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फरार व्यक्ति से क्या तात्पर्य है

फरार होने से तात्पर्य अपने आपकों गिरफ्तारी से बचायें एवंम् छिपाये रखने के उद्देश्य से अपने सामान्य निवास अथवा कारबार के स्थान को छोड़कर कही अन्यत्र चला जाना है, परन्तु मात्र एक दिन के लिये अपने निवास स्थान मे अनुपस्थित रहना अथवा एक अस्पाल से दूसरे अस्पताल मे चले जाने को फरार हो जाना नही कहा जायेगा ।

फरारी के लिये निम्नांकित बाते आवश्यक है-

  1. गिरफ्तार किये जाने वाला व्यक्ति गिरफ्तारी से बचने के लिये अपने आपको छिपा रहा हो;
  2. वह अपने निवास स्थान अथवा कारबार के स्थान को छोड़कर किसी अज्ञात स्थान पर चला गया हो; एवं
  3. किसी अनिश्चित काल के लिये किया गया हो ।

फरार व्यक्ति के लिये उद्घोषणा (Proclamation for person absconding)- दण्ड प्रकिया संहिता की धारा 82 ऐसे व्यक्ति के विरूद्ध उद्घोषणा के सम्बन्ध में प्रावधान करती है जो गिरफ्तारी के वारण्ट से बचने के लिये फरार हो गया हो । उपधारा-1 के अनुसार, जब न्यायालय को यह विश्वास हो जाये कि वह व्यक्ति जिसके विरूद्ध गिरफ्तारी का वारण्ट जारी किया गया है, उसके निष्पादन को असफल बनाने के उद्देश्य से फरार हो गया हो या अपने आपको छिपा रहा है, तो न्यायालय इस आशय की एक उद्घोषणा प्रकाशित कर सकेगा कि वह व्यक्ति विनिर्दिष्ट स्थान मे और विनिर्दिष्ट समय पर, जो उद्घोषणा के प्रकाशन की तारीख मे तीस दिन का कम नही होगा, उपस्थित हो ।

फरार व्यक्ति के सम्पत्ति की कुर्की (Attachment of property of absconder)- दण्ड प्रकिया संहिता की धारा 83 सम्पत्ति की कुर्की के बारे मे प्रावधान करती है । उपधारा-1 के अनुसार, धारा-82 के अधीन उद्घोषणा जारी करने वाला न्यायालय ऐसी उद्घोषणा के पश्चात् किसी भी समय उद्घोषित व्यक्ति के चल अथवा अचल दोनो प्रकार की सम्पत्तियों की कुर्की का आदेश दे सकता है ।


परन्तु यदि उद्घोषणा जारी करते समय न्यायालय का शपथ-पत्र व्दारा या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि वह व्यक्ति जिसके सम्बन्ध मे उद्घोषणा निकाली जाती है –

क) अपनी सम्पत्ति या उसे किसी भाग का व्ययन करने वाला है; अथवा


ख) अपनी समस्त सम्पत्ति या उसके किसी भाग को उस न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता से हटने वाला है, तो वह उद्घोषणा जारी करने के साथ ही कुर्की का आदेश दे सकता है ।

फरार व्यक्ति की सम्पत्ति की कुर्की न्यायालय व्दारा फरार व्यक्ति की उद्घोषित प्रकाशित करने के तीस दिन के पश्चात् यदि फरार व्यक्ति न्यायालय के समक्ष उपस्थित नही होता है, तो फरार व्यक्ति के चल अथवा अचल सम्पत्ति की कुर्की राज्य सरकार अथवा केन्द्र सरकार व्दारा की जा सकती है ।

CrPC Section-125 (दण्ड प्रकिया संहिता की धारा-125)

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 125 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपने पुत्र, पुत्री, पत्नी एवंम् वृद्ध माता-पिता के भरण पोषण का दायित्व होता है, भरण-पोषण से सम्बन्धित कई न्यायिक निर्णय भी इस सम्बन्ध मे आये हुये है, जिनके आधार पर किसी व्यक्ति को अपने आश्रितों का भरण-पोषण समाजिक दायित्व है। यह धारा भरण पोषण के लिये कोई व्.

सीआरपीसी की धारा 125 के अनुसार

पत्नी, सन्तान माता-पिता के भरण-पोषण के लिए आदेश-

(क) अपनी पत्नी का, जो अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है, या
(ख) अपनी धर्मज या अधर्मज अवयस्क सन्तान का, चाहे विवाहित हो या न हो, जो अपना भरण पोषण करने में असमर्थ हैं या
(ग) अपनी धर्मज या अधर्मज संतान का (जो विवाहित पुत्री नहीं है), जिसने वयस्कता प्राप्त कर ली है, जहां ऐसी संतान किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या क्षति के कारण अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, या
(घ) अपने पिता या माता का, जो अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है,
भरण-पोषण करने में उपेक्षा करता है या भरण-पोषण करने से इन्कार करता है तो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, ऐसी उपेक्षा या इंकार के साबित हो जाने पर, ऐसे व्यक्ति को यह निदेश दे सकता है कि वह अपनी पत्नी या ऐसी सन्तान, पिता या माता के भरण-पोषण के लिए। ऐसी मासिक दर पर, जिसे मजिस्ट्रेट ठीक समझे, मासिक भत्ता और उस भत्ते का संदाय ऐसे व्यक्ति को करे जिसको संदाय करने का मजिस्ट्रेट समय समय पर निदेश दे।

Order for maintenance of wives, children and parents-Order for maintenance of wives, children and parents-
(a) his wife, unable to maintain herself, or
(b) his legitimate or illegitimate minor child, whether married or not, unable to maintain itself, or
(c) his legitimate or illegitimate child (not being a married daughter) who has attained majority, where such child is, by reason of any physical or mental abnormality or injury unable to maintain itself, or
(d) his father or mother, unable to maintain himself or herself,
a Magistrate of the first class may, upon proof of such neglect or refusal, order such person to make a monthly allowance for the maintenance of his wife or such child, father or mother, at such monthly rate, as such Magistrate thinks fit, and to pay the same to such person as the Magistrate may from time to time direct.

दण्ड प्रकिया संहिता की धारा-125 के अन्तर्गत वृद्ध माता-पिता, पत्नी एवंम् बच्चो के भरण-पोषण के अधिकारो के लिये मुख्य बाते-

भारतीय संविधान मे प्रत्येक व्यक्ति को अपने पुत्र, पुत्री, पत्नी एवंम् वृद्ध माता-पिता के भरण पोषण का दायित्व होता है, भरण-पोषण से सम्बन्धित कई न्यायिक निर्णय भी इस सम्बन्ध मे आये हुये है, जिनके आधार पर किसी व्यक्ति को अपने आश्रितों का भरण-पोषण देना समाजिक दायित्व है, जिसे प्रत्येक को पूर्ण करना होता है अथवा वह व्यक्ति अगर सक्षम नही है तो वह न्यायालय व्दारा अपने दायित्व को चैलेन्ज कर सकता है, इस सम्बन्ध मे बहुत से निर्णय न्यायालय व्दारा भरण-पोषण का अधिकार दिलाया गया है।

दण्ड प्रकिया संहिता की धारा-125 के अन्तर्गत वही व्यक्ति अथवा महिला भरण पोषण का अधिकार प्राप्त कर सकता है, भरण-पोषण तभी न्यायाय व्दारा दिलाया जा सकता है, जब वह व्यक्ति अपना जीवन यापन चलाने मे समर्थ है, अगर स्वयं का जीवन यापन चलाने मे असमर्थ है तो भरण-पोषण पाने के अधिकारी नही होगें ।

दण्ड प्रकिया संहिता की धारा-125 से धारा-128 तक की व्यक्ति को कभी दण्डित करने का नही रहा है और न ही धारा-125 से धारा-128 तक की दण्ड की श्रेणी मे आती है । 

भरण-पोषण किसे-किसे दिया जा सकता है-

भरण-पोषण मुख्यतः अपने पिता, पुत्र, पत्नी अथवा पति को दिया जाने का कानूनी दायित्व है एवंम् आप अपने उन सम्बन्धियों जो पूर्ण रूप से आप पर निर्भर है, एवंम् वह अपना जीवन यापन स्वंय का करने मे सक्षम नही है।

जब कोई पुत्र मानसिक विक्षिप्त है और वह अपना जीवन यापन नही कर सकता है, तब पिता का दायित्व होता है कि पुत्र को भरण-पोषण देने का, इसी प्रकार से पुत्र अपने वृद्ध माता-पिता का पूर्ण दायित्व होता है कि वृद्ध माता-पिता को भरण-पोषण करे ।

इसी तरह से पत्नी अगर तलाक-शुदा भी है, वह अपना जीवन यापन करने मे समर्थ नही है और अकेले ही जीवन यापन कर रही है तो भी आप उसे भरण पोषण देने के बाध्य होंगें अथवा वह तलाक के पश्चात् भी अपना जीवन यापन करने के लिये भरण-पोषण की मांग कर सकती है । दण्ड प्रकिया संहिता 125 के अन्तर्गत अपनी धर्मज अथवा अधर्मज अवयस्क संतान का, चाहे विवाहित हो या न हो, जो भरण-पोषण करने मे असमर्थ हो, तो वह अपने पिता से भरण-पोषण की मांग कर सकता है तथा वह संन्तान जो धर्मज अथवा अधर्मज हो,किसी शारीरिक अथवा मानसिक क्षति के कारण भरण-पोषण करने मे असमर्थ है, तो उसका पिता भरण-पोषण करेगा ।

हमारा प्रयास दण्ड प्रकिया संहिता की धारा-125 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

RTI (Right to Information) सूचना का अधिकार

Right to Information (सूचना का अधिकार) मुख्यतः हमारे इस अधिनियम के आधीन पहुंच योग्य सूचना का, जो किसी लोक प्राधिकारी व्दारा उसके नियन्त्रणाधीन धारित है या हमारे व्दारा किसी सूचना को किसी कार्यालय व्दारा प्राप्त करना, इस अधिनियम मे बताता है, जिसमे निम्नलिखित अधिकार सम्मलित है- जैसे- कृति, दस्तावेज और अभिलेखों का निरिक्षण हेतु, समाग्री के प्रमाणित नमूने लेना, डिस्केट, फ्लाॉपी, टेप, वीडियों कैसेट के रूप मे या किसी अन्य युक्ति से भण्डारित है इत्यादि अभिप्राप्त करना । सूचना का अधिकार अधिनियम के अध्याय वार एवंम् धारा वार निम्नलिखित है ।

अध्याय-1

प्रारंभिक (Preliminary)

Sec-1 (1) इस अधिनियम को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कहा जा सकता है।

यह जम्मू और कश्मीर राज्य को छोड़कर पूरे भारत में फैला हुआ है।

(3) धारा 4 की उपधारा ( 1 ), उपधारा ( 1 ) और ( 2 ) की धारा 5, धारा 12, 13, 15,16, 24, 27 और 28 के प्रावधान एक बार में लागू होंगे, और इस अधिनियम के शेष प्रावधान इसके लागू होने के एक सौ बीसवें दिन लागू होंगे।

