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लोन एग्रीमेंट क्या होता है | What is Loan Agreement?

लोन एग्रीमेेंट (Loan Agreement) एक प्रकार से समझौता/करार है, जिसमे लोन देने वाला व्यक्ति एवंम् लेने वाले व्यक्ति के मध्य नियमों एवंंम् शर्तो को मामने के लिये एक करार या एग्रीमेंट बनाया जाता है, जिसमे लोन देने वाली कम्पनी अथवा संस्था, लोन लेने वाले या प्राप्तकर्ता को उन सभी बिन्दुओ और करारों को स्वीकार कराती है, जैसे लोन पर ब्याज कितना देय होगा, देरी होने पर शुल्क एवंम् दंड का क्या प्रावधान होगा और कितने समय तक चुकाना पडेंगा, अगर समय से नही दे पाते हो, तो क्या एक्शन लिया जायेगा इत्यादि सभी शर्तो एवंम् नियमों का पालन करने के उपरान्त ही यदि लोन लेने वाला व्यक्ति या प्राप्तकर्ता लोन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करता है, उसके पश्चात् ही लोन दिया जाता है, इसी करार को लोन एग्रीमेंट कहते है।

लोन एग्रीमेंट (Loan Agreement) कराने का मुख्य आशय यह होता है कि यदि किसी लोन प्राप्तकर्ता व्दारा लोन लिया गया है और वह व्यक्ति अपने लोन को समय से नही चुका रहा है या लोन चुकाने मे कोई आना कानी करता है अथवा एग्रीमेंट के अनुसार किन्ही शर्तो का दुरूपयोग कर रहा है, तो लोन देने वाले व्यक्ति, कम्पनी अथवा सास्था को कानूनी रूप से बल मिलता है, और वह सास्था ऐसे व्यक्तियों पर नियमित रूप से न्यायिक कार्यवाही करने मे सक्षम रहता है।

लोन एग्रीमेंट के प्रकार क्या है? (What are the types of loan agreement?)

लोन एग्रीमेंट कितने प्रकार के होते है, यह जानने से पहले हमे यह समझना जरूरी होगा कि लोन कितने प्रकार से दिया जाता है और लोन देने एवंम् लोन लेने वाले व्यक्ति के मध्य उन्ही प्रकार से बाध्य होंगे, जिस प्रकार से उस व्यक्ति ने उन कारणों पर लोन लिया है, तो आइयेे पहले समझते है, लोन दो प्रकार से मिलता है, पहला सुरक्षित लोन और दूसरा असुरक्षित लोन लोन वाले वाले व्यक्ति व्दारा जिस भी प्रकार से बैंक अथवा किसी सास्थां से किस प्रकार से लोन लिया है, यह निर्भर करता है, दोनो प्रकार से लोन की अपनी शर्ते एवंम् अपने नियम होते है, जिनके आधार पर ही किसी व्यक्ति को बैंक या कोई सांस्था लोन देती है।

सुरक्षित लोन (Secured Loan): यह सुरक्षित लोन किसी बैंक या सांस्था व्दारा आसानी के लोन लेने वाले व्यक्ति को दे दिया जाता है, यदि कोई व्यक्ति अपनी किसी वस्तु जिसका वह स्वंय मालिक हो जैसे जमीन, घर, दुकान, फैक्ट्री, गाड़ी या कोई मूल्यवान वस्तु को गारन्टी के तौर पर रखकर लोन लेता है, तो बैंक या सांस्था आसानी से लोन दे देती है, क्यो गारंटी रखी होने के कारण कम जोखिम भरा माना जाता है। यदि कोई व्यक्ति लोन लेने के पश्चात् समय से भुगतान नही कर रहा होता है या लोन अदा नही कर पाता है, तो उस वस्तु को जिसे लोन प्राप्तकर्ता व्दारा गिरवी रखी है, उसे अपने कब्जे मे कर लेती है और वह उनका अधिकार भी होता है।

सुरक्षित लोन देने वाली संस्था अथवा बैंक अपनी सुरक्षा पहले ही किसी मूल्यवान वस्तु को रखकर कर लेती है। इनकी शर्ते एवंम् एग्रीमेंट भी उन्ही आधारो के अनुरूप तैयार किया जाता है। जिसे सुरक्षित लोन एग्रीमेंट (Secured Loan Agreement) कहते है।

