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सीआरपीसी की धारा 172 | अन्वेषण में कार्यवाहियों की डायरी | CrPC Section- 172 in hindi| Diary of proceedings in investigation.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 172 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 172 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 172 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 172 के अन्तर्गत जब कोई जांच अधिकारी अथवा भारसाधक अधिकारी किसी मामले की जांच करता है, तो जांच से सम्बंधित समस्त कार्यवाहियो को दिन-प्रतिदिन एक डायरी मे नोट करेगा अथवा डायरी मे लिखेगा, कब और किस समय कार्यवाही को आरम्भ की थी और कब समाप्त की, साथ ही मामले मे साक्षियों व्दारा क्या बयान दिया गया और मामले मे जांच की समस्त कार्यवाहीयों को अंकित करेगा।  यह धारा 172 ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारी व्दारा की गयी जांच के समस्त कार्यवाहियों की डायरी मे दर्ज करने की प्रक्रिया को बताता है।

सीआरपीसी की धारा 172 के अनुसार

अन्वेषण में कार्यवाहियों की डायरी-

(1) प्रत्येक पुलिस अधिकारी, जो इस अध्याय के अधीन अन्वेषण करता है, अन्वेषण में की गई अपनी कार्यवाही को दिन-प्रतिदिन एक डायरी में लिखेगा, जिसमें वह समय जब उसे इत्तिला मिली, वह समय जब उसने अन्वेषण आरम्भ किया और जब समाप्त किया, वह स्थान या वे स्थान जहां वह गया और अन्वेषण द्वारा अभिनिश्चित परिस्थितियों का विवरण होगा।
(क) धारा 161 के अधीन अन्वेषण के दौरान अभिलिखित किए गये साक्षियों के बयान को केस डायरी में अन्त:स्थापित किया जाएगा।
(ख) उपधारा (1) में निर्दिष्ट डायरी एक संग्रह तथा सम्यक् रूपेण पृष्ठ संख्यांकित होगी।
(2) कोई दण्ड न्यायालय ऐसे न्यायालय में जांच या विचारण के अधीन मामले की पुलिस डायरियों को मंगा सकता है और ऐसी डायरियों को मामले में साक्ष्य के रूप में तो नहीं किन्तु ऐसी जांच या विचारण में अपनी सहायता के लिए उपयोग में ला सकता है।
(3) न तो अभियुक्त और न उसके अभिकर्ता ऐसी डायरियों को मंगाने के हकदार होंगे और न वह या वे केवल उस कारण उन्हें देखने के हकदार होंगे कि वे न्यायालय द्वारा देखी गई हैं, किन्तु यदि वे उस पुलिस अधिकारी द्वारा, जिसने उन्हें लिखा है अपनी स्मृति को ताजा करने के लिए उपयोग में लाई जाती है, या यदि न्यायालय उन्हें ऐसे पुलिस अधिकारी की बातों का खण्डन करने के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाता है तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की, यथास्थिति, धारा 161 या धारा 145 के उपबन्ध लागू होंगे।

Diary of proceedings in investigation-
(1) Every police officer making an investigation under this Chapter shall day by day enter his proceedings in the investigation in a diary, setting forth the time at which the information reached him, the time at which he began and closed his investigation, the place or places visited by him, and statement of the circumstances ascertained through his investigation.
(A) The statements of witnesses recorded during the course of investigation under section 161 shall be inserted in the case diary.
(B) The diary referred to in sub-section (1) shall be a volume and duly paginated.
(2) Any Criminal Court may send for the police diaries of a case under inquiry or trial in such Court, and may use such diaries, not as evidence in the case, but to aid it in such inquiry or trial.
(3) Neither the accused nor his agents shall be entitled to call for such diaries, nor shall he or they be entitled to see them merely because they are referred to by the Court; but, if they are used by the police officer who made them to refresh his memory, or if the Court uses them for the purpose of contradicting such police officer, the provisions of Section 161 or Section 145, as the case may be, of the Indian Evidence Act, 1872 (1 of 1872), shall apply.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 172 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 171 | परिवादी और साक्षियों से पुलिस अधिकारी के साथ जाने की अपेक्षा न किया जाना और उनका अवरुद्ध न किया जाना | CrPC Section- 171 in hindi| Complainant and witnesses not to be required to accompany police officer and not to be subjected to restraint.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 171 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 171 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 171 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 171 के अन्तर्गत जब किसी मामले मे किसी परिवादी या साक्षी से न्यायालय साथ जाने की अवश्यकता नही होगी, उससे अपनी हाजिरी के लिये उसके बन्धपत्र देने की उपेक्षा की जायेगी, यदि बन्धपत्र निष्पादित करने से इंकार करता है तो  पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी उसे मजिस्ट्रेट के पास अभिरक्षा में भेज सकता है, जो उसे तब तक अभिरक्षा में निरुद्ध रख सकता है जब तक वह ऐसा बन्धपत्र निष्पादित नहीं कर देता है या जब तक मामले की सुनवाई समाप्त नहीं हो जाती है। यह धारा 171 ऐसे मामलों में परिवादी और साक्षियों से पुलिस अधिकारी के साथ जाने की अपेक्षा न किया जाना और उनका अवरुद्ध न किया जाना प्रक्रिया को बतलाता है।