Sec-2 इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, –

(क) “उपयुक्त सरकार” का अर्थ है एक सार्वजनिक प्राधिकरण के संबंध में जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रदान की गई धनराशि से स्थापित, गठित, स्वामित्व, नियंत्रित या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित है-
(1) केंद्र सरकार या केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन, केंद्र सरकार व्दारा;
(2) राज्य सरकार, राज्य सरकार व्दारा;

(ख) “केंद्रीय सूचना आयोग” का अर्थ है धारा 12 की उप-धारा ( 1 ) के तहत गठित केंद्रीय सूचना आयोग;

(ग) “केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी” का अर्थ है उप-धारा ( 1 ) के तहत नामित केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी और धारा 5 के उप-खंड ( 2 ) के तहत नामित एक केंद्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी शामिल है ;

(घ) “मुख्य सूचना आयुक्त” और “सूचना आयुक्त” का अर्थ है मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त धारा 12 की उपधारा ( 3 ) के तहत नियुक्त;

(ड़) “सक्षम प्राधिकारी” का अर्थ है-

(1) किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के लोगों या विधान सभा के सदन के मामले में अध्यक्ष या राज्य की विधान परिषद या राज्य की विधान परिषद के मामले में अध्यक्ष;

(2) सुप्रीम कोर्ट के मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश;

(3) उच्च न्यायालय के मामले में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश;

(4) राष्ट्रपति या राज्यपाल, जैसा कि मामला हो सकता है, संविधान के तहत या उसके व्दारा स्थापित या गठित अन्य अधिकारियों के मामले में;

(5) संविधान के अनुच्छेद 239 के तहत नियुक्त प्रशासक;

(च) “सूचना” का अर्थ किसी भी रूप में किसी भी सामग्री से है, जिसमें रिकॉर्ड, दस्तावेज, मेमो, ई-मेल, राय, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, परिपत्र, आदेश, लॉगबुक, अनुबंध, रिपोर्ट, कागजात, नमूने, मॉडल, किसी भी इलेक्ट्रॉनिक में रखी गई सामग्री शामिल हैं। किसी भी निजी निकाय से संबंधित प्रपत्र और जानकारी जिसे किसी भी अन्य कानून के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण व्दारा लागू किया जा सकता है;

(छ) “निर्धारित” का अर्थ है उपयुक्त सरकार या सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों के अनुसार, जैसा भी मामला हो;

(ज) “सार्वजनिक प्राधिकरण” का अर्थ किसी भी प्राधिकरण या निकाय या स्व-सरकार की संस्था या स्थापित या गठित किया जाता है-
(क) संविधान द्वारा या उसके अधीन;
(ख) संसद द्वारा बनाए गए किसी अन्य कानून द्वारा;
(ग) राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी अन्य कानून द्वारा;
(घ) उचित सरकार द्वारा जारी अधिसूचना या आदेश द्वारा, और किसी भी शामिल हैं-
(1) शरीर के स्वामित्व, नियंत्रित या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित;
(2) गैर-सरकारी संगठन ने उचित सरकार द्वारा प्रदान की गई धनराशि से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पर्याप्त वित्त पोषण किया;
(3) “रिकॉर्ड” में शामिल हैं-
(क) किसी भी दस्तावेज़, पांडुलिपि और फ़ाइल;
(ख) किसी भी माइक्रोफिल्म, माइक्रोफिच और एक दस्तावेज की प्रतिकृति कॉपी;
(ग) इस तरह के माइक्रोफिल्म (चाहे बढ़े या नहीं) में सन्निहित छवि या छवियों का कोई भी पुनरुत्पादन; तथा
(घ) कंप्यूटर या किसी अन्य उपकरण द्वारा उत्पादित कोई अन्य सामग्री;
(झ) “सूचना का अधिकार” का अर्थ इस अधिनियम के तहत सुलभ सूचना का अधिकार है जो किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण के नियंत्रण में या उसके द्वारा आयोजित किया जाता है और इसमें शामिल हैं –
(1) कार्य, दस्तावेजों, अभिलेखों का निरीक्षण;
(2) दस्तावेज़ या रिकॉर्ड की नोट, अर्क या प्रमाणित प्रतियां लेना;
(3) सामग्री के प्रमाणित नमूने लेना;
(4) डिस्केट, फ़्लॉपी, टेप, वीडियो कैसेट या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक मोड में या प्रिंटआउट के माध्यम से जानकारी प्राप्त करना जहां ऐसी जानकारी कंप्यूटर या किसी अन्य डिवाइस में संग्रहीत होती है;
(ञ) “राज्य सूचना आयोग” का अर्थ है धारा 15 की उप-धारा ( 1 ) के तहत गठित राज्य सूचना आयोग ;
(ट) “राज्य मुख्य सूचना आयुक्त” और “राज्य सूचना आयुक्त” का अर्थ है राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त और धारा 15 की उप-धारा ( 3 ) के तहत नियुक्त राज्य सूचना आयुक्त ;
(ठ) “राज्य लोक सूचना अधिकारी” का अर्थ है उप-धारा ( 1 ) के तहत नामित राज्य लोक सूचना अधिकारी और धारा 5 के उप-खंड ( 2 ) के तहत नामित एक राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी शामिल है ;
(ड) “थर्ड पार्टी” का अर्थ है सूचना के लिए अनुरोध करने वाले नागरिक के अलावा एक व्यक्ति और एक सार्वजनिक प्राधिकरण शामिल है।

अध्याय-2

सूचना और सार्वजनिक अधिकारियों के दायित्वों का अधिकार (Right to information and obligations of public authorities)

Sec-3 इस अधिनियम के प्रावधानों के अधीन, सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार होगा।

Sec-4 (1) प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण –

(क) अपने सभी रिकॉर्डों को विधिवत रूप से सूचीबद्ध और अनुक्रमणित किया जाता है और इस अधिनियम के तहत सूचना के अधिकार की सुविधा प्रदान करने वाले प्रपत्र को सुनिश्चित किया जाता है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी रिकॉर्ड जो कम्प्यूटरीकृत होने के लिए उपयुक्त हैं, उचित समय के भीतर और संसाधनों की उपलब्धता के अधीन, कम्प्यूटरीकृत और जुड़े हुए हैं विभिन्न प्रणालियों पर पूरे देश में एक नेटवर्क के माध्यम से ताकि इस तरह के रिकॉर्ड तक पहुंच की सुविधा हो;

(ख) इस अधिनियम के अधिनियमन से एक सौ बीस दिनों के भीतर प्रकाशित –
(i) अपने संगठन, कार्यों और कर्तव्यों का विवरण;
(ii) अपने अधिकारियों और कर्मचारियों की शक्तियां और कर्तव्य;
(iii) पर्यवेक्षण और जवाबदेही के चैनलों सहित निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया;
(iv) अपने कार्यों के निर्वहन के लिए इसके व्दारा निर्धारित मानदंड;
(v) नियम, विनियम, निर्देश, नियमावली और रिकॉर्ड, जो इसके नियंत्रण में या इसके कर्मचारियों व्दारा अपने कार्यों के निर्वहन के लिए उपयोग किए जाते हैं;
(हम) दस्तावेजों की श्रेणियों का एक बयान जो इसके व्दारा या इसके नियंत्रण में हैं;
(vii) किसी भी व्यवस्था के ब्यौरे जो उसके नीति निर्माण या उसके कार्यान्वयन के संबंध में जनता के सदस्यों के साथ परामर्श, या प्रतिनिधित्व के लिए मौजूद है;
(viii) बोर्ड, परिषदों, समितियों और अन्य निकायों के एक बयान में दो या दो से अधिक व्यक्तियों को शामिल किया गया है जो इसके हिस्से के रूप में या इसकी सलाह के लिए गठित हैं, और क्या उन बोर्डों, परिषदों, समितियों और अन्य निकायों की बैठकें जनता के लिए खुली हैं। , या इस तरह की बैठकों के मिनट जनता के लिए सुलभ हैं;
(ix) अपने अधिकारियों और कर्मचारियों की एक निर्देशिका;
(x) इसके प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारियों को प्राप्त मासिक पारिश्रमिक, इसके विनियमों में प्रदत्त मुआवजे की प्रणाली सहित;
(xi) अपनी प्रत्येक एजेंसी को आवंटित बजट, सभी योजनाओं, प्रस्तावित व्यय और किए गए संवितरण पर रिपोर्ट का विवरण दर्शाता है;
(xii) सब्सिडी कार्यक्रमों के निष्पादन का तरीका, जिसमें आवंटित राशि और ऐसे कार्यक्रमों के लाभार्थियों का विवरण शामिल है;
(xiii) रियायतें, परमिट या प्राधिकरण के प्राप्तकर्ताओं के विवरण;
(xiv) इलेक्ट्रॉनिक रूप में घटाई गई जानकारी के संबंध में विवरण, उसके पास उपलब्ध या उसके व्दारा रखे गए;
(xv) सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाए रखा गया है, तो एक पुस्तकालय या वाचनालय के काम के घंटे सहित जानकारी प्राप्त करने के लिए नागरिकों के लिए उपलब्ध सुविधाओं का विवरण;
(xvi) लोक सूचना अधिकारियों के नाम, पदनाम और अन्य विवरण;
(xvii) इस तरह की अन्य जानकारी को निर्धारित किया जा सकता है और उसके बाद हर साल इन प्रकाशनों को अद्यतन किया जा सकता है;

(ग) महत्वपूर्ण नीतियों को तैयार करते समय या जनता को प्रभावित करने वाले निर्णयों की घोषणा करते हुए सभी प्रासंगिक तथ्यों को प्रकाशित करें;

(घ) प्रभावित व्यक्तियों को इसके प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक निर्णयों के लिए कारण प्रदान करते हैं।

(2) संचार के विभिन्न साधनों के माध्यम से नियमित अंतराल पर जनता को अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए उप-धारा (1) के खंड (ख) की आवश्यकताओं के अनुसार कदम उठाने के लिए हर सार्वजनिक प्राधिकरण का यह निरंतर प्रयास होगा। इंटरनेट, ताकि जनता को जानकारी प्राप्त करने के लिए इस अधिनियम के उपयोग के लिए न्यूनतम सहारा हो।

(3) उप-धारा (1) के प्रयोजनों के लिए, हर सूचना का व्यापक रूप से और ऐसे रूप और तरीके से प्रसार किया जाएगा जो आसानी से जनता के लिए सुलभ हो।

(4) केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सार्वजनिक सूचना के साथ इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में संभव सीमा तक, सभी सामग्रियों की लागत प्रभावशीलता, स्थानीय भाषा और उस स्थानीय क्षेत्र में संचार की सबसे प्रभावी विधि और सूचना आसानी से सुलभ होनी चाहिए। अधिकारी, जैसा भी मामला हो, उपलब्ध या माध्यम की ऐसी लागत पर या प्रिंट मूल्य निर्धारित किया जा सकता है।

स्पष्टीकरण। – उप-वर्गों (3) और (4) के प्रयोजनों के लिए, “प्रसार” का अर्थ है नोटिस बोर्ड, समाचार पत्र, सार्वजनिक घोषणाओं, मीडिया प्रसारण, इंटरनेट या किसी अन्य माध्यम से जनता को जानकारी देना या संप्रेषित करना। किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण के कार्यालयों के निरीक्षण सहित।

