Home Blog Page 190

सीआरपीसी की धारा 310 | स्थानीय निरीक्षण | CrPC Section- 310 in hindi| Local inspection.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 310 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 310 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 310 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 310 के अन्तर्गत कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट किसी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के किसी प्रक्रम में, पक्षकारों को सम्यक् सूचना देने के पश्चात् किसी स्थान में, जिसमें अपराध का किया जाना अभिकथित है, या किसी अन्य स्थान में जा सकता है और उसका निरीक्षण कर सकता है, जिसके बारे में उसकी राय है कि उसका अवलोकन ऐसी जांच या विचारण में दिए गए साक्ष्य का उचित विवेचन करने के प्रयोजन से आवश्यक है और ऐसे निरीक्षण में देखे गए किन्हीं सुसंगत तथ्यों का ज्ञापन, अनावश्यक विलम्ब के बिना, लेखबद्ध करेगा। ऐसा ज्ञापन मामले के अभिलेख का भाग होगा और यदि अभियोजक, परिवादी या अभियुक्त या मामले का अन्य कोई पक्षकार ऐसा चाहे तो उसे ज्ञापन की प्रतिलिपि निःशुल्क दी जायगी।

सीआरपीसी की धारा 310 के अनुसार

स्थानीय निरीक्षण-

(1) कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट किसी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के किसी प्रक्रम में, पक्षकारों को सम्यक् सूचना देने के पश्चात् किसी स्थान में, जिसमें अपराध का किया जाना अभिकथित है, या किसी अन्य स्थान में जा सकता है और उसका निरीक्षण कर सकता है, जिसके बारे में उसकी राय है कि उसका अवलोकन ऐसी जांच या विचारण में दिए गए साक्ष्य का उचित विवेचन करने के प्रयोजन से आवश्यक है और ऐसे निरीक्षण में देखे गए किन्हीं सुसंगत तथ्यों का ज्ञापन, अनावश्यक विलम्ब के बिना, लेखबद्ध करेगा।
(2) ऐसा ज्ञापन मामले के अभिलेख का भाग होगा और यदि अभियोजक, परिवादी या अभियुक्त या मामले का अन्य कोई पक्षकार ऐसा चाहे तो उसे ज्ञापन की प्रतिलिपि निःशुल्क दी जायगी।

Local inspection-
(1) Any Judge or Magistrate may, at any stage of any inquiry, trial or other proceeding, after due notice to the parties, visit and inspect any place in which an offence is alleged to have been committed, or any other place which it is in his opinion necessary to view for the purpose of properly appreciating the evidence given at such inquiry or trial, and shall without unnecessary delay record a memorandum of any relevant facts observed at such inspection.
(2) Such memorandum shall form part of the record of the case and if the prosecutor, complainant or accused or any other party to the case, so desires, a copy of the memorandum shall be furnished to him free of cost.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 310 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 307 | क्षमा-दान का निदेश देने की शक्ति | CrPC Section- 307 in hindi| Power to direct tender of pardon.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 307 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 307 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 307 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 307 के अन्तर्गत मामले की सुपुर्दगी के पश्चात् किसी समय किन्तु निर्णय दिए जाने के पूर्व वह न्यायालय जिसे मामला सुपुर्द किया जाता है किसी ऐसे अपराध से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में संबद्ध या संसर्गित समझे जाने वाले किसी व्यक्ति का साक्ष्य विचारण में अभिप्राप्त करने की दृष्टि से उस व्यक्ति को उसी शर्त पर क्षमा-दान कर सकता है।

सीआरपीसी की धारा 307 के अनुसार

क्षमा-दान का निदेश देने की शक्ति-

मामले की सुपुर्दगी के पश्चात् किसी समय किन्तु निर्णय दिए जाने के पूर्व वह न्यायालय जिसे मामला सुपुर्द किया जाता है किसी ऐसे अपराध से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में संबद्ध या संसर्गित समझे जाने वाले किसी व्यक्ति का साक्ष्य विचारण में अभिप्राप्त करने की दृष्टि से उस व्यक्ति को उसी शर्त पर क्षमा-दान कर सकता है।

