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अनुच्छेद और धारा में अंतर

अनुच्छेद

कानून (Law) भारतीय संविधान के आधार पर बनाया गया था । भारतीय संविधान के अन्तर्गत अनुच्छेद (Article) का निर्माण हुआ । इन अनुच्छेद के अनुसार ही सरकार व्दारा किसी कानून अथवा अधिनियम पारित किये जाते है जिसे हम Act या अधिनियम भी कहते हैं । (Article) अनुच्छेद पूर्व में 395 थे, जो 22 भागो में विभाजित थे, इसमें केवल 8 अनुसूचियां थी। जबकि वर्तमान में आज 448 (Article) अनुच्छेद है, जो 25 भागो में विभाजित है, इनको 12 अनुसूचियों में रखा गया है। इस तरह से ज्ञात होता है कि भारतीय संविधान के अन्तर्गत बने कानूनों में बहुत से अनुच्छेद जोड़े गए है, जिसके अन्तर्गत नई धारा का निर्माण भी किया गया है। इनको Provision Act भी कहा जाता है, कानून की ड्राफ्टिंग भी कह सकते है, जिसे राष्ट्रपति द्वारा पूर्ण रूप लागू किया जाता है । जो भारतीय संविधान के अनुरूप ही होना चाहिए, अन्यथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे बदलाव अथवा हटाया भी जा सकता है ।

पुराने समय से ही (Article) अनुच्छेद शब्द का प्रयोग उस धारणा को बताने के लिए होता आ रहा है कि जो किसी व्यक्ति की मौलिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए किसी धारा का निर्माण किया जाता है । धारा का निर्माण भारत के संविधान के अनुरुप ही (Article) अनुच्छेद में ही विभाजित करके धारा का निर्माण किया जाता है।

धारा

धारा का कार्य भी लगभग अनुच्छेद के समान है, ये भी विभाजन का कार्य करती है. जहाँ अनुच्छेद अर्थात (Article) वे नियम होते है जिनसे मिलकर हमारे संविधान का निर्माण हुआ है तो दूसरी तरफ धारा अर्थात section वे नियम होते है जिनसे मिलकर भारतीय दण्ड संहिता जैसे अन्य का निर्माण हुआ है । लेकिन इसका ये अर्थ नहीं है कि भारतीय दण्ड संहिता अर्थात Act में अनुच्छेद नहीं हो सकते या संविधान में धारा नहीं हो सकती, दोनों ही विभाजन के साथ साथ अपने कुछ और भी महत्व रखते हैं ।

अन्तर

अनुच्छेद (Article) वे हैं जिनसे भारत का संविधान बना है जबकि धारा वे नियम हैं जिनसे भारतीय दण्ड संहिता जैसे कानून के निर्माण के लिए किया जाता है ।

IPC और CRPC मे क्या अन्तर है?

IPC (The Indian Penal Code)-

IPC (भारतीय दण्ड संहिता) अग्रेजो व्दारा सन् 1834 (पहला विधि आयोग) बना, जो लार्ड मैकाले के नेत्तृव मे बनाया गया था। जिसे सन् 1860 मे लागू किया गया । IPC मे कुल 511 धाराये है, जिसमे 23 भाग या अध्याय भी कहा जा सकता है । भारतीय दण्ड संहिता को उर्दू मे ताज-इरात-ए-हिन्द कहते है । IPC पुलिस एवंम् कोर्ट प्रकिया के अन्तर्गत अपराधी को उसके अपराध से अवगत कराता है, कि अपराधी व्दारा जो अपराध किया गया है उस पर कौन सी धारा लगेगी । IPC (भारतीय दण्ड संहिता) अपराधी के अपराध की धारा बताने की मौलिक विधि भी कह सकते है ।

CRPC (Criminal Pressure Code)-

CRPC (दण्ड प्रकिया संहिता) भारत सरकार व्दारा सन् 1973 मे काग्रेस सरकार व्दारा कानून को बनाया गया था । जिसमे कुल 484 धाराये है। CRPC (दण्ड प्रकिया संहिता) के अन्तर्गत अपराधी के अपराध सिद्ध हो जाने के पश्चात् अपराधी को अपराध को दण्ड कैसे देना है यह बताता है । CRPC (दण्ड प्रकिया संहिता) एक प्रकिया विधि है, जिसके अन्तर्गत अपराधी को अपराध को दण्ड देने अथवा उसे किस तरह दण्ड दिया जाना चाहिये, यह बतलाता है। प्रक्रियाओं का विवरण इस प्रकार है-