Sec-5 (1) इस अधिनियम के लागू होने के एक सौ दिनों के भीतर, प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण केंद्रीय लोक सूचना अधिकारियों या राज्य लोक सूचना अधिकारियों के रूप में कई अधिकारियों को नामित करेगा, जैसा कि मामला हो सकता है, इसके तहत सभी प्रशासनिक इकाइयों या कार्यालयों में आवश्यक हो सकता है इस अधिनियम के तहत सूचना के लिए अनुरोध करने वाले व्यक्तियों को जानकारी प्रदान करना।

(2) उप-धारा (1) के प्रावधानों के प्रति पूर्वाग्रह के बिना, प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण एक अधिकारी को इस अधिनियम के लागू होने के एक सौ दिनों के भीतर, प्रत्येक उप-विभागीय स्तर पर या अन्य उप-जिला स्तर पर एक केंद्रीय सहायक सूचना के रूप में नामित करेगा। अधिकारी या एक राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, इस अधिनियम के तहत सूचना या अपील के लिए आवेदन प्राप्त करने के लिए केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी या उप के तहत निर्दिष्ट वरिष्ठ अधिकारी को उसी सूचना को अग्रेषित करने के लिए। धारा 19 (धारा 1) या केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो:

बशर्ते कि केंद्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी या राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी को सूचना या अपील के लिए आवेदन दिया जाए, जैसा भी मामला हो, उप के तहत निर्दिष्ट प्रतिक्रिया के लिए अवधि की गणना में पांच दिनों की अवधि जोड़ी जाएगी। खंड 7 का खंड (1)।

(3) प्रत्येक केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, जानकारी मांगने वाले व्यक्तियों के अनुरोधों से निपटेंगे और ऐसी जानकारी प्राप्त करने वाले व्यक्तियों को उचित सहायता प्रदान करेंगे।

(4) केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, किसी अन्य अधिकारी की सहायता ले सकता है क्योंकि वह अपने कर्तव्यों के उचित निर्वहन के लिए आवश्यक समझता है।

(5) कोई भी अधिकारी, जिसकी सहायता उपधारा (4) के तहत मांगी गई है, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी को सभी सहायता प्रदान करेगा, जैसा भी मामला हो, उसकी सहायता और किसी भी उल्लंघन के प्रयोजनों के लिए इस अधिनियम के प्रावधानों में, ऐसे अन्य अधिकारी को केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के रूप में माना जाएगा, जैसा कि मामला हो सकता है।

Sec-6 (1) एक व्यक्ति, जो इस अधिनियम के तहत किसी भी जानकारी को प्राप्त करने की इच्छा रखता है, वह लिखित रूप में या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अंग्रेजी या हिंदी में या उस क्षेत्र की आधिकारिक भाषा में, जिसमें आवेदन किया जा रहा है, इस तरह के शुल्क के साथ निर्धारित किया जा सकता है। , सेवा-

(क) केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, संबंधित लोक प्राधिकरण का;

(ख) केंद्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी या राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो,

उसके या उसके व्दारा मांगी गई सूचना के विवरण को निर्दिष्ट करना:

बशर्ते कि इस तरह का अनुरोध लिखित रूप से नहीं किया जा सकता है, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी हो, लिखित रूप में उसी को कम करने के लिए अनुरोध करने वाले व्यक्ति को सभी उचित सहायता प्रदान करेगा।

(2) सूचना के लिए अनुरोध करने वाले आवेदक को सूचना या किसी अन्य व्यक्तिगत विवरण के अनुरोध के लिए कोई कारण बताने की आवश्यकता नहीं होगी, सिवाय इसके कि उनसे संपर्क करने के लिए आवश्यक हो।

(3) जहां एक आवेदन एक सूचना के लिए अनुरोध करने वाले सार्वजनिक प्राधिकरण के लिए किया जाता है, –
(i) जो एक अन्य सार्वजनिक प्राधिकरण व्दारा आयोजित किया जाता है; या
(ii) जिस विषय का विषय किसी अन्य सार्वजनिक प्राधिकरण, सार्वजनिक प्राधिकरण के कार्यों के साथ अधिक निकटता से जुड़ा हुआ है

जिसके लिए ऐसा आवेदन किया जाता है, वह आवेदन या उसके ऐसे हिस्से को अन्य सार्वजनिक प्राधिकरण के लिए उपयुक्त हो सकता है और आवेदक को सूचित करेगा। इस तरह के हस्तांतरण के बारे में तुरंत:

बशर्ते कि इस उप-धारा के अनुसार आवेदन का हस्तांतरण जल्द से जल्द किया जाएगा, लेकिन आवेदन की प्राप्ति की तारीख से पांच दिनों के बाद किसी भी स्थिति में नहीं।

Sec-7 (1) धारा 5 के उप-धारा (2) या धारा 6 के उप-खंड (3) के उप-धारा के अधीन, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा कि मामला हो सकता है, अनुरोध प्राप्त होने पर धारा 6 के तहत, जितनी जल्दी हो सके, और अनुरोध प्राप्त होने के तीस दिनों के भीतर किसी भी मामले में, या तो इस तरह के शुल्क के भुगतान के बारे में जानकारी प्रदान करें या निर्धारित किए गए किसी भी कारण के लिए अनुरोध को अस्वीकार कर दें। और 9:

बशर्ते कि जहां सूचना किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता की चिंताओं के लिए मांगी गई है, वही अनुरोध प्राप्त होने के अड़तालीस घंटों के भीतर प्रदान की जाएगी।

(2) यदि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, उप-धारा (1) के तहत निर्दिष्ट अवधि के भीतर सूचना के अनुरोध पर निर्णय देने में विफल रहता है, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, अनुरोध को अस्वीकार करने के लिए माना जाएगा।

(3) जहां सूचना प्रदान करने की लागत का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी भी आगे के शुल्क के भुगतान पर जानकारी प्रदान करने का निर्णय लिया जाता है, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, अनुरोध करने वाले व्यक्ति को सूचना भेजेगा ।

(क) उसके व्दारा निर्धारित जानकारी प्रदान करने की लागत का प्रतिनिधित्व करते हुए आगे की फीस का विवरण, साथ में उप-धारा (1) के तहत निर्धारित शुल्क के अनुसार राशि पर पहुंचने के लिए की गई गणना, उसे उस शुल्क और अवधि को जमा करने का अनुरोध करना। उस उप-धारा में निर्दिष्ट तीस दिनों की अवधि की गणना के उद्देश्य से उक्त सूचना और शुल्क के भुगतान के बीच का अंतर शामिल नहीं किया जाएगा; ।

(ख) अपीलीय प्राधिकारी, समय सीमा, प्रक्रिया और किसी भी अन्य रूपों के विवरण सहित शुल्क की राशि या प्रदान किए गए पहुंच के रूप में निर्णय की समीक्षा करने के संबंध में उसके अधिकार से संबंधित जानकारी।

(4) जहां इस अधिनियम के तहत रिकॉर्ड या उसके एक हिस्से तक पहुंच प्रदान की जानी आवश्यक है और जिस व्यक्ति तक पहुंच प्रदान की जानी है, वह संवेदक रूप से अक्षम है, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, प्रदान करेगा। निरीक्षण के लिए उपयुक्त हो सकती है, इस तरह की सहायता प्रदान करने सहित जानकारी का उपयोग करने के लिए सहायता।

(5) जहां सूचना का उपयोग मुद्रित या किसी भी इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में प्रदान किया जाना है, आवेदक उप-धारा (6) के प्रावधानों के अधीन होगा, ऐसे शुल्क का भुगतान करें जो निर्धारित किया जा सकता है:

बशर्ते कि धारा 6 के उप-खंड (1) और उप-वर्गों (1) और (5) की धारा 7 के तहत निर्धारित शुल्क उचित होगा और उन लोगों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा जो गरीबी रेखा से नीचे हैं। उचित सरकार व्दारा निर्धारित किया जाना चाहिए।

(6) सब-सेक्शन (5) में निहित कुछ के बावजूद,

सूचना के लिए अनुरोध करने वाले व्यक्ति को नि: शुल्क जानकारी प्रदान की जाएगी जहां एक सार्वजनिक प्राधिकरण उप-धारा (1) में निर्दिष्ट समय सीमा का पालन करने में विफल रहता है।

(7) उप-धारा (1) के तहत कोई भी निर्णय लेने से पहले, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, धारा 11 के तहत किसी तीसरे पक्ष व्दारा किए गए प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखेगा।

(8) जहां उप-धारा (1) के तहत अनुरोध को अस्वीकार कर दिया गया है, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, अनुरोध करने वाले व्यक्ति से संवाद करेगा, –
(i) ऐसी अस्वीकृति के कारण;
(ii) वह अवधि जिसके भीतर ऐसी अस्वीकृति के खिलाफ अपील को प्राथमिकता दी जा सकती है; तथा
(iii) अपीलीय प्राधिकारी के विवरण।

(9) एक सूचना आमतौर पर उस रूप में प्रदान की जाएगी जिसमें यह मांग की जाती है जब तक कि यह सार्वजनिक प्राधिकरण के संसाधनों को असुरक्षित रूप से मोड़ नहीं देगा या प्रश्न में रिकॉर्ड की सुरक्षा या संरक्षण के लिए हानिकारक होगा।

Sec-8 (1) इस अधिनियम में निहित कुछ भी होने के बावजूद, किसी भी नागरिक को देने की कोई बाध्यता नहीं होगी, –

(क) सूचना, जिसके प्रकटीकरण से भारत की संप्रभुता और अखंडता प्रभावित होगी, राज्य की सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हित, विदेशी राज्य के साथ संबंध या अपराध को बढ़ावा देने के लिए नेतृत्व;

(ख) ऐसी जानकारी जिसे किसी न्यायालय या न्यायाधिकरण व्दारा प्रकाशित करने के लिए स्पष्ट रूप से मना किया गया है या जिसके प्रकटीकरण से न्यायालय की अवमानना हो सकती है;

(ग) जानकारी, जिसके प्रकटीकरण से संसद या राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार का हनन होगा;

(घ) व्यावसायिक विश्वास, व्यापार रहस्य या बौद्धिक संपदा सहित जानकारी, जिसका प्रकटीकरण किसी तीसरे पक्ष की प्रतिस्पर्धी स्थिति को नुकसान पहुंचाएगा, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी संतुष्ट न हो कि बड़े जनहितकर्ता ऐसी जानकारी के प्रकटीकरण का वारंट करते हैं;

किसी व्यक्ति को उसके विवादास्पद संबंध में उपलब्ध जानकारी, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी संतुष्ट नहीं होता है कि बड़ा जनहित इस तरह की जानकारी का खुलासा करता है;

(ड़) विदेशी सरकार से विश्वास में प्राप्त जानकारी;

(च) जानकारी, जिसके प्रकटीकरण से किसी व्यक्ति की जीवन या शारीरिक सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी या कानून प्रवर्तन या सुरक्षा उद्देश्यों के लिए विश्वास में दी गई सूचना या सहायता के स्रोत की पहचान होगी;

(छ) वह सूचना जो अपराधियों की जांच या आशंका या अभियोजन की प्रक्रिया को बाधित करेगी;