असुरक्षित लोन (Unsecured Loan): यह असुरक्षित लोन किसी बैंक या सांस्था व्दारा आसानी से नही दिया जाता है, यह लोन व्यक्ति यदि किसी सांस्था या बैंक से काफी समय से जुड़ा और बैंक या सांस्था को ऐसा लगता है कि यह व्यक्ति समय से चुका देगा, तो वह सांस्था अगर चाहे, तो दे सकती है और मना भी करने का पूरा हकदार होती है, क्योकि ऐसे लोन पूर्ण जोखिम भरे माने जाते है। यह लोन क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन के रूप मे दिये जाते है, जिसमे काफी ज्यादा ब्याज दर पर लोन दिया जाता है। यदि कोई लोन नही चुकाता है, तो वह न्यायिक कार्यवाही करने का हकदार होता है।

असुरक्षित लोन देने वाली संस्था अथवा बैंक अपनी सुरक्षा एवंम् लोन देने वाले व्यक्ति के दस्तावेजों के आधार पर अत्यधिक ब्याज दर लेने के उद्देश्य से लोन देती है। यह एग्रीमेंट वह अपनी शर्तो एवंम् नियमो के आधार पर तैयार कराती है। जिसे असुरक्षित एग्रीमेंट (Unsecured Loan Agreement) कहते है।

इस तरह से लोन एग्रीमेंट भी दो प्रकार से बैक एवंम् लोन प्राप्तकर्ता के मध्य बनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोन चुकाने की अवधि, लोन ब्याज दर, देरी होने पर शुल्क या दंड का क्या प्रावधान है इत्यादि सभी बिन्दुओं पर एग्रीमेंट तैयार किया जाता है। दोनों प्रकार के लोन के लिये बैंक या सांस्था की अलग – अलग शर्ते होती है, जिनके आधार पर लोन दिया जाता है और इन सभी शर्तो के लोन देने वाली सांस्था या बैंक एवंम् लोन लेने वाले या लोन प्राप्तकर्ता को मानना पड़ता है, यदि दोनों मे कोई भी किन्ही शर्तो का उलंघन कर्ता है, तो दूसरा पक्ष एग्रीमेंट के आधार पर न्यायिक कार्यवाही करने अधिकारी होता है।

क्या लोन लेने के लिये लोन एग्रीमेंट पढ़ना जरुरी है? (Is it necessary to read the loan agreement for taking a loan?)

हम मे से बहुत से लोन लेते है, क्या कभी लोन एग्रीमेंट पढ़ा है अथवा एक कॉपी लोन एग्रीमेंट की बैंक से मांगी है? लोन लेते समय यह ध्यान रखने वाली बात है कि कभी कभी हम इन सभी चीजों को इग्नोर कर देते है, और कभी-कभी आगे जाकर काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ जाता है, क्योकि अक्सर हम इन महत्वपूर्ण बातों को भूल ही जाते है, कि बैंक ने हमसे जिन कागजों मे हस्ताक्षर कराया है पढ़ा है या नही और तो और अधिंकाशतः बैंक भी अपनी शर्तो को पूरी तरह से किसी नही बताती है, जिसका खामियाजा आगे चलकर भुगतना पड़ता है। इसलिये लोन लेते समय सभी दस्तावेजो को ध्यान पूर्वक पढ़े और एक कॉपी पहले ही ले ले। अन्यथा कभी कभी किसी बिन्दु को लेकर बैंक आपसे कई प्रकार से चार्ज के रूप से भी चार्ज करती है और आपको पता भी नही चल पाता है।

इस तरह से लोन लेने वाले व्यक्ति यह सांवधानी रखनी चाहिये कि लोन एग्रीमेंट मे क्या शर्ते है और एग्रीमेन्ट की एक कॉपी अपने पास भी रखना जरूरी है।

लोन लेन के लिये लोन एग्रीमेंट की महत्वपूर्ण बाते (Important points of loan agreement for loan)

