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मोटर वाहन अधिनियम की धारा 157 | बीमा के प्रमाणपत्र का अंतरण | MV Act, Section- 157 in hindi | Transfer of certificate of insurance.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए मोटर वाहन अधिनियम की धारा 157 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 157, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 157 का विवरण

मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) की धारा -157 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस अध्याय के आधीन जहां व्यक्ति जिसके पक्ष में इस अध्याय के उपबंधों के अनुसार बीमा प्रमाणपत्र जारी किया गया है, ऐसे मोटर यान का स्वामित्व, जिसकी बाबत ऐसा बीमा उससे संबंधित बीमा पालिसी के साथ अन्य व्यक्ति को अंतरित करता है, बीमा प्रमाणपत्र और प्रमाणपत्र में वर्णित पालिसी ऐसे व्यक्ति, जिसको मोटरयान अंतरित किया जाता है के पक्ष में उसके स्थानांतरण की तारीख से अंतरित की गई समझी जाएगी।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 157 के अनुसार

बीमा के प्रमाणपत्र का अंतरण-

(1) जहां व्यक्ति जिसके पक्ष में इस अध्याय के उपबंधों के अनुसार बीमा प्रमाणपत्र जारी किया गया है, ऐसे मोटर यान का स्वामित्व, जिसकी बाबत ऐसा बीमा उससे संबंधित बीमा पालिसी के साथ अन्य व्यक्ति को अंतरित करता है, बीमा प्रमाणपत्र और प्रमाणपत्र में वर्णित पालिसी ऐसे व्यक्ति, जिसको मोटरयान अंतरित किया जाता है के पक्ष में उसके स्थानांतरण की तारीख से अंतरित की गई समझी जाएगी।
स्पष्टीकरण- शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि ऐसा समझा गया अंतरण उक्त बीमा प्रमाणपत्र और बीमा पालिसी के अधिकारों और दायित्वों को सम्मिलित करेगा।
(2) अंतरिती, अंतरण की तारीख से चौदह दिनों के भीतर विहित प्ररूप में बीमाकर्ता को बीमा प्रमाणपत्र और उसके पक्ष में प्रमाणपत्र में वर्णित पालिसी में अंतरण के तथ्यों के संबंध में आवश्यक परिवर्तन करने के लिए आवेदन कर सकेगा और बीमाकर्ता प्रमाणपत्र और बीमा के अंतरण के संबंध में बीमा की पालिसी में आवश्यक परिवर्तन करेगा।

Transfer of certificate of insurance-
(1) Where a person, in whose favor the certificate of insurance has been issued in accordance with the provisions of this Chapter, transfers to another person the ownership of the motor vehicle in respect of which such insurance was taken together with the policy of insurance relating thereto, the certificate of insurance and the policy described in the certificate shall be deemed to have been transferred in favor of the person to whom the motor vehicle is transferred with effect from the date of its transfer.
Explanation- For the removal of doubts, it is hereby clarified that such deemed transfer shall include the transfer of rights and liabilities of the said certificate of insurance and policy of insurance.
(2) The transferee shall apply within fourteen days from the date of transfer in the prescribed form to the insurer for making necessary changes in regard to the fact of transfer in the certificate of insurance and the policy described in the certificate in his favour, and the insurer shall make the necessary changes in the certificate and the policy of insurance in regard to the transfer of insurance.

हमारा प्रयास मोटर वाहन अधिनियम (MV Act) की धारा 157 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा 156 | बीमा प्रमाणपत्र का प्रभाव | MV Act, Section- 156 in hindi | Effect of certificate of insurance.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए मोटर वाहन अधिनियम की धारा 156 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 156, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 156 का विवरण

मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) की धारा -156 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस अध्याय के आधीन यदि और जहां तक प्रमाणपत्र में वर्णित पालिसी बीमाकर्ता द्वारा बीमाकृत को जारी नहीं की गई है, बीमाकर्ता द्वारा स्वयं और बीमाकृत के सिवाय किसी अन्य व्यक्ति के बीच ऐसे प्रमाणपत्र में कथित वर्णन और सभी विशिष्टियों के अनुरूप बीमाकृत व्यक्ति को बीमा पालिसी जारी की गई समझी जाएगी।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 156 के अनुसार