(i) मंत्रिपरिषद, सचिवों और अन्य अधिकारियों के विचार-विमर्श के रिकॉर्ड सहित कैबिनेट पेपर:
बशर्ते कि मंत्रिपरिषद के निर्णय, उसके कारण, और जिस आधार पर निर्णय लिया गया है, उसके आधार पर सामग्री को निर्णय लेने के बाद सार्वजनिक किया जाएगा, और मामला पूरा, या खत्म हो गया है:
बशर्ते कि इस धारा में निर्दिष्ट छूट के तहत आने वाले मामलों का खुलासा नहीं किया जाएगा;

(ज) वह जानकारी जो व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित है, जिसके किसी भी सार्वजनिक गतिविधि या हित से कोई संबंध नहीं है, या जो तब तक किसी व्यक्ति की गोपनीयता के लिए अनुचित आक्रमण का कारण बनेगी जब तक कि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी या अपीलीय प्राधिकारी, मामला हो सकता है, संतुष्ट है कि बड़ा सार्वजनिक हित ऐसी जानकारी के प्रकटीकरण को सही ठहराता है:

बशर्ते कि जो जानकारी संसद या राज्य विधानमंडल से इनकार नहीं की जा सकती है, उसे किसी व्यक्ति को अस्वीकार नहीं किया जाएगा।

(2) आधिकारिक रहस्य अधिनियम, 1923 में कुछ भी नहीं होने के बावजूद और न ही उप-धारा (1) के अनुसार स्वीकार्य कोई छूट, एक सार्वजनिक प्राधिकरण जानकारी तक पहुंच की अनुमति दे सकता है, अगर प्रकटीकरण में सार्वजनिक हित संरक्षित हितों को नुकसान पहुंचाता है।

(3) उप-धारा (1) के खंडों (ए), (सी) और (i) के प्रावधानों के अधीन, किसी भी घटना, घटना या मामले से संबंधित कोई भी जानकारी, जो उस तारीख से बीस साल पहले हुई या हुई हो। किसी भी अनुरोध को अनुभाग 6 के तहत किया जाता है, उस अनुभाग के तहत अनुरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति को प्रदान किया जाएगा:

बशर्ते कि जहां कोई प्रश्न उठता है, उस तारीख से लेकर बीस साल की उक्त अवधि की गणना की जानी चाहिए, तो केंद्र सरकार का निर्णय अंतिम होगा, जो इस अधिनियम में दी गई सामान्य अपीलों के अधीन है।

Sec-9 धारा 8 के प्रावधानों, किसी केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या एक राज्य लोक सूचना अधिकारी के पक्षपात के बिना, जैसा भी मामला हो, जानकारी के लिए एक अनुरोध को अस्वीकार कर सकता है जहां पहुंच प्रदान करने के लिए इस तरह के अनुरोध में किसी व्यक्ति में कॉपीराइट का उल्लंघन शामिल होगा। राज्य के अलावा।

Sec-10 (2) जहां उप-धारा (1) के तहत रिकॉर्ड के एक हिस्से तक पहुंच दी जाती है, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, आवेदक को एक सूचना देगा, सूचित करेगा-

(क) रिकॉर्ड के केवल उस हिस्से का अनुरोध किया गया, जो रिकॉर्ड से विच्छेद करने के बाद जानकारी जिसमें छूट से छूट दी गई है, प्रदान की जा रही है;

(ख) तथ्य के किसी भी भौतिक प्रश्न पर किसी भी निष्कर्ष सहित निर्णय के कारणों, उस निष्कर्ष पर आधारित सामग्री का उल्लेख करना;

(ग) निर्णय देने वाले व्यक्ति का नाम और पदनाम;

(घ) उसके या उसके व्दारा जमा की गई फीस का विवरण और आवेदक को जमा करने के लिए आवश्यक शुल्क की राशि; तथा

(ड़) सूचना के भाग के गैर-प्रकटीकरण, शुल्क की राशि या पहुंच के रूप में दिए गए निर्णय की समीक्षा के संबंध में उसके अधिकार, उप-धारा (1) के तहत निर्दिष्ट वरिष्ठ अधिकारी के विवरण सहित 19 या केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा कि मामला हो सकता है, समय सीमा, प्रक्रिया और किसी अन्य प्रकार का उपयोग।

Sec-11 (1) जहां केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, इस अधिनियम के तहत किए गए एक अनुरोध पर किसी भी जानकारी या रिकॉर्ड का खुलासा करने या उसके हिस्से का खुलासा करने का इरादा रखता है, जो तीसरे पक्ष व्दारा आपूर्ति की गई है या उससे संबंधित है। उस तीसरे पक्ष व्दारा गोपनीय माना गया है, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, अनुरोध प्राप्त होने के पांच दिनों के भीतर, अनुरोध के ऐसे तीसरे पक्ष को एक लिखित नोटिस दे सकता है। और इस तथ्य के अनुसार कि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, सूचना या रिकॉर्ड, या उसके भाग का खुलासा करने का इरादा रखता है, और तीसरे पक्ष को लिखित या मौखिक रूप से प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित करता है, इस बारे में कि क्या है जानकारी का खुलासा किया जाना चाहिए,और जानकारी के प्रकटीकरण के बारे में निर्णय लेते समय तीसरे पक्ष के ऐसे प्रस्ताव को ध्यान में रखा जाएगा:

बशर्ते कि कानून व्दारा संरक्षित व्यापार या वाणिज्यिक रहस्यों के मामले में, प्रकटीकरण की अनुमति दी जा सकती है, अगर सार्वजनिक रूप से प्रकटीकरण में सार्वजनिक हित ऐसे तीसरे पक्ष के हितों के लिए किसी भी संभावित नुकसान या चोट से बाहर निकलते हैं।

(2) जहां केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी व्दारा एक नोटिस दिया जाता है, जैसा भी मामला हो, किसी भी जानकारी या रिकॉर्ड या उसके भाग के संबंध में किसी तीसरे पक्ष को उप-धारा (1) के तहत, तीसरा पक्ष, इस तरह के नोटिस की प्राप्ति की तारीख से दस दिनों के भीतर, प्रस्तावित प्रकटीकरण के खिलाफ प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया जाए।

(3) धारा 7, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के मामले में कुछ भी होने के बावजूद, जैसा कि मामला हो सकता है, धारा 6 के तहत अनुरोध प्राप्त होने के चालीस दिनों के भीतर, यदि तीसरे पक्ष को प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया गया हो उप-धारा (2) के तहत, जानकारी या रिकॉर्ड या उसके भाग का खुलासा करने या न करने के बारे में निर्णय करें और अपने निर्णय के नोटिस को तीसरे पक्ष को लिखित रूप में दें।

(4) उप-धारा (3) के तहत दिए गए एक नोटिस में यह कथन शामिल होगा कि जिस तीसरे पक्ष को नोटिस दिया गया है, वह फैसले के खिलाफ धारा 19 के तहत अपील करना पसंद करता है।

अध्याय-3

केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission)

Sec-12 1) केंद्र सरकार, सरकारी राजपत्र में अधिसूचना व्दारा, निकाय को केंद्रीय सूचना आयोग के रूप में जाना जाता है, जिसे इस अधिनियम के तहत प्रदान की गई शक्तियों का प्रयोग करना है, और इस अधिनियम के तहत इसे सौंपे गए कार्यों को पूरा करना है।2) केंद्रीय सूचना आयोग इसमें शामिल होगा-

(क) मुख्य सूचना आयुक्त; तथा

(ख) केंद्रीय सूचना आयुक्तों की संख्या, दस से अधिक नहीं, जैसा कि आवश्यक समझा जा सकता है।

3) मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति की सिफारिश पर राष्ट्रपति व्दारा की जाएगी -(i) प्रधान मंत्री, जो समिति के अध्यक्ष होंगे;
(ii) लोकसभा में विपक्ष के नेता; तथा
(iii) केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को प्रधानमंत्री व्दारा नामित किया जाना है।

4) केंद्रीय सूचना आयोग के मामलों का सामान्य अधीक्षण, निर्देशन और प्रबंधन मुख्य सूचना आयुक्त में निहित होगा, जो सूचना आयुक्तों व्दारा सहायता प्रदान करेगा और ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग कर सकता है और ऐसे सभी कार्य और कार्य कर सकता है, जिनका प्रयोग या किया जा सकता है। केंद्रीय सूचना आयोग स्वायत्त रूप से इस अधिनियम के तहत किसी अन्य प्राधिकारी के निर्देशों के अधीन नहीं है।

5) मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त कानून, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, सामाजिक सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जन मीडिया या प्रशासन और शासन में व्यापक ज्ञान और अनुभव के साथ सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित होंगे।6) मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संसद सदस्य या विधानमंडल के सदस्य नहीं होंगे, जैसा कि मामला हो सकता है, या किसी अन्य लाभ का पद धारण कर सकता है या किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हो सकता है या किसी को ले जा सकता है। व्यवसाय या किसी पेशे का पीछा करना।7) केंद्रीय सूचना आयोग का मुख्यालय दिल्ली में होगा और केंद्रीय सूचना आयोग, केंद्र सरकार की पिछली मंजूरी के साथ भारत में अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकता है।

Sec-13 1) मुख्य सूचना आयुक्त उस पद से पाँच वर्ष के लिए पद धारण करेगा जिस तिथि पर वह अपने कार्यालय में प्रवेश करेगा और पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा:
बशर्ते कोई भी मुख्य सूचना आयुक्त पद धारण नहीं करेगा, जैसे कि पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद।

2) प्रत्येक सूचना आयुक्त उस पद से पाँच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा, जिस दिन वह अपने कार्यालय में प्रवेश करता है या जब तक वह पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेता, जो भी पहले हो, और ऐसे आयुक्त के रूप में पुन: नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा:

बशर्ते कि प्रत्येक सूचना आयुक्त इस उप-धारा के तहत अपने कार्यालय को खाली करने पर, मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में उप-धारा (3) की धारा 12 में निर्दिष्ट तरीके से नियुक्ति के लिए पात्र होंगे:
बशर्ते कि जहां सूचना आयुक्त को मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्त किया जाता है, सूचना आयुक्त और मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में उनका पद पांच साल से अधिक नहीं होगा।3) मुख्य सूचना आयुक्त या एक सूचना आयुक्त अपने कार्यालय में प्रवेश करने से पहले राष्ट्रपति या किसी अन्य व्यक्ति व्दारा उस पक्ष में नियुक्त या सदस्यता लेने से पहले पहली अनुसूची में दिए गए फॉर्म के अनुसार शपथ या पुष्टि करेंगे।4) मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त किसी भी समय राष्ट्रपति को संबोधित अपने हाथ से लिखकर अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं:
बशर्ते कि मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त को धारा 14 के तहत निर्दिष्ट तरीके से हटाया जा सकता है।
5) के वेतन और भत्ते और सेवा के अन्य नियम और शर्तें –

(क) मुख्य सूचना आयुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में ही होगा;

(ख) एक सूचना आयुक्त चुनाव आयुक्त के समान होगा:

