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स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम क्या है? (What is NDPS Act) |कितनी धाराये है और सजा का क्या प्रावधान है? (How many sections are there and what is the provision of punishment)

नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस एक्ट (एनडीपीएस एक्ट) भारत में एक विस्तृत ड्रग कंट्रोल कानून है जिसे 1985 में पारित किया गया था। एनडीपीएस एक्ट का उद्देश्य स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थों के अवैध व्यापार को रोकना एवंम् नियंत्रण प्रदान करना है। यह कानून ऐसी औषधि एवंम् पदार्थो अवैध उत्पादन, वितरण और खपत को नियंत्रण करती है। एनडीपीएस अधिनियम अफीम, मॉर्फिन, कोकीन, मारिजुआना और विभिन्न अन्य सिंथेटिक दवाओं सहित सभी मादक दवाओं और मन:प्रभावी पदार्थों पर लागू होती है।

NDPS कानून क्या है?

NDPS कानून भारत मे मादक दवाईयों एवंम् मनः प्रभावी पदार्थो की अवैध बिक्री पर रोक लगाने एवंम् नियंत्रित करने के लिये कानून बनाया गया । इसके अन्तर्गत सरकार के एक मानक अनुसार ही किसी मादक दवाई एवंम् मनः प्रभावी पदार्थ का व्यवसाय किया जा सकता है, लेकिन अधिकांशतः हमारे भारत मे इसका गलत उपयोग किया जा रहा है, एक निर्धारित मानक के अनुरूप न होकर तेजी से किसी अन्य देश से मादक दवाईयों एवंम् पदार्थो का आयात निर्यात किया जाता है, जिसे रोकने के लिये यह कानून बनाया गया।

एनडीपीएस अधिनियम के तहत, मादक दवाओं और मन:प्रभावी पदार्थों के कब्जे, बिक्री, परिवहन, आयात और निर्यात को नियंत्रण किया जाता है, और उल्लंघन करने वालों को कारावास और जुर्माना सहित गंभीर दंड का सामना करना पड़ सकता है। एनडीपीएस अधिनियम कानून के प्रावधानों को लागू करने के लिए केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (NCB) के साथ-साथ राज्य और स्थानीय नारकोटिक नियंत्रण एजेंसियों की स्थापना का भी प्रावधान करता है।

एनडीपीएस अधिनियम को दुनिया में सबसे कड़े दवा नियंत्रण कानूनों में से एक माना जाता है, और यह भारत में मादक दवाओं और मन:प्रभावी पदार्थों के अवैध व्यापार को कम करने में सहायक रहा है। हालांकि, कानून का कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती है, विशेष रूप से दूरस्थ और अविकसित क्षेत्रों में, जहां नशीले पदार्थों की तस्करी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

नारकोटिक दवाओं और मन:प्रभावी पदार्थों के उत्पादन, बिक्री और वितरण को नियमित करने के अलावा, एनडीपीएस अधिनियम अफीम की खेती और चिकित्सा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए अफीम-आधारित दवाओं के निर्माण के लिए एक प्रणाली भी स्थापित करता है। अवैध बाजार में इन दवाओं के किसी भी मोड़ को रोकने के लिए सरकार द्वारा इस प्रणाली की बारीकी से निगरानी की जाती है।

एनडीपीएस अधिनियम मादक पदार्थों की तस्करी और दुरुपयोग से संबंधित मामलों को संभालने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना का भी प्रावधान करता है। ये अदालतें दोषसिद्ध अपराधियों पर आजीवन कारावास और जुर्माने सहित कठोर दंड लगाने के लिए अधिकृत हैं। यह अधिनियम नशीले पदार्थों की तस्करी के माध्यम से उपयोग की जाने वाली या अर्जित की गई संपत्तियों और संपत्तियों को जब्त करने का भी प्रावधान करता है।

एनडीपीएस अधिनियम के प्रभावी प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के लिए, सरकार ने विभिन्न अंतर-एजेंसी समन्वय तंत्रों की स्थापना की है, जिसमें मादक दवाओं और मन:प्रभावी पदार्थों की ट्रैकिंग और निगरानी के लिए एक केंद्रीय निगरानी प्रणाली का निर्माण शामिल है। एनडीपीएस अधिनियम सूचना के आदान-प्रदान और नशीली दवाओं से संबंधित अपराधों की जांच और अभियोजन में अन्य देशों को सहायता के प्रावधान सहित मादक दवाओं और मनःप्रभावी पदार्थों के नियंत्रण और विनियमन में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्रदान करता है।

NDPS कानून मे मादक पदार्थो का मानक (Standard of drugs in NDPS Act)

NDPS (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस) अधिनियम भारत में एक दवा नियंत्रण कानून है। यह मादक दवाओं और मन:प्रभावी पदार्थों के निर्माण, कब्जे, उपयोग, बिक्री, आयात और निर्यात को परिभाषित और नियंत्रित करता है। अधिनियम इसके प्रावधानों के उल्लंघन के लिए सजा भी स्थापित करता है।

भारत सरकार ने अधिनियम की अनुसूचियों में सूचीबद्ध मादक दवाओं और मन:प्रभावी पदार्थों सहित विभिन्न पदार्थों के लिए मानक निर्धारित किए हैं। मानकों का उपयोग पदार्थों की शुद्धता और गुणवत्ता निर्धारित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि उनका दुरुपयोग न हो।

एनडीपीएस अधिनियम अधिनियम की अनुसूचियों में विभिन्न दवाओं के मानकों को निर्दिष्ट करता है, जो पदार्थ के दुरुपयोग की प्रकृति और क्षमता पर आधारित हैं। अनुसूचियों में पदार्थों को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, अनुसूची I पदार्थों के दुरुपयोग के लिए उच्चतम क्षमता और कोई स्वीकृत चिकित्सा उपयोग नहीं माना जाता है, और अनुसूची IV पदार्थों को दुरुपयोग और स्वीकृत चिकित्सा उपयोग के लिए कम क्षमता वाला माना जाता है।

एनडीपीएस अधिनियम की अनुसूची I में सूचीबद्ध कुछ पदार्थों में शामिल हैं:

  • अफीम और इसके डेरिवेटिव, जैसे कि मॉर्फिन और कोडीन
  • कोकीन
  • हेरोइन
  • एलएसडी (लाइसर्जिक एसिड डायथाइलैमाइड)
  • एक्स्टसी (एमडीएमए)

एनडीपीएस अधिनियम की अनुसूची II में सूचीबद्ध कुछ पदार्थों में शामिल हैं:

  • कैनबिस (मारिजुआना और हशीश)
  • एम्फ़ैटेमिन और मेथामफेटामाइन
  • बार्बीचुरेट्स

एनडीपीएस अधिनियम की अनुसूची III में सूचीबद्ध कुछ पदार्थों में शामिल हैं:

  • बेंजोडायजेपाइन (जैसे डायजेपाम और अल्प्राजोलम)
  • उपचय स्टेरॉयड्स

एनडीपीएस अधिनियम की अनुसूची IV में सूचीबद्ध कुछ पदार्थों में शामिल हैं:

  • ट्रामाडोल
  • टैपेंटाडॉल

संबंधित अधिकारियों से लाइसेंस या अनुमति के बिना इन पदार्थों का निर्माण, कब्जे, उपयोग, बिक्री, आयात या निर्यात करना अवैध है, और अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर कारावास और जुर्माना सहित गंभीर दंड हो सकता है।

