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भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 59 | मौखिक साक्ष्य द्वारा तथ्यों का साबित किया जाना | Indian Evidence Act Section- 59 in hindi| Proof of facts by oral evidence.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 59 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 59, साथ ही क्या बतलाती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 59 का विवरण

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 59 के अन्तर्गत दस्तावेजों या इलेक्ट्रानिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तु के सिवाय सभी तथ्य मौखिक साक्ष्य द्वारा साबित किये जा सकेंगे।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 59 के अनुसार

मौखिक साक्ष्य द्वारा तथ्यों का साबित किया जाना-

दस्तावेजों या इलेक्ट्रानिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तु के सिवाय सभी तथ्य मौखिक साक्ष्य द्वारा साबित किये जा सकेंगे।

Proof of facts by oral evidence-
All facts, except the contents of documents or electronic records may be proved by oral evidence.

हमारा प्रयास भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 59 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 58 | स्वीकृत तथ्यों को साबित करना आवश्यक नहीं है | Indian Evidence Act Section- 58 in hindi| Facts admitted need not be proved.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 58 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 58, साथ ही क्या बतलाती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 58 का विवरण

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 58 के अन्तर्गत किसी ऐसे तथ्य को किसी कार्यवाही में साबित करना आवश्यक नहीं है, जिसे उस कार्यवाही के पक्षकार या उनके अभिकर्ता सुनवाई पर स्वीकार करने के लिये सहमत हो जाते हैं, या जिसे वे सुनवाई के पूर्व किसी स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा स्वीकार करने के लिये सहमत हो जाते हैं या जिसके बारे में अभिवचन सम्बन्धी किसी तत्समय प्रवृत्त नियम के अधीन यह समझ लिया जाता है कि उन्होंने उसे अपने अभिवचनों द्वारा स्वीकार कर लिया है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 58 के अनुसार

स्वीकृत तथ्यों को साबित करना आवश्यक नहीं है-

किसी ऐसे तथ्य को किसी कार्यवाही में साबित करना आवश्यक नहीं है, जिसे उस कार्यवाही के पक्षकार या उनके अभिकर्ता सुनवाई पर स्वीकार करने के लिये सहमत हो जाते हैं, या जिसे वे सुनवाई के पूर्व किसी स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा स्वीकार करने के लिये सहमत हो जाते हैं या जिसके बारे में अभिवचन सम्बन्धी किसी तत्समय प्रवृत्त नियम के अधीन यह समझ लिया जाता है कि उन्होंने उसे अपने अभिवचनों द्वारा स्वीकार कर लिया है :
परन्तु न्यायालय स्वीकृत तथ्यों का ऐसी स्वीकृतियों द्वारा साबित किये जाने से अन्यथा साबित किया जाना अपने विवेकानुसार अपेक्षित कर सकेगा।

Facts admitted need not be proved-
No fact need to be proved in any proceeding which the parties thereto or their agents agree to admit at the hearing, or which, before the hearing, they agree to admit by any writing under their hands, or which by any rule of pleading in force at the time they are deemed to have admitted by their pleadings :
Provided that the Court may, in its discretion, require the facts admitted to be proved otherwise than by such admissions.

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भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 57 | वे तथ्य, जिनकी न्यायिक अवेक्षा न्यायालय को करनी होगी | Indian Evidence Act Section- 57 in hindi| Facts of which Court must take judicial notice.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 57 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 57, साथ ही क्या बतलाती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 57 का विवरण

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 57 के अन्तर्गत न्यायालय से किसी तथ्य की न्यायिक अवेक्षा करने की किसी व्यक्ति द्वारा प्रार्थना की जाती है, तो यदि और जब तक वह व्यक्ति कोई ऐसी पुस्तक या दस्तावेज पेश न कर दे, जिसे ऐसा न्यायालय अपने को ऐसा करने को समर्थ बनाने के लिये आवश्यक समझता है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 57 के अनुसार

