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उच्च न्यायालय एवं सत्र न्यायालय व्दारा दंड देने की शक्ति (Power to punish by High Court and Sessions Court)

नमस्कार दोस्तो, आज हम जानेगे उच्च न्यायालय एवंम् सत्र न्यायालय Power to punish by High Court and Sessions Court किसी अपराधी व्यक्ति को दंड किस तरह से दे सकते है इसके अलावा यह दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत कोई अपराधी व्यक्ति अगर दंड का भागीदार होता है, तो सत्र न्यायालय एवंम् उच्च न्यायालय किस तरह से दंड दे सकता है।

उच्च न्यायालय एवं संत्र न्यायालय व्दारा दंड देने की शक्ति-

उच्च न्यायालय, विधि व्दारा प्राधिकृत किसी भी प्रकार का दण्डादेश दे सकते है चाहे पूर्व मे सत्र न्यायालय व्दारा किसी व्यक्ति को कोई भी दण्ड दे चुका हो।

सत्र न्यायालय या अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ऐसा कोई दण्डादेश दे सकेगा, जिसके लिये वह विधि व्दारा प्राधिकृत है । लेकिन उसके व्दारा जाने वाले मृत्युदण्ड की अवस्था मे उच्च न्यायालय व्दारा उसकी पुष्टि होना आवश्यक आवश्यक है।

सहायक सेशन न्यायाधीश मृत्यु या अजीवन कारावास या दस वर्ष से अधिक की अवधि के लिये कारावास के दण्डादेश के सिवाय कोई ऐसा दण्डादेश दे सकता है जो विधि विधि व्दारा प्राधिकृत है।

इसे पढ़े-

आखिर क्या है लव जिहाद?

लव जिहाद

लव जिहाद या जिहाद, कथित रूप से मुस्लिम पुरुषों व्दारा गैर-मुस्लिम समुदायों से जुड़ी महिलाओं को इस्लाम में धर्म परिवर्तन के लिए लक्षित करके प्रेम का ढोंग रचना ही लव जिहाद है । आये दिन लव जिहाद के मामले चर्चो मे चल रहे है जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट व्दारा लव जिहाद पर टिप्पड़ी की, जिसके पश्चात् केन्द्र सरकार एवंम् राज्य सरकार व्दारा लव जिहाद पर कड़े फैसले लेने जा रही है ।
lovjihad

जीवनसाथी चुनने का अधिकार मूल अधिकारों में निहित

सुप्रीम कोर्ट एवंम् हाईकोर्ट व्दारा फैसला लिया गया था कि किसी महिला अथवा पुरूष, किसी के साथ रहने की स्वतंत्र है, धर्म पर निर्भर नहीं होगी एवंम् हाईकोर्ट ने कहा है कि जीवनसाथी चुनने का अधिकार, चाहे धर्म, जाति या नस्ल कोई हो, भारतीय संविधान के अनुच्छे्द 21 के तहत मूल अधिकारों के तहत जीवन और निजी स्वातंत्रता के अधिकार में निहित है। जजों ने केएस पुतास्वा‍मी बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नजीर बनाया जिसमें कहा गया था कि व्यक्ति की स्वायत्ताी उसके अपने जीवन से जुड़े अहम फैसले करने की योग्यजता है।अदालत ने कहा कि बालिग होने पर अपने आप जीवनसाथी चुनने का अधिकार मिल जाता है। अगर यह अधिकार न दिया जाए तो इससे न सिर्फ अमुक व्यक्ति के मानवाधिकार का उल्लंघन होगा, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार का भी।

बालिग होने पर अपने आप जीवनसाथी चुनने का अधिकार महिला एवंम् पुरूष व्दारा गलत तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है प्रदेश में कानून व्यवस्था सामान्य रखने के लिए और महिलाओं को इंसाफ दिलाने के लिए जरूरी है। उन्होंने कहा, बीते दिनों में 100 से ज्यादा घटनाएं सामने आई थीं, जिनमें ज़बरन धर्म परिवर्तित किया जा रहा है। इसके अंदर छल-कपट, बल से धर्म परिवर्तित किया जा रहा है। इसपर कानून को लेकर एक आवश्यक नीति बनी, जिसपर कोर्ट के आदेश आए हैं और आज योगी जी की कैबिनेट अध्यादेश लेकर आई है।