• अपराध की जांच (Investigation of crime)• संदिग्धों के प्रति बरताव (Treatment of the suspects)• साक्ष्य संग्रह प्रक्रिया (Evidence collection process)• यह निर्धारित करना कि अपराधी दोषी है या नहीं

आईपीसी धारा-151 क्या है ?(IPC 151 in Hindi)

धारा 151 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता में आज हम आपको बहुत ही महत्वपूर्ण धारा के बारे में बताने जा रहे हैं, जो कि भविष्य में आपके बहुत काम आने वाली है। हम में बहुत लोग यह नहीं जानते हैं कि शांति भंग की आशंका क्या होती है आइए जानते हैं, धारा 151 के संबंध मे पूर्ण जानकारी सजा, अर्थदण्ड और जमानत कैसे मिलती है ।

आईपीसी की धारा 151 के अनुसार –

पांच या अधिक व्यक्ति के जमाव को बिखर जाने का समादेश दिए जाने के पश्चात उसमें जानते हुए सम्मिलित होना या बने रहना-

जो कोई पांच या अधिक व्यक्तियों के किसी जमाव में, जिसमें लोक शांति में विघ्न कारित होना सम्भाव्य हो, ऐसे जमाव को बिखर जाने का समादेश विधिपूर्वक दे दिए जाने पर जानते हुए सम्मिलित होगा या बना रहेगा, वह दोनों मैं से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।

स्पष्टीकरण

यदि वह जमाव धारा 141 के अर्थ के अंतर्गत विधिविरुद्ध जमाव हो, तो अपराधी धारा 145 के अधीन दंडनीय होगा।

साधारण भाषा में धारा 151 को समझते है ।

धारा-151 को स्पष्ट भाषा मे यह कह सकते है- यदि कोई व्यक्ति किसी समूह मे सम्मलित होता है, जिसमे पांच अथवा पांच से अधिक व्यक्ति मिलकर, समाज की शांति भंग करते है या भंग करते पाये जाते है, तो वह 6 मास कारावास या अर्थदण्ड अथवा दोनो का भागीदार होगा।
यह अपराध समझौता योग्य नहीं है।

धारा-151 के अन्तर्गत गिरफ्तारी-

इस धारा का मुख्य उद्देश्य उन सभी लोगों को सजा दिलाने का होता है, जो समाज में अशांति फ़ैलाने का कार्य करते हैं, जब किसी समाज में किसी गैर क़ानूनी जन सभा द्वारा कोई अपराध को अंजाम दिया जाता है, जिसमें सभी अपराधियों का एक जैसा उद्देश्य हो, तो ऐसे अपराधियों को पुलिस के अधिकारी द्वारा प्रथम सूचना दर्ज होने के आधार अथवा किसी अन्य व्यक्ति के व्दारा शिकायत की जाने के पश्चात् अगर व्यक्ति वास्तव में दोषी पाया जाता है तो पुलिस उनको गिरफ्तार कर, उन पर धारा-151 का चालान करके, उनकी गिरफ्तार कर 24 घन्टे के भीतर कोर्ट मे पेश करती है ।

धारा-151 के अन्तर्गत सजा

धारा-151 के अन्तर्गत किया गया अपराध असंज्ञेय अपराध की श्रेणी मे आता है। धारा-151 के अपराध किसी व्यक्ति के व्दारा किये गये कृत के आधार पर कोर्ट अपराधी को 6 मास तक का कारावास अथवा आर्थिक दण्ड उसकी आर्थिक स्थिति को देखकर भी लगा सकती है ।

जमानत (Bail) का प्रावधान

जब कोई गैर क़ानूनी जन सभा किसी समाज के लोगों में अशांति फ़ैलाने की कोशिश करे तब पुलिस ऐसे सभी अपराधियों को जो किसी भी प्रकार से उस गैर क़ानूनी जन सभा में शामिल रहते हैं, तो ऐसे व्यक्तियों को पुलिस न्यायालय में पेश करती है । अपराधी के अपराध को देखते हुये कोर्ट निर्णय लेती है कि व्यक्ति ने किस तरह से अपराध किस रूप मे किया है । उसी के आधार पर न्यायालय जमानत दे देती है । यह एक जमानती और संज्ञेय अपराध है और किसी भी न्यायधीश द्वारा विचारणीय है साथ ही यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।