बशर्ते कि अगर मुख्य सूचना आयुक्त या एक सूचना आयुक्त, उनकी नियुक्ति के समय, पेंशन की प्राप्ति में, विकलांगता या घाव पेंशन के अलावा, भारत सरकार के अधीन किसी पिछली सेवा के संबंध में या सरकार के अधीन है एक राज्य, मुख्य सूचना आयुक्त या एक सूचना आयुक्त के रूप में सेवा के संबंध में उसका वेतन उस पेंशन की राशि से कम हो जाएगा जिसमें पेंशन का कोई हिस्सा शामिल था, जो पेंशन के सेवानिवृत्ति के अन्य रूपों के समान पेंशन और सेवानिवृत्ति के लाभों के बराबर था। ग्रेच्युटी,

बशर्ते कि मुख्य सूचना आयुक्त या एक सूचना आयुक्त, यदि उनकी नियुक्ति के समय, किसी केंद्रीय सेवा या राज्य अधिनियम या सरकार व्दारा स्थापित निगम में प्रदान की गई किसी भी पिछली सेवा के संबंध में सेवानिवृत्ति का लाभ प्राप्त करता है। केंद्र सरकार या राज्य सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण वाली कंपनी, मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त के रूप में सेवा के संबंध में उनका वेतन सेवानिवृत्ति लाभों के बराबर पेंशन की राशि से कम हो जाएगा ।

बशर्ते कि मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की सेवा के वेतन, भत्ते और अन्य शर्तें उनकी नियुक्ति के बाद उनके नुकसान के लिए भिन्न नहीं होंगी।6) केंद्र सरकार ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त प्रदान करेगी जो इस अधिनियम के तहत अपने कार्यों के कुशल प्रदर्शन के लिए आवश्यक हो सकते हैं, और अधिकारियों के सेवा के नियमों और शर्तों के लिए देय वेतन और भत्ते और इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए नियुक्त अन्य कर्मचारी ऐसे होंगे जिन्हें निर्धारित किया जा सकता है।

Sec-14 1) उप-धारा (3) के प्रावधानों के अधीन, मुख्य सूचना आयुक्त या किसी भी सूचना आयुक्त को उनके कार्यालय से केवल राष्ट्रपति के आदेश के आधार पर हटा दिया जा सकता है, सुप्रीम कोर्ट के संदर्भ में गलत व्यवहार या अक्षमता के आधार पर, एक संदर्भ में किए गए संदर्भ में यह राष्ट्रपति व्दारा, जांच पर, रिपोर्ट किया है कि मुख्य सूचना आयुक्त या किसी भी सूचना आयुक्त, जैसा भी मामला हो, इस तरह के आधार पर हटाया जाना चाहिए।2) राष्ट्रपति को कार्यालय से निलंबित किया जा सकता है, और यदि जांच के दौरान कार्यालय में भाग लेने से भी डीम आवश्यक निषेध है, तो मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त जिनके संबंध में सुप्रीम कोर्ट व्दारा उप-धारा (1) के तहत राष्ट्रपति के पास एक संदर्भ दिया गया है ऐसे संदर्भ पर उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट प्राप्त होने के आदेश पारित किए हैं।3) सब-सेक्शन (1) में कुछ भी होने के बावजूद, राष्ट्रपति मुख्य सूचना आयुक्त या किसी सूचना आयुक्त को कार्यालय से हटाने का आदेश दे सकते हैं यदि मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त, जैसा भी मामला हो, –

(क) एक दिवालिया माना जाता है; या

(ख) को एक अपराध का दोषी ठहराया गया है, जिसमें राष्ट्रपति की राय में नैतिक संकीर्णता शामिल है; या(ग) अपने कार्यालय के कर्तव्यों के बाहर किसी भी भुगतान किए गए रोजगार में अपने कार्यकाल के दौरान संलग्न है; या(घ) राष्ट्रपति की राय में, मन या शरीर की दुर्बलता के कारण कार्यालय में जारी रखने के लिए अयोग्य; या
(ड़) इस तरह के वित्तीय या अन्य ब्याज का अधिग्रहण किया है, मुख्य कार्यकारी आयुक्त या सूचना आयुक्त के रूप में अपने कार्यों को प्रभावित करने की संभावना है।4) यदि मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त किसी भी तरह से, भारत सरकार की ओर से किए गए किसी भी अनुबंध या समझौते में संबंधित या रुचि रखते हैं या किसी भी तरह से लाभ में या किसी भी तरह से लाभ या वहां से उत्पन्न होने वाले किसी भी भाग में भाग लेते हैं एक सदस्य के रूप में और एक निगमित कंपनी के अन्य सदस्यों के साथ आम तौर पर, वह उप-धारा (1) के प्रयोजनों के लिए, दुर्व्यवहार के लिए दोषी माना जाएगा।

अध्याय-4

राज्य सूचना आयोग (State information commission)

Sec-15 1) प्रत्येक राज्य सरकार, आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना व्दारा, निकाय का गठन ……… (राज्य का नाम) सूचना आयोग के रूप में किया जाएगा, जो शक्तियों को प्रदान करने के लिए, और सौंपे गए कार्यों को पूरा करने के लिए करेगा। इस अधिनियम के तहत इसे ।

2) राज्य सूचना आयोग से मिलकर बनेगा-(क) राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त, और(ख) राज्य सूचना आयुक्तों की ऐसी संख्या, जो दस से अधिक न हो, आवश्यक समझा जा सकता है।3) राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति की सिफारिश पर राज्यपाल व्दारा की जाएगी -(i) मुख्यमंत्री, जो समिति के अध्यक्ष होंगे;(ii) विधान सभा में विपक्ष के नेता; तथा(iii) मुख्यमंत्री व्दारा नामांकित किया जाने वाला कैबिनेट मंत्री।

स्पष्टीकरण – संदेह को दूर करने के प्रयोजनों के लिए, यह एतद्द्वारा घोषित किया जाता है कि जहाँ विधान सभा में विपक्ष के नेता को मान्यता नहीं दी गई है, वहाँ विधान सभा में सरकार के विरोध में सबसे बड़े समूह के नेता होंगे विपक्ष का नेता माना जाता है।

4) राज्य सूचना आयोग के मामलों के सामान्य अधीक्षण, निर्देशन और प्रबंधन राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त को निहित करेंगे, जिन्हें राज्य सूचना आयुक्तों व्दारा सहायता प्रदान की जाएगी और वे ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग कर सकते हैं और ऐसे सभी कार्य और कार्य कर सकते हैं, जिनका प्रयोग या किया जा सकता है। राज्य सूचना आयोग व्दारा स्वायत्त रूप से इस अधिनियम के तहत किसी अन्य प्राधिकारी के निर्देशों के अधीन किए बिना।5) राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त कानून, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, सामाजिक सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, मास मीडिया या प्रशासन और शासन में व्यापक ज्ञान और अनुभव के साथ सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित होंगे।6) राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त या एक राज्य सूचना आयुक्त किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संसद सदस्य या विधानमंडल के सदस्य नहीं होंगे, जैसा भी मामला हो, या किसी अन्य लाभ का पद धारण किया हो या किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हो या लेकर रहा हो किसी भी व्यवसाय पर या किसी भी व्यवसाय को आगे बढ़ाने पर।7) राज्य सूचना आयोग का मुख्यालय राज्य में ऐसे स्थान पर होगा जैसा कि राज्य सरकार, सरकारी राजपत्र में अधिसूचना व्दारा निर्दिष्ट कर सकती है और राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन के साथ राज्य सूचना आयोग अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकती है। राज्य में।

Sec-16 1) राज्य मुख्य सूचना आयुक्त उस पद से पाँच वर्ष के लिए पद धारण करेगा जिस तिथि पर वह अपने कार्यालय में प्रवेश करेगा और पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा:बशर्ते कि कोई राज्य मुख्य सूचना आयुक्त पद धारण नहीं करेगा, क्योंकि वह पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर चुका है।

2) प्रत्येक राज्य सूचना आयुक्त उस तिथि से पाँच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा, जिस दिन वह अपने कार्यालय में प्रवेश करता है या जब तक वह पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेता, जो भी पहले हो, और ऐसी राज्य सूचना के लिए पुन: नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा। आयुक्त:बशर्ते कि प्रत्येक राज्य सूचना आयुक्त इस उप-धारा के तहत अपने कार्यालय को खाली करने पर, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में उप-धारा (3) की धारा 15 में निर्दिष्ट तरीके से नियुक्ति के लिए पात्र होंगे: इसके अलावा, जहां राज्य सूचना आयुक्त को राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्त किया जाता है, उनका पद कार्यकाल राज्य सूचना आयुक्त और राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में कुल मिलाकर पांच वर्ष से अधिक नहीं होगा।

3) राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त, अपने कार्यालय में प्रवेश करने से पहले राज्यपाल और उस व्यक्ति व्दारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति की सदस्यता ले लेंगे, इस उद्देश्य के लिए निर्धारित प्रपत्र के अनुसार शपथ या पुष्टि पहली अनुसूची।

4) राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त किसी भी समय राज्यपाल को संबोधित अपने हाथ से लिखकर अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं:बशर्ते कि राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त को धारा 17 के तहत निर्दिष्ट तरीके से हटाया जा सकता है।

5) के वेतन और भत्ते और सेवा के अन्य नियम और शर्तें -(क) राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त चुनाव आयुक्त के समान ही होंगे;(ख) राज्य सूचना आयुक्त राज्य सरकार के मुख्य सचिव के समान ही होंगे:बशर्ते कि अगर राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त, उनकी नियुक्ति के समय, पेंशन की प्राप्ति में, विकलांगता या घाव पेंशन के अलावा, भारत सरकार के अधीन किसी पिछली सेवा के संबंध में या राज्य सरकार, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त के रूप में सेवा के संबंध में उनका वेतन उस पेंशन की राशि से कम हो जाएगा, जिसमें पेंशन का कोई हिस्सा शामिल था, जो पेंशन और सेवानिवृत्ति के अन्य रूपों के पेंशन के बराबर था। सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी के बराबर पेंशन:बशर्ते कि राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त, जहां उनकी नियुक्ति के समय, निगम में या किसी केंद्रीय अधिनियम या राज्य अधिनियम के तहत स्थापित निगम में प्रदान की गई किसी भी पिछली सेवा के संबंध में सेवानिवृत्ति के लाभ की प्राप्ति में है। केंद्र सरकार या राज्य सरकार के स्वामित्व वाली या नियंत्रित एक सरकारी कंपनी, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त के रूप में सेवा के संबंध में उनका वेतन सेवानिवृत्ति लाभों के बराबर पेंशन की राशि से कम हो जाएगा:बशर्ते कि राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों की सेवा के वेतन, भत्ते और अन्य शर्तें उनकी नियुक्ति के बाद उनके नुकसान के लिए भिन्न नहीं होंगी।

6) राज्य सरकार ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त उपलब्ध कराएगी जो इस अधिनियम के तहत अपने कार्यों के कुशल प्रदर्शन के लिए आवश्यक हो सकते हैं, और वेतन और भत्ते देय हो सकते हैं और सेवा के नियम और शर्तें इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए नियुक्त अधिकारी और अन्य कर्मचारी ऐसे होंगे जिन्हें निर्धारित किया जा सकता है।

