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भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 30 | Indian Contract Act Section 30

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-30) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 30 के अनुसार पंद्यम् के तौर के करार शून्य हैं, और किसी ऐसी चीज की वसूली के लिए कोई वाद न लाया जाएगा, जो पंद्यम् पर जीती गई अभिकथित हो, या जो किसी व्यक्ति को किसी ऐसे खेल या अन्य अनिश्चित घटना के, जिसके बारे में कोई पंद्यम् किया गया हो, परिणाम के अनुसार व्ययनित की जाने को न्यस्त की गई हो, जिसे IC Act Section-30 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 30 (Indian Contract Act Section-30) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 30 IC Act Section-30 के अनुसार पंद्यम् के तौर के करार शून्य हैं, और किसी ऐसी चीज की वसूली के लिए कोई वाद न लाया जाएगा, जो पंद्यम् पर जीती गई अभिकथित हो, या जो किसी व्यक्ति को किसी ऐसे खेल या अन्य अनिश्चित घटना के, जिसके बारे में कोई पंद्यम् किया गया हो, परिणाम के अनुसार व्ययनित की जाने को न्यस्त की गई हो।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 30 (IC Act Section-30 in Hindi)

पंद्यम् के तौर के करार शून्य हैं-

पंद्यम् के तौर के करार शून्य हैं, और किसी ऐसी चीज की वसूली के लिए कोई वाद न लाया जाएगा, जो पंद्यम् पर जीती गई अभिकथित हो, या जो किसी व्यक्ति को किसी ऐसे खेल या अन्य अनिश्चित घटना के, जिसके बारे में कोई पंद्यम् किया गया हो, परिणाम के अनुसार व्ययनित की जाने को न्यस्त की गई हो।
घुड़दौड़ के लिए कतिपय पारितोषिकों के पक्ष में अपवाद — यह धारा ऐसे चन्दे या अभिदाय को, या चन्दा देने या अभिदाय करने के ऐसे करार को विधिविरुद्ध बना देने वाली न समझी जाएगी जो किसी घुड़दौड़ के विजेता या विजेताओं को प्रदेय किसी ऐसे प्लेट, पारितोषिक या धनराशि के लिए या मद्दे दिया या किया जाए, जिसका मूल्य या रकम पाँच सौ रुपये या उससे अधिक हो।
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 294-क पर प्रभाव न पड़ेगा — इस धारा की कोई भी बात घुड़दौड़ से सम्बन्धित किसी ऐसे संव्यवहार को, जिसे भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 294-क लागू है, वैध बना देने वाली नहीं समझी जाएगी।

Indian Contract Act Section-30 (IC Act Section-30 in English)

Agreements by way of wager, void-

Agreements by way of wager are void; and no suit shall be brought for recovering anything alleged to be won on any wager, or entrusted to any person to abide the result of any game or other uncertain event on which any wager is made.
Exception in favour of certain prizes for horse-racing – This section shall not be deemed to render unlawful a subscription or contribution, or agreement to subscribe or contribute, made or entered into for or toward any plate, prize or sum of money, of the value or amount of five hundred rupees or upwards, to be rewarded to the winner or winners of any horse-race.
Section 294A of the Indian Penal Code not affected — Nothing in this section shall be deemed to legalize any transaction connected with horse-racing, to which the provisions of section 294A of the Indian Penal Code (45 of 1860) apply.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 30 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 29 | Indian Contract Act Section 29

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-29) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 29 के अनुसार वे करार जिनका अर्थ निश्चित नहीं है या निश्चित किया जाना शक्य नहीं है, शून्य है, जिसे IC Act Section-29 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 29 (Indian Contract Act Section-29) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 29 IC Act Section-29 के अनुसार वे करार जिनका अर्थ निश्चित नहीं है या निश्चित किया जाना शक्य नहीं है, शून्य है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 29 (IC Act Section-29 in Hindi)