सामूहिक धर्म परिवर्तन कराने पर कार्यवाही

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने लव जिहाद को लेकर कानून (Love jihad) बनाने की पूरी तैयारी कर ली है। मंगलवार को गैरकानूनी धर्म परिवर्तन अध्यादेश कैबिनेट मीटिंग (Uttar Pradesh Cabinet) में भी पास हो गया। अध्यादेश के मुताबिक, दूसरे धर्म में शादी करने पर अब डीएम की इजाजत लेनी होगी।

सरकार के अध्यादेश के अन्तर्गत दूसरे धर्म में शादी करने के लिए संबंधित जिले के जिलाधिकारी से इजाजत लेना अनिवार्य होगा। इसके लिए शादी से पहले 2 माह की नोटिस देना होगा। बिना अनुमति लिए शादी करने या धर्म परिवर्तन करने पर 6 महीने से लेकर 3 साल तक की सजा के साथ 10 हजार का जुर्माना भी देना पड़ेगा।

इसके अलावा अध्यादेश में नाम छिपाकर शादी करने वाले के लिए 10 साल की सजा का भी प्रावधान किया गया है। इसके अलावा गैरकानूनी तरीके से धर्म परिवर्तन पर एक से 10 साल तक की सजा होगी। साथ ही 15 हजार तक का जुर्माना भी देना पड़ सकता है। इसके अलावा सामूहिक रूप से गैरकानूनी तरीके से धर्म परिवर्तन करने पर जहां 10 साल तक सजा हो सकती है, वहीं 50 हजार तक जुर्माना भी देना पड़ सकता है।लव-जिहाद के चल रहे मामलो मे प्रशासन व्दारा ऐसे व्यक्तियों पर कठोर कार्यवाही करने के साथ-साथ साक्ष्य प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी धर्म परिवर्तन कराने वाले व्यक्ति पर तथा करने वाले व्यक्ति पर होगी। यूपी के अलावा मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक जैसे राज्यों ने भी ‘लव जिहाद’ को लेकर कानून बनाने की बात कही है। इस बीच, इलाहाबाद उच्चे न्याजयालय ने एक अहम फैसले में कहा कि ‘जीवनसाथी चुनने का अधिकार संवैधानिक है और यह जीवन और निजी स्व‍तंत्रता के अधिकार में निहित है।’ अदालत ने अपने फैसले में क्याि अहम बातें कही हैं ।

गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार (Right of an arrested person)-

नमस्कार दोस्तो, आज हम गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार के बारे मे जानेंगे। जब कोई अपराधी व्यक्ति किसी अपराध मे लिप्त पाया जाता है, तो पुलिस अधिकारी व्दारा उस व्यक्ति की गिरफ्तारी की प्रकिया जाती है तो गिरफ्तारी के पश्चात् भी उसके कुछ अधिकार होते है, यह अधिकार दोषी व्यक्ति पर होने वाले न्याययिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है, इसलिये यह अधिकार हमे मालूम होना चाहिये। यह अधिकार निम्नलिखित है-

1) गिरफ्तारी के आधारों को जानने का अधिकार (Right to know the grounds of arrest) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(1) गिरफ्तार व्यक्ति को इस आशय का मूल अधिकार प्रदान करता है कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को यथाशीघ्र गिरफ्तारी के आधार बताये बिना अभिरक्षा (Custody) के निरूद्ध न रखा जाएगा ।

2) जमानत पर रिहा किये जाने के अधिकार के बारे मे सूचित किये जाने का अधिकार (Right to be informed about the right to be released on bail)दण्ड संहिता की धारा 50(2) के अनुसार यदि गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति जमानतीय अपराध का अभियुक्त है, तो अपराध आरोपित व्यक्ति को बिना वारण्ट गिरफ्तार करने वाला पुलिस अधिकारी गिरफ्तार व्यक्ति को यह बतलायेगा कि वह जमानत पर छूटने का अधिकारी है या नही ।

