसका प्रमुख मुख्‍यमन्त्री है, राज्‍यपाल को उसके कार्यकारी कार्यों के निष्‍पादन में सलाह देती है। राज्‍य की मन्त्रिपरिषद से राज्‍य की विधान सभा के प्रति उत्तरदायी है।

भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताएं (Characteristics of Indian Constitution)

भारतीय संविधान की अपनी एक अलग ही विशेषता है। अन्य देश अपने अलग अलग संविधान बनाये है, कुछ देशो मे तो कुछ लिखित संविधान तथा अलिखित संविधान बनाये है, जो समय समय पर बदलते रहते है, लेकिन भारतीय संविधान प्रारूप समिति तथा सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान को संघात्मक संविधान माना है, परन्तु विद्वानों में मतभेद है। अमेरीकी विद्वान इस को ‘छद्म-संघात्मक-संविधान’ कहते हैं, हालांकि पूर्वी संविधानवेत्ता कहते हैं कि अमेरिकी संविधान ही एकमात्र संघात्मक संविधान नहीं हो सकता। संविधान का संघात्मक होना उसमें निहित संघात्मक लक्षणों पर निर्भर करता है, किन्तु माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पूर्ण संघात्मक माना है।

भारतीय संविधान के प्रस्तावना के अनुसार भारत एक सम्प्रुभतासम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य है। जिसके कारण यह अन्य देशों से भिन्न है। संविधान की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार है-

सम्प्रभुता

भारतीय संविधान मे सम्प्रभुता का भी अधिक महत्व है सम्प्रभुता शब्द का अर्थ है सर्वोच्च या स्वतन्त्र होना। भारत किसी भी विदेशी और आन्तरिक शक्ति के नियन्त्रण से पूर्णतः मुक्त सम्प्रभुतासम्पन्न राष्ट्र है। यह सीधे लोगों द्वारा चुने गए एक मुक्त सरकार द्वारा शासित है तथा यही सरकार कानून बनाकर लोगों पर शासन करती है।

सामाजिक और आर्थिक समानता

समाजिक और आर्थिक समानता शब्द संविधान के 1976 में हुए 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया। यह अपने सभी नागरिकों के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता सुनिश्चित करता है। जाति, रंग, नस्ल, लिंग, धर्म या भाषा के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना सभी को बराबर का दर्जा और अवसर देता है। सरकार केवल कुछ लोगों के हाथों में धन जमा होने से रोकेगी तथा सभी नागरिकों को एक अच्छा जीवन स्तर प्रदान करने का प्रयत्न करेगी।

समानता और पान्थिक सहिष्णुता

समानता और पान्थिक सहिष्णुता शब्द संविधान के 1976 में हुए 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया। यह सभी पन्थों की समानता और पान्थिक सहिष्णुता सुनिश्चित करता है। भारत का कोई आधिकारिक पन्थ नहीं है। यह ना तो किसी पन्थ को बढ़ावा देता है, ना ही किसी से भेदभाव करता है। यह सभी पन्थों का सम्मान करता है व एक समान व्यवहार करता है। हर व्यक्ति को अपने पसन्द के किसी भी पन्थ का उपासना, पालन और प्रचार का अधिकार है। सभी नागरिकों, चाहे उनकी पान्थिक मान्यता कुछ भी हो कानून की दृष्टि में बराबर होते हैं। सरकारी या सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों में कोई पान्थिक अनुदेश लागू नहीं होता।

लोकतान्त्रिक

भारत एक स्वतन्त्र देश है, किसी भी स्थान से मत देने की स्वतन्त्रता, संसद में अनुसूचित सामाजिक समूहों और अनुसूचित जनजातियों को विशिष्ट सीटें आरक्षित की गई है। स्थानीय निकाय चुनाव में महिला उम्मीदवारों के लिए एक निश्चित अनुपात में सीटें आरक्षित की जाती है। सभी चुनावों में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का एक विधेयक लम्बित है। हालांकि इसकी क्रियान्वयन कैसे होगा, यह निश्चित नहीं हैं। भारत का निर्वाचन आयोग एक स्वतन्त्र संस्था है और यह स्वतन्त्र और निष्पक्ष निर्वाचन करने के लिए सदैव तत्पर है।

शक्ति विभाजन

यह भारतीय संविधान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्षण है, राज्य की शक्तियां केंद्रीय तथा राज्य सरकारों में विभाजित होती हैं। दोनों सत्ताएँ एक-दूसरे के अधीन नहीं होती है, वे संविधान से उत्पन्न तथा नियंत्रित होती हैं।

मौलिक कर्तव्य कौन कौन से हैं? (What are the fundamental duties?)

मूल कर्तव्य, मूल सविधान में नहीं थे, 42 वें संविधान संशोधन में मूल कर्तव्य जोड़े गये है। ये रूस से प्रेरित होकर जोड़े गये तथा संविधान के भाग 4(क) के अनुच्छेद 51- अ में रखे गये हैं। वर्तमान में ये 11 हैं। 11 वाँ मूल कर्तव्य 86 वें संविधान संशोधन में जोड़ा गया।

भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह-

(1) संविधान का पालन करे और उस के आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का आदर करे ;
(2) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उन का पालन करे;
(3) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे;
(4) देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे;
(5) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है;
(6) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्त्व समझे और उस का परिरक्षण करे;
(7) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिस के अंतर्गत वन, झील नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उस का संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे;
(8) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे;
(9) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे;
(10) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिस से राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले;
(11) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा का अवसर प्रदान करे।

Indian Constitution in Hindi
Indian Constitution in Hindi | भारतीय संविधान क्या है?