एनडीपीएस अधिनियम यह निर्धारित करने के लिए कि क्या वे अधिनियम द्वारा निर्धारित मानकों को पूरा करते हैं, पदार्थों का विश्लेषण और परीक्षण करने के लिए प्रयोगशालाओं की स्थापना का भी प्रावधान करता है। कोई भी पदार्थ जो मानकों को पूरा नहीं करता है उसे एनडीपीएस अधिनियम के तहत प्रतिबंधित पदार्थ माना जाता है।

सजा का प्रावधान (Provision of Punishment)

भारत में एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सबस्टेंस) अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर कारावास और जुर्माना सहित गंभीर दंड हो सकता है। दंड की गंभीरता अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों पर निर्भर करती है, और कुछ वर्षों की जेल से लेकर आजीवन कारावास और भारी जुर्माने तक भिन्न हो सकती है।

  • एक नियंत्रित पदार्थ का कब्ज़ा: एक वैध लाइसेंस या नुस्खे के बिना एक नियंत्रित पदार्थ रखने के लिए जुर्माना न्यूनतम 10 साल की जेल से लेकर अधिकतम 20 साल की जेल तक हो सकता है, साथ ही जुर्माना भी।
  • नियंत्रित पदार्थ की खेती या उत्पादन: वैध लाइसेंस या अनुमति के बिना नियंत्रित पदार्थ की खेती या उत्पादन के लिए जुर्माने के साथ न्यूनतम 10 साल की जेल से अधिकतम 20 साल की जेल हो सकती है।
  • नियंत्रित पदार्थ की बिक्री, तस्करी या वितरण: नियंत्रित पदार्थ की बिक्री, तस्करी या वितरण के लिए जुर्माने के साथ न्यूनतम 10 साल की जेल से लेकर अधिकतम उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।
  • नियंत्रित पदार्थ का आयात या निर्यात: वैध लाइसेंस या अनुमति के बिना नियंत्रित पदार्थ का आयात या निर्यात करने के लिए जुर्माना के साथ न्यूनतम 10 साल की जेल से लेकर अधिकतम 20 साल तक की जेल हो सकती है।

धाराये-

एनडीपीएस एक्ट मे कुल 83 धाराये है, जिन्हे 6 अध्यायों मे बांटा गया है-

1- संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ (Short title, extent and commencement)

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 9 (ऐसे मजिस्ट्रेट, व्दारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया जिसे इस अधिनियम के अधीन सशक्त नही किया गया है) | Juvenile Justice Act Section 9 (Procedure to be followed by a Magistrate not empowered under this Act)

किशोर न्याय अधिनियम JJ Act (Juvenile Justice Act) की धारा -9 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। किशोर न्याय अधिनियम की धारा-9 मे मजिस्ट्रेट व्दारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया जिसे इस अधिनियम की अधीन सशक्त नही किया गया है, परिभाषित किया गया है।

ऐसे मजिस्ट्रेट, व्दारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया जिसे इस अधिनियम के अधीन सशक्त नही किया गया है-

(1) जब किसी मजिस्ट्रेट की जो इस अधिनियम के अधीन बोर्ड की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए सशक्त नहीं है, यह राय है कि वह व्यक्ति जिसके बारे में यह अभिकथन किया गया है कि उसने अपराध किया है, और उसके समक्ष लाया गया है, कोई बालक है तो वह ऐसी राय को अविलंब अभिलेखबद्ध करेगा और उस बालक को तत्काल ऐसी कार्यवाही के अभिलेख के साथ कार्यवाहियों पर अधिकारिता रखने वाले बोर्ड को भेजेगा।
(2) यदि वह व्यक्ति, जिसके बारे में यह अभिकथन किया गया है कि उसने अपराध किया है, बोर्ड से भिन्न किसी न्यायालय के समक्ष यह दावा करना है कि वह व्यक्ति बालक है या अपराध के किए जाने की तारीख को बालक था, या यदि न्यायालय की स्वयं यह राय है कि वह व्यक्ति अपराध के किए जाने की तारीख को बालक था, तो उक्त न्यायालय उस व्यक्ति की आयु की अवधारणा करने के लिए ऐसी जांच करेगा, ऐसा साक्ष्य लेगा जो आवश्यक हो (किन्तु शपथपत्र नहीं) और उस व्यक्ति की यथासंभव निकटतम आयु का कथन करते हुए मामले के निष्कर्ष अभिलिखित करेगा:
परन्तु ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय के समक्ष किया जा सकेगा और उसको किसी भी प्रक्रम पर मामले का अंतिम निपटारा हो जाने के पश्चात् भी, स्वीकार किया जाएगा और उस दावे का अवधारण इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों में अन्तर्विष्ट उपबंधों के अनुसार किया जाएगा, भले ही वह व्यक्ति इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख को या उससे पूर्व बालक न रह गया हो।
(3) यदि न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि किस व्यक्ति ने अपराध किया है और वह ऐसे अपराध के किए जाने की तारीख को बालक था, तो वह उस बालक को बोर्ड के पास, समुचित आदेश पारित करने के लिए भेजेगा और न्यायालय द्वारा पारित दंडादेश के, यदि कोई हो, बारे में यह समझा जाएगा कि उसका कोई प्रभाव नहीं है।
(4) यदि इस धारा के अधीन किसी व्यक्ति को, जब उस व्यक्ति के बालक होने के दावे की जांच की जा रही है, संरक्षात्मक अभिरक्षा में रखा जाना अपेक्षित है, तो उस व्यक्ति को उस अंतःकालीन अवधि में सुरक्षित स्थान में रखा जा सकेगा।

Procedure to be followed by a Magistrate not empowered under this Act-
(1) When a Magistrate not empowered to exercise the powers of the Board under this Act is of opinion that the person alleged to have committed an offense is, and is brought before child, he shall record such opinion without delay and forward the child forthwith to the Board having jurisdiction over the proceedings along with the record of such proceedings.
(2) If the person alleged to have committed the offense claims before any court other than the Board that the person is a child or was a child at the date of the commission of the offence, or if If the Court is of its own opinion that the person was a child on the date of the commission of the offence, the said Court shall make such inquiry as may be necessary to ascertain the age of the person, take such evidence (but not affidavit) as may be necessary, and shall record the findings of the case stating the age as near as possible:
Provided that any such claim may be preferred before any court and shall be admitted at any stage notwithstanding the final disposal of the case and the claim shall be determined in accordance with the provisions contained in this Act and the rules made thereunder. notwithstanding that such person has ceased to be a child on or before the date of commencement of this Act.
(3) If the Court finds that a person has committed an offense and was a child on the date of the commission of such offence, it shall refer the child to the Board for passing appropriate orders and the sentence passed by the Court shall, if any, be deemed to have no effect.
(4) If any person is required under this section to be kept in protective custody while the claim of that person to be a child is being investigated, that person may be kept in a place of safety during that interim period.

