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पॉक्सो एक्ट की धारा 33 | विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां | Pocso Act Section- 33 by in hindi | Procedure and powers of Special Court.

pocso section- 33

नमस्कार दोस्तों, आज हम पॉक्सो एक्ट की धारा 33 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 33? साथ ही हम आपको POCSO ACT की धारा 33 क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 33 का विवरण

पॉक्सो एक्ट की धारा 33 बालको पर हुए, अपराध को संज्ञान में लेते हुए विशेष न्यायालयों की व्यवस्था की गई साथ ही यह पॉक्सो एक्ट की धारा 33 विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियो को परिभाषित करती है।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 33 के अनुसार

विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां-

(1) कोई विशेष न्यायालय अभियुक्त को विचारण के लिए उसको सुपुर्द किए बिना किसी अपराध का संज्ञान ऐसे अपराध का गठन करने वाले तथ्यों का परिवाद प्राप्त होने पर या ऐसे तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर, ले सकेगा।
(2) यथास्थिति, विशेष लोक अभियोजक या अभियुक्त के लिए उपसंजात होने वाला काउंसेल बालक की मुख्य परीक्षा, प्रतिपरीक्षा, या पुनः परीक्षा अभिलिखित करते समय बालक से पूछे जाने वाले प्रश्नों को विशेष न्यायालय को संसूचित करेगा जो क्रम से उन प्रश्नों को बालक के समक्ष रखेगा।
(3) विशेष न्यायालय, यदि वह आवश्यक समझे विचारण के दौरान बालक के लिए बार-बार विराम अनुज्ञात कर सकेगा।
(4) विशेष न्यायालय, बालक के परिवार के किसी सदस्य, संरक्षक, मित्र या नातेदार की, जिसमें बालक का और विश्वास है, न्यायालय में उपस्थित अनुज्ञात करके बालक के लिए मित्रतापूर्ण वातावरण सृजित करेगा।
(5) विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि बालक को न्यायालय में परीक्षण के लिए बार बार नहीं बुलाया जाए।
(6) विशेष न्यायालय, विचारण के दौरान आक्रामक या बालक के चरित्र हनन संबंधी प्रश्न पूछने के लिए अनुज्ञात नहीं करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी समय बालक की गरिमा बनाए रखी जाए।
(7) विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि अन्वेषण या विचारण के दौरान किसी भी समय बालक की पहचान प्रकट नहीं की जाए:
परंतु ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किए जाएंगे, विशेष न्यायालय ऐसे प्रकटन की अनुज्ञा दे सकेगा, यदि उसकी राय में ऐसा प्रकटन बालक के हित में है।
स्पष्टीकरण- इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, बालक की पहचान में, बालक के कुटुंब, विद्यालय, नातेदार, पड़ोसी की पहचान या कोई अन्य सूचना जिसके द्वारा बालक की पहचान का पता चल सके सम्मिलित होंगे।
(8) समुचित मामलों में विशेष न्यायालय दंड के अतिरिक्त, बालक को कारित किसी शारीरिक या मानसिक आघात के लिए या ऐसे बालक के तुरंत पुनर्वास के लिए उसको ऐसे प्रतिकर के संदाय का निदेश दे सकेगा जो विहित किया जाए।
(9) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए विशेष न्यायालय को इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के विचारण के प्रयोजन के लिए सेशन न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी और ऐसे अपराध का विचारण ऐसे करेगा, मानो वह सेशन न्यायालय हो. और यथाशक्य सेशन न्यायालय के समक्ष विचारण के लिए दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया का अनुसरण करेगा।