Section-16

Sec-17 1) उप-धारा (3) के प्रावधानों के अधीन, राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त या एक राज्य सूचना आयुक्त को उनके कार्यालय से केवल राज्यपाल के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट के संदर्भ में दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर हटा दिया जाएगा। राज्यपाल व्दारा इसे करने के लिए, जाँच पर, रिपोर्ट किया गया है कि राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त या एक राज्य सूचना आयुक्त, जैसा भी मामला हो, इस तरह के आधार पर हटाया जाना चाहिए।

2) राज्यपाल को कार्यालय से निलंबित किया जा सकता है, और यदि पूछताछ के दौरान कार्यालय में भाग लेने से डीम आवश्यक निषेध भी करता है, तो राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त जिनके संदर्भ में उप-धारा (1) के तहत सुप्रीम कोर्ट में एक संदर्भ दिया गया है जब तक कि राज्यपाल ने ऐसे संदर्भ पर उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट प्राप्त होने के आदेश पारित नहीं किए हैं।

3) उप-धारा (1) में निहित कुछ भी होने के बावजूद, राज्यपाल राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त, जैसे भी मामला हो, कार्यालय से हटा सकते हैं।

(क) एक दिवालिया घोषित किया जाता है; या

(ख) को एक अपराध का दोषी ठहराया गया है, जिसमें राज्यपाल की राय में नैतिक संकीर्णता शामिल है; या

(ग) अपने कार्यालय के कर्तव्यों के बाहर किसी भी भुगतान किए गए रोजगार में अपने कार्यकाल के दौरान संलग्न है; या

(घ) राज्यपाल की राय में, मन या शरीर की दुर्बलता के कारण पद पर बने रहने के लिए अयोग्य; या(ड़) राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त के रूप में इस तरह के वित्तीय या अन्य ब्याज का अधिग्रहण करने की संभावना है जो उनके कार्यों को प्रभावित करेगा।

4) यदि राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त किसी भी तरह से, राज्य सरकार की ओर से या उसके व्दारा किए गए किसी भी अनुबंध या समझौते में संबंधित या रुचि रखते हैं या किसी भी तरह से या किसी भी लाभ या परिलब्धियों के लाभ में भाग लेते हैं एक सदस्य के रूप में अन्यथा और एक निगमित कंपनी के अन्य सदस्यों के साथ आम तौर पर, वह उप-धारा (1) के प्रयोजनों के लिए, दुर्व्यवहार के लिए दोषी माना जाएगा।

अध्याय-5

सूचना आयोगों की शक्तियां और कार्य, अपील और दंड (Powers and functions of information commissions, appeals and penalties)

Sec-18 1) इस अधिनियम के प्रावधानों के अधीन, यह केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग का कर्तव्य होगा, जैसा भी मामला हो, किसी भी व्यक्ति से शिकायत प्राप्त करने और पूछताछ करने के लिए, –

(क) जो केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी को अनुरोध प्रस्तुत करने में असमर्थ रहा है, जैसा भी मामला हो, या तो इस कारण से कि इस अधिनियम के तहत कोई भी अधिकारी नियुक्त नहीं किया गया है, या केंद्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी या राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी, जैसा कि मामला हो सकता है, ने इस अधिनियम के तहत सूचना या अपील के लिए अपने आवेदन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।

1) धारा 19 या केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो;

(ख) इस अधिनियम के तहत मांगी गई किसी भी जानकारी तक पहुंचने से इनकार कर दिया गया है;

(ग) जिसे इस अधिनियम के तहत निर्दिष्ट समय सीमा के भीतर सूचना या सूचना तक पहुंच के अनुरोध का जवाब नहीं दिया गया है;

(घ) जिसे शुल्क की राशि का भुगतान करना आवश्यक है जिसे वह अनुचित मानता है;

(ड़) जो मानता है कि उसे इस अधिनियम के तहत अधूरी, भ्रामक या गलत जानकारी दी गई है; तथा

(च) इस अधिनियम के तहत अभिलेखों का अनुरोध करने या प्राप्त करने से संबंधित किसी अन्य मामले के संबंध में।

2) जहां केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो, संतुष्ट है कि इस मामले में पूछताछ करने के लिए उचित आधार हैं, यह उसके संबंध में एक जांच शुरू कर सकता है।

3) केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो, इस धारा के तहत किसी भी मामले में पूछताछ कर सकता है, उसके पास वैसी ही शक्तियां होंगी, जो नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत मुकदमा चलाने के दौरान दीवानी अदालत में निहित होती हैं। निम्नलिखित मामलों के संबंध में, अर्थात्: –

(क) व्यक्तियों की उपस्थिति को बुलाना और लागू करना और उन्हें शपथ पर मौखिक या लिखित साक्ष्य देने और दस्तावेजों या चीजों का उत्पादन करने के लिए मजबूर करना;

(ख) दस्तावेजों की खोज और निरीक्षण की आवश्यकता;

(ग) शपथ पत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना;

(घ) किसी भी सार्वजनिक रिकॉर्ड या किसी भी अदालत या कार्यालय से प्रतियां की आवश्यकता;(ड़) गवाहों या दस्तावेजों की जांच के लिए सम्मन जारी करना; तथा

(च) कोई अन्य मामला जो निर्धारित किया जा सकता है।

4) संसद या राज्य विधानमंडल के किसी भी अन्य अधिनियम में निहित किसी भी चीज के बावजूद, जैसा भी मामला हो, केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो, इस अधिनियम के तहत किसी भी शिकायत की जांच के दौरान, किसी भी जांच कर सकता है यह रिकॉर्ड जिसके लिए यह अधिनियम लागू होता है, जो सार्वजनिक प्राधिकरण के नियंत्रण में है, और ऐसा कोई भी रिकॉर्ड किसी भी आधार पर इसे रोक नहीं सकता है।

Sec-19 1) कोई भी व्यक्ति, जो उप-धारा (1) या खंड 7 के खंड (क) में निर्दिष्ट समय के भीतर कोई निर्णय प्राप्त नहीं करता है, या केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य के किसी निर्णय से दुखी होता है लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, ऐसी अवधि समाप्त होने के तीस दिनों के भीतर या इस तरह के निर्णय की प्राप्ति से ऐसे अधिकारी की अपील पसंद कर सकते हैं जो केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के पद पर वरिष्ठ हो। जैसा कि मामला हो सकता है, प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण में:बशर्ते कि ऐसा अधिकारी तीस दिनों की अवधि समाप्त होने के बाद अपील स्वीकार कर सकता है यदि वह संतुष्ट है कि अपीलकर्ता को समय पर अपील दायर करने से पर्याप्त कारण से रोका गया था।

2) जहां एक अपील केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी व्दारा किए गए आदेश के खिलाफ पसंद की जाती है, जैसा कि मामला हो सकता है, तीसरे पक्ष की जानकारी का खुलासा करने के लिए धारा 11 के तहत, संबंधित तीसरे पक्ष व्दारा अपील तीस दिनों के भीतर की जाएगी। आदेश की तिथि से।

3) उप-धारा (1) के तहत निर्णय के खिलाफ एक दूसरी अपील केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग के साथ उस तारीख से नब्बे दिनों के भीतर होगी, जिस दिन निर्णय लिया जाना चाहिए था या वास्तव में प्राप्त किया गया था: बशर्ते कि केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो, नब्बे दिनों की अवधि समाप्त होने के बाद अपील स्वीकार कर सकता है यदि यह संतुष्ट हो कि अपीलकर्ता को समय पर अपील दायर करने से पर्याप्त कारण से रोका गया था।

4) यदि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी का निर्णय, जैसा कि मामला हो सकता है, जिसके विरूद्ध अपील को प्राथमिकता दी जाती है, जैसा कि मामला हो, केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, से संबंधित हो सकता है। उस तीसरे पक्ष को सुनने का उचित अवसर देंगे।

5) किसी भी अपील की कार्यवाही में, यह साबित करने के लिए कि किसी अनुरोध का खंडन उचित था, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी पर होगा, जैसा कि मामला हो सकता है, जिन्होंने अनुरोध से इनकार किया है।

6) उप-धारा (1) या उप-धारा (2) के तहत अपील की प्राप्ति के तीस दिनों के भीतर या ऐसी विस्तारित अवधि के भीतर कुल दाखिल करने की तारीख से पैंतालीस दिनों से अधिक नहीं होने पर निपटाया जाएगा, जैसा भी हो, लिखित में दर्ज किए जाने के कारणों के लिए।

7) जैसा भी मामला हो, केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग का निर्णय बाध्यकारी होगा।

8) अपने निर्णय में, केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो, करने की शक्ति है-

(क) इस अधिनियम के प्रावधानों का अनुपालन करने के लिए आवश्यक कदम उठाने के लिए सार्वजनिक प्राधिकरण की आवश्यकता है, जिसमें शामिल हैं-

(i) सूचना तक पहुंच प्रदान करके, यदि किसी विशेष रूप में ऐसा अनुरोध किया गया हो;

(ii) केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी नियुक्त करके, जैसा भी मामला हो;(iii) कुछ सूचनाओं या सूचनाओं की श्रेणियों को प्रकाशित करके;

(iv) अभिलेखों के रखरखाव, प्रबंधन और विनाश के संबंध में इसकी प्रथाओं में आवश्यक परिवर्तन करके;(v) अपने अधिकारियों के लिए सूचना के अधिकार पर प्रशिक्षण के प्रावधान को बढ़ाकर;
(हम) धारा 4 की उप-धारा (1) के खंड (बी) के अनुपालन में एक वार्षिक रिपोर्ट प्रदान करके;
(ख) किसी भी नुकसान या अन्य नुकसान के लिए शिकायतकर्ता को क्षतिपूर्ति करने के लिए सार्वजनिक प्राधिकरण की आवश्यकता होती है;(ग) इस अधिनियम के तहत प्रदान किए गए किसी भी दंड को लागू करना;(घ) आवेदन को अस्वीकार करें।9) केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो, शिकायतकर्ता और सार्वजनिक प्राधिकरण को अपील के किसी भी अधिकार सहित अपने निर्णय का नोटिस देगा।10) केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो, इस तरह की प्रक्रिया के अनुसार अपील को निर्धारित कर सकता है।

Sec-20 1) जैसा कि केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो, किसी भी शिकायत या अपील का निर्णय लेने के समय होता है कि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, , बिना किसी उचित कारण के, सूचना के लिए एक आवेदन पत्र प्राप्त करने से इनकार कर दिया है या धारा 7 की उप-धारा (1) के तहत निर्दिष्ट समय के भीतर सूचना को प्रस्तुत नहीं किया है या जानकारी के अनुरोध या जानबूझकर गलत, अधूरी या भ्रामक जानकारी देने या नष्ट करने से इनकार कर दिया है जानकारी जो अनुरोध का विषय था या जानकारी प्रस्तुत करने में किसी भी तरह से बाधा उत्पन्न हुई, वह आवेदन प्राप्त होने तक या जानकारी प्राप्त होने तक प्रत्येक दिन दो सौ और पचास रुपये का जुर्माना लगाएगा, लेकिन फिर भी,ऐसे जुर्माने की कुल राशि पच्चीस हजार रुपए से अधिक नहीं होगी: बशर्ते कि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, उस पर कोई भी जुर्माना लगाने से पहले सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा:बशर्ते कि यह साबित करने का बोझ कि वह यथोचित और लगन से काम करता है, जैसा कि मामला हो सकता है, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी पर होगा।