करार अनिश्चितता के कारण शून्य है-

वे करार जिनका अर्थ निश्चित नहीं है या निश्चित किया जाना शक्य नहीं है, शून्य है
दृष्टान्त
(क) ‘ख’ को ‘क’ ‘‘एक सौ टन तेल” बेचने का करार करता है। उसमें यह दर्शित करने के लिए कुछ नहीं है कि किस तरह का तेल आशयित था। करार अनिश्चितता के कारण शून्य है।
(ख) ‘ख’ को ‘क’, विनिर्दिष्ट वर्णन का एक सौ टन ऐसा तेल बेचने का करार करता है जो एक वाणिज्यिक वस्तु के रूप में ज्ञात है। यहाँ कोई अनिश्चितता नहीं है जिससे करार शून्य हो जाए।
(ग) ‘क’, जो केवल नारियल के तेल का व्यवसायी है, ‘ख’ को ‘एक सौ टन तेल” बेचने का करार करता है। ‘क’ के व्यापार की प्रकृति इन शब्दों का अर्थ उपदर्शित करती है और ‘क’ ने एक सौ टन नारियल के तेल के विक्रय के लिए संविदा की है।
(घ) ‘क’ “रामनगर में मेरे धान्य-भण्डार में का सारा धान्य” ‘ख’ को बेचने का करार करता है। यहाँ कोई अनिश्चितता नहीं है जिससे करार शून्य हो जाए।
(ङ) ‘ख’ को ‘‘ग द्वारा नियत की जाने वाली कीमत पर एक हजार मन चावल” बेचने का करार ‘क’ करता है। कीमत निश्चित की जा सकती है, इसलिए यहाँ कोई अनिश्चितता नहीं है जिससे करार शून्य हो जाए।
(च) ‘ख’ को ‘क’ ‘‘मेरा सफेद घोड़ा पाँच सौ रुपये या एक हजार रुपये के लिए” बेचने का करार करता है। यह दर्शित करने के लिए कुछ नहीं है कि इन दो कीमतों में से कौन-सी दी जानी है। करार शून्य है।

Indian Contract Act Section-29 (IC Act Section-29 in English)

Agreements void for uncertainty-

Agreements, the meaning of which is not certain, or capable of being made certain, are void
Illustrations
(a) A agrees to sell B “a hundred tons of oil”. There is nothing whatever to show what kind of oil was intended. The agreement is void for uncertainty.
(b) A agrees to sell B one hundred tons of oil of a specified description, known as an article of commerce. There is no uncertainty here to make the agreement void.
(c) A, who is a dealer in coconut oil only, agrees to sell to B “one hundred tons of oil”. The nature of A’s trade affords an indication of the meaning of the words, and A has entered into a contract for the sale of one hundred tons of coconut-oil.
(d) A agrees to sell B “all the grain in my granary at Ramnagar”. There is no uncertainty here to make the agreement void.
(e) A agrees to sell to B one thousand maunds of rice at a price to be fixed by C”. As the price is capable of being made certain, there is no uncertainty here to make the agreement void.
(f) A agrees to sell to B “my white horse for rupees five hundred or rupees one thousand”. There is nothing to show which of the two prices was to be given. The agreement is void.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 29 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 28 | Indian Contract Act Section 28

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-28) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 28 के अनुसार अगर किसी पक्षकार की एक तथ्य की बात के बारे में भूल होती है और वह भूल संविदा के कारण होती है, तो यह कारित संविदा को प्रभावित कर सकती है। भूल के कारण, संविदा में समझौते के मामले में असुंदरता उत्पन्न हो सकती है और पक्षकार के लिए वांछित परिणामों या परिणामों के साथ असुरक्षा उत्पन्न कर सकती है, जिसे IC Act Section-28 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 28 (Indian Contract Act Section-28) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 28 IC Act Section-28 के अनुसार अगर किसी पक्षकार की एक तथ्य की बात के बारे में भूल होती है और वह भूल संविदा के कारण होती है, तो यह कारित संविदा को प्रभावित कर सकती है। भूल के कारण, संविदा में समझौते के मामले में असुंदरता उत्पन्न हो सकती है और पक्षकार के लिए वांछित परिणामों या परिणामों के साथ असुरक्षा उत्पन्न कर सकती है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 28 (IC Act Section-28 in Hindi)