भारतीय संविधान के भाग

भारतीय संविधान 22 भागों में विभजित है तथा इसमे 395 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियाँ हैं, जो निम्न प्रकार है-

भागविषयअनुच्छेद
भाग 1संघ और उसके क्षेत्र(अनुच्छेद 1-4)
भाग 2नागरिकता(अनुच्छेद 5-11)
भाग 3मूलभूत अधिकार(अनुच्छेद 12 – 35)
भाग 4राज्य के नीति निदेशक तत्त्व(अनुच्छेद 36 – 51)
भाग 4Aमूल कर्तव्य(अनुच्छेद 51A)
भाग 5संघ(अनुच्छेद 52-151)
भाग 6राज्य(अनुच्छेद 152 -237)
भाग 7संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 द्वारा निरसित(अनु़चछेद 238)
भाग 8संघ राज्य क्षेत्र(अनुच्छेद 239-242)
भाग 9पंचायत(अनुच्छेद 243- 243O)
भाग 9Aनगरपालिकाएँ(अनुच्छेद 243P – 243ZG)
भाग 10अनुसूचित और जनजाति क्षेत्र(अनुच्छेद 244 – 244A)
भाग 11संघ और राज्यों के बीच सम्बन्ध(अनुच्छेद 245 – 263)
भाग 12वित्त, सम्पत्ति, संविदाएँ और वाद(अनुच्छेद 264 -300A)
भाग 13भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर व्यापार, वाणिज्य और समागम(अनुच्छेद 301 – 307)
भाग 14संघ और राज्यों के अधीन सेवाएँ(अनुच्छेद 308 -323)
भाग 14Aअधिकरण(अनुच्छेद 323A – 323B)
भाग 15निर्वाचन(अनुच्छेद 324 -329A)
भाग 16कुछ वर्गों के लिए विशेष उपबन्ध सम्बन्ध(अनुच्छेद 330- 342)
भाग 17राजभाषा(अनुच्छेद 343- 351)
भाग 18आपात उपबन्ध(अनुच्छेद 352 – 360)
भाग 19प्रकीर्ण(अनुच्छेद 361 -367)
भाग 20संविधान के संशोधन(अनुच्छेद 368)
भाग 21अस्थाई संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध(अनुच्छेद 369 – 392)
भाग 22संक्षिप्त नाम, प्रारम्भ, हिन्दी में प्राधिकृत पाठ और निरसन(अनुच्छेद 393 – 395)

इसे भी पढ़े-

अनुसूचियाँ

भारत के मूल संविधान में मूलतः आठ अनुसूचियाँ थीं परन्तु वर्तमान में भारतीय संविधान में बारह अनुसूचियाँ हैं। संविधान में नौवीं अनुसूची प्रथम संविधान संशोधन 1951, 10वीं अनुसूची 52वें संविधान संशोधन 1985, 11वीं अनुसूची 73वें संविधान संशोधन 1992 एवं बाहरवीं अनुसूची 74वें संविधान संशोधन 1992 द्वारा सम्मिलित किया गया।

पहली अनुसूची – (अनुच्छेद 1 तथा 4) – राज्य तथा संघ राज्य क्षेत्र का वर्णन।

दूसरी अनुसूची – [अनुच्छेद 59(3), 65(3), 75(6),97, 125,148(3), 158(3),164(5),186 तथा 221] – मुख्य पदाधिकारियों के वेतन-भत्ते 

  • भाग-क : राष्ट्रपति और राज्यपाल के वेतन-भत्ते,
  • भाग-ख : लोकसभा तथा विधानसभा के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष, राज्यसभा तथा विधान परिषद् के सभापति तथा उपसभापति के वेतन-भत्ते,
  • भाग-ग : उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन-भत्ते,
  • भाग-घ : भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक के वेतन-भत्ते।

तीसरी अनुसूची – [अनुच्छेद 75(4),99, 124(6),148(2), 164(3),188 और 219] – व्यवस्थापिका के सदस्य, मंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, न्यायाधीशों आदि के लिए शपथ लिए जानेवाले प्रतिज्ञान के प्रारूप दिए हैं।

चौथी अनुसूची – [अनुच्छेद 4(1),80(2)] – राज्यसभा में स्थानों का आबंटन राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों से।

पाँचवी अनुसूची – [अनुच्छेद 244(1)] – अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जन-जातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित उपबंध।

छठी अनुसूची– [अनुच्छेद 244(2), 275(1)] – असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के विषय में उपबंध।

सातवीं अनुसूची – [अनुच्छेद 246] – विषयों के वितरण से संबंधित सूची-1 संघ सूची, सूची-2 राज्य सूची, सूची-3 समवर्ती सूची।

आठवीं अनुसूची – [अनुच्छेद 344(1), 351] – भाषाएँ – 22 भाषाओं का उल्लेख।

नवीं अनुसूची – [अनुच्छेद 31 ख ] – कुछ भूमि सुधार संबंधी अधिनियमों का विधिमान्य करण।पहला संविधान संशोधन (1951) द्वारा जोड़ी गई ।