Power to direct tender of pardon-
At any time after commitment of a case but before judgment is passed, the Court to which the commitment is made may, with a view to obtaining at the trial the evidence of any person supposed to have been directly or indirectly concerned in, or privy to, any such offence, tender a pardon on the same condition to such person.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 307 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 305 | प्रक्रिया, जब निगम या रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी अभियुक्त है | CrPC Section- 305 in hindi| Procedure when corporation or registered society is an accused.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 305 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 305 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 305 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 305 के अन्तर्गत इस धारा में, “निगम” से कोई निगमित कम्पनी या अन्य निगमित निकाय अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी भी है। जहां कोई निगम किसी जांच या विचारण में अभियुक्त व्यक्ति या अभियुक्त व्यक्तियों में से एक है। वहां वह ऐसी जांच या विचारण के प्रयोजनार्थ एक प्रतिनिधि नियुक्त कर सकता है और ऐसी नियुक्ति निगम की मुद्रा के अधीन करना आवश्यक नहीं होगा।

सीआरपीसी की धारा 305 के अनुसार

प्रक्रिया, जब निगम या रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी अभियुक्त है-

(1) इस धारा में, “निगम” से कोई निगमित कम्पनी या अन्य निगमित निकाय अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी भी है।
(2) जहां कोई निगम किसी जांच या विचारण में अभियुक्त व्यक्ति या अभियुक्त व्यक्तियों में से एक है। वहां वह ऐसी जांच या विचारण के प्रयोजनार्थ एक प्रतिनिधि नियुक्त कर सकता है और ऐसी नियुक्ति निगम की मुद्रा के अधीन करना आवश्यक नहीं होगा।
(3) जहां निगम का कोई प्रतिनिधि हाजिर होता है, वहां इस संहिता की इस अपेक्षा का कि कोई बात अभियुक्त की हाजिरी में की जाएगी या अभियुक्त को पढ़ कर सुनाई जाएगी या बताई जाएगी या समझायी जाएगी, इस अपेक्षा के रूप में अर्थ लगाया जायगा कि वह बात प्रतिनिधि की हाजिरी में की जाएगी, प्रतिनिधि को पढ़ कर सुनाई जाएगी या बताई जायगी या समझायी जाएगी और किसी ऐसी अपेक्षा का कि अभियुक्त की परीक्षा की जाएगी, इस अपेक्षा के रूप में अर्थ लगाया जाएगा कि प्रतिनिधि की परीक्षा की जाएगी।
(4) जहां निगम का कोई प्रतिनिधि हाजिर नहीं होता है, वहां कोई ऐसी अपेक्षा, जो उपधारा (3) में निर्दिष्ट है, लागू नहीं होगी।
(5) जहां निगम के प्रबंध निदेशक द्वारा या किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा (वह चाहे जिस नाम से पुकारा जाता हो) जो निगम के कार्यकलाप का प्रबंध करता है या प्रबंध करने वाले व्यक्तियों में से एक है, हस्ताक्षर किया गया तात्पर्यित इस भाव का लिखित कथन फाइल किया जाता है कि कथन में नामित व्यक्ति को इस धारा के प्रयोजनों के लिए निगम के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया है, वहां न्यायालय, जब तक इसके प्रतिकूल साबित नहीं किया जाता है, यह उपधारणा करेगा कि ऐसा व्यक्ति इस प्रकार नियुक्त किया गया है।
(6) यदि यह प्रश्न उठता है कि न्यायालय के समक्ष किसी जांच या विचारण में निगम के प्रतिनिधि के रूप में हाजिर होने वाला कोई व्यक्ति ऐसा प्रतिनिधि है या नहीं, तो उस प्रश्न का अवधारण न्यायालय द्वारा किया जाएगा।