हमारा प्रयास किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act Section) की धारा 9 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 8 (बोर्ड की शक्तियां, कृत्य और उत्तरदायित्व) | Juvenile Justice Act Section 8 (Powers, Functions and Responsibilities of the Board)

किशोर न्याय अधिनियम JJ Act (Juvenile Justice Act) की धारा -8 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। किशोर न्याय अधिनियम की धारा-8 मे बोर्ड की शक्तियां, कृत्य और उत्तरदायित्व को परिभाषित किया गया है।

बोर्ड की शक्तियां, कृत्य और उत्तरदायित्व-

(1) तत्समय प्रवृत किसी अन्य विधि मे अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, और इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय किसी जिले के लिए गठित बोर्ड को विधि का उल्लंघन करने वाले बालकों के संबंध में इस अधिनियम के अधीन उस बोर्ड के अधिकारिता क्षेत्र में सभी कार्यवाहियों को अनन्य रूप से निपटाने की शक्ति होगी।
(2) इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन बोर्ड को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग उच्च न्यायालय और बालक न्यायालय द्वारा भी तब जब कार्यवाहियां अपील, पुनरीक्षण में या अन्यथा धारा 19 के अधीन उसके समक्ष आती है, किया जा सकेगा।
(3) बोर्ड के कृत्यों और उत्तरदायित्वों के अंतर्गत निम्नलिखित भी आएंगे-
(क) प्रक्रिया के प्रत्येक क्रम पर बालक और माता-पिता या संरक्षक की सूचनाबद्ध सहभागिता को सुनिश्चित करना;
(ख) यह सुनिश्चित करना कि बालक के अधिकारों की, बालक की गिरफ्तारी, जांच, पश्चातवर्ती देखरेख और पुनर्वासन की संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान, संरक्षा हो;
(ग) विधिक सेवा संस्थाओं के माध्यम से बालक के लिए विधिक सहायता की उपलब्धता सुनिश्चित करना;
(घ) बालक को बोर्ड, जब कभी आवश्यक हो, यदि वह कार्यवाहियों में प्रयुक्त भाषा को समझने में असमर्थ है. दुभाषिया या अनुवादक, जिसके पास ऐसी अर्हताएं और अनुभव हो. ऐसी फीस का, जो विहित की जाए, संदाय करने पर उपलब्ध कराएगा;
(ङ) परिवीक्षा अधिकारी या यदि परिवीक्षा अधिकारी उपलब्ध नहीं है तो बाल कल्याण अधिकारी या किसी सामाजिक कार्यकर्ता को मामले का सामाजिक अन्वेषण करने और सामाजिक अन्वेषण रिपोर्ट, उन परिस्थितियों को अभिनिश्चित करने के लिए, जिनमें अभिकथित अपराध किया गया था, उसके बोर्ड के समक्ष प्रथम बार बार पेश किए जाने की तारीख से पन्द्रह दिन की अवधि के भीतर प्रस्तुत करने का निदेश देना;
(च) विधि का उल्लंघन करने वाले बालकों के मामलों का धारा 14 में विनिर्दिष्ट जांच की प्रक्रिया के अनुसार न्यायनिर्णयन और निपटारा करना;
(छ) विधि का उल्लंघन करने के अभिकथित बालकों से, जिनके बारे में यह कथन किया गया है कि किसी प्रक्रम पर देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता है. संबंधित मामलों को, इसके द्वारा इस बात को मानते हुए कि विधि का उल्लंघन करने वाला बालक तत्समय देखरेख की आवश्यकता वाला बालक हो सकता है समिति और बोर्ड, दोनों के.. उसमें अन्तर्वलित होने की आवश्यकता है, समिति को अंतरित करना;
(ज) मामले का निपटारा करना और अंतिम आदेश पारित करना जिसके अन्तर्गत बालक के पुनर्वास के लिए व्यष्टिक देखरेख योजना भी है, जिसके अन्तर्गत परिवीक्षा अधिकारी या जिला बालक संरक्षण एकक या किसी गैर सरकारी संगठन के सदस्य द्वारा ऐसी अनुवर्ती कारवाई भी है जो अपेक्षित हो;
(झ) विधि का उल्लंघन करने वाले बालकों की देखरेख के बारे में, “योग्य व्यक्ति” घोषित करने के लिए जांच करना;
(ट) विधि का उल्लंघन करने वाले किसी बालक के विरुद्ध, इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य ञ विधि के अधीन कारित अपराधों के संबंध में, इस बारे में की गई किसी शिकायत पर प्रथम इतिला रिपोर्ट रजिस्टर करने का पुलिस को आदेश देना;
(ड) इस बात की जांच करने के लिए कि क्या वयस्कों के लिए बनी जेलों में कोई बालक डाला गया है, उन जेलों का नियमित निरीक्षण करना और ऐसे बालक को संप्रेक्षण गृह में स्थानांतरित किए जाने के तत्काल उपाय करना;

Powers, functions and responsibilities of the Board-
(1) Notwithstanding anything contained in any other law for the time being in force, and save as otherwise provided in this Act, the Board constituted for any district shall, in respect of children in conflict with law, shall have the power to exclusively dispose of all proceedings within the jurisdiction of the
(2) The powers conferred on the Board by or under this Act may also be exercised by the High Court and the Children's Court when proceedings come before it in appeal, revision or otherwise under section 19.
(3) The functions and responsibilities of the Board shall also include—
(a) ensuring the informed participation of the child and the parent or guardian at each stage of the process;
(b) ensuring that the rights of the child are protected throughout the process of arrest, investigation, aftercare and rehabilitation of the child;
(c) ensuring availability of legal aid to the child through legal service institutions;
(d) board the child, as and when necessary, if he is unable to understand the language used in the proceedings. Interpreter or translator, having such qualifications and experience. on payment of such fee as may be prescribed;
(e) the Probation Officer or, if the Probation Officer is not available, the Child Welfare Officer or a social worker to conduct a social investigation into the case and place the social investigation report before his Board to ascertain the circumstances in which the offense alleged was committed; Directing production within a period of fifteen days from the date of first production;
(f) adjudication and disposal of cases of children in conflict with law in accordance with the procedure for inquiry specified in section 14;
(g) children alleged to be in conflict with law, who are stated to be in need of care and protection at any stage. to transfer the concerned cases to the Committee, thereby recognizing that the child in conflict with law may for the time being be a child in need of care, requiring the involvement of both the Committee and the Board;
(h) disposal of the case and passing of final orders including individual care plan for rehabilitation of the child including such follow up action as may be required by the Probation Officer or the member of the District Child Protection Unit or any non-governmental organization; ;
(i) holding inquiries regarding care of children in conflict with law to be declared "fit persons";
(k) ordering the police to register a first information report on any complaint made in this regard in relation to offenses committed under this Act or any other law for the time being in force against any child in conflict with law;
(m) to carry out regular inspections of prisons meant for adults to check whether any child is lodged in those prisons and to take immediate steps to transfer such child to an observation home;

हमारा प्रयास किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act Section) की धारा 8 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

बीमा क्या है और कितने प्रकार के होते है? (What is insurance and how many types are there?) |बीमा अधिनियम भी जानेंगे। (Will also know the Insurance Act.)