वे तथ्य, जिनकी न्यायिक अवेक्षा न्यायालय को करनी होगी-

न्यायालय निम्नलिखित तथ्यों की न्यायिक अवेक्षा करेगा-
(1) भारत के राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त समस्त विधियाँ;
(2) यूनाइटेड किंगडम की पार्लमेंट द्वारा पारित या एतद्पश्चात् पारित किए जाने वाले समस्त पब्लिक ऐक्ट तथा वे समस्त स्थानीय और पर्सनल ऐक्ट जिनके बारे में यूनाइटेड किंगडम की पार्लमेंट ने निर्दिष्ट किया है कि उनकी न्यायिक अवेक्षा की जाए;
(3) भारतीय सेना, नौसेना या वायुसेना के लिये युद्ध की नियमावली;
(4) यूनाइटेड किंगडम की पार्लमेंट की भारत की संविधान सभा की, संसद की तथा किसी प्रान्त या राज्यों में तत्समय प्रवृत्त विधियों के अधीन स्थापित विधान-मण्डलों की कार्यवाही का अनुक्रम;
(5) ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैण्ड की यूनाइटेड किंगडम के तत्समय प्रभु का राज्यारोहण और राजहस्ताक्षर;
(6) वे सब मुद्राएँ, जिनकी अंग्रेजी न्यायालय न्यायिक अवेक्षा करते हैं, भारत में के सब न्यायालयों की और केन्द्रीय सरकार या क्राउन रिप्रेजेन्टेटिव के प्राधिकार द्वारा भारत के बाहर स्थापित सब न्यायालयों की मुद्राएँ, नावधिकरण और समुद्रीय अधिकारिता वाले न्यायालयों की और नोटरीज पब्लिक की मुद्राएँ और वे सब मुद्राएँ जिनका कोई व्यक्ति संविधान या यूनाइटेड किंगडम की पार्लमेंट के किसी ऐक्ट या भारत में विधि का बल रखने वाले अधिनियम या विनियम द्वारा उपयोग करने के लिए प्राधिकृत है;
(7) किसी राज्य में किसी लोक पद पर तत्समय आरूढ़ व्यक्तियों के कोई पदारोहण, नाम, उपाधियाँ, कृत्य और हस्ताक्षर, यदि ऐसे पद पर उनकी नियुक्ति का तथ्य किसी शासकीय राजपत्र में अधिसूचित किया गया हो;
(8) भारत सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त हर राज्य या प्रभु का अस्तित्व, उपाधि और राष्ट्रीय ध्वज;
(9) समय के प्रभाग, पृथ्वी के भौगोलिक प्रभाग तथा शासकीय राजपत्र में अधिसूचित लोक उत्सव, उपवास और अवकाश दिन
(10) भारत सरकार के आधिपत्य के अधीन राज्यक्षेत्र;
(11) भारत सरकार और अन्य किसी राज्य या व्यक्तियों के निकाय के बीच संघर्ष का प्रारम्भ, चालू रहना और पर्यवसान;
(12) न्यायालय के सदस्यों और आफिसरों के तथा उनके उपपदियों और अधीनस्थ आफिसरों और सहायकों के और उसकी आदेशिकाओं के निष्पादन में कार्य करने वाले सब आफिसरों के भी, तथा सब अधिवक्ताओं, अटर्नियों, प्रॉक्टरों, वकीलों, प्लीडरों और उसके समक्ष उपसंजात होने या कार्य करने के लिए किसी विधि द्वारा प्राधिकृत अन्य व्यक्तियों के नाम:
(13) भूमि या समुद्र पर मार्ग का नियम
इन सभी मामलों में, तथा लोक इतिहास, साहित्य, विज्ञान या कला के सब विषयों में भी न्यायालय समुपयुक्त निर्देश पुस्तकों या दस्तावेजों की सहायता ले सकेगा।
यदि न्यायालय से किसी तथ्य की न्यायिक अवेक्षा करने की किसी व्यक्ति द्वारा प्रार्थना की जाती है, तो यदि और जब तक वह व्यक्ति कोई ऐसी पुस्तक या दस्तावेज पेश न कर दे, जिसे ऐसा न्यायालय अपने को ऐसा करने को समर्थ बनाने के लिये आवश्यक समझता है, न्यायालय ऐसा करने से इन्कार कर सकेगा।

Facts of which Court must take judicial notice-
The Court shall take judicial notice of the following facts :-
(1) All laws in force in the territory of India;
(2) All public Acts passed or hereafter to be passed by Parliament of the United Kingdom and all local and personal Acts directed by Parliament of the United Kingdom to be judicially noticed;
(3) Articles of War for the Indian Army, Navy or Air Force;
(4) The course of proceeding of Parliament of the United Kingdom, of the Constituent Assembly of India, of Parliament and of the Legislatures established under any laws for the time being in force in a Province or in the State;
(5) The accession and the sign manual of the Sovereign for the time being of the United Kingdom of Great Britain and Ireland;
(6) All seals of which English Courts take judicial notice; the seals of all the Courts in India and of all Courts out of India established by the authority of the Central Government or the Crown Representative; the seals of Courts of Admiralty and Maritime Jurisdiction and of Notaries Public, and all seals which any person is authorized to use by the Constitution or an Act of Parliament of the United Kingdom or an Act or Regulation having the force of law in India;
(7) The accession to office, names, titles, functions and signatures of the persons filling for the time being any public office in any State, if the fact of their appointment to such office is notified in any official Gazette;
(8) The existence, title and national flag of every State or Sovereign recognized by the Government of India;
(9) The divisions of time, the geographical divisions of the world, and public festivals, fasts and holidays notified in the Official Gazette;
(10) The territories under the dominion of the Government of India;
(11) The commencement, continuance and termination of hostilities between the Government of India and any other State or body of persons;
(12) The names of members and officers of the Court, and of their deputies and subordinate officers and assistants, and also of all officers acting in execution of its process, and of all advocates, attorneys, proctors, vakils, pleaders and other persons authorized by law to appear or act before it;
(13) The rule of the road on land or at sea.
In all these cases, and also on all matters of public history, literature, science or art, the Court may resort for its aid to appropriate books or documents of reference.
If the Court is called upon by any person to take judicial notice of any fact, it may refuse to do so, unless and until such person produces any such book or document as it may consider necessary to enable it to do so.