2) जैसा कि केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो, किसी भी शिकायत या अपील का निर्णय लेने के समय होता है कि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, , बिना किसी उचित कारण और दृढ़ता के, जानकारी के लिए एक आवेदन प्राप्त करने में विफल रहा है या धारा 7 की उप-धारा (1) के तहत निर्दिष्ट समय के भीतर जानकारी से लैस नहीं किया है या जानकारी के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया है या जानबूझकर गलत, अपूर्ण या गलत जानकारी दी है या नष्ट की गई सूचना, जो सूचना प्रस्तुत करने में किसी भी तरीके से अनुरोध या बाधा का विषय थी, यह केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश करेगी,जैसा भी मामला हो, उसके लिए लागू सेवा नियमों के तहत हो सकता है।

अध्याय-6

Sec-21 कोई भी मुकदमा, अभियोजन या अन्य कानूनी कार्यवाही किसी भी व्यक्ति के खिलाफ झूठ नहीं बोलेगी, जो इस अधिनियम या उसके तहत किए गए किसी भी नियम के तहत किया गया अच्छा विश्वास है या किया जाना है।

Sec-22 इस अधिनियम के प्रावधानों को आधिकारिक रहस्य अधिनियम, 1923 में निहित किसी भी असंगत प्रभाव के बावजूद और इस कानून के अलावा किसी भी कानून के प्रभाव में लागू होने वाले समय या किसी भी अन्य कानून में निहित किसी भी अन्य कानून के लिए प्रभावी होगा।

Sec-23 कोई भी अदालत इस अधिनियम के तहत किए गए किसी भी आदेश के संबंध में किसी भी वाद, आवेदन या अन्य कार्यवाही का मनोरंजन नहीं करेगी और इस अधिनियम के तहत अपील के माध्यम से इस तरह के किसी भी आदेश को अन्यथा नहीं बुलाया जाएगा।

Sec-24 1) इस अधिनियम में निहित कुछ भी दूसरी अनुसूची में निर्दिष्ट खुफिया और सुरक्षा संगठनों पर लागू नहीं होगा, केंद्र सरकार व्दारा स्थापित संगठन या उस सरकार व्दारा ऐसे संगठनों से लैस कोई जानकारी:बशर्ते कि इस उप-धारा के तहत भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों से संबंधित जानकारी को बाहर नहीं किया जाएगा:बशर्ते कि मांगी गई सूचना के मामले में मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों के संबंध में, सूचना केवल केंद्रीय सूचना आयोग की मंजूरी के बाद प्रदान की जाएगी, और धारा 7 में शामिल किसी भी चीज के बावजूद, ऐसी जानकारी भीतर प्रदान की जाएगी। अनुरोध की प्राप्ति की तारीख से पैंतालीस दिन।

2) केंद्र सरकार, सरकारी राजपत्र में अधिसूचना व्दारा, उस सरकार व्दारा स्थापित किसी अन्य खुफिया या सुरक्षा संगठन को शामिल करके अनुसूची में संशोधन कर सकती है या उसमें पहले से निर्दिष्ट किसी भी संगठन को छोड़ सकती है और इस तरह की अधिसूचना के प्रकाशन पर, ऐसे संगठन को समझा जाएगा। में शामिल किया जा सकता है, जैसा भी हो, अनुसूची से छोड़ा जा सकता है।

3) उप-धारा (2) के तहत जारी प्रत्येक अधिसूचना संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी।

4) इस अधिनियम में निहित कुछ भी इस तरह के खुफिया और सुरक्षा संगठन पर लागू नहीं होगा जो राज्य सरकार व्दारा स्थापित संगठन हैं, जैसा कि सरकार समय-समय पर आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना व्दारा निर्दिष्ट कर सकती है:बशर्ते कि इस उप-धारा के तहत भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों से संबंधित जानकारी को बाहर नहीं किया जाएगा:बशर्ते कि मांगी गई सूचना के मामले में मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों के संबंध में, सूचना केवल राज्य सूचना आयोग के अनुमोदन के बाद प्रदान की जाएगी और धारा 7 में निहित कुछ के बावजूद, ऐसी जानकारी भीतर प्रदान की जाएगी। अनुरोध की प्राप्ति की तारीख से पैंतालीस दिन।

5) उप-धारा (4) के तहत जारी प्रत्येक अधिसूचना राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाएगी।

Section-24

Sec-25 1) केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग, जैसा भी मामला हो, प्रत्येक वर्ष के अंत के बाद जैसे ही व्यवहारिक हो, उस वर्ष के दौरान इस अधिनियम के प्रावधानों के कार्यान्वयन पर एक रिपोर्ट तैयार करें और उसकी एक प्रति आगे भेजें। उपयुक्त सरकार।

2) प्रत्येक मंत्रालय या विभाग अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर सार्वजनिक प्राधिकारियों के संबंध में, केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को इस तरह की जानकारी एकत्र और प्रदान करेगा, जैसा भी मामला हो, जैसा कि इस खंड के तहत रिपोर्ट तैयार करने और अनुपालन करने के लिए आवश्यक है इस खंड के प्रयोजनों के लिए उस जानकारी को प्रस्तुत करने और रिकॉर्ड रखने से संबंधित आवश्यकताएं।

3) प्रत्येक रिपोर्ट उस वर्ष के संबंध में बताएगी जिससे रिपोर्ट संबंधित है, –

(क) प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण से किए गए अनुरोधों की संख्या;

(ख) उन निर्णयों की संख्या जहां आवेदक अनुरोधों के अनुसार दस्तावेजों तक पहुंच के हकदार नहीं थे, इस अधिनियम के प्रावधान जिसके तहत ये निर्णय किए गए थे और ऐसे प्रावधानों की संख्या जितनी बार लागू की गई थी;

(ग) केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को संदर्भित अपील की संख्या, जैसा कि मामला हो सकता है, समीक्षा के लिए अपील की प्रकृति और अपीलों का परिणाम;

(घ) इस अधिनियम के प्रशासन के संबंध में किसी भी अधिकारी के खिलाफ की गई किसी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई के विवरण;

(ड़) इस अधिनियम के तहत प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण व्दारा वसूले गए शुल्क की राशि;

(च) कोई भी तथ्य जो सार्वजनिक प्राधिकरणों व्दारा इस अधिनियम की भावना और मंशा को संचालित करने और लागू करने के प्रयास को इंगित करता है;

(छ) सुधार के लिए सिफारिशें, विशेष सार्वजनिक प्राधिकरणों के संबंध में सिफारिशें, विकास, सुधार, आधुनिकीकरण, सुधार या इस अधिनियम या अन्य कानून या सामान्य कानून या किसी अन्य मामले में संशोधन के लिए सूचना के अधिकार के संचालन के लिए प्रासंगिक।

4) केंद्र सरकार या राज्य सरकार, जैसा कि मामला हो सकता है, जैसे ही प्रत्येक वर्ष के अंत के बाद व्यवहारिक हो सकता है, केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग की रिपोर्ट की एक प्रति का कारण बन सकता है, जैसा कि मामला हो सकता है, राज्य सभा के प्रत्येक सदन के समक्ष, या जैसा भी मामला हो, उपधारा (1) में निर्दिष्ट किया जा सकता है, राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन से पहले, जहां दो सदन हैं, और जहां राज्य विधानमंडल के एक सदन से पहले एक सदन है वो घर।

5) यदि यह केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को दिखाई देता है, जैसा कि मामला हो सकता है, कि इस अधिनियम के तहत अपने कार्यों के अभ्यास के संबंध में एक सार्वजनिक प्राधिकरण का अभ्यास इस अधिनियम के प्रावधानों या भावना के अनुरूप नहीं है, इस तरह की अनुरूपता को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को निर्दिष्ट करने की सिफारिश प्राधिकरण को दे सकता है।

Sec-26 1) उपयुक्त सरकार वित्तीय और अन्य संसाधनों की उपलब्धता की सीमा तक हो सकती है, -(क) इस अधिनियम के तहत विचार किए गए अधिकारों का उपयोग करने के तरीके के रूप में, वंचित समुदायों की विशेष रूप से जनता की समझ को आगे बढ़ाने के लिए शैक्षिक कार्यक्रमों को विकसित और व्यवस्थित करना;

(ख) क्लाज़ (ए) में निर्दिष्ट कार्यक्रमों के विकास और संगठन में भाग लेने के लिए सार्वजनिक अधिकारियों को प्रोत्साहित करना और ऐसे कार्यक्रमों को स्वयं करना;

(ग) सार्वजनिक अधिकारियों व्दारा उनकी गतिविधियों के बारे में सटीक जानकारी के समय पर और प्रभावी प्रसार को बढ़ावा देना; तथा

(घ) केंद्रीय लोक सूचना अधिकारियों या राज्य लोक सूचना अधिकारियों को प्रशिक्षित करें, जैसा कि मामला हो सकता है, सार्वजनिक प्राधिकारियों का हो और स्वयं सार्वजनिक प्राधिकारियों व्दारा उपयोग के लिए प्रासंगिक प्रशिक्षण सामग्री का उत्पादन किया जाए।

2) इस अधिनियम के प्रारंभ से अठारह महीने के भीतर उपयुक्त सरकार, अपनी आधिकारिक भाषा में ऐसी जानकारी युक्त मार्गदर्शिका का संकलन, आसानी से समझने योग्य रूप और तरीके से कर सकती है, जैसा कि उस व्यक्ति को उचित रूप से आवश्यक हो सकता है जो किसी भी अधिकार का प्रयोग करना चाहता है। यह कार्य।

3) उपयुक्त सरकार, यदि आवश्यक हो, तो उप-धारा (2) में निर्दिष्ट दिशानिर्देशों को नियमित रूप से अद्यतन और प्रकाशित करें, जो उप-धारा (2) की व्यापकता के बिना विशेष रूप से और बिना किसी पूर्वाग्रह के शामिल होंगे-

(क) इस अधिनियम की वस्तुएं;

(ख) डाक और सड़क का पता, फोन और फैक्स नंबर और, यदि उपलब्ध हो, तो केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी का इलेक्ट्रॉनिक मेल पता, जैसा भी मामला हो, उप-धारा (1) के तहत नियुक्त प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण का धारा 5;

(ग) जिस तरीके से और जिस तरह से किसी जानकारी तक पहुंचने का अनुरोध केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी से किया जाएगा, जैसा कि मामला हो सकता है;

(घ) केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के कर्तव्यों से उपलब्ध सहायता, जैसा कि इस अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण का मामला हो सकता है;

(ड़) केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग से उपलब्ध सहायता, जैसा भी मामला हो;

(च) इस अधिनियम व्दारा प्रदत्त किसी अधिकार या कर्तव्य के संबंध में अधिनियम या विफलता के संबंध में कानून में उपलब्ध सभी उपाय, जिसमें आयोग को अपील दायर करने का तरीका शामिल है;