बाबरी और रामलला:

राम मन्दिर का इतिहास

आइये समझते हैं विस्तार से क्या है अयोध्या का राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद:-

सबसे पहले जानते हैं भगवान राम के बारे में-

भगवान श्रीराम का जन्म त्रेता युग मे हुआ था। भगवान श्रीराम मनुष्य के रूप में पूजे जाने वाले सबसे पुराने देवता के रूप मे जाना जाता है। भगवान श्रीराम को विष्णु जी जो दुनिया के पालन करता हैं उनका अवतार माना जाता है। भगवान श्रीराम विषम परिस्थितियों में भी स्थिति पर नियंत्रण रख सफलता प्राप्त की। भगवान श्रीराम ने हमेशा धर्म और मर्यादा का पालन किया। स्वयं के सुखों से समझौता कर भगवान श्रीराम न्याय और सत्य का साथ दिया। सहनशीलता व धैर्य भगवान श्रीराम का प्रमुख गुण है। अयोध्या का राजा होते हुए भी श्रीराम ने संन्यासी की तरह ही अपना जीवन व्यापन किया। यह उनकी सहनशीलता को दर्शाता है। भगवान राम काफी दयालु स्वभाव के रहें। भगवान श्रीराम दया कर सभी को अपनी छत्रछाया में लिया। भगवान श्रीराम ने सभी को आगे बढ़ कर नेतृत्व करने का अधिकार दिया। सुग्रीव को राज्य दिलाना उनके दयालु स्वभाव का ही प्रतिक है। हर जाति, हर वर्ग के व्यक्तियों के साथ भगवान राम ने मित्रता की। हर रिश्तें को श्री राम ने दिल से निभाया। केवट हो या सुग्रीव, निषादराज या विभीषण सभी मित्रों के लिए उन्होंने स्वयं कई बार संकट झेले। भगवान राम एक कुशल प्रबंधक थे। वो सभी को साथ लेकर चलने वाले थे। भगवान राम के बेहतर नेतृत्व क्षमता की वजह से ही सीता माता को वापस लाने के लिये लंका जाने के लिए समुद्र पर पत्थरों का सेतु बन पाया। भगवान श्रीराम ने अपने सभी भाइयों के प्रति सगे भाई से बढ़कर त्याग और समर्पण का भाव रखा और स्नेह दिया। इसी कारण से भगवान श्रीराम के वनवास जाते समय लक्ष्मण जी भी उनके साथ वन गए। यही नहीं भरत ने श्रीराम की अनुपस्थिति में राजपाट मिलने के बावजूद भगवान राम के मूल्यों को ध्यान में रखकर सिंहासन पर रामजी की चरण पादुका रख जनता की सेवा की। भगवान श्रीराम के प्रिय भाई भरत ने भी भाई-प्रेम का अच्छा प्रमाण दिया। भगवान श्रीराम की अर्धांगिनी मां सीता का पंचवटी के पास लंकाधिपति रावण ने अपहरण करके 2 वर्ष तक अपनी कैद में रखा था। भगवान श्रीराम ने रावण को उसके पापो के कारण इस संसार से मुक्त करने एवंम् अपने प्रत्येक कर्तव्यो का निर्वाहन करने के पूर्व मुक्त हो जाते है। इससे संसार को भगवान श्रीराम के जीवन व्यापन, सहनशीलता, मर्यादा पुरोषोत्तम स्वाभाव का ज्ञानरूपी प्रकाश देती है।

भगवान श्रीराम का मन्दिर भव्य निर्माण-

भगवान श्रीराम का भव्य मन्दिर उज्जैन के महाराजा विक्रमादित्य ने राम जन्म भूमि अयोध्या मे निर्णाण कराया था, कहा जाता है उस समय भारतवर्ष मे 4 ही सर्वश्रेष्ठ मन्दिर थे, पहला मन्दिर भगवान श्रीराम का अयोध्या मे दूसरा कनक भवन, तीसरा कश्मीर का सूर्य मन्दिर और चौथा सोमनाथ मन्दिर, ये सभी मन्दिर भारतवर्ष के सबसे सर्वश्रेष्ठ मन्दिर माने जाते थे ।
Ram Mandir