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भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 56 | न्यायिक रूप से अवेक्षणीय तथ्य साबित करना आवश्यक नहीं है | Indian Evidence Act Section- 56 in hindi| Fact judicially noticeable need not be proved.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 56 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 56, साथ ही क्या बतलाती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 56 का विवरण

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 56 के अन्तर्गत तथ्य की न्यायालय न्यायिक अवेक्षा करेगा, उसे साबित करना आवश्यक नहीं है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 56 के अनुसार

न्यायिक रूप से अवेक्षणीय तथ्य साबित करना आवश्यक नहीं है-

जिस तथ्य की न्यायालय न्यायिक अवेक्षा करेगा, उसे साबित करना आवश्यक नहीं है।

Fact judicially noticeable need not be proved-
No fact of which the Court will take judicial notice need to be proved.

हमारा प्रयास भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 56 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 55 | नुकसानी पर प्रभाव डालने वाला शील | Indian Evidence Act Section- 55 in hindi| Character as affecting damages.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 55 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 55, साथ ही क्या बतलाती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 55 का विवरण

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 55 के अन्तर्गत सिविल मामलों में, यह तथ्य कि किसी व्यक्ति का शील ऐसा है, जिससे नुकसानी की रकम पर, जो उसे मिलनी चाहिए, प्रभाव पड़ता है, सुसंगत है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 55 के अनुसार

नुकसानी पर प्रभाव डालने वाला शील-

सिविल मामलों में, यह तथ्य कि किसी व्यक्ति का शील ऐसा है, जिससे नुकसानी की रकम पर, जो उसे मिलनी चाहिए, प्रभाव पड़ता है, सुसंगत है।

Character as affecting damages-
In civil cases, the fact that the character of any person is such as to affect the amount of damages which he ought to receive, is relevant.

स्पष्टीकरण- धारा 52, 53, 54 और 55 में “शील” शब्द के अन्तर्गत ख्याति और स्वभाव दोनों आते हैं, किन्तु धारा 54 में यथा उपबन्धित के सिवाय केवल साधारण ख्याति व साधारण स्वभाव का ही, न कि ऐसे विशिष्ट कार्यों का, जिनके द्वारा ख्याति पर स्वभाव दर्शित हुये थे, साक्ष्य दिया जा सकेगा।

हमारा प्रयास भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 55 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 54 | उत्तर में होने के सिवाय पूर्वतन बुरा शील सुसंगत नहीं है | Indian Evidence Act Section- 54 in hindi| Previous bad character not relevant, except in reply.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 54 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 54, साथ ही क्या बतलाती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 54 का विवरण

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 54 के अन्तर्गत दाण्डिक कार्यवाहियों में यह तथ्य कि अभियुक्त व्यक्ति बुरे शील का है, विसंगत है, जब तक कि इस बात का साक्ष्य न दिया गया हो कि वह अच्छे शील का है, जिसके दिये जाने की दशा में वह सुसंगत हो जाता है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 54 के अनुसार

उत्तर में होने के सिवाय पूर्वतन बुरा शील सुसंगत नहीं है-

दाण्डिक कार्यवाहियों में यह तथ्य कि अभियुक्त व्यक्ति बुरे शील का है, विसंगत है, जब तक कि इस बात का साक्ष्य न दिया गया हो कि वह अच्छे शील का है, जिसके दिये जाने की दशा में वह सुसंगत हो जाता है।

Previous bad character not relevant, except in reply-
In criminal proceedings the fact that the accused person has a bad character is irrelevant, unless evidence has been given, that he has a good character, in which case it becomes relevant.

स्पष्टीकरण 1- यह धारा उन मामलों को लागू नहीं है, जिनमें किसी व्यक्ति का बुरा शील स्वयं विवाद्यक तथ्य है।
स्पष्टीकरण 2- पूर्व दोषसिद्ध बुरे शील के साक्ष्य के रूप में सुसंगत है।

हमारा प्रयास भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 54 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।