सीआरपीसी की धारा 171 के अनुसार

परिवादी और साक्षियों से पुलिस अधिकारी के साथ जाने की अपेक्षा न किया जाना और उनका अवरुद्ध न किया जाना-

किसी परिवादी या साक्षी से, जो किसी न्यायालय में जा रहा है, पुलिस अधिकारी के साथ जाने की अपेक्षा न की जाएगी, और न तो उसे अनावश्यक रूप से अवरुद्ध किया जाएगा या असुविधा पहुंचाई जाएगी और न उससे अपनी हाजिरी के लिए उसके अपने बंधपत्र से भिन्न कोई प्रतिभूति देने की अपेक्षा की जाएगी :
परन्तु यदि कोई परिवादी या साक्षी हाजिर होने से, या धारा 170 में निर्दिष्ट प्रकार का बंधपत्र निष्पादित करने से इंकार करता है तो पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी उसे मजिस्ट्रेट के पास अभिरक्षा में भेज सकता है, जो उसे तब तक अभिरक्षा में निरुद्ध रख सकता है जब तक वह ऐसा बन्धपत्र निष्पादित नहीं कर देता है या जब तक मामले की सुनवाई समाप्त नहीं हो जाती है।

Complainant and witnesses not to be required to accompany police officer and not to be subjected to restraint-
No complainant or witness on his way to any Court shall be required to accompany a police officer, or shall be subjected to unnecessary restraint or inconvenience, or required to give any security for his appearance other than his own bond:
Provided that, if any complainant or witness refuses to attend or to execute a bond as directed in Section 170, the officer in charge of the police station may forward him in custody to the Magistrate, who may detain him in custody until he executes such bond, or until the hearing of the case is completed.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 171 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 170 | जब साक्ष्य पर्याप्त है तब मामलों का मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया जाना | CrPC Section- 170 in hindi| Cases to be sent to Magistrate when evidence is sufficient.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 170 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 170 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 170 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 170 के अन्तर्गत जब किसी मामले मे जांच पर पुलिस अधिकारी अथवा भारसाधक अधिकारी पर्याप्त साक्ष्य जांच से प्राप्त कर लेता है, तो वह न्यायालय मे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करता है, प्राप्त साक्ष्य के आधार पर ही मजिस्ट्रेट अभियुक्त का विचारण करने या उसे विचारणार्थ सुपुर्द करने के लिए सशक्त मजिस्ट्रेट के पास अभियुक्त को अभिरक्षा में भेजेगा अथवा यदि अपराध जमानतीय है और अभियुक्त प्रतिभूति देने के लिए समर्थ है यह धारा 170 ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारी व्दारा अन्वेषण के पश्चात् साक्ष्य पर्याप्त है तब मामलों का मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया जाना प्रक्रिया को बताता है।

सीआरपीसी की धारा 170 के अनुसार

जब साक्ष्य पर्याप्त है तब मामलों का मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया जाना-