3) गिरफ्तार किये गये व्यक्ति की सूचना देने का दायित्व (Obligation to inform the person arrested)दण्ड संहिता (संशोधन) अधिनियम 2005 मे जोड़ी गयी धारा 50(क) मे कहा गया है कि प्रत्येक पुलिस अधिकारी या गिरफ्तारी करने वाले किसी अन्य व्यक्ति का यह दायित्व होगा कि ऐसी गिरफ्तारी तथा उस स्थान जहॉ गिरफ्तार व्यक्ति को रखा गया है, उस सम्बन्ध गिरफ्तारी व्यक्ति से सम्बन्धित मित्रो, परिवार जन को सूचना दे या तत्काल सूचित करे ।

4) अपनी पसंद से विधि व्यवसायी से परामर्श तथा प्रतिरक्षा के अधिकार (Advice and immunity from legal practitioner of your choice)भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(1) के अन्तर्गत गिरफ्तार व्यक्ति को यह मूलाधिकार भी प्राप्त है कि गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसन्द के विधि व्यवसायी से परामर्श कर सकता है एवंम् अपने पसंन्द के विधि व्यवसायी के माध्यम से प्रतिरक्षा करने का अधिकारी है ।

5) बिना विलम्ब के मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किये जाने का अधिकार (Right to be presented before magistrate without delay)दण्ड संहिता की धारा 56 के अनुसार बिना वारण्ट गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी व्दारा बिना विलम्ब किये गिरफ्तार व्यक्ति को दण्डाधिकारी या थाना प्रभारी के समक्ष प्रस्तुत अथवा भेजेगा ।

धारा-76 के अनुसार, गिरफ्तारी वारण्ट निष्पादित करने वाला पुलिस अधिकारी अन्य कोई व्यक्ति बिना अनावश्यक विलम्ब के गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगा ।

6) बिना न्यायिक जांच के 24 घण्टे से अधिक निरूद्धि के विरूद्ध अधिकार (Rights against rectification for more than 24 hours without judicial inquiry)- अनुच्छेद 22(2) के अनुसार अभिरक्षा के निरूद्ध व्यक्ति को गिरफ्तार के समय से 24 घण्टों के भीतर निकटस्थ दण्डाधिकारी के समक्ष पेश किया जायेगा । (यात्रा का समय शामिल नही होगा ।)

7) अनावश्यक प्रतिबन्ध के विरूद्ध का अधिकार (Right against unnecessary restrictions) धारा 46 के अनुसार यदि गिरफ्तार किये जाने वाला व्यक्ति अपने शब्दों या कार्यों से स्वयं अभिरक्षा मे प्रस्तुत कर देता है, तो गिरफ्तारी करे वाला पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति उसके शरीर को स्पर्श नही करेगा। अनुच्छेद 21 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक प्रकरणों मे यह धारित किया है कि गिरफ्तार व्यक्ति को अनावश्यक रूप से बेड़िया या हथकड़िया नही पहनायी जायेगीं ।

8) गिरफ्तारी व्यक्ति के चिकित्सा अधिकारी व्दारा परीक्षा (Examination by medical officer of the arrested person)जब कोई व्यक्ति गिरफ्तार किया जाता है तब गिरफ्तार किये जाने के पश्चात् वह व्यक्ति राज्य अथवा केन्द्र सरकार सेवाधीन चिकित्सा अधिकारी  व्दारा राजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी व्दारा परीक्षा की जायेगी अथवा गिरफ्तार व्यक्ति स्वंय कराने के लिये भी कह सकता है । 

9) विधि के अनुसार तलाशी दिये जाने का अधिकार (Right to search by law)धारा 51(1) के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति की तलाशी के दौरान प्राप्त वस्तुओ (पहनने वाले वस्त्रो को छोड़कर) को जब्त करने के पश्चात् गिरफ्तार व्यक्ति को जब्त की गयी वस्तुओ की सूची उपलब्ध करायी जायेगी ।

10) शालीनता पूर्ण आचरण की अपेक्षा का अधिकार (Right to expect decent conduct) धारा-51(2) के अनुसार जहॉ कही किसी गिरफ्तार महिला की तलाशी आवश्यक हो वहॉ शालीता का पूरा ध्यान रखते हुये, किसी महिला व्दारा तलाशी करायी जायेगी ।