 विधिक कार्यवाहियों के अवरोधक करार शून्य हैं-

हर करार —
(क) जिससे उसका कोई पक्षकार किसी संविदा के अधीन या बारे में अपने अधिकारों को मामूली अधिकरणों में प्रायिक विधिक कार्यवाहियों द्वारा प्रवर्तित कराने से आत्यन्तिकतः अवरुद्ध किया जाता है या जो उस समय को, जिसके भीतर वह अपने अधिकारों को इस प्रकार प्रवृत्त करा सकता है, परिसीमित कर देता हो; या
(ख) जो उसके किसी पक्षकार के अधिकारों को समाप्त कर देता है अथवा किसी संविदा के अधीन या बारे में किसी विनिर्दिष्ट समय तक किसी पक्षकार को अपने दायित्व के निर्वहन से उन्मोचित कर देता है ताकि उसे अपने अधिकारों के प्रवर्तन से प्रतिबंधित किया जा सके;
उस विस्तार तक शून्य है।
अपवाद 1 —- जो विवाद पैदा हो उसको माध्यस्थम् के लिए निर्देशित करने वाली संविदा की व्यावृत्ति — यह धारा उस संविदा को अवैध नहीं कर देगी जिसके द्वारा दो या अधिक व्यक्ति, करार करें कि किसी विषय के या विषयों के किसी वर्ग के बारे में, जो विवाद उनके बीच पैदा हो, वह माध्यस्थम् के लिए निर्देशित किया जाएगा और कि ऐसे निर्दिष्ट विवाद के बारे में केवल वह रकम वसूलीय होगी जो ऐसे माध्यस्थम् में अधिनिर्णीत हो।
अपवाद 2 — जो प्रश्न पहले ही पैदा हो चुके हैं उन्हें निर्देशित करने की संविदा की व्यावृत्ति — और न यह धारा किसी ऐसी लिखित संविदा को अवैध कर देगी जिससे दो या अधिक व्यक्ति किसी प्रश्न को, जो उनके बीच पहले ही पैदा हो चुके हों, माध्यस्थम् के लिए निर्देशित करने का करार करे या माध्यस्थम् विषयक निर्देशों के बारे में किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबन्ध पर प्रभाव डालेगी।
अपवाद 3 — किसी बैंक अथवा किसी वित्तीय संस्था के प्रत्याभूति करार की व्यावृत्ति — यह धारा ऐसी किसी लिखित संविदा को अवैध नहीं बनाएगी जिसके द्वारा कोई बैंक अथवा वित्तीय संस्था, अधिकारों के निर्वापन के लिये या ऐसी प्रत्याभूति या करार के अधीन या की बाबत् किसी दायित्व से उसके किसी पक्षकार के उन्मोचन के लिये, किसी विनिर्दिष्ट कालावधि के पर्यवसान पर जो उक्त दायित्व से ऐसे पक्षकार के निर्वापन या उन्मोचन के लिये किसी विनिर्दिष्ट घटना के घटित होने या घटित न होने की तारीख से एक वर्ष से अन्यून हो, किसी प्रत्याभूति या प्रत्याभूति के लिये प्रावधान करने वाले किसी करार में कोई निबंधन अनुबद्ध करे।
स्पष्टीकरण,-
(i) अपवाद 3 में, अभिव्यक्ति “बैंक” से अभिप्रेत है :-
(क) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (ग) में यथा परिभाषित “कोई बैंककारी कंपनी”;
(ख) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (घक) में यथा परिभाषित “कोई तत्स्थानी नया बैंक”;
(ग) भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) की धारा 3 के अधीन गठित “भारतीय स्टेट बैंक”;
(घ) भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) की धारा 2 के खण्ड (ट) में यथा परिभाषित “कोई समनुषंगी बैंक”;
(ङ) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 (1976 का 21) की धारा 3 के अधीन स्थापित “कोई प्रादेशिक ग्रामीण बैंक”;
(च) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (गगi) में यथा परिभाषित “कोई सहकारी बैंक”;
(छ) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (गगiiiक) में यथा परिभाषित “कोई बहु-राज्य सहकारी बैंक”; और
(ii) अपवाद 3 में, अभिव्यक्ति “किसी वित्तीय संस्था” से अभिप्रेत है कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क के अर्थान्तर्गत कोई लोक वित्तीय संस्था ।

Indian Contract Act Section-28 (IC Act Section-28 in English)