दसवीं अनुसूची – [अनुच्छेद 102(2), 191(2)] – दल परिवर्तन संबंधी उपबंध तथा परिवर्तन के आधार पर 52वें संविधान संशोधन (1985) द्वारा जोड़ी गई ।

ग्यारहवीं अनुसूची – [अनुच्छेद 243 छ ] – पंचायती राज/ जिला पंचायत से सम्बन्धित यह अनुसूची संविधान में 73वें संवैधानिक संशोधन (1992) द्वारा जोड़ी गई।

बारहवीं अनुसूची – इसमे नगरपालिका का वर्णन किया गया हैं ; यह अनुसूची संविधान में 74वें संवैधानिक संशोधन (1993) द्वारा जोड़ी गई।

संशोधन

भारतीय संविधान का संशोधन भारत के संविधान में परिवर्तन करने की प्रक्रिया है। एक संशोधन के प्रस्ताव की शुरुआत संसद में होती है जहाँ इसे एक बिल के रूप में पेश किया जाता है। 1950 में संविधान की स्थापना के बाद से अब तक 105 बार संशोधन किया जा चुका है जबकि संविधान संशोधन के लिए अब तक 127 बिल लाए जा चुके हैं।

हमारा प्रयास Indian Constitution in Hindi | संविधान क्या है | भारतीय संविधान की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

जीएसटी क्या है? | What is gst? | जीएसटी रजिस्ट्रेशन कैसे करे? | How to do gst registration? | जीएसटी सम्बन्धी सम्पूर्ण जानकारी | All GST related information

आज हम GST के बारे मे सम्पूर्ण जानकारी आपके साथ साझा करेंगे, जैसे कि यह जीएसटी कानून कब लागू हुआ, इसके क्या- क्या फायदे होगें और क्या नुकसान है, इसके अलावा जीएसटी रिर्टन कैसे भरे और कौन कौन से फार्म जीएसटी रिर्टन करने के लिये भरे जाते है और जीएसटी रजिस्ट्रेशन कैसे ले, पंजीयन लेने के लिये कितनी लिमिट होनी आवश्यक है। इन सभी प्रश्नो के उत्तर देंगे।

जीएसटी कर सरकार व्दारा अप्रत्यक्ष कर प्रणाली है, जिसे दिनांक 1 जुलाई 2017 से लागू किया गया। जीएसटी कानून पूरे भारत मे एक राष्ट्र, एक कर टैक्स प्रणाली के उद्धेश्य से लागू किया गया है। किसी वस्तु एवंम् सेवा जिसको हम देते है या लेते है, उस वस्तु अथवा सर्विस के मूल्य का कुछ भाग कर के रूप मे सरकार को चुकाते है, जिसे हम GST Tax कहते है। अप्रत्क्ष कर भी सरकार का महत्वपूर्ण अंग है।

जीएसटी क्या है? (What is GST?)

जीएसटी का फुल फार्म Goods and Services Tax हिन्दी मे जिसे वस्तु एवंम् सेवा कर कहते है। जिसे अप्रत्यक्ष कर भी कहते है।

वस्तु एवं सेवा कर या जीएसटी एक व्यापक, बहु-स्तरीय, गंतव्य-आधारित कर है जो प्रत्येक वस्तु एवंम् सर्विस मूल्य में टैक्स के रूप मे जोड़ कर लगाया जाता है। इसे समझने के लिए, हमें इस परिभाषा के तहत शब्दों को समझना होगा। आइए हम ‘बहु-स्तरीय’ शब्द के साथ शुरू करें। कोई भी वस्तु निर्माण से लेकर अंतिम उपभोग तक कई चरणों के माध्यम से गुजरता है । पहला चरण है कच्चे माल की खरीदना । दूसरा चरण उत्पादन या निर्माण होता है । फिर, सामग्रियों के भंडारण या वेर्हाउस में डालने की व्यवस्था है । इसके बाद, उत्पाद रीटेलर या फुटकर विक्रेता के पास आता है। और अंतिम चरण में, रिटेलर आपको या अंतिम उपभोक्ता को अंतिम माल बेचता है।

इन सभी चरणो मे जीएसटी कर लगाया जाता है, अर्थात् माल के उत्पादन से लेकर वस्तु के खर्च होने तक कर चुकाना पड़ता है, इसलिये यह बहु-स्तरीय टैक्स होगा। यह टैक्स पूर्व की तरह ‘वैल्यू ऐडिशन” के रूप मे है, अर्थात् उपभोक्ता तक पहुचने तक वस्तु के मूल्य मे वृद्धि एवंम् टैक्स मे भी वृद्धि होती जायेगी।

हम जानते है जीएसटी कर के पहले VAT Tax लागू था, जीएसटी कर भी इसी कर के रूप ही आधारित है, इसके अलावा हमारे भारत देश मे जीएसटी कर प्रणाली कुछ वस्तुओ को छो़ड़कर सभी पर लागू होता है।

GST कौन से अनुच्छेद में है? (In which article is GST?)

अनुच्छेद 279A यह विधेयक भारत के राष्ट्रपति को 122 संविधान संशोधन अधिनियम 2014 के प्रारंभ होने के 60 दिनों के अंदर जीएसटी परिषद का गठन करने का अधिकार देता है। जीएसटी परिषद मे कुल 33 सदस्य हैं। जीएसटी भारत सरकार द्वारा वर्ष 2017 में पेश किया गया वस्तु एवं सेवा कर है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि पूरे राष्ट्र को एकीकृत अप्रत्यक्ष कराधान प्रणाली के तहत लाया गया।

जीएसटी कैसे काम करेगी? (How will GST work?)