लोन राशि: लोन एग्रीमेंट में लोन ली जाने वाली राशि का उल्लेख होना चाहिए।
ब्याज दर: लोन एग्रीमेंट में लोन ली जाने वाली राशि पर ब्याज दर के साथ-साथ लोन से जुड़े किसी भी अन्य कौन-कौन से शुल्क देय होंगे, उल्लेख होना चाहिए।
चुकौती की शर्तें: लोन एग्रीमेंट में चुकौती अनुसूची की रूपरेखा होनी चाहिए, जिसमें भुगतान की आवृत्ति और प्रत्येक भुगतान की देय तिथि लिखित होनी चाहिये।
भुगतान दंड: लोन एग्रीमेंट में यह निर्दिष्ट होना चाहिए कि क्या लोन को जल्दी चुकाने या देरी हो जाने पर कोई दंड है या नहीं।
डिफ़ॉल्ट प्रावधान: लोन एग्रीमेंट में स्पष्ट होना चाहिए कि क्या होता है यदि उधारकर्ता ऋण पर चूक करता है, जिसमें कोई विलंब शुल्क या दंड शामिल है, और क्या ऋणदाता को कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार है।
कानून: लोन एग्रीमेंट को निर्दिष्ट करना चाहिए कि कौन से राज्य या देश के कानून समझौते को नियंत्रित करेंगे।
हस्ताक्षर: ऋणदाता और उधारकर्ता दोनों को इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने के लिए ऋण समझौते पर हस्ताक्षर करना चाहिए।

यह लोन एग्रीमेंट बैंक एवंम् लोन लेने वाले व्यक्ति या प्राप्तकर्ता के मध्य कानूनी बाण्ड है, जिसका उपयोग यदि दोनो मे से किसी ने भी शर्तो का उलंघन किया तो दूसरा पक्ष न्यायिक कार्यवाही करने के लिये बाध्य होगा।

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 13 (माता-पिता, संरक्षक अथवा परिवीक्षा अधिकारी को इत्तिला) | Juvenile Justice Act Section 13 (Information to parents, guardian or probation officer)

किशोर न्याय अधिनियम JJ Act (Juvenile Justice Act) की धारा -13 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। किशोर न्याय अधिनियम की धारा-13 के अनुसार, यदि कोई किशोर कानून का उल्लंघन करता पाया जाता है और किशोर न्याय बोर्ड किशोर को विशेष गृह में रखने का आदेश देता है, परिभाषित किया गया है।

किशोर कानून का उल्लंघन करता पाया जाता है और किशोर न्याय बोर्ड किशोर को विशेष गृह में रखने का आदेश देता है, तो निम्नलिखित प्रावधान लागू होंगे:

  • किशोर को निगरानी गृह या सुरक्षित स्थान पर तब तक रखा जाएगा जब तक कि उसे जेजेबी के सामने पेश नहीं किया जाता है।
  • जेजेबी मामले की जांच करेगा और यह निर्धारित करेगा कि किशोर को विशेष गृह में भेजा जाना चाहिए या जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।
  • अगर जेजेबी किशोर को विशेष गृह में भेजने का फैसला करता है, तो वह उस अवधि को निर्दिष्ट करेगा जिसके लिए किशोर को वहां रखा जाना है, जो तीन साल से अधिक नहीं होगी।
  • विशेष गृह किशोर को शैक्षिक, व्यावसायिक और कौशल निर्माण के अवसरों के साथ-साथ परामर्श और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करेगा।
  • विशेष गृह यह सुनिश्चित करेगा कि किशोर किसी भी प्रकार के शारीरिक या मानसिक शोषण या शोषण का शिकार न हो।
  • किशोर को अपने परिवार के सदस्यों, कानूनी सहायता और अन्य व्यक्तियों के साथ संवाद करने की अनुमति होगी जो किशोर की सहायता कर सकते हैं।
  • जेजेबी समय-समय पर किशोर के मामले की समीक्षा करेगा और यदि उचित समझे तो निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति से पहले किशोर की रिहाई का आदेश दे सकता है।
माता-पिता, संरक्षक अथवा परिवीक्षा अधिकारी को इत्तिला-
(1) जहां विधि का उल्लंघन करने वाले अभिकथित किसी बालक को गिरफ्तार किया जाता है वहां उस पुलिस थाने या विशेष किशोर पुलिस एकक का बाल कल्याण पुलिस अधिकारी के रूप में पदाभिहीत अधिकारी, जिसके पास ऐसा बालक लाया जाता है, बालक की गिरफ्तारी के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र
(i) ऐसे बालक के माता-पिता या संरक्षक को, यदि उनका पता चलता है, इत्तिला देगा और उन्हें निदेश देगा कि वह उस बोर्ड के समक्ष उपस्थित हो जिसके समक्ष बालक को पेश किया जाएगा; और
(ii) परिवीक्षा अधिकारी को, या यदि कोई परिवीक्षा अधिकारी उपलब्ध नहीं है तो बाल कल्याण अधिकारी को दो सप्ताह के भीतर एक सामाजिक अन्वेषण रिपोर्ट, जिसमें बालक के पूर्ववृत्त और कौटुम्बिक पृष्ठभूमि के बारे में तथा अन्य ऐसी तात्विक परिस्थितियों के बारे में जानकारी अंतर्विष्ट होगी, जिनके बारे में यह संभाव्य है कि वे जांच करने में बोर्ड के लिए सहायक होंगी, तैयार करने और बोर्ड को प्रस्तुत करने के लिए इत्तिला देगा |
(2) जहां बालक को जमानत पर छोड़ दिया जाता है वहां बोर्ड द्वारा परिवीक्षा अधिकारी या बाल कल्याण अधिकारी को इत्तिला दी जाएगी।