Procedure when corporation or registered society is an accused-
(1) In this section, “corporation” means an incorporated company or other body corporate, and includes a society registered under the Societies Registration Act, 1860 (21 of 1860).
(2) Where a corporation is the accused person or one of the accused persons in an inquiry or trial, it may appoint a representative for the purpose of the inquiry or trial and such appointment need not be under the seal of the corporation.
(3) Where a representative of a corporation appears, any requirement of this Code that anything shall be done in the presence of the accused or shall be read or stated or explained to the accused, shall be construed as a requirement that thing shall be done in the presence of the representative or read or stated or explained to the representative, and any requirement that the accused shall be examined shall be construed as a requirement that the representative shall be examined.
(4) Where a representative of a corporation does not appear, any such requirement as is referred to in sub-section (3) shall not apply.
(5) Where a statement in writing purporting to be signed by the managing director of the corporation or by any person (by whatever name called) having, or being one of the persons having the management of the affairs of the corporation to the effect that the person named in the statement has been appointed as the representative of the corporation for the purposes of this section, is filed, the Court shall, unless the contrary is proved, presume that such person has been so appointed.
(6) If a question arises as to whether any person, appearing as the representative of a corporation in an inquiry or trial before a Court is or is not such representative, the question shall be determined by the Court.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 305 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 304 | कुछ मामलों में अभियुक्त को राज्य के व्यय पर विधिक सहायता | CrPC Section- 304 in hindi| Legal aid to accused at State expense in certain cases.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 304 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 304 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 304 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 304 के अन्तर्गत जहां सेशन न्यायालय के समक्ष किसी विचारण में, अभियुक्त का प्रतिनिधित्व किसी प्लीडर द्वारा नहीं किया जाता है, और जहां न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त के पास किसी प्लीडर को नियुक्त करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं है, वहां न्यायालय उसकी प्रतिरक्षा के लिए राज्य के व्यय पर प्लीडर उपलब्ध करेगा।

सीआरपीसी की धारा 304 के अनुसार

कुछ मामलों में अभियुक्त को राज्य के व्यय पर विधिक सहायता-

(1) जहां सेशन न्यायालय के समक्ष किसी विचारण में, अभियुक्त का प्रतिनिधित्व किसी प्लीडर द्वारा नहीं किया जाता है, और जहां न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त के पास किसी प्लीडर को नियुक्त करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं है, वहां न्यायालय उसकी प्रतिरक्षा के लिए राज्य के व्यय पर प्लीडर उपलब्ध करेगा।
(2) राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से उच्च न्यायालय-
(क) उपधारा (1) के अधीन प्रतिरक्षा के लिए प्लीडरों के चयन के ढंग का,
(ख) ऐसे प्लीडरों को न्यायालयों द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं का,
(ग) ऐसे प्लीडरों को सरकार द्वारा संदेय फीसों का और साधारणत: उपधारा (1) के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए,
उपबंध करने वाले नियम बना सकता है।
(3) राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकती है कि उस तारीख से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, उपधारा (1) और (2) के उपबंध राज्य के अन्य न्यायालयों के समक्ष किसी वर्ग के विचारणों के सम्बन्ध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे सेशन न्यायालय के समक्ष विचारणों के संबंध में लागू होते है।

Legal aid to accused at State expense in certain cases-
(1) Where, in a trial before the Court of Session, the accused is not represented by a pleader, and where it appears to the Court that the accused has not sufficient means to engage a pleader, the Court shall assign a pleader for his defence at the expense of the State.
(2) The High Court may, with the previous approval of the State Government, make rules providing for-
(a) the mode of selecting pleaders for defence under sub-section (1);
(b) the facilities to be allowed to such pleaders by the Courts;
(c) the fees payable to such pleaders by the Government, and generally, for carrying out the purposes of sub-section (1).
(3) The State Government may, by notification, direct that, as from such date as may be specified in the notification, the provisions of sub-sections (1) and (2) shall apply in relation to any class of trials before other Courts in the State as they apply in relation to trials before Court of Session.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 304 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 303 | जिस व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही संस्थित की गई है उसका प्रतिरक्षा कराने का अधिकार | CrPC Section- 303 in hindi| Right of person against whom proceedings are instituted to be defended.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 303 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 303 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 303 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 303 के अन्तर्गत जो व्यक्ति दण्ड न्यायालय के समक्ष अपराध के लिए अभियुक्त है या जिसके विरुद्ध इस संहिता के अधीन कार्यवाही संस्थित की गई है, उसका यह अधिकार होगा कि उसकी पसंद के प्लीडर द्वारा उसकी प्रतिरक्षा की जाए।