बीमा प्रमाणपत्र का प्रभाव-

जब बीमाकर्ता ने बीमाकर्ता और बीमाकृत व्यक्ति के बीच बीमा की संविदा की बाबत बीमा प्रमाणपत्र जारी किया है तब,-
(क) यदि और जहां तक प्रमाणपत्र में वर्णित पालिसी बीमाकर्ता द्वारा बीमाकृत को जारी नहीं की गई है, बीमाकर्ता द्वारा स्वयं और बीमाकृत के सिवाय किसी अन्य व्यक्ति के बीच ऐसे प्रमाणपत्र में कथित वर्णन और सभी विशिष्टियों के अनुरूप बीमाकृत व्यक्ति को बीमा पालिसी जारी की गई समझी जाएगी।
(ख) यदि बीमाकर्ता ने बीमाकृत को प्रमाणपत्र में वर्णित पालिसी जारी की है, लेकिन पालिसी की वास्तविक निबंधन, बीमाकर्ता के विरुद्ध प्रत्यक्षत: या बीमाकृत व्यक्ति के माध्यम से पालिसी के अधीन या के आधार पर दावा करने वाले व्यक्ति के लिए कम अनुकूल हैं तब पालिसी की विशिष्टियां जैसा प्रमाणपत्र में कथित है, पालिसी जैसी बीमाकर्ता और बीमाकृत के सिवाय किसी अन्य व्यक्ति के बीच है उक्त प्रमाणपत्र में कथित विशिष्टियों की सभी बातों में निबंधनों के अनुरूप समझी जाएगी।

Effect of certificate of insurance-
When an insurer has issued a certificate of insurance in respect of a contract of insurance between the insurer and the insured person, then-
(a) if and so long as the policy described in the certificate has not been issued by the insurer to the insured, the insurer shall, as between himself and any other person except the insured, be deemed to have issued to the insured person a policy of insurance conforming in all respects with the description and particulars stated in such certificate; and
(b) if the insurer has issued to the insured the policy described in the certificate, but the actual terms of the policy are less favorable to persons claiming under or by virtue of the policy against the insurer either directly or through the insured than the particulars of the policy as stated in the certificate, the policy shall, as between the insurer and any other person except the insured, be deemed to be in terms conforming in all respects with the particulars stated in the said certificate.

हमारा प्रयास मोटर वाहन अधिनियम (MV Act) की धारा 156 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा 155 | कतिपय वाद हेतुकों पर मृत्यु का प्रभाव | MV Act, Section- 155 in hindi | Effect of death on certain causes of action.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए मोटर वाहन अधिनियम की धारा 155 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 155, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 155 का विवरण

मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) की धारा -155 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस अध्याय के आधीन भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 36) की धारा 306 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, व्यक्ति जिसके पक्ष में बीमा प्रमाणपत्र जारी किया गया है की मृत्यु पर यदि ऐसी घटना जिसमें इस अध्याय के उपबंधों के अधीन दावों को उठाया गया है होने के पश्चात् यह घटित होता है उसकी संपदा या बीमाकर्ता के विरुद्ध उक्त घटना से उद्भूत किसी वाद हेतुक की उत्तरजीविका को वर्जित नहीं करेगा।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 155 के अनुसार

कतिपय वाद हेतुकों पर मृत्यु का प्रभाव-

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 36) की धारा 306 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, व्यक्ति जिसके पक्ष में बीमा प्रमाणपत्र जारी किया गया है की मृत्यु पर यदि ऐसी घटना जिसमें इस अध्याय के उपबंधों के अधीन दावों को उठाया गया है होने के पश्चात् यह घटित होता है उसकी संपदा या बीमाकर्ता के विरुद्ध उक्त घटना से उद्भूत किसी वाद हेतुक की उत्तरजीविका को वर्जित नहीं करेगा।

Effect of death on certain causes of action-
Notwithstanding anything contained in section 306 of the Indian Succession Act, 1925 (39 of 1925), the death of a person in whose favour a certificate of insurance had been issued, if it occurs after the happening of an event which has given rise to a claim under the provisions of this Chapter, shall not be a bar to the survival of any cause of action arising out of such event against his estate or against the insurer.

