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भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 24 | Indian Contract Act Section 24

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-24) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 24 के अनुसार यदि एक या अधिक उद्देश्यों के लिए किसी एकल प्रतिफल का कोई भाग, या किसी एक उद्देश्य के लिए कई प्रतिफलों में से कोई एक या किसी एक का कोई भाग विधिविरुद्ध हो तो करार शून्य है यदि प्रतिफल और उद्देश्य विधिपूर्णता के विपरीत हों तो वे करार शून्य होंगे। विधिपूर्णता का मतलब होता है कि किसी कार्य या प्रयास को कानून के अनुसार और नियमित तरीके से किया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति या संगठन विधिपूर्णता के खिलाफ कार्य करता है या विधिपूर्ण उद्देश्यों के विपरीत प्रतिफल चाहता है, तो ऐसे कार्य को करार शून्य माना जाएगा, जिसे IC Act Section-24 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 24 (Indian Contract Act Section-24) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 24 IC Act Section-24 के अनुसार यदि एक या अधिक उद्देश्यों के लिए किसी एकल प्रतिफल का कोई भाग, या किसी एक उद्देश्य के लिए कई प्रतिफलों में से कोई एक या किसी एक का कोई भाग विधिविरुद्ध हो तो करार शून्य है। यदि प्रतिफल और उद्देश्य विधिपूर्णता के विपरीत हों तो वे करार शून्य होंगे। विधिपूर्णता का मतलब होता है कि किसी कार्य या प्रयास को कानून के अनुसार और नियमित तरीके से किया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति या संगठन विधिपूर्णता के खिलाफ कार्य करता है या विधिपूर्ण उद्देश्यों के विपरीत प्रतिफल चाहता है, तो ऐसे कार्य को करार शून्य माना जाएगा।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 24 (IC Act Section-24 in Hindi)

यदि प्रतिफल और उद्देश्य भागतः विधिविरुद्ध हों तो करार शून्य होंगे-

यदि एक या अधिक उद्देश्यों के लिए किसी एकल प्रतिफल का कोई भाग, या किसी एक उद्देश्य के लिए कई प्रतिफलों में से कोई एक या किसी एक का कोई भाग विधिविरुद्ध हो तो करार शून्य है।
दृृष्‍टांत 
‘क’ नील के वैध विनिर्माण का, और अन्य वस्तुओं में अवैध दुव्र्यापार का ‘ख’ की ओर से अधीक्षण करने का वचन देता है। ‘ख’ 10,000 रुपये वार्षिक संबलम ‘क’ को देने का वचन देता है। यह करार इस कारण शून्य है कि ‘क’ के वचन का उद्देश्य और ‘ख’ के वचन के लिए प्रतिफल भागतः विधिविरुद्ध है।

Indian Contract Act Section-24 (IC Act Section-24 in English)

Agreements void, if considerations and objects unlawful in part-

If any part of a single consideration for one or more objects, or any one or any part of any one of several considerations for a single object, is unlawful, the agreement is void. .
Illustration
A promises to superintend, on behalf of B, a legal manufacturer of indigo, and an illegal traffic in other articles. B promises to pay to A a salary of 10,000 rupees a year. The agreement is void, the object of A’s promise, and the consideration for B’s promise, being in part unlawful

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 24 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 23 | Indian Contract Act Section 23

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-23) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 23 के अनुसार विधिपूर्ण प्रतिफल और उद्देश्य उस देश या संगठन के नियमों, नियमित व्यवस्थाओं और मानदंडों के संगत होते हैं, करार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिपूर्ण है, विधि द्वारा निषिद्ध हो, कपटपूर्ण हो या न्यायालय उसे अनैतिक या लोकनीति के विरूद्ध माने, इन दशाओं में से हर एक में करार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिविरुद्ध कहलाता है, जिसे IC Act Section-23 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 23 (Indian Contract Act Section-23) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 23 IC Act Section-23 के अनुसार विधिपूर्ण प्रतिफल और उद्देश्य उस देश या संगठन के नियमों, नियमित व्यवस्थाओं और मानदंडों के संगत होते हैं, करार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिपूर्ण है, विधि द्वारा निषिद्ध हो, कपटपूर्ण हो या न्यायालय उसे अनैतिक या लोकनीति के विरूद्ध माने, इन दशाओं में से हर एक में करार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिविरुद्ध कहलाता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 23 (IC Act Section-23 in Hindi)