Information to parents, guardian or probation officer-
(1) Where a child alleged to be in conflict with law is apprehended, the officer designated as Child Welfare Police Officer of the police station, or the special juvenile police unit to which such child is brought, shall, as soon as possible after apprehending the child, inform-
(i) the parent or guardian of such child, if they can be found, and direct them to be present at the Board before which the child is produced; and
(ii) the probation officer, or if no probation officer is available, a Child Welfare Officer, for preparation and submission within two weeks to the Board, a social investigation report containing information regarding the antecedents and family background of the child and other material circumstances likely to be of assistance to the Board for making the inquiry.
(2) Where a child is released on bail, the probation officer or the Child Welfare Officer shall be informed by the Board.

हमारा प्रयास किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act Section) की धारा 13 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 14 (विधि का उल्लंघन करने वाले बालक के बारे में बोर्ड द्वारा जांच) | Juvenile Justice Act Section 14 (Inquiry by Board regarding child in conflict with law)

किशोर न्याय अधिनियम JJ Act (Juvenile Justice Act) की धारा -14 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। किशोर न्याय अधिनियम की धारा-14 मे विधि का उल्लंघन करने वाले बालक के बारे मे बोर्ड व्दारा जांच की प्रकिया, को परिभाषित किया गया है।

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 14 किशोर न्याय बोर्ड को एक किशोर को उपयुक्त सुविधा में रखने का आदेश देने का अधिकार देती है और उपयुक्त सुविधा में किशोर की नियुक्ति और देखभाल को नियंत्रित करने वाले प्रावधानों को निर्धारित करती है।