सख्त निर्देशों और प्रावधानों के बिना एक देशव्यापी कर सुधार काम नहीं कर सकता है। जीएसटी कौंसिल ने इस नए कर व्यवस्था को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है, इसे लागू करने का एक नियम तैयार किया है। 

जीएसटी में 3 प्रकार के टैक्स प्रणाली हैं-

 सीजीएसटी:- जहां केंद्र सरकार व्दारा राजस्व एकत्र किया जाता है। 

एसजीएसटी: राज्य में बिक्री के लिए राज्य सरकारों व्दारा राजस्व एकत्र किया जाता है।

आईजीएसटी: जहां अंतरराज्यीय बिक्री के लिए केंद्र सरकार द्वारा राजस्व एकत्र किया जाता है।

उदाहरण:- यदि कोई जीएसटी करदाता दिल्ली मे व्यापार करता है, यदि दिल्ली स्टेट मे ही किसी माल की बिक्री करता है, और उस वस्तु पर 18% की करदेयता है, तो उसे सीजीएसटी 9% एवंम् एसजीएसटी 9% दोनो कर आधा-आधा टैक्स बिल मे चार्ज करना होगा। इसी तरह से यदि वह महाराष्ट्र मे किसी माल की बिक्री करता है, तो उसे केवल आईजीएसटी 18% के रूप मे फुल टैक्स बिल मे चार्ज करना होगा।

जीएसटी अधिनियम के तहत पंजीकरण की सीमा क्या है? (What is the limit of registration under GST Act?)

किसी कारोबारी को जीएसटी पंजीयन लेने के लिये कितना कारोबार होना आवश्यक है? साथ ही हम जानेंगे कि विशेष श्रेणी के राज्यो के लिये कारोबार की क्या सीमा है और कितना कारोबार जीएसटी पंजीकरण के लिए आवश्यक है?

यदि किसी कारोबार मे वित्तीय वर्ष, कारोबार की सीमा 20 लाख रुपए (कुछ मामलों में रु. 40 लाख) से अधिक होने पर और (कुछ विशेष श्रेणी राज्यों के लिए सीमा 10 लाख है) जीएसटी पंजीयन लेना अनिवार्य होगा। यह सीमा जीएसटी पंजीकरण के लिये सम्पूर्ण भारत मे लागू होती है।

जीएसटी रजिस्ट्रेशन के लिये फीस कितनी है? (What is the fee for GST registration?)

यदि कोई कारोबारी जीएसटी पंजीयन लेना चाहता है तो वह स्वयं भी जीएसटी पोर्टल पर जाकर जीएसटी रजिस्ट्रेशन के लिये आवेदन कर सकता है। एप्लीकेशन दाखिल करने के लिए कोई भी शुल्क नहीं लिया जाता है और ना ही कोई ऑनलाइन पेमेंट करना होता है। इसके अलावा यदि वह व्यक्ति स्वयं जीएसटी आवेदन करने मे असमर्थ है, तो वह किसी टैक्स कन्सर्ट के माध्यम से भी आवेदन करा सकता है, और कारोबारी करने के लिये क्या-क्या सावधानी रखनी है सभी जानकारियां टैक्स कन्सर्ट से ठीक तरह से ले सकते है।

जीएसटी नंबर कितने दिन में मिलता है? (In how many days do I get the GST number?)

यदि कोई कारोबारी जीएसटी नंबर के लिये आवेदन करता है, तो यदि कारोबारी के आधार वेरीफिकेशन करने के उपरान्त, यदि अटैच किये गये सभी दस्तावेज सही होंगें तो लगभग् तीन दिनों के भीतर नया जीएसटी रजिस्‍ट्रेशन मिल सकता है, इसके अलावा फिजिकल वेरिफिकेशन की जरूरत भी नहीं होगी, लेकिन यदि करदाता के श्रेत्र का कर निर्धारण अधिकारी वेरीफिकेशन करना चाहता है, तो कर सकता है, इसके अलावा यदि आवेदक जीएसटी रजिस्‍ट्रेशन के लिए आधार ऑथेंटिकेशन नही हो पा रहा है तो, उन्‍हें कारोबार के स्‍थल के फिजिकल वेरिफिकेशन के बाद ही जीएसटी पंजीयन दिया जाएगा। जिसमे उसे लगभग् 21 दिन का वक्‍त लग सकता है।

जीएसटी पंजीकरण संख्या में कुल कितने अंक होते हैं? (How many digits are there in GST registration number?)

यदि कोई कारोबारी जीएसटी नंम्बर लेता है, तो वह कुल 15 अंको का होता है, इसके अलावा आवेदक के पैन नम्बर के आधार पर ही पंजीयन मिलता है और जीएसटी नंम्बर के पहले दो अंक उसके स्टेट के होंगे। उसके बाद 10 अंको का उसका पैन नंम्बर होगा, और बाकी 3 अंक उस पंजीयन के सीरियल होंगे।

जीएसटी नंबर कौन कौन ले सकते है? (Who can get GST Number?)