Agreements in restraint of legal proceedings, void-

Every agreement
(a) by which any party thereto is restricted absolutely from enforcing his rights under or in respect of any contract, by the usual legal proceedings in the ordinary tribunals, or which limits the time within which he may thus enforce his rights; or
(b) which extinguishes the rights of any party thereto, or discharges any party thereto, from any liability, under or in respect of any contact on the expiry of a specified period so as to restrict any party from enforcing his rights, is void to that extent.
Exception 1 – Saving of contract to refer to arbitration dispute that may arise – This section shall not render illegal a contract, by which two or more persons agree that any dispute which may arise between them in respect of any subject or class of subjects shall be referred to arbitration, and that only the amount awarded in such arbitration shall be recoverable in respect of the dispute so referred.
Exception 2 – Saving of contract to refer questions that have already arisen – Nor shall this section render illegal any contract in writing, by which two or more persons agree to refer to arbitration any question between them which has already arisen, or affect any provision of any law in force for the time being as to references to arbitration.
Exception 3 – Saving of a guarantee agreement of a bank or a financial institution – This section shall not render illegal a contract in writing by which any bank or financial institution stipulate a term in a guarantee or any agreement making a provision for guarantee for extinguishment of the rights or discharge of any party thereto from any liability under or in respect of such guarantee or agreement on the expiry of a specified period which is not less than one year from the date of occurring or non-occurring of a specified event for extinguishment or discharge of such party from the said liability.
Explanation
(i) In Exception 3, the expression “bank” means
(a) a “banking company” as defined in clause (c) of Section 5 of the Banking Regulation Act, 1949 (10 of 1949);
(b) “a corresponding new bank” as defined in clause (da) of Section 5 of the Banking Regulation Act, 1949 (10 of 1949);
(c) “State Bank of India” constituted under Section 3 of the State Bank of India Act, 1955 (23 of 1955);
(d) “a subsidiary bank” as defined in clause (k) of Section 2 of the State Bank of India (Subsidiary Banks) Act, 1959 (38 of 1959);
(e) “a Regional Rural Bank” established under Section 3 of the Regional Rural Banks Act, 1976 (21 of 1976);
(f) “a Co-operative Bank” as defined in clause (cci) of Section 5 of the Banking Regulation Act, 1949 (10 of 1949);
(g) “a multi-State Co-operative Bank” as defined in clause (cciiia) of Section 5 of the Banking Regulation Act, 1949 (10 of 1949); and
(ii) In Exception 3, the expression “a financial institution” means any public financial institution within the meaning of Section 4A of the Companies Act, 1956 (1 of 1956).

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 28 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 27 | Indian Contract Act Section 27

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-27) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 27 के अनुसार हर करार जिसमें कोई व्यक्ति किसी प्रकार की विधिपूर्ण वृत्ति, व्यापार या कारबार करने से अवरुद्ध किया जाता है, उस विस्तार तक शून्य है, जिसे IC Act Section-27 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 27 (Indian Contract Act Section-27) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 27 IC Act Section-27 के अनुसार हर करार जिसमें कोई व्यक्ति किसी प्रकार की विधिपूर्ण वृत्ति, व्यापार या कारबार करने से अवरुद्ध किया जाता है, उस विस्तार तक शून्य है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 27 (IC Act Section-27 in Hindi)

व्यापार का अवरोधक करार शून्य है-

हर करार जिसमें कोई व्यक्ति किसी प्रकार की विधिपूर्ण वृत्ति, व्यापार या कारबार करने से अवरुद्ध किया जाता है, उस विस्तार तक शून्य है।
अपवाद — जिस कारबार की गुडविल बेच दी गई है उस कारबार को न चलाने के करार की व्यावृत्ति — वह व्यक्ति जो किसी कारबार की गुडविल का विक्रय करे, क्रेता से यह करार कर सकेगा कि वह विनिर्दिष्ट स्थानीय सीमाओं के अन्दर तब तक तत्सदृश कारबार चलाने से विरत रहेगा जब तक क्रेता या कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे उससे गुडविल का हक व्युत्पन्न हुआ हो, उन सीमाओं में तत्सदृश कारबार चलाता रहे; परन्तु यह तब जबकि उस कारबार की प्रकृति की दृष्टि से ऐसी सीमाएँ न्यायालय को युक्तियुक्त प्रतीत हों।

Indian Contract Act Section-27 (IC Act Section-27 in English)

Agreement in restraint of trade, void-

Every agreement by which any one is restrained from exercising a lawful profession, trade or business of any kind, is to that extent void.
Exception— Saving of agreement not to carry on business of which goodwill is sold – One who sells the goodwill of a business may agree with the buyer to refrain from carrying on a similar business, within specified local limits, so long as the buyer, or any person deriving title to the goodwill from him, carries on a like business therein, provided that such limits appear to the Court reasonable, regard being had to the nature of the business.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 27 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 26 | Indian Contract Act Section 26