कौन से प्रतिफल और उद्देश्य विधिपूर्ण हैं और कौन से नहीं-

करार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिपूर्ण है, सिवाय जब कि —
वह विधि द्वारा निषिद्ध हो;अथवा
वह ऐसी प्रकृति का हो कि यदि वह अनुज्ञात किया जाए तो वह किसी विधि के उपबन्धों को विफल कर देगा; अथवा
वह कपटपूर्ण हो;अथवा
उसमें किसी अन्य के शरीर या सम्पत्ति को क्षति अन्तर्वलित या विवक्षित हो;अथवा
न्यायालय उसे अनैतिक या लोकनीति के विरुद्ध माने ।
इन दशाओं में से हर एक में करार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिविरुद्ध कहलाता है। हर एक करार, जिसका उद्देश्य या प्रतिफल विधिविरुद्ध हो, शून्य है।
दृष्टान्त
(क) ‘क’ अपना गृह 10,000 रुपये में ‘ख’ को बेचने का करार करता है। यहाँ 10,000 रुपये देने का ‘ख’ का वचन गृह बेचने के ‘क’ के वचन के लिए प्रतिफल है और गृह बेचने का ‘क’ का वचन 10,000 रुपये देने के ‘ख’ के वचन के लिए प्रतिफल है। ये विधिपूर्ण प्रतिफल है।
(ख) ‘क’ यह वचन देता है कि यदि ‘ग’, जिसे ‘ख’ को 1,000 रुपये देना है उसे देने में असफल रहा तो वह ‘ख’ को छः मास के बीतते ही 1,000 रुपये देगा। ‘ख’ तदनुसार ‘ग’ को समय देने का वचन देता है। यहाँ हर एक पक्षकार का वचन दूसरे पक्षकार के लिए प्रतिफल है और ये विधिपूर्ण प्रतिफल है।
(ग)’ख’ द्वारा उसे दी गई किसी राशि के बदले ‘क’ यह वचन देता है कि यदि ‘ख’ का पोत अमुक समुद्र यात्रा में नष्ट हो जाए तो ‘क’ उसके पोत के मूल्य की प्रतिपूर्ति करेगा। यहाँ ‘क’ का वचन ‘ख’ के संदाय के लिए प्रतिफल है, और ‘ख’ का संदाय ‘क’ के वचन के लिए प्रतिफल है; और ये विधिपूर्ण प्रतिफल है।
(घ) ‘ख’ के बच्चे का भरण-पोषण करने का ‘क’ वचन देता है और ‘ख’ उस प्रयोजन के लिए ‘क’ को 1,000 रुपये वार्षिक देने का वचन देता है। यहाँ हर एक पक्षकार का वचन दूसरे पक्षकार के वचन के लिए प्रतिफल है। ये विधिपूर्ण प्रतिफल है।
(ङ) ‘क’, ‘ख’ और ‘ग’ अपने द्वारा कपट से अर्जित किए गए या किए जाने वाले अभिलाभों के आपस में विभाजन के लिए करार करते हैं। करार शून्य है क्योंकि उसका उद्देश्य विधिविरुद्ध है।
(च) “ख’ के लिए लोक-सेवा में नियोजन अभिप्राप्त करने का वचन ‘क’ देता है और ‘क’ को ‘ख’ 1,000 रुपये देने का वचन देता है। करार शून्य है क्योंकि उसके लिए प्रतिफल विधिविरुद्ध है।
(छ) ‘क’, जो एक भू-स्वामी के लिए अभिकर्ता है, अपने मालिक के ज्ञान के बिना, अपने मालिक की भूमि का एक पट्टा ‘ख’ के लिए अभिप्राप्त करने का करार धन के लिए करता है। ‘क’ और ‘ख’ के बीच का करार शून्य है। क्योंकि उससे यह विवक्षित है कि ‘क’ ने अपने मालिक से छिपाव द्वारा कपट किया है।
(ज) ‘क’ उस अभियोजन को, जो उसने लूट के बारे में ‘ख’ के विरुद्ध संस्थित किया है, छोड़ देने का ‘ख’ को वचन देता है और ‘ख’ दी गई चीजों का मूल्य लौटा देने का वचन देता है। करार शून्य है क्योंकि उसका उद्देश्य विधिविरुद्ध है।
(झ) ‘क’ की सम्पदा का राजस्व बकाया के लिए विक्रय विधान-मण्डल के एक ऐसे अधिनियम के उपबंधों के अधीन किया जाता है, जो व्यतिक्रम करने वाले को वह भू-सम्पदा खरीदने से प्रतिषिद्ध करता है। ‘क’ के साथ बात तय करके ‘ख’ क्रेता बन जाता है और यह करार करता है कि वह ‘क’ से वह कीमत मिलने पर, जो ‘ख’ ने दी है, वह सम्पदा ‘क’ को हस्तान्तरित कर देगा। करार शून्य है, क्योंकि उसका यह प्रभाव हैं कि वह संव्यवहार व्यतिक्रम करने वाले द्वारा किया गया क्रय बन जाता है और उस प्रकार उससे विधि का उद्देश्य विफल हो जाएगा।
(j) ‘क’, जो ‘ख’ का मुख्तार है, उस असर को जो उस हैसियत में उसका ‘ख’ पर है, ‘ग’ के पक्ष में प्रयुक्त करने का वचन देता है और ‘क’ को 1,000 रुपये देने का वचन ‘ग देता है। करार शून्य है, क्योंकि यह अनैतिक है।
(ट) ‘क’ जो अपनी पुत्री को उपपत्नी के रूप में रखे जाने के लिए ‘ख’ को भाड़े पर देने के लिए करार करता है। करार शून्य है क्योंकि वह अनैतिक है, यद्यपि इस प्रकार भाड़े पर दिया जाना भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अधीन दण्डनीय न हो।