विधि का उल्लंघन करने वाले बालक के बारे में बोर्ड द्वारा जांच-
(1) जहां विधि का उल्लंघन करने वाला अभिकथित बालक, बोर्ड के समक्ष पेश किया जाता है, वहां बोर्ड इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार जांच करेगा और ऐसे बालक के संबंध में ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह इस अधिनियम की धारा 17 और धारा 18 के अधीन ठीक समझे।
(2) इस धारा के अधीन कोई जांच, बोर्ड के समक्ष बालक को पहली बार पेश किए जाने की तारीख से चार मास की अवधि के भीतर, जब तक कि बोर्ड द्वारा, मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और ऐसे विस्तारण के लिए लिखित में कारण लेखबद्ध करने के पश्चात् दो और मास की अधिकतम अवधि के लिए उक्त अवधि विस्तारित नहीं की गई हो, पूरी की जाएगी।
(3) बोर्ड द्वारा, धारा 15 के अधीन जघन्य अपराधों की दशा में प्रारंभिक निर्धारण, बोर्ड के समक्ष बालक को पहली बार पेश किए जाने की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर पूरा किया जाएगा ।
(4) यदि बोर्ड द्वारा, छोटे अपराधों के लिए उपधारा (2) के अधीन जांच, विस्तारित अवधि पश्चात् भी अनिर्णायक रहती है तो कार्यवाहियां समाप्त हो जाएंगी : 
परंतु घोर या जघन्य अपराधों के लिए यदि बोर्ड जांच पूरी करने के लिए समय और बढ़ाने की अपेक्षा करता है, तो यथास्थिति, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट लिखित में लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से उसे प्रदान करेगा |
(5) बोर्ड, ऋजु और त्वरित जांच सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित उपाय करेगा
अर्थात् :-
(क) जांच प्रारंभ करते समय, बोर्ड अपना यह समाधान करेगा कि विधि का उल्लंघन करने वाले बालक से पुलिस द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, जिसके अंतर्गत वकील या परिवीक्षा अधिकारी भी है, कोई दुर्व्यवहार न किया गया हो और वह ऐसे दुर्व्यवहार के मामले में सुधारात्मक उपाय करेगा;
(ख) इस अधिनियम के अधीन सभी मामलों में, कार्यवाहियां यथासंभव साधारण रीति से की जाएंगी और यह सुनिश्चित करने के लिए सावधानी बरती जाएगी कि ऐसे बालक को, जिसके विरुद्ध कार्यवाहियां आरंभ की गई हैं, कार्यवाहियों के दौरान बाल अनुकूल वातावरण उपलब्ध करवाया जाए;
(ग) बोर्ड के समक्ष लाए गए प्रत्येक बालक को जांच में सुनवाई का और भाग लेने का अवसर प्रदान किया जाएगा;
(घ) छोटे अपराधों वाले मामलों का निपटारा बोर्ड द्वारा, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन विहित प्रक्रिया के अनुसार बोर्ड द्वारा संक्षिप्त कार्यवाहियों के माध्यम से किया जाएगा;
(ङ) बोर्ड द्वारा घोर अपराधों की जांच का निपटारा, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन समन मामलों के विचारण की प्रक्रिया का अनुसरण करते हुए किया जाएगा;
(च) जघन्य अपराधों की जांच–
(i) अपराध किए जाने की तारीख को सोलह वर्ष से कम आयु के बालक के संबंध में जघन्य अपराधों की जांच खंड (ङ) के अधीन बोर्ड द्वारा निपटाई जाएगी; और 
(ii) अपराध किए जाने की तारीख को सोलह वर्ष से अधिक आयु के बालक के संबंध में जघन्य अपराधों की जांच धारा 15 के अधीन विहित रीति से की जाएगी।

Inquiry by Board regarding child in conflict with law-
(1) Where a child alleged to be in conflict with law is produced before Board, the Board shall hold an inquiry in accordance with the provisions of this Act and may pass such orders in relation to such child as it deems fit under sections 17 and 18 of this Act.
(2) The inquiry under this section shall be completed within a period of four months from the date of first production of the child before the Board, unless the period is extended, for a maximum period of two more months by the Board, having regard to the circumstances of the case and after recording the reasons in writing for such extension.
(3) A preliminary assessment in case of heinous offences under section 15 shall be disposed of by the Board within a period of three months from the date of first production of the child before the Board.
(4) If inquiry by the Board under sub-section (2) for petty offences remains inconclusive even after the extended period, the proceedings shall stand terminated:
Provided that for serious or heinous offences, in case the Board requires further extension of time for completion of inquiry, the same shall be granted by the Chief Judicial Magistrate or, as the case may be, the Chief Metropolitan Magistrate, for reasons to be recorded in writing.
(5) The Board shall take the following steps to ensure fair and speedy inquiry, namely:
(a) at the time of initiating the inquiry, the Board shall satisfy itself that the child in conflict with law has not been subjected to any ill-treatment by the police or by any other person, including a lawyer or probation officer and take corrective steps in case of such ill-treatment;
(b) in all cases under the Act, the proceedings shall be conducted in simple manner as possible and care shall be taken to ensure that the child, against whom the proceedings have been instituted, is given child-friendly atmosphere during the proceedings;
(c) every child brought before the Board shall be given the opportunity of being heard and participate in the inquiry;
(d) cases of petty offences, shall be disposed of by the Board through summary proceedings, as per the procedure prescribed under the Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974);
(e) inquiry of serious offences shall be disposed of by the Board, by following the procedure, for trial in summons cases under the Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974);
(f) inquiry of heinous offences-
(i) for child below the age of sixteen years as on the date of commission of an offence shall be disposed of by the Board under clause (e);
(ii) for child above the age of sixteen years as on the date of commission of an offence shall be dealt with in the manner prescribed under section 15.