अनिवार्य जीएसटी पंजीकरण / रजिस्ट्रेशन के लिेये वह सभी व्यक्ति, कम्पनी, फर्म, एचयूएफ, एलएलपी जीएसटी पंजीयन के लिये आवेदन कर सकते है साथ माल एवंम् सेवा प्रदान करने वाले सभी कारोबारी ले सकते है।

  • माल या सेवाओं या दोनों की अंतर-राज्य कर योग्य आपूर्ति में लगे व्यक्ति;
  • कर योग्य आपूर्ति में लगे एक आकस्मिक कर योग्य व्यक्ति;
  • रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म के तहत कर का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति;
  • कर योग्य आपूर्ति प्रदान करने में लगे अनिवासी कर योग्य व्यक्ति;

जीएसटी रिटर्न कितने प्रकार के होते हैं? (What are the types of GST returns?)

जीएसटी रिर्टन प्रत्येक करदाता को समय से भरना होगा। इसके अलावा कौन-कौन सी रिर्टन भरेंगें साथ समस्त रिर्टन फार्मो की विस्तृत डिटेल आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे है और रिर्टन के प्रकार भी जानेंगे।

जीएसटी रिटर्न के प्रकार-

  1. GSTR-1 प्रत्येक माह/तिमाही कर अवधि के दौरान किए गए बिक्री लेनदेन के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट है। जीएसटी शासन के तहत पंजीकृत एक सामान्य करदाता को इसे दाखिल करना होगा। इसमें जारी किए गए किसी भी डेबिट और क्रेडिट नोट की रिपोर्ट करना भी शामिल है। बिक्री चालान में किए गए किसी भी परिवर्तन को GSTR-1 की रिपोर्ट भरते समय शामिल किया होगा।
  2. GSTR-2 कर अवधि के दौरान पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं से की गई सभी खरीद की रिपोर्टिंग है। GSTR-2A से सभी विवरण सीधे GSTR-2 में परिलक्षित होते हैं। यह सभी सामान्य करदाताओं द्वारा दायर किया जाना है। GSTR-2 की फाइलिंग को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया है।
  3. GSTR-2A एक रिटर्न है जिसमें कर अवधि के दौरान पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं से की गई सभी खरीदारी का विवरण होता है। यह केवल देखने/मिलान करने/कराने के लिए रिटर्न है। यह डेटा पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं द्वारा उनके GSTR-1 रिटर्न में दर्ज किए गए डेटा के आधार पर आपकी रिपोर्ट में सीधे आपको दिखाई देता है।
  4. GSTR-3 यह सभी जावक आपूर्ति, खरीद, दावा किए गए इनपुट टैक्स क्रेडिट के साथ-साथ किसी भी कर देयता और भुगतान किए गए करों के बारे में सारांश विवरण के साथ एक मासिक सारांश रिटर्न है। यह आपके GSTR-1 और GSTR-2 फाइलिंग के आधार पर स्वतः उत्पन्न होता है। GSTR-3 को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया है।
  5. GSTR-3B प्रत्येक माह/तिमाही कर अवधि के दौरान पंजीकृत सभी सामान्य करदाताओं द्वारा दायर किया जाना है। यह एक मासिक स्व-घोषणा है जिसमें जावक आपूर्ति, दावा किए गए इनपुट टैक्स क्रेडिट, कर देयता और भुगतान किए गए करों के बारे में संक्षेप में विवरण दिया गया है।
  6. GSTR-4/CMP-08 तिमाही कर अवधि के लिये यह जीएसटीआर-4 रिटर्न है जो उन करदाताओं को फाइल करना होगा, जिन्होंने कंपोजिशन स्कीम का विकल्प चुना है। CMP-08 वह रिटर्न है जिसने पूर्व GSTR-4 को बदल दिया है। इसे हर तिमाही में दाखिल करना होता है।
  7. GSTR-5 यह एक रिटर्न है जिसे अनिवासी विदेशी करदाताओं द्वारा दाखिल किया जाना है जो भारत में व्यापारिक लेनदेन करते हैं। यह सभी जावक आपूर्ति, खरीद, दावा किए गए इनपुट टैक्स क्रेडिट के साथ-साथ किसी भी कर देयता और भुगतान किए गए करों के विवरण के साथ एक वापसी है। जीएसटीआर-5 भारत में जीएसटी के तहत पंजीकृत करदाता द्वारा मासिक रूप से दाखिल किया जाना है।
  8. GSTR-6 यह एक रिटर्न है जिसे एक इनपुट सेवा द्वारा मासिक रूप से दाखिल किया जाना है। इसमें आईएसडी द्वारा प्राप्त और वितरित किए गए इनपुट टैक्स क्रेडिट के विवरण शामिल हैं।
  9. GSTR-7 यह उन लोगों द्वारा दाखिल किया जाने वाला मासिक रिटर्न है, जिन्हें टीडीएस (स्रोत पर कर कटौती) काटने की आवश्यकता होती है। इसमें काटे गए टीडीएस, देय/भुगतान किए गए टीडीएस दायित्व और के बारे में विवरण शामिल होंगे टीडीएस रिफंड दावा किया।
  10. GSTR-8 ई-कॉमर्स ऑपरेटरों, जिन्हें स्रोत पर कर (टीसीएस) जमा करना आवश्यक है, उन्हें यह मासिक फाइल करनी होगी। इसमें ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर की गई सभी आपूर्ति और एकत्रित टीसीएस का विवरण होगा।
  11. GSTR-9 जीएसटी के तहत पंजीकृत करदाताओं को सालाना यह रिटर्न भरना होता है। जिसे Annual Return भी कहते है।
  12. GSTR-9A जीएसटी के तहत पंजीकृत करदाताओं को सालाना यह रिटर्न भरना होता है। जिसे कम्पोजिशन करदाताओ के लिये Annual Return भी कहते है।
  13. GSTR-9C यह रिर्टन आॉडिट की जानकारी, मिलान हेतु जैसे बैलेन्ससीट, ट्रेडिंग एकाउन्ट इत्यादि की जानकारी उन करदाताओ को भरना होगा जिनका टर्नओवर रु. 5 करोड़ हर वित्तीय वर्ष दाखिल करना है।
  14. GSTR-10 कोई भी कर योग्य व्यक्ति जिसकी पंजीकृत स्थिति रद्द या आत्मसमर्पण कर दी गई है, उसे इसे दाखिल करना है।
  15. GSTR-11 यह उन लोगों द्वारा दायर किया जाना है, जिन्हें भारत में वस्तुओं और सेवाओं की खरीद के लिए जीएसटी के तहत धनवापसी का लाभ उठाने के लिए एक विशिष्ट पहचान संख्या (यूआईएन) जारी किया गया है।