बाबर कैसे अयोध्या आया-

लगभग् 1500 ई0 मे फतेहपुर सीकरी के पास चित्तौड के राजा संग्राम सिंह से पराजित होकर मुगल सम्राट बाबर आयोध्या भाग आया, उन दिनो श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर पर बाबा श्यामानन्द नाम के सिद्ध महात्मा निवास करते थे, इनकी सिद्धियो की महानता उस समय समस्त उत्तर भारत मे फैली हुयी थी। जिससे प्रभावित होकर कजल अब्बास नाम का एक फकीर आया और बाबा श्यामानन्द का साधक शिष्य बनकर रामजन्म भूमि पर रहने और योग की क्रिया सीखने लगा। कजल अब्बास जाति का मुसलमान था इसीलिये बाबा श्यामानन्द जी उसे मुसलमानी ढंग से योग शिक्षा देने लगे, जिसके परिणाम स्वरूप वह भी सिद्ध फकीर बन गया। कुछ दिन पश्चात् जलालाशाह नाम का एक फकीर वहां आया और वह भी श्यामानन्द का साधक शिष्य बन गया। वह भी रामजन्म भूमि पर रहने लगा और योग क्रिया सीखने लगा। जलालाशाह कट्टर मुसलमान था, उसे जब रामजन्म भूमि की महत्वा ज्ञात हुयी तो उसने जाना आयोध्या एक सिद्ध पीठ है तो उसके दिमाग मे इस स्थान को खुर्द मक्का और सहस्त्रो को निवास सिद्द करने की सनक सवार हुयी। उसने धीरे-धीरे क्रिया कलाप को अपने मुसलमानी ढंग मे परिवर्तित करने लगा। फतेहपुर सीकरी के संग्राम सिंह से पराजित होकर प्राण बचाकर बाबर शान्ति प्राप्ति करने की इच्छा से आयोध्या आया। कजल अब्बास एवंम् जलालाशाह फकीरो से बाबर ने आशीर्वाद प्राप्त किया और पुनः चित्तौड के राजा संग्राम सिंह पर आक्रमण किया और विजय प्राप्त किया। बाबर फिर लौटकर अयोध्या आया। कजल अब्बास एवंम् जलालाशाह फकीर, बाबर से मिलकर मन्दिर को गिराकर मस्जिद बनवाने का वचन लिया। बाबर ने धीरे-धीरे मन्दिरो को गिराकर मस्जिद का निमार्ण करने लगे। बाबा श्यामानन्द जी अपने साधक शिष्यो की करतूतो पर पछतावा करते हुये प्रतिमा को सरयू मे प्रवाह करते हुये अपने दिव्य शिष्यो को लेकर उत्तराखण्ड चले गये और पुजारियो ने मन्दिर के व्दार पर खडे हुये जिससे कोई विधर्मी मन्दिर मे प्रवेश न कर सके। फकीरो के आज्ञा के अनुसार बाबर की सेना ने उन पुजारियो के सिर कटवा दिये और लाशे बाहर फेकवा दिया गया।