(1) यदि इस अध्याय के अधीन अन्वेषण करने पर पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को प्रतीत होता है कि यथापूर्वोक्त पर्याप्त साक्ष्य या उचित आधार है, तो वह अधिकारी पुलिस रिपोर्ट पर उस अपराध का संज्ञान करने के लिए और अभियुक्त का विचारण करने या उसे विचारणार्थ सुपुर्द करने के लिए सशक्त मजिस्ट्रेट के पास अभियुक्त को अभिरक्षा में भेजेगा अथवा यदि अपराध जमानतीय है और अभियुक्त प्रतिभूति देने के लिए समर्थ है तो ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष नियत दिन उसके हाजिर होने के लिए और मजिस्ट्रेट के समक्ष, जब तक अन्यथा निदेश न दिया जाए तब तक दिन-प्रतिदिन उसकी हाजिरी के लिए प्रतिभूति लेगा।
(2) जब पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी अभियुक्त को इस धारा के अधीन मजिस्ट्रेट के पास भेजता है या ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष उसके हाजिर होने के लिए प्रतिभूति लेता है तब उस मजिस्ट्रेट के पास वह ऐसा कोई आयुध या अन्य वस्तु जो उसके समक्ष पेश करना आवश्यक हो, भेजेगा और यदि कोई परिवादी हो, तो उससे और ऐसे अधिकारी को मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित प्रतीत होने वाले उतने व्यक्तियों से, जितने वह आवश्यक समझे, मजिस्ट्रेट के समक्ष निर्दिष्ट प्रकार से हाजिर होने के लिए और (यथास्थिति) अभियोजन करने के लिए या अभियुक्त के विरुद्ध आरोप के विषय में साक्ष्य देने के लिए बन्धपत्र निष्पादित करने की अपेक्षा करेगा।
(3) यदि बन्धपत्र में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का न्यायालय उल्लिखित है तो उस न्यायालय के अन्तर्गत कोई ऐसा न्यायालय भी समझा जाएगा जिसे ऐसा मजिस्ट्रेट मामले की जांच या विचारण के लिए निर्देशित करता है, परन्तु यह तब जब ऐसे निर्देश की उचित सूचना उस परिवादी या उन व्यक्तियों को दे दी गई है।
(4) वह अधिकारी, जिसकी उपस्थिति में बन्धपत्र निष्पादित किया जाता है, उस बन्धपत्र की एक प्रतिलिपि उन व्यक्तियों में से एक को परिदत्त करेगा जो उसे निष्पादित करता है और तब मूल बन्धपत्र को अपनी रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा।

Cases to be sent to Magistrate when evidence is sufficient–
(1) If, upon an investigation under this Chapter, it appears to the officer in charge of the police station that there is sufficient evidence or reasonable ground as aforesaid, such officer shall forward the accused under custody to a Magistrate empowered to take cognizance of the offence upon a police report and to try the accused or commit him for trial, or, if the offence is bailable and the accused is able to give security, shall take security from him for his appearance before such Magistrate on a day fixed and for his attendance from day to day before such Magistrate until otherwise directed.
(2) When the officer in charge of a police station forwards an accused person to a Magistrate or takes security for his appearance before such Magistrate under this section, he shall send to such Magistrate any weapon or other article which it may be necessary to produce before him, and shall require the complainant (if any) and so many of the persons who appear to such officer to be acquainted with the facts and circumstances of the case as he may think necessary, to execute a bond to appear before the Magistrate as thereby directed and prosecute or give evidence (as the case may be) in the matter of the charge against the accused.
(3) If the Court of the Chief Judicial Magistrate is mentioned in the bond, such Court shall be held to include any Court to which such Magistrate may refer the case for inquiry or trial, provided reasonable notice of such reference is given to such complainant or persons.
(4) The officer in whose presence the bond is executed shall deliver a copy thereof to one of the persons who executed it, and shall then send to the Magistrate the original with his report.

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सीआरपीसी की धारा 169 | जब साक्ष्य अपर्याप्त हो तब अभियुक्त का छोड़ा जाना | CrPC Section- 169 in hindi| Release of accused when evidence deficient.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 169 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 169 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 169 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 169 के अन्तर्गत जब किसी मामले मे जांच पर पुलिस अधिकारी अथवा भारसाधक अधिकारी को प्रतीत होता हो कि पर्याप्त साक्ष्य या सन्देह उचित आधार नही है, जिससे अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के समक्ष भेजना उचित नही है तो पुलिस अधिकारी अथवा भारसाधक अधिकारी बन्धपत्र निष्पादित करने पर उसे छोड़ देगा और जब अपेक्षा की जाए तो और तब वह ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होगा जो पुलिस रिपोर्ट पर ऐसे अपराध का संज्ञान करने के लिए, और अभियुक्त का विचारण करने या उसे विचारणार्थ सुपुर्द करने के लिए सशक्त है। यह धारा 169 ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारी व्दारा अन्वेषण के पश्चात् साक्ष्य अपर्याप्त होने के अभियुक्त को छोडा जाना प्रक्रिया को बतलाता है।