जीएसटी रिर्टन दाखिल करने के मुख्य तिथिया क्या है? (What are the main dates for filing GST return?)

जब कोई कारोबारी जीएसटी पंजीयन ले लेता है, तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह कौन सी रिर्टन कब भरना है, और कौन सी रिर्टन किसे भरना होगा, यह भी जानना आवश्यक है, क्योकि यदि रिर्टन लेट भरता है, तो लेट फीस भी भरनी पड़ सकती है, इसे नही बचाया जा सकता है, जो ऑटोमैटिक GST Return Portal मे लग कर दिखाती है। इसलिये हमे ध्यान देना होगा, कि कौन सी रिर्टन कब भरनी है, और इन रिर्टनो की तिथि क्या होगी?

Return FormDateRemarks
GSTR-1 (Monthly)By 11th of next monthSelected for filing monthly returns.
GSTR-3B (Monthly)By 20th of next monthSelected for filing monthly returns.
GSTR-1 (Quarterly)By the 13th of the month following the end of the quarterSelected for filing Quarterly returns.
GSTR-3B (Quarterly)By the 22th, 24th of the month following the end of the quarterSelected for filing Quarterly returns.
CMP-08 (Quarterly)By the 18th of the month following the end of the quarterSelected for Composition Return for Quarterly
GSTR-4 (Annual Return Composition Dealer)By the 30th of April in the month of the end of the yearComposition Dealer Annual Return for Yearly
GSTR-5By 20th of next monthnon-resident foreign taxpayers (Montly Basis)
GSTR-5ABy 20th of next monthnon-resident foreign taxpayers (Montly Basis)
GSTR-6By 13th of next monthISD Delaer (Montly Basis)
GSTR-7By 10th of next monthTDS deduction at source (Montly Basis)
GSTR-8By 10th of next monthE-commerce operators (Montly Basis)

जीएसटी रिर्टन मे लेट फीस क्या पडेंगी? (What will be the late fee in GST return?)

वैसे जीएसटी रिर्टनें समय से दाखिल करना होगा यदि कोई करदाता समय से अपनी रिर्टन नही दाखिल करता है तो उसे लेटफीस जमा करना पडेंगा। निल रिर्टनों मे 10 CGST एवंम् 10 SGST कुल लेट फीस 20 रूपये प्रतिदिन और खरीद-बिक्री वाली रिर्टनों मे 25 CGST एवंम् 25 SGST कुल लेट फीस 50 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से देना होगा।

इसके अलावा निल रिटर्न में 500 रुपया अधिकतम लेट फीस, 1.5 करोड़ रुपया टर्नओवर वाले व्यापारी के लिए अधिकतम लेट फीस दो हज़ार रुपये, 1.5 करोड़ रुपये से पांच करोड़ तक टर्नओवर वाले व्यापारियों को पांच हज़ार और पांच करोड़ रुपये से अधिक टर्नओवर वाले व्यापारी को दस हज़ार रुपये अधिकतम लेट फीस देनी होगी

जीएसटी नंबर लेने के लिए क्या क्या दस्तावेज चाहिए? (What are the documents required to get GST number?)

GST Registration की प्रक्रिया शुरू करने से पहले ही किसी कारोबारी को Documents अपने पास एकत्रित कर लेने है और सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजो को ढंग से स्कैन कर ही अपलोड करना होगा।

  • फोटोग्राफ| Photographs
    इसमें आपको संबंधित बिजनेस के मालिक (Proprietor), भागीदारों Partners), प्रबंध ट्रस्टी (Managing Trustee) समिति (Committee) आदि के नवीनतम् फोटोग्राफ लगाने हैं। साथ ही अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (Authorized Signatory) का फोटोग्राफ भी लगाना है।
  • करदाता के संविधान| Constitution of taxpayer
    पार्टनरशिप डीड (Partnership deed), पंजीकरण प्रमाणपत्र (Registration Certificate) या संविधान के अन्य सबूत (Other Proof of Constitution) (यदि आप अपने स्वामित्व मे आवेदन करते है, तो इसकी अवश्यकता नही पडेंगी।)
  • व्यापार के प्रमुख परिसर/ अतिरिक्त जगह का सबूत Proof Of Principal/Additional place of business
    स्वयं के परिसर के लिए (For Own Premises): परिसर के मालिकाना हक दिखाने वाला कोई डाक्यूमेंट जैसे कि नवीनतम संपत्ति कर रसीद (Latest Property Tax Receipt), नगर खाता कॉपी (Municipal Khata Copy) या बिजली के बिल (Electricity Bill) की कॉपी।
    किराए पर या पट्टे पर परिसर के लिए(For Rental Premises): किराए / लीज़ समझौते के साथ मकान मालिक के दस्तावेजों जैसे नवीनतम Property Tax रसीद या नगर खाता नकल या Electricity Bill की Copy।
  • बैंक खाते से संबंधित सबूत|Bank Account Related Proof
    बैंक Passbook  के पहले Page की  Scanned copy और bank statement।
  • प्राधिकरण फॉर्म्स|Authorization forms
    प्रत्येक Authorized Signatory के लिए, Authority की Copy या निर्धारित Format पर या फर्म व्दारा अपने लेटर पैड पर ।