हिन्दुओ की प्रतिक्रिया-

श्रीराम मन्दिर विध्वंश करने की खबर बिजली की तरह भारतवर्ष मे फैल गयी। फैजाबाद जिले के एक राजा महताब सिंह तीर्थ यात्रा जा ही रहे थे किन्तु जब यह समाचार मिला तो राजा महताब सिंह ने रातो-रात अपने सलाहकार भेजकर आस-पास के समस्त क्षत्रियो को यह सूचना दी और अगले सुबह सूर्य की पहली किरण पडते ही रामजन्म भूमि को चारो ओर से घेर लिया । इसके पश्चात् मुगलो एवंम् हिन्दू क्षत्रियो के मध्य भीषण युद्ध हुआ। मुगलो के पास काफी बडी सेना और तोपे भी थी, जिससे उन्होने मन्दिरो की दीवारो और क्षत्रियो को काफी नुकसान पहुचाया। जिससे हिन्दू सेना तहस नहस हो गयी। राम मन्दिर विध्वस होने के पश्चात् मुगल सम्राट बाबर ने समस्त भारत मे एक फरमान निकालकर हिन्दुओं के अयोध्या न जाने का जबरदस्त प्रतिबन्ध लगा दिया। जब मस्जिद बनने लगी तो जितनी दीवार तैयार होती थी, अपने आप ही गिर जाती थी, फिर मुगल शासको ने हैरान होकर बाबर को दिल्ली से बुलाया तो बाबर ने कहा अगर दीवारे नही बन रही तो काम छोडकर वापस चले जाओ, तो कजल अब्बास ने उत्तर दिया कि इस पाक सरजमीन पर मस्जिद बन गयी तो हिन्दुस्तान मे इस्लामी जडे जम जायेगी, काम बन्द नही किया जा सकता आप एक बार खुद आइये। बाबर अयोध्या आया और विशिष्ट महासन्तो को बुलाकर कहा कि आप लोग राय दे कि मस्जिद किस तरह बने । तब सन्तो ने बताया इसे मन्दिर न कहकर सीता पाक स्थान का नाम दे तो बन जायेगा और कोई भी परिवर्तन नही किया जा सकता है। उसके बाद मस्जिद का निर्माण मन्दिर के नाम पर किया गया और समस्त मूर्ति को अपने स्थान पर लगायी गयी, इसके बाद मुगल सम्राट बाबर ने फरमान जारी किया कि जुम्मे को नमाज वाले दिन को छोडकर समस्त हिन्दू मन्दिर आ सकते है, जुम्मे वाले दिन हिन्दुओ का आना वर्जित था।

मन्दिर, मस्जिद विवाद का प्रकरण-

06 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को गिराया गया था। हिंदू मान्यता के अनुसार इसी जगह भगवान राम का जन्म हुआ था और हिंदू संगठनों का आरोप रहा कि राम मंदिर को तुड़वाकर मस्जिद बनाई गई थी। साल 1859- अंग्रेजी हुकूमत ने हिन्दू-मुस्लिम मध्यस्थता करते हुए विवादित स्थल का बंटवारा कर दिया और तारों की एक बाड़ खड़ी करना दी ताकि अलग-अलग जगहों पर हिंदू-मस्लिम अपनी-अपनी प्रार्थना कर सकें और कोई विवाद न हो। साल 1885- विवाद ने इतना गंभीर रूप ले लिया कि पहली बार मन्दिर, मस्जिद का मामला अदालत पहुंचा हिंदू साधु महंत रघुबर दास ने फैजाबाद कोर्ट में बाबरी मस्जिद परिसर में राम मंदिर बनवाने के लिए इजाजत मांगी, हालांकि अदालत ने ये अपील ठुकरा दी। इसके बाद से मामला गहराता गया और सिलसिलेवार तारीखों का जिक्र मिलता है। साल 1949- हिंदुओं ने रामजन्म भूमि पर भगवान श्रीराम की मूर्ति स्थापित कर दी, तब से हिंदू ही पूजा करने लगे और मुस्लिमों ने मस्जिद में नमाज पढ़नी बंद कर दी।साल 1959- निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल के हस्तांतरण के लिए मुकदमा किया, कि रामजन्मभूमि हिन्दुओ की है । साल 1961- उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक के लिए मुकदमा कर दिया, कि यह भूमि हमारे पूर्वजो की है।साल 1984- विश्व हिंदू परिषद का गठन हुआ और रामजन्म भूमि पर राम मन्दिर का ताला खोलने और इस जगह पर मंदिर बनवाने के लिए अभियान शुरू किया।साल 1986- एक अहम फैसले के तहत स्थानीय कोर्ट ने विवादित स्थल पर हिंदुओं को पूजा की इजाजत दे दी और ताले दोबारा खोले गए, इससे नाराज मुस्लिमों ने फैसले के विरोध में बाबरी मस्जिद कमेटी बनाई गयी। साल 1989- भारतीय जनता पार्टी ने इस मामले में विश्व हिंदू परिषद को औपचारिक समर्थन दिया।साल 1990- 25 सितंबर 1990 मे बीजेपी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली ताकि हिंदुओं को इस महत्वपूर्ण मु्द्दे से अवगत कराया जा सके, हजारों कार सेवक अयोध्या में इकट्ठा हुआ, इस यात्रा के बाद साम्प्रदायिक दंगे हुए ।साल 1992- 6 दिसंबर 1992 ये विवाद में ऐतिहासिक दिन के तौर पर याद रखा जाता है, इस रोज हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढहा दिया और अस्थायी राम मंदिर बना दिया गया, चारों ओर सांप्रदायिक दंगे होने लगे, जिसमें लगभग 2500 लोगों के मारे जाने का रिकॉर्ड है। साल 1997- सितंबर 1997 बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की सुनवाई कर रही विशेष अदालत ने इस बारे में 49 लोगों को दोषी करार दिया, जिसमें बीजेपी के कुछ प्रमुख नेताओं का नाम भी शामिल रहा। साल 2002- अप्रैल 2002 हाईकोर्ट के तीन जजों की पीठ ने अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर सुनवाई आरम्भ हुयी। साल 2003- मार्च-अगस्त 2003- हाई कोर्ट के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। पुरातत्वविदों ने कहा कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष के प्रमाण मिले हैं।साल 2003- 30 सितंबर 2010- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा, इसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा निर्मोही अखाड़े को दिया गया।साल 2003- 9 मई 2011 सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। साल 2017- 21 मार्च 2017 सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की सलाह दी।साल 2017- 19 अप्रैल 2017 सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में बीजेपी और आरएसएस के कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया।साल 2018- 8 फरवरी 2018 सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील पर सुनवाई शुरू कर दी।साल 2018- 25 नवंबर 2018 अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद की अगुवाई में धर्म सभा हुई. धर्म सभा में एक हिंदू संत रामभद्राचार्य ने कहा कि बहुत जल्द ही भव्य राम मंदिर का निर्माण करना होगा और बीजेपी पर आरोप लगाया कि पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की वजह से तारीख का ऐलान नहीं किया जा रहा है. इसके साथ ही विश्व हिंदू परिषद का कहना था कि अब करो या मरो का वक्त है, देश का बहुसंख्यक समाज अब इस मामले का हल होते हुए देखना चाहता है।साल 2018- 1 जनवरी 2019 पीएम नरेंद्र मोदी ने 2019 के अपने पहले इंटरव्यू में कहा कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश पर फैसला कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लिया जा सकता है। राम मंदिर पर अध्यादेश लाने के बारे पीएम ने कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है, और संभवत: अपने अंतिम चरण में है उन्होंने कहा कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने दीजिए इसके बाद जो भी सरकार की जिम्मेदारी होगी उसे पूरा किया जाएगा।