Indian Contract Act Section-23 (IC Act Section-23 in English)

What consideration and objects are lawful, and what not-

The consideration or object of an agreement is lawful, unless –
it is forbidden by law; or
is of such a nature that, if permitted, it would defeat the provisions of any law; or is fraudulent; or
involves or implies, injury to the person or property of another; or
the Court regards it as immoral, or opposed to public policy.
In each of these cases, the consideration or object of an agreement is said to be unlawful. Every agreement of which the object or consideration is unlawful is void.
Illustrations
(a) A agrees to sell his house to B for 10,000 rupees. Here, B’s promise to pay the sum of 10,000 rupees is the consideration for A’s promise to sell the house and A’s promise to sell the house is the consideration for B’s promise to pay the 10,000 rupees. These are lawful considerations.
(b) A promises to pay B 1,000 rupees at the end of six months, if C, who owes that sum to B, fails to pay it. B promises to grant time to C accordingly. Here, the promise of each party is the consideration for the promise of the other party, and they are lawful considerations.
(C) A promises, for a certain sum paid to him by B, to make good to B the value of his ship if it is wrecked on a certain voyage. Here, A’s promise is the consideration for B’s payment, and Bš payment is the consideration for A’s promise, and these are lawful considerations
(d) A promises to maintain B’s child, and B promises to pay A 1,000 rupees yearly for the purpose. Here, the promise of each party is the consideration for the promise of the other party. They are lawful considerations.
(e) A, B and Center into an agreement for the division among them of gains acquired or to be acquired, by them by fraud. The agreement is void, as its object is unlawful.
(f) A promises to obtain for B an employment in the public service and B promises to pay 1,000 rupees to A. The agreement is void, as the consideration for it is unlawful.
(g) A, being agent for a landed proprietor, agrees for money, without the knowledge of his principal, to obtain for B a lease of land belonging to his principal. The agreement between A and B is void, as it implies a fraud by concealment, by A, on his principal.
(h) A promises B to drop a prosecution which he has instituted against B for robbery, and B promises to restore the value of the things taken. The agreement is void, as its object is unlawful.
(i) A’s estate is sold for arrears of revenue under the provisions of an Act of the Legislature, by which the defaulter is prohibited from purchasing the estate. B, upon an understanding with A, becomes the purchaser, and agrees to convey the estate to A upon receiving from him the price which B has paid. The agreement is void, as it renders the transaction, in effect, a purchase by the defaulter and would so defeat the object of the law.
(j) A, who is B’s mukhtar, promises to exercise his influence, as such, with B in favour of C, and C promises to pay 1,000 rupees to A. The agreement is void, because it is immoral.
(k) A agrees to let her daughter to hire to B for concubinage. The agreement is void,