बीमा (Insurance) उस साधन को कहते है, जहां किसी हानि या नुकसान को किसी दूसरे व्यक्ति पर व्यय किया जाना सुनिश्चित कर हम उस दूसरे व्यक्ति को कुछ शुल्क (प्रीमियम के रूप मे) देकर यह भार उस पर डाल सकते है, जिसे ही बीमा कहते है।

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बीमा की परिभाषा और अर्थ (Definition and Meaning of Insurance)

साधारण भाषा मे बीमा का अर्थ (Meaning of insurance in simple language) यह है- आने वाले खतरे से सुरक्षा करना यानि अपनी और प्रॉपर्टी की सुरक्षा करने का ऑपशन होता है, जिसे ही बीमा कहते है। बीमा (Insurance) एक लीगल एग्रीमेंट होता है, जो दोनों पक्षो (जैसे बीमा कराने वाला एवंम् बीमा करने वाली कम्पनी) के मध्य के निश्चित राशि (प्रीमीयम अदा करके) किसी जोखिम से मुक्ति पा सकते है, अर्थात् बीमा कराने वाले व्यक्ति को अगर किसी भी प्रकार से भविष्य मे होेने वाले नुकसान की भरपाई बीमा कम्पनी भरेगी।

बीमा एक तरह से एक अनुबन्ध पत्र है, बीमाकृत एवंम् बीमाकर्ता के बीच एक अनुबन्ध होता है, जिसे ही हम बीमा (Insurance) कहते है। बीमाकर्ता (insurer), बीमाकृत (Insured) से एक निश्चित रकम (प्रीमियम) के बदले किसी निश्चित घटना के घटित होने (जैसे कि एक निश्चित आयु की समाप्ति या मृत्यु की स्थिति में) एक निश्चित रकम देता है या फिर बीमाकृत की जोखिम से होने वाले वास्तविक हानि की क्षतिपूर्ति करता है।

बीमाकर्ता (Insurer)

बीमाकर्ता (Insurer) उस व्यक्ति, कम्पनी अथवा सांस्था को कहते है, जो कोई भविष्य निश्चित अवधि मे होने वाले जोखिम को स्वीकार करता है, और उस जोखिम का वित्तीय निस्तारण एक निश्चित अवधि मे करता है। बीमाकर्ता को ‘बीमा कंपनी’ भी कहा जाता है।

बीमाकर्ता एक बीमा एग्रीमेंट में वह पक्ष है जो मुआवजे का भुगतान करने का वादा करती है । बीमाकर्ता एक इकाई है, आमतौर पर एक बीमा कंपनी है, जो बीमित जोखिम को कम करती है। इसके विपरीत, बीमित एक व्यक्ति या संगठन है जिसका जीवन, स्वास्थ्य या संपत्ति बीमा पॉलिसी द्वारा कवर की जाती है।

बीमाकृत (Insured)

बीमाकृत (Insured) उस व्यक्ति, कम्पनी या सांस्था को कहते है, जिसने भविष्य होने वाली आपदा से बचने के लिये अपनी लाइफ, अपना घर एवंम् अपनी कम्पनी को जोखिम होने की स्थिति से बचने के लिये बीमा लिया हुआ है, जिसे ही बीमाकृत व्यक्ति (Insured Person) या बीमाकृत (Insured) कहते है।

बीमाकृत एक बीमा एग्रीमेंट मे वह पक्ष होता है, जो मुआवजा पाने का हकदार होता है, बीमाकृत व्यक्ति जिसके साथ एक निश्चित अवधि मे उसके या उसके परिवार अथवा सम्पत्ति मे किसी भी प्रकार से कोई हानि हो जाती है, तो बीमा उस व्यक्ति को एक राशि प्रदान कर वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

बीमा कितने प्रकार के होते हैं? (How many types of insurance are there?)

बीमा (Insurance) के मुख्यताः तीन प्रकार से होते है, लेकिन धीरे-धीरे भारत मे बहुत से नये बीमा भी शामिल हो रहे है, जिन्हे इस लेख मे अन्य बीमा मे शामिल किया गया है, जो निम्नप्रकार है-

  1. जीवन बीमा (Life Insurance)
  2. दुर्घटना बीमा (Accident Insurance)
  3. सामान्य बीमा (General Insurance)
    • स्वास्थ बीमा (Health Insurance)
    • मोटर वाहन बीमा (Motor Vehicle Insurance)
    • अग्नि बीमा (Fire Insurance)
    • गृह बीमा (Home Insurance)
    • यात्रा बीमा (Travel Insurance)
    • फसल बीमा (Crop Insurance)

1. जीवन बीमा (Life Insurance)

जीवन बीमा (Life Insurance) भारत मे प्रत्येक व्यक्ति को लेना आवश्यक होता है, क्योकि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन जोखिम भरा हुआ है, साथ ही जीवन बीमा लेने पर व्यक्ति के परिवार जनों पर भविष्य मे पड़ने वाली आर्थिक मार पर सहायता मिलती है, इसके अलावा यदि कोई व्यक्ति अपने एवंम् अपने परिवार के लिये जीवन बीमा एक निश्चित अवधि एवंम् निश्चित राशि के लिये बीमा कम्पनी को कुछ राशि (प्रीमियम) देने के पश्चात् जीवन बीमा कवर होता है, यह बीमा एक निश्चित आयु अथवा किसी व्यक्ति आकस्मिक मृत्यु हो जाने पर बीमित व्यक्ति के परिवार जन को भविष्य मे होने वाली आर्थिक मार पर भी सहायता करता है।

2. दुर्घटना बीमा (Accident Insurance)

दुर्घटना बीमा (Accident Insurance) भी आज के दौर मे प्रत्येक व्यक्ति को लेना आवश्यक है, क्योकि जो व्यक्ति अपनी और अपने परिवार के भविष्य को लेकर चिन्तित है, कि आज वह है और अगर कल को अगर दुर्घटना हो जाती है, और जान चली जाती या अपंग हो जाता है, तो परिवार जन का क्या होगा, कैसे आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाये। यह बीमा बीमित व्यक्ति को भविष्य मे होने वाली आकस्मिक दुर्घटना होने पर सुरक्षा प्रदान करती है, यह बीमा जीवन बीमा से कम मूल्य पर होता है यह एक निश्चित राशि जीवन बीमा से बहुत कम (प्रीमियम) देकर जीवन भर देते हुये यह बीमा ले सकते है, जो बीमित व्यक्ति के परिवार जनो को होेने वाली भविष्य दुर्घटना मे आर्थिक सहायता प्रदान करेगीं।

3. सामान्य बीमा (General Insurance)

सामान्य बीमा (General Insurance) भी कई प्रकार से भविष्य मे पड़ने वाली आर्थिक मार से बचाता है। इसके अलावा कई बार कोई व्यक्ति अपने भविष्य के लिये घर, व्यापार, खेती के लिये काफी मात्रा मे धन व्यय करता है, लेकिन किसी प्राकृतिक जैसी समस्याओं के चलते नुकसान हो जाता है, तो ऐसे जोखिम को सुरक्षित करने के लिये बीमा का सहारा लिया जा सकता है, जिसमे कोई भी अपनी चल सम्पत्ति (वाहन), अचल सम्पत्ति (घर/दुकान), स्वास्थ, आग लग जाना, यात्रा के दौरान होने वाली आपदा और किसानों के लिये फसल नुकसान जैसी होने प्राकृतिक आपदाओ के लिये भी यह बीमा लिया जा सकता है, जो आपके आने वाले भविष्य के लिये लाभदायी होगा।