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-26) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 26 के अनुसार ऐसा हर करार शून्य है, जो अप्राप्तवय से भिन्न किसी व्यक्ति के विवाह के अवरोधार्थ हो, जिसे IC Act Section-26 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 26 (Indian Contract Act Section-26) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 26 IC Act Section-26 के अनुसार ऐसा हर करार शून्य है, जो अप्राप्तवय से भिन्न किसी व्यक्ति के विवाह के अवरोधार्थ हो।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 26 (IC Act Section-26 in Hindi)

विवाह का अवरोधक करार शून्य है-

ऐसा हर करार शून्य है, जो अप्राप्तवय से भिन्न किसी व्यक्ति के विवाह के अवरोधार्थ हो।

Indian Contract Act Section-26 (IC Act Section-26 in English)

Agreement in restraint of marriage, void-

Every agreement in restraint of the marriage of any person, other than a minor, is void.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 26 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 25 | Indian Contract Act Section 25

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-25) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 25 के अनुसार लिखित रूप में अभिव्यक्त और दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण के लिए तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत और एक दूसरे के साथ निकट संबंध वाले पक्षकारों के बीच नैसर्गिक प्रेम और स्नेह के कारण किया गया हो, ऐसे व्यक्ति को पूर्णत: या भागत: प्रतिकर देने के लिए वचन हो, जिसने वचनदाता के लिए स्वेच्छया पहले ही कोई बात कर दी हो अथवा ऐसी कोई बात कर दी हो, जिसे करने के लिए वचनदाता वैध रूप से विवश किए जाने का दायीं था, जिसे IC Act Section-25 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 25 (Indian Contract Act Section-25) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 25 IC Act Section-25 के अनुसार लिखित रूप में अभिव्यक्त और दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण के लिए तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत और एक दूसरे के साथ निकट संबंध वाले पक्षकारों के बीच नैसर्गिक प्रेम और स्नेह के कारण किया गया हो, ऐसे व्यक्ति को पूर्णत: या भागत: प्रतिकर देने के लिए वचन हो, जिसने वचनदाता के लिए स्वेच्छया पहले ही कोई बात कर दी हो अथवा ऐसी कोई बात कर दी हो, जिसे करने के लिए वचनदाता वैध रूप से विवश किए जाने का दायीं था।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 25 (IC Act Section-25 in Hindi)

प्रतिफल के बिना करार शून्य है, सिवाय जबकि वह लिखित तथा रजिस्ट्रीकत हो या की गई किसी बात के लिए प्रतिकर देने का वचन हो, या परिसीमा विधि द्वारा वर्जित किसी ऋण के संदाय का वचन हो-