11) विधि विरूद्ध गिरफ्तारी के विरूद्ध आत्मरक्षा के प्रयोग अन्य विधिक उपचार प्राप्त करने का अधिकार (Use of self-defense against arrest against law, right to receive other legal remedies)गिरफ्तार किया गया व्यक्ति विधि के अनुसार आत्मरक्षा के अधिकार का प्रयोग कर सकता है । विधि विरूद्ध गिरफ्तारी का शिकार व्यक्ति सिविल विधि के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति का वाद भी दायर कर सकता है।

हमारा प्रयास उपरोक्त लेख से आपको पूर्ण जानकारी प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

संज्ञेय अपराधों के निवारण हेतु पुलिस की शक्तियां (CrPC-149)

दण्ड प्रकिया संहिता, 1973 की धारा 149 मे पुलिस व्दारा संज्ञेय अपराधों के निवारण के बारे में बताया गया है । अपराध कारित किये जाने से पहले ही उसकी रोकथाम कर दिया जाना एक महत्वपूर्ण बात है, क्योंकि इससे जहां अपार धनहानि को रोका जा सकेगा, वही समाज मे शान्ति एवंम् व्यवस्था भी बनी रहेगी । यही कारण है कि अपराधों का निवारण करने के लिये पुलिस को अनेक शक्तियां प्रदत्त की गयी है ।

संज्ञेय अपराधों को रोकने अथवा समाज मे शान्ति बनाये रखने हेतु प्रत्येक पुलिस अधिकारी को यह शक्ति प्रदान की गयी है कि वह संज्ञेय अपराधों को पूर्ण रूप से रोकने मे सक्षम हो ।

वह ऐसे जघन्य अपराध जो अपराधी व्दारा कारित करने से पहले अथवा तुरन्त बाद पुलिस अधिकारी व्दारा बिना किसी वारन्ट के भी उन्हे किसी भी जगह से किसी भी समय गिरफ्तार करने की शक्ति प्रदान की गयी है । प्रमुख संज्ञेय अपराध यह निम्नलिखित है, जिनके आधार पर पुलिस अधिकारी व्दार बिना किसी वारन्ट के गिरफ्तार किया जा सकता है-

  • देशद्रोह
  • घातक आयुधों (हथियारों) से लैस होकर अपराध करना
  • लोकसेवक द्वारा रिश्वत मामला
  • बलात्कार
  • हत्या
  • लोकसेवक नहीं होने पर गलत तरीके से स्वयं को लोकसेवक दर्शाकर विधि विरुद्ध कार्य करना। जनता को ऐसा आभास हो कि संबंधित व्यक्ति लोकसेवक है ।
  • विधि विरुद्ध जमाव। योजना बनाकर गैर कानूनी कार्य करना। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना।

पुलिस अधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पूरी क्षमता एवंम् योग्यता अपराधों का निवारण करे तथा ऐसे अपराधों की रोकथाम के लिये उसमें हस्तक्षेप करे । अपराधों के निवारण हेतु पुलिस अधिकारी को संहिता के साथ-साथ पुलिस अधिनियम के अन्तर्गत भी सशक्त किया गया है । 

फरार व्यक्ति से क्या तात्पर्य है

फरार होने से तात्पर्य अपने आपकों गिरफ्तारी से बचायें एवंम् छिपाये रखने के उद्देश्य से अपने सामान्य निवास अथवा कारबार के स्थान को छोड़कर कही अन्यत्र चला जाना है, परन्तु मात्र एक दिन के लिये अपने निवास स्थान मे अनुपस्थित रहना अथवा एक अस्पाल से दूसरे अस्पताल मे चले जाने को फरार हो जाना नही कहा जायेगा ।

फरारी के लिये निम्नांकित बाते आवश्यक है-

  1. गिरफ्तार किये जाने वाला व्यक्ति गिरफ्तारी से बचने के लिये अपने आपको छिपा रहा हो;
  2. वह अपने निवास स्थान अथवा कारबार के स्थान को छोड़कर किसी अज्ञात स्थान पर चला गया हो; एवं
  3. किसी अनिश्चित काल के लिये किया गया हो ।