Procedure and powers of Special Court-
(1) A Special Court may take cognizance of any offence, without the accused being committed to it for trial, upon receiving a complaint of facts which constitute such offence, or upon a police report of such facts.
(2) The Special Public Prosecutor, or as the case may be, the counsel appearing for the accused shall, while recording the examination-in-chief, cross examination or re-examination of the child, communicate the questions to be put to the child to the Special Court which shall in turn put those questions to the child.
(3) The Special Court may, if it considers necessary, permit frequent breaks for the child during the trial.
(4) The Special Court shall create a child-friendly atmosphere by allowing a family member, a guardian, a friend or a relative, in whom the child has trust or confidence, to be present in the court.
(5) The Special Court shall ensure that the child is not called repeatedly to testify in the court.
(6) The Special Court shall not permit aggressive questioning or character
assassination of the child and ensure that dignity of the child is maintained at all times during the trial.
(7) The Special Court shall ensure that the identity of the child is not disclosed at any time during the course of investigation or trial:
Provided that for reasons to be recorded in writing, the Special Court may permit such disclosure, if in its opinion such disclosure is in the interest of the child.
Explanation- For the purposes of this sub-section, the identity of the child. shall include the identity of the child’s family, school, relatives, neighbourhood or any other information by which the identity of the child may be revealed.
(8) In appropriate cases, the Special Court may, in addition to the punishment, direct payment of such compensation as may be prescribed to the child for any physical or mental trauma caused to him or for immediate rehabilitation of such child.
(9) Subject to the provisions of this Act, a Special Court shall, for the purpose of the trial of any offence under this Act, have all the powers of a Court of Session and shall try such offence as if it were a Court of Session, and as far as may be, in accordance with the procedure specified in the Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974) for trial before a Court of Session.

हमारा प्रयास पॉक्सो एक्ट की धारा 33 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
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पॉक्सो एक्ट की धारा 32 | विशेष लोक अभियोजक | Pocso Act Section- 32 by in hindi | Special Public Prosecutors.

POCSO Section- 32

नमस्कार दोस्तों, आज हम पॉक्सो एक्ट की धारा 32 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 32? साथ ही हम आपको POCSO ACT की धारा 32 क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 32 का विवरण

पॉक्सो एक्ट की धारा 32 के अंतर्गत राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, केवल इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन मामलों का संचालन करने के लिए प्रत्येक विशेष न्यायालय के लिए एक विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति करेगी, तो यह पॉक्सो एक्ट की धारा 23 विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति को परिभाषित करती है।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 32 के अनुसार

विशेष लोक अभियोजक-

(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, केवल इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन मामलों का संचालन करने के लिए प्रत्येक विशेष न्यायालय के लिए एक विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति करेगी।
(2) उपधारा (1) के अधीन किसी विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए कोई व्यक्ति केवल तभी पात्र होगा यदि उसने सात वर्ष से अन्यून अवधि के लिए अधिवक्ता के रूप में विधि व्यवसाय किया हो।
(3) इस धारा के अधीन विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 2 के खंड (प) के अर्थांतर्गत एक लोक अभियोजक समझा जाएगा और इस संहिता के उपबंध तदनुसार प्रभावी होंगे।

Special Public Prosecutors-
(1) The State Government shall, by notification in the Official Gazette, appoint a Special Public Prosecutor for every Special Court for conducting cases only under the provisions of this Act.
(2) A person shall be eligible to be appointed as a Special Public Prosecutor under sub-section (1) only if he had been in practice for not less than seven years as an advocate.
(3) Every person appointed as a Special Public Prosecutor under this section shall be deemed to be a Public Prosecutor within the meaning of clause (u) of Section 2 of the Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974) and provision of that Code shall have effect accordingly.

हमारा प्रयास पॉक्सो एक्ट की धारा 32 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
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पॉक्सो एक्ट की धारा 31 | विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का लागू होना | Pocso Act Section- 31 by in hindi | Application of Code of Criminal Procedure, 1973 to proceedings before a Special Court.

POCSO Section-31

नमस्कार दोस्तों, आज हम पॉक्सो एक्ट की धारा 31 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 31? साथ ही हम आपको POCSO ACT की धारा 31 क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 31 का विवरण

पॉक्सो एक्ट की धारा 31 के अंतर्गत किसी विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे और उक्त उपबंधों के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय को सेशन न्यायालय समझा जाएगा तथा विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन का संचालन करने वाले व्यक्ति को, लोक अभियोजक समझा जाएगा, तो यह पॉक्सो एक्ट की धारा 31 विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को दंड प्रक्रिया को परिभाषित करती है।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 31 के अनुसार

विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का लागू होना-

इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध (जमानत और बंधपत्र के संबंध में उपबंधों सहित) किसी विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे और उक्त उपबंधों के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय को सेशन न्यायालय समझा जाएगा तथा विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन का संचालन करने वाले व्यक्ति को, लोक अभियोजक समझा जाएगा।

Application of Code of Criminal Procedure, 1973 to proceedings before a Special Court-
Save as otherwise provided in this Act, the provisions of the Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974) (including the provisions as to bail and bonds) shall apply to the proceedings before a Special Court and for the purposes of the said provisions, the Special Court shall be deemed to be a Court of Sessions and the person conducting a prosecution before a Special Court, shall be deemed to be a Public Prosecutor.