हमारा प्रयास मोटर वाहन अधिनियम (MV Act) की धारा 155 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा 154 | धारा 151, धारा 152 और धारा 153 के संबंध में व्यावृत्ति | MV Act, Section- 154 in hindi | Saving in respect of sections 151, 152 and 153.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए मोटर वाहन अधिनियम की धारा 154 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 154, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 154 का विवरण

मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) की धारा -154 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस अध्याय के आधीन धारा 151, धारा 152 और धारा 153 के प्रयोजन के लिए बीमा की किसी पालिसी के अधीन बीमाकृत व्यक्ति के संबंध में “पर-पक्षकारों के दायित्वों” के प्रति निर्देश में उस व्यक्ति की किसी अन्य बीमा की पालिसी के अधीन बीमाकर्ता की हैसियत में कोई दायित्व सम्मिलित नहीं होगा।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 154 के अनुसार

धारा 151, धारा 152 और धारा 153 के संबंध में व्यावृत्ति-

(1) धारा 151, धारा 152 और धारा 153 के प्रयोजन के लिए बीमा की किसी पालिसी के अधीन बीमाकृत व्यक्ति के संबंध में “पर-पक्षकारों के दायित्वों” के प्रति निर्देश में उस व्यक्ति की किसी अन्य बीमा की पालिसी के अधीन बीमाकर्ता की हैसियत में कोई दायित्व सम्मिलित नहीं होगा।
(2) धारा 151, धारा 152 और धारा 153 के उपबंध वहां लागू नहीं होंगे जो कंपनी पुनर्निर्माण या अन्य कंपनी के साथ केवल समामेलन के प्रयोजन के लिए परिसमाप्त की जाती है।

Saving in respect of sections 151, 152 and 153-
(1) For the purposes of sections 151, 152, and 153, a reference to “liabilities to third parties” in relation to a person insured under any policy of insurance shall not include a reference to any liability of that person in the capacity of the insurer under some other policy of insurance.
(2) The provisions of sections 151, 152 and 153 shall not apply where a company is wound-up voluntarily merely for the purposes of reconstruction or of an amalgamation with another company.

हमारा प्रयास मोटर वाहन अधिनियम (MV Act) की धारा 154 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा 153 | बीमाकर्ता और बीमाकृत व्यक्तियों के बीच समझौता | MV Act, Section- 153 in hindi | Settlement between insurers and insured persons.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए मोटर वाहन अधिनियम की धारा 153 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 153, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 153 का विवरण

मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) की धारा -153 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस अध्याय के प्रयोजन के लिए जारी की गई पालिसी के अधीन बीमाकृत है दिवालिया हो जाता है या जहां ऐसा बीमाकृत व्यक्ति एक कंपनी है, कंपनी के संबंध में परिसमापन आदेश किया गया है या स्वेच्छया परिसमापन का संकल्प पारित किया गया है, बीमाकर्ता और बीमाकृत व्यक्ति के बीच कोई भी ठहराव पर-पक्षकार द्वारा दायित्व उपगत किए जाने के पश्चात नहीं किया जाएगा और, यथास्थिति, दिवाला या परिसमापन, जैसा भी मामला हो, के प्रारंभ होने के पश्चात् किया गया कोई अधित्यजन, समनुदेशन या अन्य व्ययन या उपरोक्त प्रारंभ के पश्चात् बीमाकृत व्यक्ति को किया गया संदाय इस अध्याय के अधीन पर-पक्षकार को अंतरित किए गए अधिकारों को विफल करने के लिए प्रभावी नहीं होगा।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 153 के अनुसार

बीमाकर्ता और बीमाकृत व्यक्तियों के बीच समझौता-

(1) बीमाकर्ता द्वारा धारा 147 की उपधारा (1) के खंड (ख) में निर्दिष्ट प्रकृति के किसी दायित्व के संबंध में पर-पक्षकार द्वारा किए जा सकने वाले दावे की बाबत किया गया समझौता विधिमान्य नहीं होगा जब तक कि पर-पक्षकार समझौता का एक पक्षकार न हो।
(2) दावा अधिकरण यह सुनिश्चित करेगा कि समझौता सद्भाविक है और असम्यक् प्रभाव के अधीन नहीं किया गया था तथा प्रतिकर धारा 164 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट संदाय अनुसूची के अनुसार दिया गया है।
(3) जहां एक व्यक्ति, जो इस अध्याय के प्रयोजन के लिए जारी की गई पालिसी के अधीन बीमाकृत है दिवालिया हो जाता है या जहां ऐसा बीमाकृत व्यक्ति एक कंपनी है, कंपनी के संबंध में परिसमापन आदेश किया गया है या स्वेच्छया परिसमापन का संकल्प पारित किया गया है, बीमाकर्ता और बीमाकृत व्यक्ति के बीच कोई भी ठहराव पर-पक्षकार द्वारा दायित्व उपगत किए जाने के पश्चात नहीं किया जाएगा और, यथास्थिति, दिवाला या परिसमापन, जैसा भी मामला हो, के प्रारंभ होने के पश्चात् किया गया कोई अधित्यजन, समनुदेशन या अन्य व्ययन या उपरोक्त प्रारंभ के पश्चात् बीमाकृत व्यक्ति को किया गया संदाय इस अध्याय के अधीन पर-पक्षकार को अंतरित किए गए अधिकारों को विफल करने के लिए प्रभावी नहीं होगा, लेकिन वे अधिकार वैसे ही रहेंगे मानो ऐसा ठहराव, अधित्यजन, समनुदेशन या व्ययन नहीं किया गया है।