3.1 स्वास्थ बीमा (Health Insurance)

यह बीमा कोई व्यक्ति अपने या अपने परिवार के लिये भविष्य मे आने वाले बीमारियों से लड़ने के लिये आर्थिक मार से सुरक्षा देते है, आजकल सभी जानते है कि भारत देश मे चिकित्सा क्षेत्र मे बहुत सारा धन व्यय होता है, यदि किसी माध्यम वर्गीय परिवार मे कोई बीमारी से गृसित हो जाता है, तो बहुत सारा धन केवल चिकित्सा मे ही व्यय हो जाता है, माध्यम वर्गीय परिवार यह व्यय उठाने मे सक्षम नही होते है, इसलिये यह स्वास्थ बीमा (Health Insurance) भी बहुत जरूरी है।

3.2 मोटर वाहन बीमा (Motor Vehicle Insurance)

मोटर वाहन बीमा (Motor Vehicle Insurance) वैसे तो हमारे भारत मे जिनके पास भी मोटर वाहन है, उनको मोटर वाहन बीमा कराना अनिवार्य है। इसमे वाहन चोरी हो जाने, एक्सीडेन्ट हो जाने, वाहन मे किसी प्रकार का नुकसान हो जाने वाली भरपाई को कवर करता है। इसके अलावा यदि किसी वाहन से किसी व्यक्ति को चोट लग जाने अथवा किसी मृत्यु हो जाने तक की भरपाई भी यह मोटर वाहन बीमा कवर करता है।

3.3 अग्नि बीमा (Fire Insurance)

अग्नि बीमा (Fire Insurance) वैसे तो यह बीमा आम तौर पर हर व्यक्ति लेता नही लेता है, जिसे अपनी फैक्ट्री या घर मे आग लगने के जोखिम से सुरक्षा रखने के लिये लिया जाता है। यह बीमा घर या फैक्ट्री जहां आग लगने का जोखिम उठाने के लिये होता है, जहां आग लगना हो सकता है, वह इस बीमा का लाभ ले सकता है और भविष्य मे होने वाली जोखिम से बचा जा सकता है।

3.4 गृह बीमा (Home Insurance)

गृह बीमा (Home Insurance) भी वैसे चलन मे काफी बढ़ गया है, क्योकि घर के निर्माण के लिये काफी लम्बा पैसा या काफी वक्त देने के बाद यदि घर को प्राकृतिक आपदा या किसी भी प्रकार से कोई तोड़ फोड़ होती है, तो यदि घर की बीमा होगा, तो ड़रने की जरूरत उतनी नही होगी। घर जैसे समस्या का जोखिम उठाने के लिये भी आप गृह बीमा (Home Insurance) करा सकते है, जिसके तहत भविष्य मे किसी भी प्रकार से घर मे होने वाली आपदा के लिये सुरक्षित होंगे।

3.5 यात्रा बीमा (Travel Insurance)

यात्रा बीमा (Travel Insurance) यह बीमा आमतौर पर यदि किसी यात्रा के दौरान किसी व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार से अनहोनी होती है, तो यह बीमा व्यक्ति एवंम् व्यक्ति के परिजनों को अर्थिक मदद् कवर करता है, यह बीमा यात्रा दौरान हम सभी को आवश्य लेना चाहिये। इसके अलावा प्रत्येक व्यक्ति जो यात्रा कर रहा होता है, उसके परिवार को होने वाली अनहोनी से आर्थिक सुरक्षा मिलती है।

3.6 फसल बीमा (Crop Insurance)

फसल बीमा (Crop Insurance) प्रत्येक किसान को लेना चाहिये, क्योकि किसान अपनी फसल को उगाने के लिये अधिकांशतः लोन जैसे साधनो का ही उपयोग करता और कभी कभी प्राकृतिक आपदा जैसी स्थिति मे अपनी लागत पूंजी को बचाने के लिये अपनी फसल का बीमा करा सकता है, जिसके तहत वह व्यक्ति यदि किसी उसके साथ फसल को लेकर किसी भी प्रकार से आपदा होती है, तो आर्थिक मदद् मिलेगी। फसल बीमा प्राकृतिक आपदा अग्नि के कारण फसल नष्ट हो जाना या बारिश के कारण फसल नष्ट हो जाने जैसी तमाम कारणों को पूर्ण करती है और किसान को अर्थिक जोखिम मे मदद् करती है।

बीमा का मुख्य उद्देश्य क्या है? (What is the main purpose of insurance?)

बीमा का मुख्य उद्देश्य बीमाकृत और बीमाकृता के मध्य हुयी लीगल एग्रीमेंट को सही ढंग एवंम् सही तरीके एवंम् सही समय पर हुये बीमा का जोखिम उठाना आवश्यक होता है। बीमा आपको और आपके परिवार को विभिन्न जोखिमों से बचाता है जो अन्यथा आपको या आपके परिवार को वित्तीय संकट में डाल सकते हैं। बीमा पॉलिसियों का उपयोग ऋण के लिए संपार्श्विक के रूप में किया जा सकता है। जब गृह ऋण की बात आती है, तो बीमा कवरेज होने से ऋणदाता से ऋण प्राप्त करना आसान हो जाता है। यह भी बीमा कराने से लाभ होता है, इसके अलावा बीमित व्यक्ति अथवा बीमित सम्पत्ति का जोखिम उठाने के लिये ही बीमा को लिया जाता है।

बीमा का उद्देश्य किसी बीमित व्यक्ति का संरक्षण एवंम् सुरक्षा, सामूहिक जोखिम, जोखिम आकलन एवंम् भुगतान की निश्चितता को सरल बनाने के साथ साथ भविष्य मे होने वाली आर्थिक हानि से बचने एवंम् बचाने के लिये एग्रीमेंट को जानना आवश्यक होगा। इसी एग्रीमेंट के आधार पर ही बीमित व्यक्ति या उसके परिवार को लाभ मिलेगा। इसके अलावा बीमित व्यक्ति को होने वाली समस्त जोखिम को कवर करना एवंम् बीमित व्यक्ति पर आने वाले संकट से बीमित व्यक्ति के परिवार की आर्थिक सहायता करना होता है।

बीमा कराने के बीमित व्यक्ति को आयकर मे छूट, ऋण लेने मे आसानी इसके अलावा बीमित व्यक्ति के परिवार जन भविष्य मे आने वाली अनेक संकटो से आर्थिक मदद् भी मिलेगी।

बीमा अधिनियम क्या है? (What is Insurance Act?)

बीमा अधिनियम (Insurance Act) बीमाकृता एवंम् बीमाकृत के मध्य लीगल एग्रीमेंट के माध्यम से कानूनी समझौता है जिसे बीमा कंपनी बीमाधारक को कवर की गई आकस्मिकता के कारण हुए किसी भी नुकसान के लिए क्षतिपूर्ति करने की गारंटी देती है। वैसा बीमा एक व्यवसाय है, जो समाजिक सहायता के साथ साथ व्यवसायिक भी है, इस लिये बीमा अधिनियम 1938 बनाया गया जिसमे समय समय पर कई बदलाव भी किये गये है। यह अधिनियम बीमाकृता एवंम् बीमाधारक के मध्य हुयी बीमित विवाद का निस्तारण करने के लिये बनाया गया है बीमा अधिनियम मे 5 अध्याय और 123 धाराये है, जो निम्नलिखित है-

1- संक्षिप्त शीर्षक, विस्तार और प्रारंभ (Short title, extent, and commencement.)