फरार व्यक्ति के लिये उद्घोषणा (Proclamation for person absconding)- दण्ड प्रकिया संहिता की धारा 82 ऐसे व्यक्ति के विरूद्ध उद्घोषणा के सम्बन्ध में प्रावधान करती है जो गिरफ्तारी के वारण्ट से बचने के लिये फरार हो गया हो । उपधारा-1 के अनुसार, जब न्यायालय को यह विश्वास हो जाये कि वह व्यक्ति जिसके विरूद्ध गिरफ्तारी का वारण्ट जारी किया गया है, उसके निष्पादन को असफल बनाने के उद्देश्य से फरार हो गया हो या अपने आपको छिपा रहा है, तो न्यायालय इस आशय की एक उद्घोषणा प्रकाशित कर सकेगा कि वह व्यक्ति विनिर्दिष्ट स्थान मे और विनिर्दिष्ट समय पर, जो उद्घोषणा के प्रकाशन की तारीख मे तीस दिन का कम नही होगा, उपस्थित हो ।

फरार व्यक्ति के सम्पत्ति की कुर्की (Attachment of property of absconder)- दण्ड प्रकिया संहिता की धारा 83 सम्पत्ति की कुर्की के बारे मे प्रावधान करती है । उपधारा-1 के अनुसार, धारा-82 के अधीन उद्घोषणा जारी करने वाला न्यायालय ऐसी उद्घोषणा के पश्चात् किसी भी समय उद्घोषित व्यक्ति के चल अथवा अचल दोनो प्रकार की सम्पत्तियों की कुर्की का आदेश दे सकता है ।


परन्तु यदि उद्घोषणा जारी करते समय न्यायालय का शपथ-पत्र व्दारा या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि वह व्यक्ति जिसके सम्बन्ध मे उद्घोषणा निकाली जाती है –

क) अपनी सम्पत्ति या उसे किसी भाग का व्ययन करने वाला है; अथवा


ख) अपनी समस्त सम्पत्ति या उसके किसी भाग को उस न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता से हटने वाला है, तो वह उद्घोषणा जारी करने के साथ ही कुर्की का आदेश दे सकता है ।

फरार व्यक्ति की सम्पत्ति की कुर्की न्यायालय व्दारा फरार व्यक्ति की उद्घोषित प्रकाशित करने के तीस दिन के पश्चात् यदि फरार व्यक्ति न्यायालय के समक्ष उपस्थित नही होता है, तो फरार व्यक्ति के चल अथवा अचल सम्पत्ति की कुर्की राज्य सरकार अथवा केन्द्र सरकार व्दारा की जा सकती है ।

CrPC Section-125 (दण्ड प्रकिया संहिता की धारा-125)

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 125 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपने पुत्र, पुत्री, पत्नी एवंम् वृद्ध माता-पिता के भरण पोषण का दायित्व होता है, भरण-पोषण से सम्बन्धित कई न्यायिक निर्णय भी इस सम्बन्ध मे आये हुये है, जिनके आधार पर किसी व्यक्ति को अपने आश्रितों का भरण-पोषण समाजिक दायित्व है। यह धारा भरण पोषण के लिये कोई व्.

सीआरपीसी की धारा 125 के अनुसार

पत्नी, सन्तान माता-पिता के भरण-पोषण के लिए आदेश-

(क) अपनी पत्नी का, जो अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है, या
(ख) अपनी धर्मज या अधर्मज अवयस्क सन्तान का, चाहे विवाहित हो या न हो, जो अपना भरण पोषण करने में असमर्थ हैं या
(ग) अपनी धर्मज या अधर्मज संतान का (जो विवाहित पुत्री नहीं है), जिसने वयस्कता प्राप्त कर ली है, जहां ऐसी संतान किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या क्षति के कारण अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, या
(घ) अपने पिता या माता का, जो अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है,
भरण-पोषण करने में उपेक्षा करता है या भरण-पोषण करने से इन्कार करता है तो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, ऐसी उपेक्षा या इंकार के साबित हो जाने पर, ऐसे व्यक्ति को यह निदेश दे सकता है कि वह अपनी पत्नी या ऐसी सन्तान, पिता या माता के भरण-पोषण के लिए। ऐसी मासिक दर पर, जिसे मजिस्ट्रेट ठीक समझे, मासिक भत्ता और उस भत्ते का संदाय ऐसे व्यक्ति को करे जिसको संदाय करने का मजिस्ट्रेट समय समय पर निदेश दे।

Order for maintenance of wives, children and parents-Order for maintenance of wives, children and parents-
(a) his wife, unable to maintain herself, or
(b) his legitimate or illegitimate minor child, whether married or not, unable to maintain itself, or
(c) his legitimate or illegitimate child (not being a married daughter) who has attained majority, where such child is, by reason of any physical or mental abnormality or injury unable to maintain itself, or
(d) his father or mother, unable to maintain himself or herself,
a Magistrate of the first class may, upon proof of such neglect or refusal, order such person to make a monthly allowance for the maintenance of his wife or such child, father or mother, at such monthly rate, as such Magistrate thinks fit, and to pay the same to such person as the Magistrate may from time to time direct.