निर्णय-

रामजन्मभूमि का निर्णय सुप्रीम कोर्ट मे दिनांक 09 नवम्बर 2019 को जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े, जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर के मध्य सुनाया गया था। जिसके फलस्वरूप रामजन्मभूमि पर आज राम मन्दिर का निर्माण कार्य चल रहा है। दिनांक 05-08-2020 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी मन्दिर का शिलान्यास करेगे। यह विवाद हमारे हिन्दुओ के संघर्ष का प्रतीक माना जायेगा।

जय श्रीराम

FIR और NCR मे क्या अन्तर है ?

FIR or NCR
FIR और NCR मे क्या अन्तर है और बताते है FIR और NCR किस अपराध मे लिखी जाती है । FIR FIR का तात्पर्य First Information Report (प्राथमिक सूचना विवरण) होता है, FIR पुलिस Cognizable Crime (संज्ञेय अपराधो) पर रिपोर्ट दर्ज की जाती है ।
संज्ञेय अपराध जैसे- मर्डर, रेप अथवा दहेज हत्या मे दर्ज की जाती है । FIR अपराध होने के पश्चात् आप स्वयं जा कर लिखा सकते है अथवा पुलिस भी स्वंय संज्ञेय अपराध की पुष्टि होने पर FIR दर्ज कर सकती है ।
NCRNCR का तात्पर्य NON Cognizable Report (असंज्ञेय अपराध सूचना) होता है, NCR हमेशा NON Cognizable Crime (असंज्ञेय अपराधो) पर रिपोर्ट दर्ज की जाती है ।
असंज्ञेय अपराध जैसे- चोरी होना, मोबाइल फोन कही गिर जाना अथवा छल होना या किसी के साथ धोखा-धडी, मामूली झगडा होना असंज्ञेय अपराध है । असंज्ञेय अपराध होने के पश्चात् आपको स्वयं जा कर लिखाना पडता है, असंज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज कर के उपरान्त उचित कार्यवाही करती है ।
उदाहरण स्वरूप- पुलिस व्दारा घटना/अपराध की सूचना के आधार पर एनसीआर दर्ज कर लेने के बाद, पुलिस मामले की जाँच करने में लग जाती है। जाँच के आधार पर पुलिस उस घटना से सम्बन्धित रिपोर्ट बनाती है और इस रिपोर्ट को सम्बंधित न्यायालय में पेश करती है। यदि जाँच के दौरान चोरी हुयी वस्तु या खोई हुई संपत्ति की रिकवरी हो जाती है, तो ऐसे में पुलिस उस संपत्ति को कानूनी औपचारिकताएं पूरी हो जाने के बाद शिकायत करता को सौंप देती है।