Settlement between insurers and insured persons-
(1) No settlement made by an insurer in respect of any claim which might be made by a third party in respect of any liability of the nature referred to in clause (b) of subsection (1) of section 147 shall be valid unless such third party is a party to the settlement.
(2) The Claims Tribunal shall ensure that the settlement is bona fide and was not made under undue influence and the compensation is made in accordance with the payment schedule referred to in sub-section (1) of section 164.
(3) Where a person who is insured under a policy issued for the purpose of this Chapter has become insolvent, or where, if such insured person is a company, a winding-up order has been made or a resolution for a voluntary winding-up has been passed with respect to the company, no agreement made between the insurer and the insured person after the liability has been incurred to a third party and after the commencement of the insolvency or winding-up, as the case may be, nor any waiver, assignment or other disposition made by or payment made to the insured person after the commencement aforesaid, shall be effective to defeat the rights transferred to the third party under this Chapter; but those rights shall be the same as if no such agreement, waiver, assignment or disposition or payment has been made.

हमारा प्रयास मोटर वाहन अधिनियम (MV Act) की धारा 153 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा 152 | बीमा के संबंध में सूचना देने का कर्तव्य | MV Act, Section- 152 in hindi | Duty to give information as to insurance.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए मोटर वाहन अधिनियम की धारा 152 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 152, साथ ही इस धारा के अंतर्गत क्या परिभाषित किया गया है, यह सभी जानकारी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 152 का विवरण

मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) की धारा -152 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। इस अध्याय के आधीन इस अध्याय के अधीन जारी की गई किसी पालिसी द्वारा दायित्व की बाबत बीमाकृत था या नहीं था वह इस प्रकार बीमाकृत होता यदि बीमाकर्ता ने पालिसी इस प्रकार परिवर्जित या रद्द नहीं की होती; न ही वह तब इस संबंध में जारी किए गए बीमा प्रमाणपत्र में इसके संबंध में यथाविनिर्दिष्ट की गई पालिसी की बाबत ऐसी विशिष्टियां देने से इंकार करेगा यदि वह इस प्रकार बीमाकृत था या होता।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 152 के अनुसार