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 23 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 22 | Indian Contract Act Section 22

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-22) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 22 के अनुसार अगर किसी पक्षकार की एक तथ्य की बात के बारे में भूल होती है और वह भूल संविदा के कारण होती है, तो यह कारित संविदा को प्रभावित कर सकती है। भूल के कारण, संविदा में समझौते के मामले में असुंदरता उत्पन्न हो सकती है और पक्षकार के लिए वांछित परिणामों या परिणामों के साथ असुरक्षा उत्पन्न कर सकती है, जिसे IC Act Section-22 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 22 (Indian Contract Act Section-22) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 22 IC Act Section-22 के अनुसार अगर किसी पक्षकार की एक तथ्य की बात के बारे में भूल होती है और वह भूल संविदा के कारण होती है, तो यह कारित संविदा को प्रभावित कर सकती है। भूल के कारण, संविदा में समझौते के मामले में असुंदरता उत्पन्न हो सकती है और पक्षकार के लिए वांछित परिणामों या परिणामों के साथ असुरक्षा उत्पन्न कर सकती है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 22 (IC Act Section-22 in Hindi)

एक पक्षकार की तथ्य की बात के बारे की भूल से कारित संविदा-

कोई संविदा इस कारण ही शून्यकरणीय नहीं है कि उसके पक्षकारों में से एक किसी तथ्य की बात के बारे की भूल में होने से वह कारित हुई थी।

Indian Contract Act Section-22 (IC Act Section-22 in English)

Contract caused by mistake of one party as to matter of fact-

A contract is not voidable merely because it was caused by one of the parties to it being under a mistake as to a matter of fact.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 22 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 21 | Indian Contract Act Section 21

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-21) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 21 के अनुसार जब किन्ही दो पक्षो व्दारा किसी करार को किया गया है और वह इस कारण शून्यकरणीय नहीं है कि वह भारत में प्रवृत्त विधि के बारे में किसी भूल के कारण की गई थी, किन्तु किसी ऐसी विधि के बारे में की, जो भारत में प्रवृत्त नहीं है, किसी भूल का वही प्रभाव है जो तथ्य की भूल का है, जिसे IC Act Section-21 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 21 (Indian Contract Act Section-21) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 21 IC Act Section-21 के अनुसार जब किन्ही दो पक्षो व्दारा किसी करार को किया गया है और वह इस कारण शून्यकरणीय नहीं है कि वह भारत में प्रवृत्त विधि के बारे में किसी भूल के कारण की गई थी, किन्तु किसी ऐसी विधि के बारे में की, जो भारत में प्रवृत्त नहीं है, किसी भूल का वही प्रभाव है जो तथ्य की भूल का है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 21 (IC Act Section-21 in Hindi)