हमारा प्रयास किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act Section) की धारा 14 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 12 (ऐसे व्यक्ति की जमानत जो दृश्यमान रूप से विधि का उल्लंघन करने वाला अभिकथित बालक है) Juvenile Justice Act Section 12 (Bail to a person who is apparently a child alleged to be in conflict with law)

किशोर न्याय अधिनियम JJ Act (Juvenile Justice Act) की धारा -12 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। किशोर न्याय अधिनियम की धारा-12 के अनुसार, जब एक किशोर को गिरफ्तार किया जाता है या किसी प्राधिकरण के सामने लाया जाता है, तो किशोर की आयु का निर्धारण साक्ष्य, जैसे कि जन्म प्रमाण पत्र, मैट्रिक या समकक्ष प्रमाण पत्र, या चिकित्सा राय मांगकर किया जाएगा।

यदि किशोर की सही उम्र का निर्धारण नहीं किया जा सकता है, तो किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) या बाल न्यायालय विधिवत् गठित मेडिकल बोर्ड द्वारा किशोर की चिकित्सा जांच कराने का आदेश दे सकता है। मेडिकल बोर्ड को उनकी जांच के आधार पर किशोर की उम्र की रिपोर्ट देनी होगी।

यदि चिकित्सकीय जांच के बाद किशोर की आयु 18 वर्ष से कम पाई जाती है, तो किशोर के खिलाफ किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। तथापि, यदि किशोर की आयु 18 वर्ष या उससे अधिक पाई जाती है, तो उसके साथ भारतीय दंड संहिता या लागू होने वाले किसी अन्य कानून के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।

ऐसे व्यक्ति की जमानत जो दृश्यमान रूप से विधि का उल्लंघन करने वाला अभिकथित बालक है-
(1) जब कोई ऐसा व्यक्ति, जो दृश्यमान रूप से एक बालक है और जिसने अभिकथित – जमानतीय या अजमानतीय अपराध किया है, पुलिस द्वारा गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाता है या बोर्ड के समक्ष उपसंजात होता है या लाया जाता है, तब दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे व्यक्ति को प्रतिभूि सहित या रहित जमानत पर छोड़ दिया जाएगा या उसे किसी परिवीक्षा अधिकारी के पर्यवेक्षणाधीन या किसी उपयुक्त व्यक्ति की देखरेख के अधीन रखा जाएगा:
परंतु ऐसे व्यक्ति को तब इस प्रकार छोड़ा नहीं जाएगा जब यह विश्वास करने के युक्तियुक्त आधार प्रतीत होते हैं कि उस व्यक्ति को छोड़े जाने से यह संभाव्य है कि उसका संसर्ग किसी ज्ञात अपराधी से होगा या उक्त व्यक्ति नैतिक, शारीरिक या मनोवैज्ञानिक रूप से खतरे में पड़ जाएगा या उस व्यक्ति के छोड़े जाने से न्याय का उद्देश्य विफल हो जाएगा और बोर्ड जमानत देने से इंकार करने के कारणों को और ऐसा विनिश्चय लेने से संबंधित परिस्थितियों को अभिलिखित करेगा।
(2) जब गिरफ्तार किए जाने पर ऐसे व्यक्ति को पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा उपधारा (1) के अधीन जमानत पर नहीं छोड़ा जाता है तब ऐसा अधिकारी उस व्यक्ति को ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, ‘[यथास्थिति, संप्रेक्षण गृह या सुरक्षित स्थान) में केवल तब तक के लिए रखवाएगा जब तक ऐसे व्यक्ति को बोर्ड के समक्ष न लाया जा सके।
(3) जब ऐसा व्यक्ति, बोर्ड द्वारा उपधारा (1) के अधीन जमानत पर नहीं छोड़ा जाता है तब वह ऐसे व्यक्ति के बारे में जांच के लंबित रहने के दौरान ऐसी कालावधि के लिए जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, उसे यथास्थिति, संप्रेक्षण गृह या किसी सुरक्षित स्थान में भेजने के लिए आदेश करेगा।
(4) जब विधि का उल्लंघन करने वाला कोई बालक, जमानत के आदेश के सात दिन के भीतर जमानत की शर्तों को पूरा करने में असमर्थ होता है तो ऐसे बालक को जमानत की शर्तों के उपांतरण के लिए बोर्ड के समक्ष पेश किया जाएगा।