(छ) धारा 4 के अनुसार अभिलेखों की श्रेणियों के स्वैच्छिक प्रकटीकरण के लिए प्रावधान;

(ज) सूचना के लिए अनुरोधों के संबंध में भुगतान की जाने वाली फीस के बारे में नोटिस; तथा

(i) इस अधिनियम के अनुसार जानकारी प्राप्त करने के संबंध में कोई अतिरिक्त नियम या परिपत्र या जारी किए गए।

4) उपयुक्त सरकार को, यदि आवश्यक हो, तो नियमित अंतराल पर दिशानिर्देशों को अद्यतन और प्रकाशित करना चाहिए।

Sec-27 1) आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना व्दारा उपयुक्त सरकार इस अधिनियम के प्रावधानों को पूरा करने के लिए नियम बना सकती है।

2) विशेष रूप से, और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता के बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित मामलों में से किसी या सभी के लिए प्रदान कर सकते हैं: –

क) धारा 4 की उपधारा (4) के तहत प्रसारित की जाने वाली सामग्रियों के मध्यम या प्रिंट लागत मूल्य;

ख) धारा 6 की उपधारा (1) के तहत देय शुल्क;

ग) धारा 7 के उप-वर्गों (1) और (5) के तहत देय शुल्क;

घ) वेतन और भत्ते और धारा 16 के उप-अनुभाग (6) और धारा 16 के उप-धारा (6) के तहत अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा के नियमों और शर्तों के लिए देय;

ड़) केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग व्दारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया, जैसा भी मामला हो, धारा 19 की उप-धारा (10) के तहत अपील तय करने में; तथा

च) कोई अन्य मामला जो होना चाहिए, या निर्धारित किया जा सकता है।

Sec-28 1) सक्षम अधिकारी, आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना व्दारा, इस अधिनियम के प्रावधानों को पूरा करने के लिए नियम बना सकते हैं।

2) विशेष रूप से, और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता के बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित मामलों में से किसी या सभी के लिए प्रदान कर सकते हैं: –

(i) धारा 4 की उपधारा (4) के तहत प्रसारित की जाने वाली सामग्रियों के मध्यम या प्रिंट लागत मूल्य;

(ii) धारा 6 की उपधारा (1) के तहत देय शुल्क;

(iii) धारा 7 की उपधारा (1) के तहत देय शुल्क; तथा

(iv) कोई अन्य मामला जो होना चाहिए, या निर्धारित किया जा सकता है।

Sec-29 1) इस अधिनियम के तहत केंद्र सरकार व्दारा बनाए गए हर नियम को संसद भवन के प्रत्येक सदन के समक्ष रखने के बाद, जैसे ही हो सकता है, रखा जाएगा, जबकि यह सत्र में कुल तीस दिनों के लिए है, जिसमें एक सत्र शामिल हो सकता है। या दो या अधिक क्रमिक सत्रों में, और यदि, सत्र की समाप्ति से पहले सत्र के तुरंत बाद या क्रमिक सत्रों को पूर्वोक्त किया जाता है, तो दोनों सदन नियम में कोई संशोधन करने पर सहमत होते हैं या दोनों सदन सहमत होते हैं कि नियम नहीं बनाया जाना चाहिए, इसके बाद नियम केवल इस तरह के संशोधित रूप में या बिना किसी प्रभाव के हो सकता है, जैसा भी मामला हो; हालाँकि, इस तरह का कोई भी संशोधन या विलोपन उस नियम के तहत पहले की गई किसी भी वैधता के पक्षपात के बिना होगा।2) राज्य सरकार व्दारा इस अधिनियम के तहत बनाए गए प्रत्येक नियम को राज्य विधानमंडल के समक्ष अधिसूचित किए जाने के बाद जैसे ही रखा जाएगा।

Sec-30 1) यदि इस अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो केंद्र सरकार, आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित आदेश व्दारा, इस तरह के प्रावधान इस अधिनियम के प्रावधानों के साथ असंगत नहीं कर सकती है, क्योंकि इसे हटाने के लिए आवश्यक या समीचीन होना दिखाई देता है। कठिनाई:बशर्ते कि इस अधिनियम के शुरू होने की तारीख से दो साल की अवधि समाप्त होने के बाद ऐसा कोई आदेश नहीं दिया जाएगा।2) इस धारा के तहत किया गया प्रत्येक आदेश, जैसे ही इसे बनाने के बाद हो सकता है, संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।

Sec-31 सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002 को निरस्त किया गया है।

Permanent alimony and maintenance (स्थायी निर्वाहिका और भरण-पोषण)

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-25 के अन्तर्गत स्थायी निर्वाहिका और भरण पोषण (Permanent alimony and maintenance) को बताता है । स्थायी निर्वाहिका और भरण पोषण पति अथवा पत्नी विवाह विखण्डित होने के उपरान्त अथवा पहले अपनी जीविका चलाने हेतु पति अथवा पत्नी दूसरे पक्षकार से न्यायोच्चित ढंग से न्यायालय व्दारा दिलाया जा सकता है ।

Maintenance (भरण पोषण)

भरण-पोषण का अधिकार संयुक्त परिवार के सिद्धान्त से उत्पन्न होता है । परिवार के मुखिया परिवार सभी सदस्यों के भरण-पोषण संस्कारों की पूर्ति तथा विवाह के खर्चों की पूर्ति के लिये जिम्मेदार होता है। भरण-पोषण के अधिकार उन व्यक्तियों को भी प्राप्त होता है, जो आयोग्यताओं के कारण दाय के अधिकारी नही रह जाते है ।

Permanent alimony and maintenance (स्थायी निर्वहिका और भरण-पोषण)

इस अधिनियम के अधीन अधिकारिता का प्रयोग कर रहा कोई भी न्यायालय, डिक्री पारित करने के समय या उसके पश्चात् किसी भी समय, यथास्थिति, पति अथवा पत्नी व्दारा इस प्रयोजन से किए गए आवेदन पर, यह आदेश दे सकेगा कि प्रत्यर्थी उसके भरण-पोषण और संभाल के लिए ऐसी कुल राशि या ऐसी मासिक अथवा कालिक राशि, जो प्रत्यर्थी की अपनी आय और अन्य सम्पत्ति को, यदि कोई हो, आवेदक या आवेदिका की आय और अन्य सम्पत्ति को तथा पक्षकारों के आचरण और मामले की अन्य परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय को न्यायसंगत प्रतीत हो, आवेदक या आवेदिका के जीवन-काल से अनधिक अवधि के लिए संदत करे और ऐसा कोई भी संदाय यदि यह करना आवश्यक हो तो, प्रत्यर्थी की स्थावर सम्पत्ति पर भार व्दारा प्रतिभूत किया जा सकेगा।यदि न्यायालय का समाधान हो जाए कि उसके उपधारा (1) के अधीन आदेश करने के पश्चात् पक्षकारों में से किसी की भी परिस्थितियों में तब्दीली हो गई है तो वह किसी भी पक्षकार की प्रेरणा पर ऐसी रीति से जो न्यायालय को न्यायसंगत प्रतीत हो ऐसे किसी आदेश में फेरफार कर सकेगा या उसे उपांतरित अथवा विखण्डित कर सकता है।
यदि न्यायालय का समाधान हो जाए कि उस पक्षकार ने जिसके पक्ष में इस धारा के अधीन कोई आदेश किया गया है, पुनर्विवाह कर लिया है या यदि ऐसा पक्षकार पत्नी है तो वह सतीव्रता नहीं रह गई है, या यदि ऐसा पक्षकार पति है तो उसने किसी स्त्री के साथ विवाहबाह्य मैथुन किया है तो वह दूसरे पक्षकार की प्रेरणा पर ऐसे किसी आदेश का ऐसी रीति में, जो न्यायालय न्यायसंगत समझे, परिवर्तित, उपांतरित या विखण्डित कर सकेगा।

Bigamy (व्दिविवाह) के लिये दण्ड

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा- 17 मे Bigamy (व्दिविवाह) के लिये दण्ड का प्रावधान भारतीय दण्ड संहिता IPC-494 मे दिया गया है । जो कोई भी पति या पत्नी के जीवित होते हुए किसी ऐसी स्थिति में विवाह करेगा जिसमें पति या पत्नी के जीवनकाल में विवाह करना अमान्य होता है, तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा जिसे सात वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, और साथ ही आर्थिक दंड से दंडित किया जाएगा।

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा-17 मे Bigamy (व्दिविवाह) के लिये पति अथवा पत्नी के जीवित रहते अगर कोई एक पक्ष पुनः शादी करता है, तो व्दिविवाह है, व्दिविवाह के कोई पक्ष पति अथवा पत्नी जिसने किसी दूसरे पक्ष को छुपाकर ऐसा कृत्य किया है तो वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा-494 के अन्तर्गत दण्डनीय है एवंम् यह अपराध करने वाले पक्ष पर लगभग् 7 वर्ष व जुर्माना यह एक जमानती, गैर-संज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

Legitimacy of children of void and voidable marriages (शून्य एवंम् शून्यकरणीय विवाह के संतानों की धर्मजता)

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-16 मे बताया गया है कि शून्य और शून्य विवाह वाले बच्चों की विरासत के बारे मे बताया गया है कि शून्य विवाह विधि की दृष्टि में विवाह नही माना जाता है, परन्तु विवाह अधिनियम 1955 की धारा-16, से उत्पन्न संतानों वैध घोषित करती है । अतः हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा-16 उन प्रकार की संतानों के हितों की रक्षा करती है, जो धारा-11 और 12 के अन्तर्गत शून्य एवंम् शून्यकरणीय विवाहों की अज्ञप्ति प्राप्त करने के पूर्व उत्पन्न हुये अथवा गर्भ मे आये ।

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-16 मे अपेक्षित संसोधन करने के पूर्व विघमान अनियमितता को समाप्त कर दिया गया है । अब न्यायालय से अकृतता की आज्ञप्ति ली जाय अथवा न ली जाये, उससे उत्पन्न संतानें धर्मज मानी जायेंगी । जहां धारा-12 के अधीन शून्यकरणीय विवाह के सम्बन्ध मे अकृतता की डिक्री मंजूर की जाती है, वहां डिक्री से पूर्व उत्पन्न हुयी अथवा गर्भ मे आई हुयी संतान, यदि विवाह डिक्री की तारीख को अकृत किये जाने के बजाय विघटित किया गया होता तो विवाह के पक्षकारों की धर्मज संन्तान होती, अकृतता की डिक्री के बावजूद उनकी धर्मज संन्तान मानी जायेगीं ।

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा-11 एवंम् 12 से जन्म लेने वाली संन्तानें अथवा गर्भ मे आये हुयी संन्ताने धारा-16 के अनुसार वैध घोषित करती है इस प्रकार की वैधता प्राप्त संन्तानो के दाय अधिकारों को धारा-16 के अन्तर्गत संकुचित कर दिया गया है, इस प्रकार की संन्ताने दाय अधिकार के सम्बन्ध मे संकुचित वैधता प्राप्त की हुयी, धर्मज संन्तानें मानी जायेगी, अर्थात् उन्हे अपने माता-पिता के अतिरिक्त अन्य किसी भी संम्पत्ति मे किसी प्रकार का अधिकार नही प्राप्त होगा ।