दण्ड प्रकिया संहिता की धारा-125 के अन्तर्गत वृद्ध माता-पिता, पत्नी एवंम् बच्चो के भरण-पोषण के अधिकारो के लिये मुख्य बाते-

भारतीय संविधान मे प्रत्येक व्यक्ति को अपने पुत्र, पुत्री, पत्नी एवंम् वृद्ध माता-पिता के भरण पोषण का दायित्व होता है, भरण-पोषण से सम्बन्धित कई न्यायिक निर्णय भी इस सम्बन्ध मे आये हुये है, जिनके आधार पर किसी व्यक्ति को अपने आश्रितों का भरण-पोषण देना समाजिक दायित्व है, जिसे प्रत्येक को पूर्ण करना होता है अथवा वह व्यक्ति अगर सक्षम नही है तो वह न्यायालय व्दारा अपने दायित्व को चैलेन्ज कर सकता है, इस सम्बन्ध मे बहुत से निर्णय न्यायालय व्दारा भरण-पोषण का अधिकार दिलाया गया है।

दण्ड प्रकिया संहिता की धारा-125 के अन्तर्गत वही व्यक्ति अथवा महिला भरण पोषण का अधिकार प्राप्त कर सकता है, भरण-पोषण तभी न्यायाय व्दारा दिलाया जा सकता है, जब वह व्यक्ति अपना जीवन यापन चलाने मे समर्थ है, अगर स्वयं का जीवन यापन चलाने मे असमर्थ है तो भरण-पोषण पाने के अधिकारी नही होगें ।

दण्ड प्रकिया संहिता की धारा-125 से धारा-128 तक की व्यक्ति को कभी दण्डित करने का नही रहा है और न ही धारा-125 से धारा-128 तक की दण्ड की श्रेणी मे आती है । 

भरण-पोषण किसे-किसे दिया जा सकता है-

भरण-पोषण मुख्यतः अपने पिता, पुत्र, पत्नी अथवा पति को दिया जाने का कानूनी दायित्व है एवंम् आप अपने उन सम्बन्धियों जो पूर्ण रूप से आप पर निर्भर है, एवंम् वह अपना जीवन यापन स्वंय का करने मे सक्षम नही है।

जब कोई पुत्र मानसिक विक्षिप्त है और वह अपना जीवन यापन नही कर सकता है, तब पिता का दायित्व होता है कि पुत्र को भरण-पोषण देने का, इसी प्रकार से पुत्र अपने वृद्ध माता-पिता का पूर्ण दायित्व होता है कि वृद्ध माता-पिता को भरण-पोषण करे ।

इसी तरह से पत्नी अगर तलाक-शुदा भी है, वह अपना जीवन यापन करने मे समर्थ नही है और अकेले ही जीवन यापन कर रही है तो भी आप उसे भरण पोषण देने के बाध्य होंगें अथवा वह तलाक के पश्चात् भी अपना जीवन यापन करने के लिये भरण-पोषण की मांग कर सकती है । दण्ड प्रकिया संहिता 125 के अन्तर्गत अपनी धर्मज अथवा अधर्मज अवयस्क संतान का, चाहे विवाहित हो या न हो, जो भरण-पोषण करने मे असमर्थ हो, तो वह अपने पिता से भरण-पोषण की मांग कर सकता है तथा वह संन्तान जो धर्मज अथवा अधर्मज हो,किसी शारीरिक अथवा मानसिक क्षति के कारण भरण-पोषण करने मे असमर्थ है, तो उसका पिता भरण-पोषण करेगा ।

हमारा प्रयास दण्ड प्रकिया संहिता की धारा-125 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।