सूचना- यह सभी डॉक्यूमेन्ट, आवेदक के सिर्फ पैन एवंम् आधार छोडकर सभी ढंग से स्कैन कर अपने कम्प्यूटर अथवा मोबाइल मे रख ले, इसके पश्चात् ही आवेदन की प्रक्रिया शुरू करे।

जीएसटी का रजिस्ट्रेशन कैसे करें? (How to register for GST?)

जीएसटी में Registration करना/ कराना इतना मुश्किल नही बस थोडा समझना होगा कि कौन-कौन से डोक्यूमेन्ट किस जगह अपलोड करना है और क्या हम यह डोक्यूमेन्ट सही अपलोड कर रहे है। इसके अलावा यदि कोई कारोबारी सभी डोक्यूमेन्ट अगर सही तरीके से एवंम् सही डोक्यूमेन्ट अपलोड करता है, तो महज उसे लगभग् 3-6 दिनो के अन्दर जीएसटी नंम्बर आसानी से मिल जायेगा। ज्यादा परेशान होने की अवश्यकता नही है यदि कोई आवेदन करने मे असमर्थ है तो भी वह किसी टैक्स सलाहकार से जीएसटी पंजीयन हेतु आवेदन करा सकता है। यदि आप इण्टरनेंट के थोठे बहुत जानकार है, तो भी आप घर बैठे या ऑफिस से ही अपना Online  Registration पूरा कर सकते हैं। बस जरूरी दस्तावेज पास में रखिए, Computer या SmartFone से जीएसटी पोर्टल www.gst.gov.in के वेबसाइट पर जाकर कुछ आसान से स्टेप्स में आपका GST Registration पूरा हो जाएगा। आपकी पूर्व तैयारी के रूप में हम GST Registration की पूरी प्रक्रिया की Stepwise जानकारी यहां भी दे रहे हैं। तो आइए जानते हैं, कैसे होगा जीएसटी में Registration-

Step-1

Gst registration process

यदि कोई काराेबारी जीएसटी के लिये आवेदन करना चाहता है, तो सबसे पहले वह जीएसटी वेबसाइट www.gst.gov.in पर जाना जिसके पश्चात् ही पंजीयन हेतु आवेदन कर सकेंगे।

Step-2

Gst registration process 2

जीएसटी पोर्टल पर जाने के पश्चात् आपको सर्विसेस विन्डो मे जाना होगा, जहां आपको सबसे रजिस्ट्रेशन का विन्डो दिखेगा, उस पर जाकर क्लिक करेंगे।

Step-3

Gst-registration-process-3

नये जीएसटी आवेदन विन्डो खोलने के पश्चात् स्टेप वाइस प्रत्येक कॉलमो को भरने के पश्चात् एक TRN नम्बर जनरेट होगा। सबसे महत्वपूर्ण हमे मोबाइल नम्बर एवंम् ई-मेल आईडी सही-सही भरना होगा, क्योकि इसमे OTP Verification होगा। हमे पैन न0 जिस नाम से है, उस नाम को Legal Name of the Business (As mentioned in PAN) भरना होगा।

Step-4

Gst registration process 4

TRN नंम्बर प्राप्त करने के पश्चात् ही TRN नंबर डालकर और कैप्चा डालकर Proceed कर करके OTP Verification के पश्चात् एप्लीकेशन ड्राफ्ट मे दिखायी देगा। उसके पश्चात् बिजनेस नेम और Crossing Threshold Choice कर आगे बढें।

इसी तरह से जब आपकी एप्लीकेशन दिखाई देगी। वह अप्लीकेशन भरते हुये आगे बढे। पहले विन्डो मे आपको बिजनेस की डिटेल भरनी होगी। इसके बाद आपको प्रोपराइटर/पार्टनर/कम्पनी डायेरेक्टर की फुल डिटेल नाम, पता, निवास स्थल और आधार कार्ड नंबर भरकर सेव करना होगा। इसके बाद Authorized Signatory डिटेल भरकर आगे बढना होगा। इसके पश्चात् आपको बिजनेस पंजीकृत कार्यालय को एड करना होगा, ध्यान रखे आप क्या अपने बिजनेस मे करते है, जैसे मैन्यूफैक्चरिंग करते है या केवल खरीद-बिक्री करते है या सिर्फ सर्विस प्रोवाइड करते है या लेते है, तो आप कॉलम को सलेक्ट कर बता सकेंगे। इसके पश्चात् अगर आप Additional Place जैसे गोदाम या स्टॉक गोदाम या कोई दूसरा वर्किंग प्रोसेसिंग कार्यालय एड करना चाहते है, तो भी आप एड कर सकते है। इसके पश्चात् जिस भी वस्तु एवंम् सेवा का कार्य कर रहे है, तो आप उसका HSN code or SAC कोड डालकर आगे बढ़ सकते है।