विधि के बारे में भूलों का प्रभाव-

कोई संविदा इस कारण ही शून्यकरणीय नहीं है कि वह भारत में प्रवृत्त विधि के बारे में किसी भूल के कारण की गई थी, किन्तु किसी ऐसी विधि के बारे में की, जो भारत में प्रवृत्त नहीं है, किसी भूल का वही प्रभाव है जो तथ्य की भूल का है।
दृष्टान्त
‘क’ और ‘ख’ इस गलत विश्वास पर संविदा करते हैं कि एक विशिष्ट ऋण भारतीय परिसीमा विधि द्वारा वर्जित है। संविदा शून्यकरणीय नहीं हैे।

Indian Contract Act Section-21 (IC Act Section-21 in English)

Effect of mistakes as to law-

A contract is not voidable because it was caused by a mistake as to any law in force in India; but a mistake as to a law not in force in India has the same effect as a mistake of fact.
Illustration
A and B make a contract grounded on the erroneous belief that a particular debt is barred by the Indian Law of Limitation; the contract is not voidable.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 21 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 20 | Indian Contract Act Section 20

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-20) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 20 के अनुसार जब दोनों पक्षकारों के बीच तथ्यों की भूल होती है और उन्हें बाद में यह पता चलता है, तो उनके बीच किया गया करार अमान्य हो जाता है। इससे करार को बिंदु रूप में बाधित माना जाता है, क्योंकि सही जानकारी की अभाव में यहां परम्परागत संबंध या सहमति की प्राप्ति नहीं हो सकती है।, जिसे IC Act Section-20 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 20 (Indian Contract Act Section-20) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 20 IC Act Section-20 के अनुसार जब दोनों पक्षकारों के बीच तथ्यों की भूल होती है और उन्हें बाद में यह पता चलता है, तो उनके बीच किया गया करार अमान्य हो जाता है। इससे करार को बिंदु रूप में बाधित माना जाता है, क्योंकि सही जानकारी की अभाव में यहां परम्परागत संबंध या सहमति की प्राप्ति नहीं हो सकती है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 20 (IC Act Section-20 in Hindi)

जबकि दोनों पक्षकार तथ्य की बात संबंधी भूल में हों, तब करार शून्य है-

जहाँ कि किसी करार के दोनों पक्षकार ऐसी तथ्य की बात के बारे में, जो करार के लिए मर्मभूत है, भूल में हों, वहाँ करार शून्य है।
स्पष्टीकरण — जो चीज करार की विषय-वस्तु हो उसके मूल्य के बारे में गलत राय, तथ्य की बात के बारे में भूल नहीं समझी जाएगी।
दृष्टान्त
(क) माल के विनिर्दिष्ट स्थोरा को, जिसके बारे में यह अनुमान है कि वह इंग्लैण्ड से मुम्बई को चल चुका है, ‘ख’ को बेचने का करार ‘क’ करता है। पता चलता है कि सौदे के दिन से पूर्व, उस स्थोरा को प्रवहण करने वाला पोत संत्यक्त कर दिया गया था और माल नष्ट हो गया था। दोनों में से किसी भी पक्षकार को इन तथ्यों की जानकारी नहीं थी। करार शून्य है
(ख) ‘ख’ से अमुक घोड़ा खरीदने का करार ‘क’ करता है। यह पता चलता है कि वह घोड़ा सौदे के समय मर चुका था, यद्यपि दोनों में से किसी भी पक्षकार को इस तथ्य की जानकारी नहीं थी। करार शून्य है।
(ग) ‘ख’ के जीवनपर्यन्त के लिए एक सम्पदा का हकदार होते हुए ‘क उसे ‘ग’ को बेचने का करार करता है। करार के समय ‘ख’ मर चुका था किन्तु दोनों पक्षकार इस तथ्य से अनभिज्ञ थे। करार शून्य है।

Indian Contract Act Section-20 (IC Act Section-20 in English)