प्रतिफल के बिना किया गया करार शून्य है, जबकि वह —
(1) लिखित रूप में अभिव्यक्त और दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण के लिए तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत और एक दूसरे के साथ निकट संबंध वाले पक्षकारों के बीच नैसर्गिक प्रेम और स्नेह के कारण किया गया हो; अथवा
(2) किसी ऐसे व्यक्ति को पूर्णत: या भागत: प्रतिकर देने के लिए वचन हो, जिसने वचनदाता के लिए स्वेच्छया पहले ही कोई बात कर दी हो अथवा ऐसी कोई बात कर दी हो, जिसे करने के लिए वचनदाता वैध रूप से विवश किए जाने का दायीं था; अथवा
(3) जिस ऋण का संदाय वादों की परिसीमा विषयक विधि द्वारा वारित न होने की दशा में लेनदार करा लेता, उसके पूर्णत: या भागत: संदाय के लिए उस व्यक्ति द्वारा जिसे उस वचन से भारित किया जाना है या तन्निमित साधारण या विशेष रूप से प्राधिकृत उसके अधिकर्ता द्वारा, किया गया लिखित और हस्ताक्षरित वचन हो।
इनमें से किसी भी दशा में ऐसा करार संविदा है।
स्पष्टीकरण 1– इस धारा की कोई भी बात वस्तुत: दिए गए किसी दान की विधिमान्यता पर, जहाँ तक कि दाता और आदाता के बीच का संबंध है, प्रभाव नहीं डालेगी।
स्पष्टीकरण 2 — कोई करार, जिसके लिए वचनदाता की सम्मति स्वतन्त्रता से दी गई है, केवल इस कारण शून्य नहीं है कि प्रतिफल अपर्याप्त है, किन्तु इस प्रश्न को अवधारित करने में कि बचनदाता की सम्मति स्वतन्त्रता से दी गई थी या नहीं, प्रतिफल की अपर्याप्तता न्यायालय द्वारा गणना में भी ली जा सकेगी।
 दृष्टान्त
(क) ‘ख’ को किसी प्रतिफल के बिना 1,000 रुपये देने का ‘क’ वचन देता है, यह करार शून्य है।
(ख) ‘क’ नैसर्गिक प्रेम और स्नेह से अपने पुत्र ‘ख’ को 1,000 रुपये देने का वचन देता है। ‘ख’ के प्रति अपने वचन को ‘क’ लेखबद्ध करता है और उसे रजिस्ट्रीकृत करता है। यह संविदा है।
(ग) ‘ख’ की थैली ‘क’ पड़ी पाता है और उसे उसको दे देता है। ‘क’ को ‘ख’ 50 रुपये देने का वचन देता है। यह संविदा है।
(घ) ‘ख’ के शिशु पुत्र का पालन ‘क’ करता है। वैसा करने में हुए ‘क’ के व्ययों के संदाय का ‘ख’ वचन देता है। यह संविदा है।
(ङ) ‘ख’ के 1,000 रुपये ‘क’ द्वारा देय हैं, किन्तु वह ऋण परिसीमा अधिनियम द्वारा वारित है। ‘क’ उस ऋण के मद्दे ‘ख’ को 500 रुपये देने का लिखित वचन हस्ताक्षरित करता है। यह संविदा है।
(च) ‘क’ 1,000 रुपये के मूल्य के घोड़े को 10 रुपये में बेचने का करार करता है। इस करार के लिए ‘क’ की सम्मति स्वतन्त्रता से दी गई थी। प्रतिफल अपर्याप्त होते हुए भी यह करार संविदा है।
(छ) ‘क’ 1,000 रुपये के मूल्य के घोड़े को 10 रुपये में बेचने का करार करता है। ‘क’ इससे इन्कार करता है कि इस करार के लिए उसकी सम्मति स्वतन्त्रता से दी गई थी।
प्रतिफल की अपर्याप्तता ऐसा तथ्य है, जिसे न्यायालय को यह विचार करने में गणना में लेना चाहिए कि ‘क’ की सम्मति स्वतन्त्रता से दी गई थी या नहीं।

Indian Contract Act Section-25 (IC Act Section-25 in English)

Agreement without consideration, void, unless it is in writing and registered or is a promise to compensate for something done or is a promise to pay a debt barred by limitation law-

An agreement made without consideration is void, unless –
(1) it is expressed in writing and registered under the law for the time being in force for the registration of documents, and is made on account of natural love and affection between parties standing in a near relation to each other; or unless
(2) it is a promise to compensate, wholly or in part, a person who has already voluntarily done something for the promisor, or something which the promisor was legally compellable to do; or unless.
(3) It is a promise, made in writing and signed by the person to be charged therewith, or by his agent generally or specially authorized in that behalf, to pay wholly or in part a debt of which the creditor might have enforced payment but for the law for the limitation of suits. In any of these cases, such an agreement is a contract.
Explanation 1 – Nothing in this section shall affect the validity, as between the donor and donee, of any gift actually made.
Explanation 2 – An Agreement to which the consent of the promisor is freely given is not void merely because the consideration is inadequate; but the inadequacy of the consideration may be taken into account by the Court in determining the question whether the consent of the promisor was freely given.
Illustrations
(a) A promises, for no consideration, to give to B Rs. 1,000. This is a void agreement.
(b) A, for natural love and affection, promises to give his son, B, Rs. 1,000. A puts his promise to B into writing and registers it. This is a contract.
(c) A finds B’s purse and gives it to him. B promises to give A Rs. 50. This is a contract.
(d) A supports B’s infant son. B promises to pay A’s expenses in so doing. This is a contract.
(e) A owes B Rs. 1,000, but the debt is barred by the Limitation Act. A signs a written promise to pay B Rs. 500 on account of the debt. This is a contract.
(f) A agrees to sell a horse worth Rs. 1,000 for Rs. 10. As consent to the agreement was freely given. The agreement is a contract notwithstanding the inadequacy of
the consideration.
(g) A agrees to sell a horse worth Rs. 1,000 for Rs. 10. A denies that his consent to the agreement was freely given.
The inadequacy of the consideration is a fact which the Court should take into account in considering whether or not A’s consent was freely given.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 25 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।