सभी कॉलम भरने के पश्चात् आप आगे बढ़ कर प्रोपराइटर/पार्टनर/कम्पनी डायेरेक्टर primary Authorized सलेक्ट करके OTP Verification करेंगे। लगभग् 10 मिनट से 30 मिनट के मध्य आपको आधार वेरिफिकेशन का मेल आपके रजिस्टर्ड मेल आईडी पर आयेगा। जिसे आपको proceed करना होगा। यह proceed करने के पश्चात् 15 मिनट बाद आपको ARN नंबर प्राप्त हो जायेगा। इस ARN नंबर से आप अपने एप्लीकेशन की स्थिति 2 से 3 दिन मे देख ले। अगर सभी दी गयी जानकारियां कर निर्धारण अधिकारी को ठीक लगती है, तो आपका पंजीयन 3-6 दिन के भीतर प्राप्त हो जायेगा, अन्यथा आप व्दारा जो डॉक्यूमेंट मे गलती हुयी है, उसे नोटिस के माध्यम से सूचित करेंगे। इसके बाद आप वह सुधार करके पुनः OTP Verification कर एप्लीकेशन proceed कर देगें। इसके पश्चात् आपका जीएसटी नंम्बर 7 दिन के भीतर आ जायेगा।

हमारा प्रयास जीएसटी से सम्बन्धित समस्त जानकारी आपके साथ सांझा करने की थी, वो मैने बता दी, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है, इसके अलावा जीएसटी रजिस्ट्रेशन, रिर्टन सम्बन्धी किसी सुझाव एवंम् सहायता के लिए Contact पेज पर जा कर सम्पर्क कर सकते है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 10 | राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति | Dowry Prohibition Act, Section- 10 in in hindi | Power of the State Government to make rules.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 10 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दहेज प्रतिषेध की धारा- 10, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 10 का विवरण

दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा -10 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस धारा के अन्तर्गत राज्य सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजन को कार्यान्वित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी। राज्य सरकार द्वारा इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्‌ यथाशीघ्र राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 10 के अनुसार

राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति –

(1) राज्य सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजन को कार्यान्वित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव वाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्‌: –
(क) दहेज प्रतिषेध अधिकारियों द्वारा धारा 8ख की उपधारा (2) के अधीन पालन किए जाने वाले अतिरिक्त कृत्य;
(ख) वे परिसीमाएं और शर्तें जिनके अधीन रहते हुए दहेज प्रतिषेध अधिकारी धारा 8ख की उपधारा (3) के अधीन अपने कृत्यों का प्रयोग कर सकेंगे।
(3) राज्य सरकार द्वारा इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्‌ यथाशीघ्र राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा।

Power of the State Government to make rules—
(1) The State Government may, by notification in the Official Gazette, make rules for carrying out the purposes of this Act.
(2) In particular, and without prejudice to the generality of the foregoing power, such rules may provide for all or any of the following matters, namely:—
(a) the additional functions to be performed by the Dowry Prohibition Officers under sub-section (2) of section 8B;
(b) limitations and conditions subject to which a Dowry Prohibition Officer may exercise his functions under sub-section (3) of section 8B.
(3) Every rule made by the State Government under this section shall be laid as soon as may be after it is made before the State Legislature.

हमारा प्रयास दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा 10 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 9 | नियम बनाने की शक्ति | Dowry Prohibition Act, Section- 9 in in hindi | Power to make rules.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 9 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दहेज प्रतिषेध की धारा- 9, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 9 का विवरण

दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा -9 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस धारा के अन्तर्गत यदि कोई व्यक्ति केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकती है। विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबंध किया जा सकेगा।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा- 9 के अनुसार

नियम बनाने की शक्ति-

(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकती है ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्‌: –
(क) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे और ऐसे व्यक्ति जिनके द्वारा धारा 3 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट भेंटों की कोई सूची रखी जाएगी और उनसे संबंधित सभी अन्य विषय; और
(ख) इस अधिनियम के प्रशासन की बाबत नीति और कार्रवाई का बेहतर समन्वय।
(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्‌ यथाशीघ्र संसद्‌ के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा [यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व] दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात्‌ वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात्‌ वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

Power to make rules—
(1) The Central Government may, by notification in the Official Gazette,
make rules for carrying out the purposes of this Act.
(2) In particular, and without prejudice to the generality of the foregoing power, such rules may provide for—
(a) the form and manner in which, and the persons by whom, any list of presents referred to in sub-section (2) of section 3 shall be maintained and all other matters connected therewith; and
(b) the better co-ordination of policy and action with respect to the administration of this Act.
(3) Every rule made under this section shall be laid as soon as may be after it is made before each House of Parliament while it is in session for a total period of thirty days which may be comprised in one session or [in two or more successive sessions, and if, before the expiry of the session immediately following the session or the successive sessions aforesaid], both Houses agree in making any modification in the rule or both Houses agree that the rule should not be made, the rule shall thereafter have effect only in such modified form or be of no effect, as the case may be, so however that any such modification or annulment shall be without prejudice to the validity of anything previously done under that rule.

हमारा प्रयास दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) की धारा 9 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।