2- परिभाषाएं (Definitions)

2A- कुछ शब्दों और अभिव्यक्तियों की व्याख्या (Interpretation of certain words and expressions)

2B- बीमा नियंत्रक की नियुक्ति (Appointment of Controller of Insurance)

2C- कुछ व्यक्तियों द्वारा बीमा कारोबार के लेन-देन का निषेध (Prohibition of transaction of insurance business by certain persons)

2CA- इस अधिनियम के उपबन्धों विशेष आर्थिक जोन को लागू करने के लिए केंद्र सरकार की शक्ति (Power of Central Government to apply provisions of this Act to Special Economic Zones)

2CB- भारत में संपत्तियों का प्राधिकरण की अनुज्ञा के सिवाय विदेशी बीमाकर्ताओं द्वारा बीमाकृत न किया जाना (Properties in India not to be insured with foreign insurers except with the permission of
Authority)

2D- बीमाकर्ता इस अधिनियम के अधीन होंगे जबकि देनदारियां असंतुष्ट रहती हैं (Insurers to be subject to this Act while liabilities remain unsatisfied)

2E- [विलोपित (Omitted)]

3- रजिस्ट्रीकरण (Registration)

3A- बीमाकर्ता द्वारा वार्षिक फीस का संदाय (Payment of annual fee by insurer)

3B- जीवन बीमा कारबार के निबन्धनों के ठीक होने का प्रमाणन (Certification of soundness of terms of life insurance business)

4- जीवन बीमा पालिसियों द्वारा प्रतिभूत वार्षिकियों और अन्य प्रसुविधाओं के लिए न्यूनतम सीमाएं (Minimum limits for annuities and other benefits secured by policies of life insurance)

5- बीमाकर्ता के नाम के बारे में निर्बन्धन (Restriction on name of insure)

6- पूंजी के संबंध में अपेक्षा (Requirements as to capital)

6A– पूंजी संघटन तथा मतदान अधिकारों और शेयरों के हिताधिकारी स्वामियों के रजिस्टर रखने से संबंधित अपेक्षाएं (Requirements as to capital structure and voting rights and maintenance of registers beneficial owners of shares)

6AA- [विलोपित (Omitted)]

6ख- पूंजी संघटन संबंधी अपेक्षाओं का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए उपबन्ध (Provision for securing compliance with requirements relating to capital structure)

6C [विलोपित (Omitted)]

7- [विलोपित (Omitted)]

8- [विलोपित (Omitted)]

9- [विलोपित (Omitted)]

10- खातों और निधियों का पृथक्करण (Separation of accounts and funds)

11- लेखा और तुलनपत्र (Accounts and balance-sheet)

12- लेखापरीक्षा (Audit)

13-  बीमांकिक रिपोर्ट और संक्षिप्तियां (Actuarial report and abstract)

14- पालिसियों और दावों का अभिलेख (Record of policies and claims)

15- विवरणियों का दिया जाना (Submission of returns)

16- [विलोपित (Omitted)]

17- [विलोपित (Omitted)]

17A- [विलोपित (Omitted)]

18- रिपोर्टों का दिया जाना (Furnishing reports)

19- साधारण अधिवेशनों की कार्यवाही की संक्षिप्ति  (Abstract of proceedings of general meetings)

20- दस्तावेजों की अभिरक्षा और निरीक्षण तथा प्रतियों का दिया जाना (Custody and inspection of documents and supply of copies)

21- विवरणियों के सम्बन्ध में नियंत्रक की शक्तियां (Powers of Authority regarding returns)

22- पुनर्मूल्यांकन के लिए आदेश करने की नियंत्रक की शक्ति (Powers of Authority to order revaluation)

23- दस्तावेजों का साक्ष्य (Evidence of documents)

24- [विलोपित (Omitted)]

25- विवरणियों का कानूनी प्ररूपों में प्रकाशित किया जाना (Returns to be published in statutory forms)

26- रजिस्ट्रीकरण के आवेदन के साथ दी गई विशिष्टियों में परिवर्तनों का रिपोर्ट किया जाना  (Alterations in the particulars furnished with application for registration to be reported)

27- आस्तियों का विनिधान (Investment of Assets)

27A- विनिधानों के संबंध में अतिरिक्त उपबंध (Further Provisions regarding Investments)

27B- साधारण बीमा कारबार करने वाले बीमाकर्ता की आस्तियों के विनिधानों के संबंध में उपबंध (Provisions regarding investments of assets of insurer carrying general insurance business)

27C- कतिपय मामलों में बीमाकर्ता द्वारा विनिधान (Investment by insurer in certain cases)

27D- विनिधान की रीति और शर्तें (Terms and Conditions of Investment)

27E- भारत के बाहर निधियों के विनिधान के लिए प्रतिषेध (Prohibition on investment of funds outside India)

28- आस्तियों के विनिधान का विवरण और विवरणी (Statement and return of investment of assets)

29- उधारों का प्रतिषेध (Prohibition of loans)

30- धारा 27, धारा 27धारा 27धारा 27धारा 27 या धारा 29 के उल्लंघनों के कारण हुई हानि के लिए निदेशकोंआदि का दायित्व (Liability of directors, etc., for loss due to contravention of section 27, 27A, 27B, 27C, 27D or section 29)

31- बीमाकर्ता की आस्तियों को किस प्रकार रखा जाएगा (Assets of insurer how to be kept)

31A- प्रबंधकों आदि से सम्बन्धित उपबन्ध (Provisions related to managers etc. Provisions related to managers etc.)

32- [विलोपित (Omitted)]

32A- सम्मिलित अधिकारियों का प्रतिषेध तथा पूर्णकालिक अधिकारियों सम्बन्धी अपेक्षा (Prohibition of common officers and requirement as to whole-time officers)

32B- ग्रामीण और सामाजिक सेक्टर में बीमा कारबार (Insurance business in rural and social sectors)

32C- ग्रामीण या असंगठित सेक्टर और पिछड़े वर्गों के संबंध में बीमाकर्ता की बाध्यताएं (Obligations of insurer in respect of rural or unorganised sector and backward classes)

32D- मोटरयान के अन्य पक्षकार जोखिम में बीमा कारबार के संबंध में बीमाकर्ता की बाध्यता (Obligation of insurer in respect of insurance business in third party risks of motor vehicles)

33- प्राधिकरण द्वारा अन्वेषण और निरीक्षण की शक्ति (Power of investigation and inspection by Authority)

33A- कर्मचारिवृन्द नियुक्त करने की शक्ति (Power to appoint staff)

34- निदेश देने की नियन्त्रक की शक्ति (Power of the Authority to issue directions)

34A- प्रबन्ध निदेशकों आदि की नियुक्ति सम्बन्धी उपबन्धों के संशोधन के लिए नियंत्रक का पूर्वानुमोदन आवश्यक होना (Amendment of provisions relating to appointments of managing directors, etc., to be subject to previous approval of the Controller)

34B- प्रबन्धकार व्यक्तियों को उनके पद से हटा देने की नियंत्रक की शक्ति (Power of Authority to remove managerial persons from office)