सीआरपीसी की धारा 303 के अनुसार

जिस व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही संस्थित की गई है उसका प्रतिरक्षा कराने का अधिकार-

जो व्यक्ति दण्ड न्यायालय के समक्ष अपराध के लिए अभियुक्त है या जिसके विरुद्ध इस संहिता के अधीन कार्यवाही संस्थित की गई है, उसका यह अधिकार होगा कि उसकी पसंद के प्लीडर द्वारा उसकी प्रतिरक्षा की जाए।

Right of person against whom proceedings are instituted to be defended-
Any person accused of an offence before a Criminal Court, or against whom proceedings are instituted under this Code, may of right be defended by a pleader of his choice.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 303 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 302 | अभियोजन का संचालन करने की अनुज्ञा | CrPC Section- 302 in hindi| Permission to conduct prosecution.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 302 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 302 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 302 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 302 के अन्तर्गत किसी मामले की जांच या विचारण करने वाला कोई मजिस्ट्रेट निरीक्षक की पंक्ति से नीचे के पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी भी व्यक्ति द्वारा अभियोजन के संचालित किए जाने की अनुज्ञा दे सकता है, किन्तु महाधिवक्ता या सरकारी अधिवक्ता या लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक से भिन्न कोई व्यक्ति ऐसी अनुज्ञा के बिना ऐसा करने का हकदार न होगा, परन्तु यदि पुलिस के किसी अधिकारी ने उस अपराध के अन्वेषण में, जिसके बारे में अभियुक्त का अभियोजन किया जा रहा है, भाग लिया है तो अभियोजन का संचालन करने की उसे अनुज्ञा न दी जाएगी।अभियोजन का संचालन करने वाला कोई व्यक्ति स्वयं या प्लीडर द्वारा ऐसा कर सकता है।

सीआरपीसी की धारा 302 के अनुसार

अभियोजन का संचालन करने की अनुज्ञा-

(1) किसी मामले की जांच या विचारण करने वाला कोई मजिस्ट्रेट निरीक्षक की पंक्ति से नीचे के पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी भी व्यक्ति द्वारा अभियोजन के संचालित किए जाने की अनुज्ञा दे सकता है, किन्तु महाधिवक्ता या सरकारी अधिवक्ता या लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक से भिन्न कोई व्यक्ति ऐसी अनुज्ञा के बिना ऐसा करने का हकदार न होगा :
परन्तु यदि पुलिस के किसी अधिकारी ने उस अपराध के अन्वेषण में, जिसके बारे में अभियुक्त का अभियोजन किया जा रहा है, भाग लिया है तो अभियोजन का संचालन करने की उसे अनुज्ञा न दी जाएगी।
(2) अभियोजन का संचालन करने वाला कोई व्यक्ति स्वयं या प्लीडर द्वारा ऐसा कर सकता है।

Permission to conduct prosecution-
(1) Any Magistrate inquiring into or trying a case may permit the prosecution to be conducted by any person other than a police officer below the rank of Inspector; but no person, other than the Advocate General or Government Advocate or a Public Prosecutor or Assistant Public Prosecutor, shall be entitled to do so without such permission :
Provided that no police officer shall be permitted to conduct the prosecution if he has taken part in the investigation into the offence with respect to which the accused is being prosecuted.
(2) Any person conducting the prosecution may do so personally or by a pleader.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 302 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।