Bail to a person who is apparently a child alleged to be in conflict with law-
(1) When any person, who is apparently a child and is alleged to have committed a abailable or non-bailable offence, is apprehended or detained by the police or appears or brought before a Board, such person shall, notwithstanding anything contained in the Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974) or in any other law for the time being in force, be released on bail with or without surety or placed under the supervision of a probation officer or under the care of any fit person:
Provided that such person shall not be so released if there appears reasonable grounds for believing that the release is likely to bring that person into association with any known criminal or expose the said person to moral, physical or psychological danger or the persons release would defeat the ends of justice, and the Board shall record the reasons for denying the bail and circumstances that led to such a decision.
(2) When such person having been apprehended is not released on bail under sub-section (1) by the officer-in-charge of the police station, such officer shall cause the person to be kept only in an observation home 1[or a place of safety, as the case may be] in such manner as may be prescribed until the person can be brought before a Board.
(3) When such person is not released on bail under sub-section (1) by the Board, it shall make an order sending him to an observation home or a place of safety, as the case may be, for such period during the pendency of the inquiry regarding the person, as may be specified in the order.
(4) When a child in conflict with law is unable to fulfil the conditions of bail order within seven days of the bail order, such child shall be produced before the Board for modification of the conditions of bail.

हमारा प्रयास किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act Section) की धारा 12 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 11 (ऐसे व्यक्ति की भूमिका, जिसके प्रभार में विधि का उल्लंघन करने वाला बालक रखा गया है) | Juvenile Justice Act Section 11 (Role of person in whose charge child in conflict with law is placed)

किशोर न्याय अधिनियम JJ Act (Juvenile Justice Act) की धारा -11 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। किशोर न्याय अधिनियम की धारा-11 के अनुसार जब बच्चे को जेजेबी के समक्ष पेश किया जाता है, तो बोर्ड को यह निर्धारित करने के लिए जांच करनी चाहिए कि बच्चा कानून के साथ संघर्ष में है या नहीं। यदि बोर्ड इस बात से संतुष्ट है कि बच्चे ने अपराध किया है, तो वह बच्चे को तीन साल तक की अवधि के लिए किशोर गृह जैसे सुरक्षित स्थान पर भेजने का निर्देश दे सकता है।

ऐसा कोई भी आदेश देने से पहले, बोर्ड को बच्चे की उम्र, चरित्र, पूर्ववृत्त और उन परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए जिनमें अपराध किया गया था। यदि बच्चा पहली बार कानून का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता है और किया गया अपराध एक तुच्छ प्रकृति का है, तो बोर्ड बच्चे को परिवीक्षा पर रिहा करने का आदेश दे सकता है। बोर्ड बच्चे को काउंसलिंग में भाग लेने या सामुदायिक सेवा करने, या ऐसे किसी अन्य उपाय के लिए भी आदेश दे सकता है। बोर्ड को कोई भी आदेश देते समय बच्चे के पुनर्वास और सामाजिक पुनर्एकीकरण पर भी विचार करना चाहिए।

ऐसे व्यक्ति की भूमिका, जिसके प्रभार में विधि का उल्लंघन करने वाला बालक रखा गया है-
ऐसे व्यक्ति का, जिसके प्रभार में विधि का उल्लंघन करने वाले बालक को रखा जाता है, जब आदेश प्रवर्तन में हो, उक्त बालक की जिम्मेदारी इस प्रकार होगी मानो उक्त व्यक्ति बालक का माता पिता है और बालक के भरणपोषण के लिए उत्तरदायी होगा:
परंतु तब के सिवाय, जब बोर्ड की यह राय है कि माता-पिता या कोई अन्य व्यक्ति ऐसे बालक का प्रभार लेने के लिए उपयुक्त है, इस बात के होते हुए भी कि उक्त बालक का माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दावा किया गया है, बालक बोर्ड द्वारा कथित अवधि के लिए ऐसे व्यक्ति के प्रभार में बना रहेगा।

Role of person in whose charge child in conflict with law is placed-
Any person in whose charge a child in conflict with law is placed, shall while the order is in force, have responsibility of the said child, as if the said person was the childs parent and responsible for the childs maintenance:
Provided that the child shall continue in such persons charge for the period stated by the Board, notwithstanding that the said child is claimed by the parents or any other person except when the Board is of the opinion that the parent or any other person are fit to exercise charge over such child.