Agreement void where both parties are under mistake as to matter of fact-

Where both the parties to an agreement are under a mistake as to a matter of fact essential to the agreement the agreement is void.
Explanation – An erroneous opinion as to the value of the thing which forms the subject matter of the agreement, is not to be deemed a mistake as to a matter of fact.
Illustrations
(a) A agrees to sell to B a specific cargo of goods supposed to be on its way from England to Bombay. It turns out that, before the day of the bargain the ship conveying the cargo had been cast away and the goods lost. Neither party was aware of these facts. The agreement is void.
(b) A agrees to buy from B a certain horse. It turns out that the horse was dead at the time of the bargain, though neither party was aware of the fact. The agreement is void.
(c) A, being entitled to an estate for the life of B, agrees to sell it to C, B was dead at the time of agreement, but both parties were ignorant of the fact. The agreement is void.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 20 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 19 | Indian Contract Act Section 19

 भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act (ICA Section-19) in Hindi के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 19 के अनुसार “स्वतंत्र सम्मति के बिना किए गए करारों की शून्यकरणीयता” विधि की एक सिद्धांतिक संकल्पना है जिसका अर्थ होता है कि स्वतंत्रता या सहमति के बिना किए गए करार अवैध या निराधार होते हैं। इसका मतलब होता है कि जब दो पक्ष एक करार पर न सहमत हों या एक पक्ष के बिना करार किया जाए, तो ऐसा करार निष्पादनीय नहीं होता है, जिसे IC Act Section-19 के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 19 (Indian Contract Act Section-19) का विवरण

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 19 IC Act Section-19 के अनुसार “स्वतंत्र सम्मति के बिना किए गए करारों की शून्यकरणीयता” विधि की एक सिद्धांतिक संकल्पना है जिसका अर्थ होता है कि स्वतंत्रता या सहमति के बिना किए गए करार अवैध या निराधार होते हैं। इसका मतलब होता है कि जब दो पक्ष एक करार पर न सहमत हों या एक पक्ष के बिना करार किया जाए, तो ऐसा करार निष्पादनीय नहीं होता है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 19 (IC Act Section-19 in Hindi)