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पॉक्सो एक्ट की धारा 29 | कतिपय अपराधों के बारे में उपधारणा | Pocso Act Section- 29 by in hindi | Presumption as to certain offences.

POCSO Section- 29

नमस्कार दोस्तों, आज हम पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 29? साथ ही हम आपको POCSO ACT की धारा 29 क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 29 का विवरण

पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के अंतर्गत किसी अपराध को करने या दुष्प्रेरण करने या उसको करने का प्रयत्न करने के लिए अभियोजित किया गया है। वहां विशेष न्यायालय तब तक यह उपधारणा करेगा कि ऐसे व्यक्ति ने, यथास्थिति, वह अपराध किया है, दुष्प्रेरण किया है या उसको करने का प्रयत्न किया है, तो यह पॉक्सो एक्ट की धारा 29 बालक की कतिपय अपराधों के बारे में उपधारणा को परिभाषित करती है।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 29 के अनुसार

कतिपय अपराधों के बारे में उपधारणा-

जहां किसी व्यक्ति को इस अधिनियम की धारा 3, धारा 5, धारा 7 और धारा 9 के अधीन किसी अपराध को करने या दुष्प्रेरण करने या उसको करने का प्रयत्न करने के लिए अभियोजित किया गया है। वहां विशेष न्यायालय तब तक यह उपधारणा करेगा कि ऐसे व्यक्ति ने, यथास्थिति, वह अपराध किया है, दुष्प्रेरण किया है या उसको करने का प्रयत्न किया है जब तक कि इसके विरुद्ध साबित नहीं कर दिया जाता है।

Presumption as to certain offences-
Where a person is prosecuted for committing or abetting or attempting to commit any offence under Sections 3, 5, 7 and Section 9 of this Act, the Special Court shall presume, that such person has committed or abetted or attempted to commit the offence, as the case may be unless the contrary is proved.

हमारा प्रयास पॉक्सो एक्ट की धारा 29 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
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पॉक्सो एक्ट की धारा 30 | आपराधिक मानसिक दशा की उपधारणा | Pocso Act Section- 30 by in hindi | Presumption of culpable mental state.

POCSO Section- 30

नमस्कार दोस्तों, आज हम पॉक्सो एक्ट की धारा 30 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 30? साथ ही हम आपको POCSO ACT की धारा 30 क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 30 का विवरण

पॉक्सो एक्ट की धारा 30 के अंतर्गत किसी अपराध के लिए किसी अभियोजन में, जो अभियुक्त की ओर से आपराधिक मानसिक स्थिति की अपेक्षा करता है, विशेष न्यायालय ऐसी मानसिक दशा की विद्यमानता की उपधारणा करेगा, किन्तु अभियुक्त के लिए यह तथ्य साबित करने के लिए प्रतिरक्षा होगी, तो यह पॉक्सो एक्ट की धारा 30 आपराधिक मानसिक दशा की उपधारणा को परिभाषित करती है।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 30 के अनुसार

आपराधिक मानसिक दशा की उपधारणा-

(1) इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए किसी अभियोजन में, जो अभियुक्त की ओर से आपराधिक मानसिक स्थिति की अपेक्षा करता है, विशेष न्यायालय ऐसी मानसिक दशा की विद्यमानता की उपधारणा करेगा, किन्तु अभियुक्त के लिए यह तथ्य साबित करने के लिए प्रतिरक्षा होगी कि उस अभियोजन में किसी अपराध के लिए आरोपित कृत्य के संबंध में उसकी ऐसी मानसिक दशा नहीं थी।
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी तथ्य का साबित किया जाना केवल तभी कहा जाएगा जब विशेष न्यायालय उसके युक्तियुक्त संदेह से परे विद्यमान होने पर विश्वास करता है और केवल तब नहीं जब इसकी विद्यमानता संभाव्यता की प्रबलता द्वारा स्थापित होती है।
स्पष्टीकरण- इस धारा में “आपराधिक मानसिक दशा” के अंतर्गत आशय, हेतुक, किसी तथ्य का ज्ञान और किसी तथ्य में विश्वास या विश्वास किए जाने का कारण भी है।