बीमा के संबंध में सूचना देने का कर्तव्य-

(1) कोई व्यक्ति जिसके विरुद्ध धारा 147 की उपधारा (1) के खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी दायित्व की बाबत दावा किया गया है, दावा करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से मांग किए जाने पर, वह यह कथन करने से इंकार नहीं कर सकेगा कि क्या वह इस अध्याय के अधीन जारी की गई किसी पालिसी द्वारा दायित्व की बाबत बीमाकृत था या नहीं था वह इस प्रकार बीमाकृत होता यदि बीमाकर्ता ने पालिसी इस प्रकार परिवर्जित या रद्द नहीं की होती; न ही वह तब इस संबंध में जारी किए गए बीमा प्रमाणपत्र में इसके संबंध में यथाविनिर्दिष्ट की गई पालिसी की बाबत ऐसी विशिष्टियां देने से इंकार करेगा यदि वह इस प्रकार बीमाकृत था या होता।
(2) किसी व्यक्ति द्वारा दिवाला होने की दशा में या उसके देनदारों के साथ ठहराव किए जाने की दशा में या दिवाला विषयक विधि के अनुसार मृतक व्यक्ति की संपदा के प्रशासन के लिए किए गए आदेश की दशा में या किसी कंपनी की बाबत परिसमापन के आदेश किए जाने या स्वेच्छया परिसमापन का संकल्प पारित किए जाने या कंपनी के कारबार या उपक्रम के रिसीवर या प्रबंधक या सम्यक् रूप से नियुक्त किए जाने या प्रभार के अधीन या समाविष्ट संपत्ति के प्लवमान प्रभार द्वारा प्रतिभूत डिबेंचरों के धारकों द्वारा या उनकी ओर से कब्जा लिए जाने की दशा में, दिवाला लेनदार मृतक लेनदार के, यथास्थिति, निजी प्रतिनिधि या कंपनी या दिवाला के शासकीय समनुदेशिती या रिसीवर, न्यासी, परिसमापक, रिसीवर या प्रबंधक या संपत्ति के कब्जाधारी व्यक्ति का दायित्व होगा कि किसी दावाकर्ता व्यक्ति के निवेदन पर सूचना दे कि दिवाला लेनदार, मृतक लेनदार या कंपनी इस अध्याय के उपबंधों द्वारा समाविष्ट ऐसे दायित्व के अधीन है ऐसी सूचना यह अभिनिश्चित करने कि क्यों उसमें धारा 151 द्वारा कोई अधिकार अन्तरित या निहित किए गए हैं, के प्रयोजन के लिए उसके द्वारा युक्तियुक्त रूप से अपेक्षित है और ऐसे अधिकारों के प्रवर्तन के लिए, यदि कोई हो, ऐसे बीमा संविदा, तात्पर्यित है क्या, उपरोक्त दशा में ऐसी सूचना दिए जाने पर इसके अधीन प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: संविदा को परिवर्जित या पक्षकार के अधिकारों को परिवर्तित करती है या अन्यथा उक्त दशाओं में उसके किए जाने को प्रतिषिद्ध करती है या निवारित करने के लिए तात्पर्यित है तो उसका कोई प्रभाव नहीं होगा ।
(3) उपधारा (2) के अनुसरण में या अन्यथा किसी को दी गई सूचना से, उसके पास समर्थन के लिए युक्तियुक्त आधार है कि विशिष्ट बीमाकर्ता के विरुद्ध अधिकार उसे इस अध्याय के अधीन अंतरित किया गया है या किया जा सकता है कि बीमाकर्ता ऐसे कर्तव्य के अध्यधीन होगा जैसा उक्त उपधारा के द्वारा इसमें उल्लिखित व्यक्तियों पर अधिरोपित किया गया है ।
(4) इस धारा द्वारा अधिरोपित सूचना देने के कर्तव्य के अंतर्गत सभी बीमा की संविदाओं के प्रीमियमों के लिए प्राप्तियों और अन्य सुसंगत दस्तावेज जो ऐसे व्यक्ति के कब्जे और शक्ति में हैं जिन पर निरीक्षण करने और प्रतियां प्राप्त करने का कर्तव्य अधिरोपित किया गया है, भी है।

Duty to give information as to insurance-
(1) No person against whom a claim is made in respect of any liability referred to in clause (b) of subsection (1) of section 147 shall, on demand by or on behalf of the person making the claim, refuse to state whether or not he was insured in respect of that liability by any policy issued under the provisions of this Chapter, or would have been so insured if the insurer had not avoided or cancelled the policy, nor shall he refuse, if he was or would have been so insured, to give such particulars with respect to that policy as were specified in the certificate of insurance issued in respect thereof.
(2) In the event of any person becoming insolvent or making an arrangement with his creditors or in the event of an order being made for the administration of the estate of a deceased person according to the law of insolvency, or in the event of a winding-up order being made or a resolution for a voluntary winding-up being passed with respect to any company or of a receiver or manager of the company’s business or undertaking being duly appointed or of possession being taken by or on behalf of the holders of any debentures secured by a floating charge on any property comprised in or subject to the charge, it shall be the duty of the insolvent debtor, personal representative of the deceased debtor or company, as the case may be, or the official assignee or receiver in insolvency, trustee, liquidator, receiver or manager, or person in possession of the property to give, on the request of any person claiming that the insolvent debtor, deceased debtor or company is under such liability to him as is covered by the provision of this Chapter, such information as may reasonably be required by him for the purpose of ascertaining whether any rights have been transferred to and vested in him by section 151, and for the purpose of enforcing such rights, if any, and any such contract of insurance as purports whether directly or indirectly to avoid the contract or to alter the rights of the parties thereunder upon the giving of such information in the events aforesaid, or otherwise to prohibit or prevent the giving thereof in the said events, shall be of no effect.
(3) If, from the information given to any person in pursuance of sub-section (2) or otherwise, he has reasonable ground for supporting that there have or may have been transferred to him under this Chapter rights against any particular insurer, that insurer shall be subject to the same duty as is imposed by the said subsection on the persons therein mentioned.
(4) The duty to give the information imposed by this section shall include a duty to allow all contracts of insurance, receipts for premiums, and other relevant documents in the possession or power of the person on whom the duty is so imposed to be inspected and copies thereof to be taken.

हमारा प्रयास मोटर वाहन अधिनियम (MV Act) की धारा 152 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।