स्वतंत्र सम्मति के बिना किए गए करारों की शून्यकरणीयता-

जबकि किसी करार के लिए सम्मति प्रपीड़न, कपट या दुर्व्यपदेशन से कारित हो तब वह करार ऐसी संविदा है जो उस पक्षकार के विकल्प पर शून्यकरणीय है जिसकी सम्मति ऐसे कारित हुई थी। | संविदा का वह पक्षकार जिसकी सम्मति कपट या दुर्व्यपदेशन से कारित हुई थी, यदि वह ठीक समझे तो, आग्रह कर सकेगा कि संविदा का पालन किया जाए, और वह उस स्थिति में रखा जाए कि जिसमें वह होता यदि किए गए व्यपदेशन सत्य होते। |
अपवाद — यदि ऐसी सम्मति दुर्व्यपदेशन या ऐसे मौन द्वारा जो धारा 17 के अर्थ के अन्तर्गत कपटपूर्ण है, कारित हुई थी तो ऐसा होने पर भी संविदा शून्यकरणीय नहीं है यदि उस पक्षकार के पास जिसकी सम्मति इस प्रकार कारित हुई थी, सत्य का पता मामूली तत्परता से चला लेने के साधन थे।
स्पष्टीकरण — वह कपट या दुर्व्यपदेशन, जिसने संविदा के उस पक्षकार की सम्मति कारित नहीं की, जिससे ऐसा कपट या दुर्व्यपदेशन किया गया था, संविदा को शून्यकरणीय नहीं कर देता।
दृष्टान्त
(क) ‘ख’ को प्रवंचित करने के आशय से ‘क’ मिथ्या व्यपदेशन करता है कि ‘क’ के कारखाने में पाँच सौ मन नील प्रतिवर्ष बनाया जाता है और एतद्द्वारा ‘ख’ को वह कारखाना खरीदने के लिए उत्प्रेरित करता है। संविदा ‘ख’ के विकल्प पर शून्यकरणीय है।
(ख) ‘क’ दुर्व्यपदेशन द्वारा ‘ख’ को गलत विश्वास कराता है कि ‘क’ के कारखाने में पाँच सौ मन नील प्रतिवर्ष बनाया जाता है। ‘ख’ कारखाने के लेखाओं की पड़ताल करता है जो यह दर्शित करते हैं कि केवल चार सौ मन नील बनाया गया है। इसके पश्चात् ‘ख’ कारखाने को खरीद लेता है, संविदा ‘क’ के दुर्व्यपदेशन के कारण शून्यकरणीय नहीं है।
(ग) ‘क’ कपटपूर्वक ‘ख’ को इत्तिला देता है कि ‘क’ की सम्पदा विल्लंगम्-मुक्त है। तब ‘ख’ उस सम्पदा को खरीद लेता है। वह सम्पदा एक बन्धक के अध्यधीन है। ‘ख’ या तो संविदा को शून्य कर सकेगा या यह आग्रह कर सकेगा कि वह क्रियान्वित की जाए और बन्धक ऋण का मोचन किया जाए।
(घ) ‘क’ की सम्पदा में ‘ख’ अयस्क की एक शिला का पता लगाकर ‘क’ से उस अयस्क के अस्तित्व को छिपाने के साधनों का प्रयोग करता है और छिपा लेता है। ‘क’ के अज्ञान से ‘ख’ उस सम्पदा को न्यून मूल्य पर खरीदने में समर्थ हो जाता है। संविदा ‘क’ के विकल्प पर शून्यकरणीय है।
(ङ) ‘ख’ की मृत्यु पर एक सम्पदा का उत्तराधिकारी होने का ‘क’ हकदार है। ‘ख’ की मृत्यु हो जाती है। ‘ख’ की मृत्यु का समाचार पाने पर ‘ग’ उस समाचार को ‘क’ तक नहीं पहुँचने देता और इस तरह ‘क’ को उत्प्रेरित करता है कि उस सम्पदा में अपना हित उसके हाथ में बेच दे। यह विक्रय ‘क’ के विकल्प पर शून्यकरणीय है।

Indian Contract Act Section-19 (IC Act Section-19 in English)

Voidability of agreements without free consent-

When consent to an agreement is caused by coercion, fraud or misrepresentation, the agreement is a contract voidable at the option of the party whose consent was so caused.
A party to contract, whose consent was caused by fraud or misrepresentation, may, if he thinks fit, insist that the contract shall be performed, and that he shall be put in the position in which he would have been if the representations made had been true.
Exception — If such consent was caused by misrepresentation or by silence, fraudulent within the meaning of section 17, the contract, nevertheless, is not voidable, if the party whose consent was so caused had the means of discovering the truth with ordinary diligence.
Explanation — A fraud or misrepresentation which did not cause the consent to a contract of the party on whom such fraud was practised, or to whom such misrepresentation was made, does not render a contract voidable.
Illustrations
(a) A, intending to deceive B, falsely represents that five hundred maunds of indigo are made annually at As factory, and thereby induces B to buy the factory. The contract is voidable at the option of B.
(b) A, by a misrepresentation, leads B erroneously to believe that five hundred maunds of indigo are made annually at A’s factory. B examines the accounts of the factory, which show that only four hundred maunds of indigo have been made. After this B buys the factory. The contract is not voidable on account of A’s misrepresentation.
(c) A fraudulently informs B that As estate is free from incumbrance. Bothereupon buys the estate. The estate is subject to a mortgage. B may either avoid the contract, or may insist on its being carried out and mortgage-debt redeemed.
(d) B, having discovered a vein of ore on the estate of A, adopts means to conceal, and does conceal the existence of the ore from A. Through As ignorance B is enabled to buy the estate at an under-value. The contract is voidable at the option of A.
(e) A is entitled to succeed to an estate at the death of B; B dies; C, having received intelligence of B’s death, prevents the intelligence reaching A, and thus induces A to sell him his interest in the estate. The sale is voidable at the option of A.

हमारा प्रयास भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act Section) की धारा 19 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।