34C- अपर निदेशक नियुक्त करने की नियंत्रक की शक्ति (Power of Authority to appoint additional directors)

34D- धारा 34 और 34 का अन्य विधियों पर अध्यारोही होना (Sections 34B and 34C to override other laws)

34E- नियंत्रक की अपर शक्तियां (Additional powers of the controller)

34F- पुनर्बीमा करार आदि के बारे में निदेश देने की नियंत्रक की शक्ति (Power of Authority to issue directions regarding re-insurance treaties, etc)

34G- प्राधिकरण की विदेशी शाखाओं को बंद करने का आदेश देने की शक्ति (Power of Authority to order closure of foreign branches)

34H- तलाशी और अभिग्रहण (Search and seizure)

35- बीमा कारबार का समामेलन और अंतरण (Amalgamation and transfer of insurance business)

36- प्राधिकरण द्वारा समामेलन और अन्तरण की मंजूरी (Sanction of amalgamation and transfer by Controller)

37- समामेलन और अंतरण के पश्चात् अपेक्षित विवरण (Statements required after amalgamation and transfer)

37A- समामेलन की स्कीम तैयार करने की नियंत्रक की शक्ति (Power of Authority to prepare Scheme of Amalgamation)

38- बीमा पालिसियों का समनुदेश और अन्तरण (Assignment and transfer of insurance policies)

39- पालिसीधारी द्वारा नामनिर्देशन (Nomination by policy-holder)

40- बीमा कारबार उपाप्त करने के लिए कमीशन के रूप में या अन्यथा संदाय का प्रतिषेध (Prohibition of payment by way of commission or otherwise for procuring business)

40A- [विलोपित (Omitted)]

40B- जीवन बीमा कारबार में प्रबंध व्ययों की परिसीमा (Limitation of expenses of management in life insurance business)

40C- साधारणस्वास्थ्य बीमा और पुनर्बीमा कारबार में प्रबंध व्ययों की परिसीमा (Limitation of expenses of management in general insurance business)

41- रिबेट विषयक प्रतिषेध (Prohibition of rebates)

42- बीमा अभिकर्ताओं की नियुक्ति (Appointment of insurance agents)

42A- प्रधान अभिकर्ताविशेष अभिकर्ता के माध्यम से बीमा कारबार और बहुस्तरीय विपणन का प्रतिषेध (Prohibition of insurance business through principal agent, special agent and multilevel marketing)

42D- मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती को रजिस्ट्रीकरण जारी करना (Issue of registration to intermediary or insurance intermediary)

42E- मध्यवर्ती या बीमा मध्यस्थ को देय कमीशन, दलाली या शुल्क के लिए शर्त (Commission, brokerage or fee payable to intermediary or insurance intermediary)

43- बीमा अभिकर्ताओं का अभिलेख (Register of insurance agents)

44- [विलोपित (Omitted)]

44A- जानकारी मांगने की शक्ति (Power to call for information)

45- अशुद्ध कथन के आधार पर किसी पालिसी पर तीन वर्ष के पश्चात् आक्षेप  किया जाना (Policy not to be called in question on ground of mis-statement after two years)

46- भारत में निर्गमित पालिसियों को भारत में प्रवृत्त विधि का लागू होना (Application of the law in force in India to policies issued in India)

47- न्यायालय में धन का संदाय किया जाना (Payment of money into Court)

47A- [विलोपित (Omitted)]

48- [विलोपित (Omitted)]

48A- बीमा अभिकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती का बीमा कंपनी में निदेशक  होना (Insurance agent or intermediary or insurance intermediary not to be director in insurance company)

48B- निदेशकों के सम्बन्ध में अतिरिक्त उपबन्ध (Further provision regarding directors)

48C- [विलोपित (Omitted)]

49- लाभांशों और बोनसों पर निर्बन्धन (Restriction On dividends and bonuses)

50- पालिसी के व्यपगत होने पर उपलब्ध विकल्पों की बीमाकृत को सूचना (Notice of options available to the assured on the lapsing of a policy)

वित्तीय वर्ष 2017-18 एवंम् 2018-2019 के लिये जीएसटी आर-2ए मिलान के लिये नयी गाइडलाइन जारी

GST (ITC Updation): GSTR-2A के मिलान हेतु कमिंयों और विसंगतियों को ध्यान मे रखते हुये वित्तीय वर्ष 2017-18 एवंम् 2018-19 के लिये नयी गाइडलाइन परिपत्र सं0 183 दिनांक 27 दिसम्बर 2022 जारी किया है परिपत्र के अनुसार जीएसटी करदाताओ को आईटीसी का मिलान जीएसटीआर-2 मे इनवायस न दिखाये जाने पर राहत दी है, कहा है कि किसी पंजीकृत करदाता व्दारा भूलवश जीएसटीआर-1 के B2B कॉलम मे नही भरा गया है या किसी अन्य कॉलम मे भर दिया गया है, लेकिन नियमाुसार उस सप्लाई पर समय से कर का भुगतान किया गया है, तो भी प्राप्तकर्ता को उस इनवायस का लाभ मिलेगा। इसके अलावा जारी परिपत्र के अनुसार सीजीएसटी एक्ट मे इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) प्राप्त करने के लिये पात्रता एवंम् शर्तो का प्रावधान किया गया है, जो निम्नप्रकार है-

GSTR-2A will not be effective for the year 2017-18 and 2018-19 in GST-

01- जहां जीएसटी करदाता कर अवधि के लिए फॉर्म जीएसटीआर-1 दाखिल करने में विफल रहा है, लेकिन उक्त  अवधि के लिए फॉर्म जीएसटीआर-3बी में समस्त बिलों पर कर का भुगतान किया है, जिसके कारण उक्त अवधि में की गई आपूर्ति प्राप्तकर्ताओ को फॉर्म जीएसटीआर-2A में नहीं दिखायी देती है।
02- जहां जीएसटी करदाता कर अवधि के लिए फॉर्म जीएसटीआर-1 के साथ-साथ फॉर्म जीएसटीआर-3बी में रिटर्न दाखिल किया है, लेकिन फॉर्म जीएसटीआर-1 में कुछ इनवायसो को दर्ज करने में विफल रहा है, जिसके कारण उक्त आपूर्ति प्राप्तकर्ताओ को फॉर्म जीएसटीआर-2A में नही दिखायी देती हैैै।
03- जहां जीएसटी करदाता ने टैक्स अवधि के लिए फॉर्म जीएसटीआर-1 के साथ-साथ फॉर्म जीएसटीआर-3बी में रिटर्न दाखिल किया है, लेकिन उसने फॉर्म जीएसटीआर-1 में प्राप्तकर्ता के गलत जीएसटीआईएन के साथ दिखाया गया है।
04- जहां कोई सप्लाई पंजीकृत करदाता को की गई थी और प्राप्तकर्ता के GSTIN वाले CGST नियमों के नियम 46 के अनुसार चालान जारी किया गया था, लेकिन करदाता ने अपने फॉर्म GSTR-1 में, B2B आपूर्ति के बजाय B2C आपूर्ति के रूप में उक्त आपूर्ति की गलत सूचना दी है, जिस पर कथित आपूर्ति उक्त पंजीकृत व्यक्ति के फॉर्म जीएसटीआर-2ए में नहीं दिखायी देे रही है।