हमारा प्रयास किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act Section) की धारा 11 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 10 (विधि का उल्लंघन करने वाले अभिकथित बालक की गिरफ्तारी) | Juvenile Justice Act Section 10 (Apprehension of child alleged to be in conflict with law)

किशोर न्याय अधिनियम JJ Act (Juvenile Justice Act) की धारा -10 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। किशोर न्याय अधिनियम की धारा-10 के अनुसार, जब कोई बच्चा पुलिस द्वारा पकड़ा जाता है, तो उसे कानूनी सहायता के अधिकार और चुप रहने के अधिकार सहित उनके अधिकारों के बारे में तुरंत सूचित किया जाना चाहिए। विधि का उल्लंघन करने वाले अभिकथित बालक की गिरफ्तारी को परिभाषित किया गया है।

पुलिस को बच्चे के माता-पिता या अभिभावक को आशंका के बारे में भी सूचित करना चाहिए और एक चिकित्सा अधिकारी द्वारा बच्चे की जांच कराने की व्यवस्था करनी चाहिए। चिकित्सा अधिकारी को बच्चे के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर एक रिपोर्ट देनी होगी, साथ ही बच्चे को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया जाना चाहिए। बोर्ड यह निर्धारित करने के लिए एक जांच करेगा कि क्या बच्चे को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए या सुरक्षित स्थान पर भेजा जाना चाहिए।

विधि का उल्लंघन करने वाले अभिकथित बालक की गिरफ्तारी-
(1) जैसे ही विधि का उल्लंघन करने वाले अभिकथित बालक को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जाता है तभी ऐसे बालक को विशेष पुलिस बल एकक या अभिहित बाल कल्याण पुलिस अधिकारी के प्रभार के अधीन रखा जाएगा, जो बालक को अविलंब, किंतु उस स्थान से, जहां से ऐसे बालक की गिरफ्तारी हुई थी, यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर गिरफ्तारी के चौबीस घंटे की अवधि के भीतर बोर्ड के समक्ष पेश करेगा :
परंतु किसी भी दशा में विधि का उल्लंघन करने वाले अभिकथित बालक को पुलिस हवालात में नहीं रखा जाएगा या जेल में नहीं डाला जाएगा।
(2) राज्य सरकार–
(i) उन व्यक्तियों के लिए उपबंध करने के लिए जिनके द्वारा (जिसके अंतर्गत रजिस्ट्रीकृत स्वैच्छिक या गैर-सरकारी संगठन भी हैं) विधि का उल्लंघन करने वाले अभिकथित किसी बालक को बोर्ड के समक्ष पेश किया जा सकेगा;
(ii) उस रीति का उपबंध करने के लिए, जिससे विधि का उल्लंघन करने वाले अभिकथित बालक को, यथास्थिति, किसी संप्रेक्षण गृह या सुरक्षित स्थान में भेजा जा सकेगा।

Apprehension of child alleged to be in conflict with law-
(1) As soon as a child alleged to be in conflict with law is apprehended by the police, such child shall be placed under the charge of the special juvenile police unit or the designated child welfare police officer, who shall produce the child before the Board without any loss of time but within a period of twenty-four hours of apprehending the child excluding the time necessary for the journey, from the place where such child was apprehended:
Provided that in no case, a child alleged to be in conflict with law shall be placed in a police lockup or lodged in a jail.
(2) The State Government shall make rules consistent with this Act-
(i) to provide for persons through whom (including registered voluntary or non-governmental organisations) any child alleged to be in conflict with law may be produced before the Board;
(ii) to provide for the manner in which the child alleged to be in conflict with law may be sent to an observation home or place of safety, as the case may be.

हमारा प्रयास किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act Section) की धारा 10 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।