Presumption of culpable mental state-
(1) In any prosecution for any offence under this Act which requires a culpable mental state on the part of the accused, the Special Court shall presume the existence of such mental state but it shall be a defence for the accused to prove the fact that he had no such mental state with respect to the act charged as an offence in that prosecution.
(2) For the purposes of this section, a fact is said to be proved only when the Special Court believes it to exist beyond reasonable doubt and not merely when its existence is established by a preponderance of probability.
Explanation- In this section, “culpable mental state” includes intention, motive, knowledge of a fact and the belief in, or reason to believe, a fact.

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पॉक्सो एक्ट की धारा 28 | विशेष न्यायालयों को अभिहित किया जाना | Pocso Act Section- 28 by in hindi | Designation of Special Courts.

POCSO Section-28

नमस्कार दोस्तों, आज हम पॉक्सो एक्ट की धारा 28 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 28? साथ ही हम आपको POCSO ACT की धारा 28 क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 28 का विवरण

पॉक्सो एक्ट की धारा 28 के अंतर्गत राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा प्रत्येक जिले के लिए इस अधिनियम के अधीन अपराधों का विचारण करने के लिए सेशन न्यायालय को एक विशेष न्यायालय होने के लिए, अभिहित करेगी, यह पॉक्सो एक्ट की धारा 28 ऐसे मामलो की अतिशीघ्र सुनवाई हेतु विशेष न्यायालयों की स्थापना को परिभाषित करता है।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 28 के अनुसार

विशेष न्यायालयों को अभिहित किया जाना—

(1) त्वरित विचारण उपलब्ध कराने के प्रयोजनों के लिए राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा प्रत्येक जिले के लिए इस अधिनियम के अधीन अपराधों का विचारण करने के लिए सेशन न्यायालय को एक विशेष न्यायालय होने के लिए, अभिहित करेगी:
परन्तु यदि किसी सेशन न्यायालय को, बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 (2006 का 4) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन उन्हीं प्रयोजनों के लिए अभिहित किसी विशेष न्यायालय को, बालक न्यायालय के रूप में अधिसूचित कर दिया है, तो ऐसा न्यायालय इस धारा के अधीन विशेष न्यायालय समझा जाएगा।
(2) इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण करते समय कोई विशेष न्यायालय किसी ऐसे अपराध का [ उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अपराध से भिन्न] विचारण भी करेगा जिसके साथ अभियुक्त को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन उसी विचारण में आरोपित किया जा सकेगा।
(3) इस अधिनियम के अधीन गठित विशेष न्यायालय को, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का 21) में किसी बात के होते हुए भी, उस अधिनियम की धारा 67ख के अधीन अपराधों का, जहां तक वे किसी कृत्य या व्यवहार या रीति में बालकों को चित्रित करने वाली लैंगिक प्रकटन सामग्री के प्रकाशन या पारेषण से संबंधित हैं, या बालकों का आन-लाईन दुरुपयोग सुकर बनाते हैं, विचारण करने की अधिकारिता होगी।

Designation of Special Courts-
(1) For the purposes of providing a speedy trial, the State Government shall in consultation with the Chief Justice of the High Court, by notification in the Official Gazette, designate for each district, a Court of Session to be a Special Court to try the offences under the Act:
Provided that if a Court of Session is notified as a Children’s Court under the Commissions for Protection of Child Rights Act, 2005 (4 of 2006) or a Special Court designated for similar purposes under any other law for the time being in force, then, such court shall be deemed to be a Special Court under this section.
(2) While trying an offence under this Act, a Special Court shall also try an offence [other than the offence referred to in sub-section (1)], with which the accused may, under the Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974), be charged at the same trial.
(3) The Special Court constituted under this Act, notwithstanding anything in the Information Technology Act, 2000 (21 of 2000), shall have jurisdiction to try offences under Section 67B of that Act in so far as it relates to publication or transmission of sexually explicit material depicting children in any act, or conduct or manner or facilitates abuse of children online.

हमारा प्रयास पॉक्सो एक्ट की धारा 28 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
धन्यवाद