जीएसटी मे रिर्टन भरते समय किसी पंजीकृत करदाता व्दारा किसी सप्लाई को भूलवश गलत कॉलम मे भर दिया गया है, B2B के कॉलम के स्थान पर B2C कॉलम मे भर दिया गया है अथवा गलत जीएसटीएन मे भर दिया है , जिसके फलस्वरूप उपरोक्त सप्लाई प्राप्तकर्ता के जीएसटीआर-2A मे नही दिखायी दे रहा है। इस अन्तर के सम्बन्ध मे वित्तीय वर्ष 2017-18 एवंम् 2018-19 मे सीजीएसटी सीबीआईसी व्दारा एक परिपत्र जारी किया, जिसमे उपरोक्त कारणों के आधार पर किसी पंजीकृत करदाता को इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का लाभ दिया जाना होगा। वित्तीय वर्ष 2017-18 एवंम् 2018-19 के लिये जीएसटीआर-2A का मिलान जरूरी नही होगा।

यह अंतर के कारण पंजीकृत करदाताओ को कर निर्धारण अधिकारी व्दारा पुनः कर जमा कराये जाने की मांग को लेकर CBIC ने यह बदलाव वित्तीय वर्ष 2017-18 एवंम् 2018-2019 मे किया है, लेकिन अंतर का कारण पंजीकृत करदाता को यह प्रमाणित करना आवश्यक होगा कि सप्लायर व्दारा उपरोक्त इनवायसों पर नियमानुसार कर का भुगतान किया गया है, तभी लाभ दिया जा सकेगा।

GSTR-2A के अनुसार उपलब्ध ITC केंद्रीय माल और सेवा कर नियम, 2017 के नियम 36(4) के तहत प्रदान किया गया था, इसके बाद “CGST नियम” के रूप में संदर्भित) केवल 9 अक्टूबर 2019 से प्रभावी था। हालाँकि, ITC की उपलब्धता अधीन थी 1 जुलाई, 2017 से ही सीजीएसटी अधिनियम की धारा 16 में निर्दिष्ट प्रतिबंधों और शर्तों के लिए। इसे देखते हुए विभिन्न पंजीकृत करदाताओ द्वारा फॉर्म जीएसटीआर-3बी में प्राप्त आईटीसी की राशि और उनके फॉर्म जीएसटीआर में उपलब्ध राशि के बीच इस तरह की विसंगतियों से निपटने के तरीके के बारे में स्पष्टीकरण की मांग करते हुए व्यापार के साथ-साथ कर अधिकारियों से अभ्यावेदन प्राप्त हुए हैं। जिसमे वित्तीय वर्ष 2017-18 और 2018-19 के दौरान 2A प्रभावी नही माना गया है।

करनिर्धारण अधिकारी पहले पंजीकृत करदाता से उन सभी चालानों के बारे में विवरण मांगेगा जिन पर पंजीकृत करदाता ने अपने फॉर्म GSTR 3B में ITC का लाभ उठाया है, लेकिन जो उनके फॉर्म GSTR 2A में नहीं दिख रहे हैं। उसके बाद वह उक्त पंजीकृत व्यक्ति द्वारा ऐसे चालानों पर प्राप्त इनपुट टैक्स क्रेडिट के संबंध में सीजीएसटी अधिनियम की धारा 16 की निम्नलिखित शर्तों की पूर्ति सुनिश्चित करने के पश्चात् ही प्राप्तकर्ता को लाभ मिल सकेगा।

  • सप्लाई के सम्ब्ध मे इनवायस की कॉपी/डेबिट क्रेडिट नोट अथवा कर भुगतान किये गये चालान की कॉपी।
  • सप्लाई एवंम् सर्विस दोनो के लिये मान्य होंगे।
  • सप्लाई एवंम् सर्विस के मामले मे प्राप्तहुये माल एवंम् सर्विस सम्बन्धी भुगतान के दस्तावेज, इनवायस एवंम् बिल्टी की कॉपी जैसे दस्तावेज कर अधिकारी मांग सकते है।
  • इसके 5 लाख से अधिक सप्लाई के लिये चार्टेड एकाउन्टेट का प्रमाणपत्र संलग्न करना होगा और 5 लाख के अन्दर की सप्लाई मे सप्लायर व्दारा प्रमाणपत्र संलग्न करना होगा।

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 7 (बोर्ड के संबंध में प्रक्रिया) | Juvenile Justice Act Section 7 (Procedure in relation to Board)

किशोर न्याय अधिनियम JJ Act (Juvenile Justice Act) की धारा -7 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। किशोर न्याय अधिनियम की धारा-7 मे किशोर न्याय बोर्ड के सम्बन्ध मे प्रक्रिया को परिभाषित किया गया है।

किशोर न्याय अधिनियम की धारा- 7 हिन्दी एवंम् अग्रेंजी मे

बोर्ड के संबंध में प्रक्रिया-

(1) बोर्ड ऐसे समय पर बैठक करेगा और अपनी बैठकों में व्यापार के संचालन के संबंध में ऐसे नियमों का पालन करेगा, जैसा कि निर्धारित किया जा सकता है और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी प्रक्रियाएं बच्चों के अनुकूल हैं और यह स्थान बच्चे को भयभीत नहीं कर रहा है और नियमित अदालतों के समान नहीं है।
(2) कानून का उल्लंघन करने वाले बच्चे को बोर्ड के किसी एक सदस्य के समक्ष पेश किया जा सकता है, जब बोर्ड की बैठक नहीं हो रही हो।
(3) बोर्ड के किसी भी सदस्य की अनुपस्थिति के बावजूद एक बोर्ड कार्य कर सकता है, और बोर्ड द्वारा पारित कोई भी आदेश कार्यवाही के किसी भी चरण के दौरान किसी भी सदस्य की अनुपस्थिति के कारण अमान्य नहीं होगा: बशर्ते कि कम से कम दो हों मामले के अंतिम निपटारे के समय या धारा 18 की उप-धारा (3) के तहत आदेश देने के समय उपस्थित प्रधान मजिस्ट्रेट सहित सदस्य।
(4) अंतरिम या अंतिम निपटान में बोर्ड के सदस्यों के बीच किसी भी मतभेद की स्थिति में, बहुमत की राय प्रबल होगी, लेकिन जहां ऐसा बहुमत नहीं है, प्रधान मजिस्ट्रेट की राय मान्य होगी।


Procedure in relation to Board-

(1) The Board shall meet at such times and shall observe such rules in regard to the transaction of business at its meetings, as may be prescribed and shall ensure that all procedures are child friendly and that the venue is not intimidating to the child and does not resemble as regular courts.
(2) A child in conflict with law may be produced before an individual member of the Board, when the Board is not in sitting.
(3) A Board may act notwithstanding the absence of any member of the Board, and no order passed by the Board shall be invalid by the reason only of the absence of any member during any stage of proceedings: Provided that there shall be atleast two members including the Principal Magistrate present at the time of final disposal of the case or in making an order under sub-section (3) of section 18.
(4) In the event of any difference of opinion among the members of the Board in the interim or final disposal, the opinion of the majority shall prevail, but where there is no such majority, the opinion of the Principal Magistrate, shall prevail.

हमारा प्रयास किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act Section) की धारा 7 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।