अगर पुलिस आपकी FIR न लिखे तो क्या करना चाहिये?

FIR न लिखे तो क्या करे
अगर हमारे किसी अपने अथवा स्वयं के साथ कोई अपराध होता है, तो सबसे पहले हम पुलिस स्टेशन पहुचकर FIR दर्ज कराते है, FIR दर्ज कराने के लिये अपनी लिखित शिकायत नजदीकी पुलिस स्टेशन मे जाकर, एक कॉपी प्राप्ति रसीद के तौर पर लेते है । FIR आप घर से स्वंय लिख कर ले जा सकते है अथवा आप वही पुलिस मे अपनी शिकायत दर्ज करने के उपरान्त सूचना देने वाले व्यक्ति को हस्ताक्षरित करने के बाद एक कॉपी आपको भी पुलिस स्टेशन से FIR दर्ज की सूचना ली जा सकती है। अगर पुलिस किसी अपराध की रिपोर्ट लिखने से मना करे तो आपके पास इसका भी कानूनी उपचार है।

अपराध दो प्रकार के होते है एक सज्ञेय अपराध और दूसरा असंज्ञेय अपराध

संज्ञेय अपराध- (CRPC 2C) संज्ञेय अपराध वह अपराध होते है जिसमे किसी व्यक्ति ने किसी व्यक्ति, स्त्री अथवा जीवित जीव के ऊपर गम्भीर रूप से हमला किया हो या गम्भीर रूप से पीडित किया हो, सज्ञेय अपराध है, संज्ञेय अपराध मे पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने के पूर्व ही शक के आधार पर अरेस्ट कर सकती है उसके पश्चात् रिपोर्ट दर्ज कर सकती है, संज्ञेय अपराध मे पुलिस को अपराधी को अरेस्ट करने के लिये वारन्ट की भी जरूरत नही होती है । अगर संज्ञेय अपराध होता है तो पुलिस की ड्यूटी बनती है कि वह आपकी FIR दर्ज करे । संज्ञेय अपराध जैसे- मर्डर, रेप, व दहेज हत्या होती है ।असंज्ञेय अपराध- (CRPC 2L) असंज्ञेय अपराध वह अपराध होते है जिसमे किसी व्यक्ति वाद विवाद, चोरी, चीटिंग अथवा किसी को हर्ट करना असंज्ञेय अपराध है । असंज्ञेय अपराध मे FIR नही लिखी जाती है ब्लकि आपकी शिकायत को लेकर अपनी (GR) डायरी पर नोट कर लेती है और जांच करने के उपरान्त अपराधी अरेस्ट करके कोर्ट के सामने पेश करती है ।

जब भी कोई संज्ञेय अपराध होता है तो FIR करानी चाहिए फिर भी अगर पुलिस आपकी FIR लिखने से मना करती है तो आपको अपने जिले के पुलिस अधीक्षक को शिकायत करनी चाहिये, आप शिकायत पुलिस अधीक्षक के पास जा कर अथवा डाक के व्दारा भी कर सकते है, उसके बाद भी आपकी अगर कोई सुनवाई नही होती है तो आपको CRPC- 156(3) के तहत मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के पास यह पावर होती है कि वह पुलिस को आर्डर दे कि आपके अपराध पर FIR दर्ज करे । इसके बावजूद भी कभी कभी ऐसा होता है मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट पुलिस को आपकी FIR लिखने का आर्डर न देकर आपके अपराध की जांच करके FIR दर्ज करने  का आदेश देती है  ।