सीआरपीसी की धारा 169 के अनुसार

जब साक्ष्य अपर्याप्त हो तब अभियुक्त का छोड़ा जाना—

यदि इस अध्याय के अधीन अन्वेषण पर पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को प्रतीत होता है कि ऐसा पर्याप्त साक्ष्य या सन्देह का उचित आधार नहीं है जिससे अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के पास भेजना न्यायानुमत है तो ऐसा अधिकारी उस दशा में जिसमें वह व्यक्ति अभिरक्षा में है उसके द्वारा प्रतिभुओं के सहित या रहित, जैसा ऐसा अधिकारी निर्दिष्ट करे, यह बन्धपत्र निष्पादित करने पर उसे छोड़ देगा कि यदि और जब अपेक्षा की जाए तो और तब वह ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होगा जो पुलिस रिपोर्ट पर ऐसे अपराध का संज्ञान करने के लिए, और अभियुक्त का विचारण करने या उसे विचारणार्थ सुपुर्द करने के लिए सशक्त है।

Release of accused when evidence deficient-
If, upon an investigation under this Chapter, it appears to the officer in charge of the police station that there is not sufficient evidence or reasonable ground of suspicion to justify the forwarding of the accused to a Magistrate, such officer shall, if such person is in custody, release him on his executing a bond, with or without sureties, as such officer may direct, to appear, if and when so required, before a Magistrate empowered to take cognizance of the offence on a police report, and to try the accused or commit him for trial.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 169 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 168 | अधीनस्थ पुलिस अधिकारी द्वारा अन्वेषण की रिपोर्ट | CrPC Section- 168 in hindi| No Report of investigation by subordinate police officer.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 168 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 168 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 168 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 168 के अन्तर्गत जब कोई पुलिस अधिकारी किसी मामले की जांच करता है तब वह उस जांच के परिणाम की रिपोर्ट पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को करेगा। यह धारा 168 ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारी व्दारा अन्वेषण की रिपोर्ट भारसाधक अधिकारी को प्रस्तुत करने को बतलाती है।

सीआरपीसी की धारा 168 के अनुसार

अधीनस्थ पुलिस अधिकारी द्वारा अन्वेषण की रिपोर्ट-

जब कोई अधीनस्थ पुलिस अधिकारी इस अध्याय के अधीन कोई अन्वेषण करता है तब वह उस अन्वेषण के परिणाम की रिपोर्ट पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को करेगा।

Report of investigation by subordinate police officer-
When any subordinate police officer has made any investigation under this Chapter, he shall report the result of such investigation to the officer in charge of the police station.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 168 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 167 | जब चौबीस घंटे के अन्दर अन्वेषण पूरा न किया जा सके तब प्रक्रिया | CrPC Section- 167 in hindi| Procedure when investigation cannot be completed in twenty-four hours.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 167 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 167 के अन्तर्गत जब कभी कोई व्यक्ति गिरफ्तार किया गया है और अभिरक्षा मे निरूद्ध है और यह प्रतीत हो कि अन्वेषण धारा 57 द्वारा नियत चौबीस घंटे की अवधि के अन्दर पूरा नहीं किया जा सकता और यह विश्वास करने के लिए आधार है, तो निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को इसमें इसके पश्चात् विहित डायरी की मामले से सम्बन्धित प्रविष्टियों की एक प्रतिलिपि भेजेगा और साथ ही अभियुक्त व्यक्ति को भी उस मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा। यह धारा 167 ऐसे मामलों में चौबीस घंटे के अन्दर अन्वेषण पूरा न किया जा सके। प्रकिया को बतलाता है।

सीआरपीसी की धारा 167 के अनुसार

जब चौबीस घंटे के अन्दर अन्वेषण पूरा न किया जा सके तब प्रक्रिया-

(1) जब कभी कोई व्यक्ति गिरफ्तार किया गया है और अभिरक्षा में निरुद्ध है और यह प्रतीत हो कि अन्वेषण धारा 57 द्वारा नियत चौबीस घंटे की अवधि के अन्दर पूरा नहीं किया जा सकता और यह विश्वास करने के लिए आधार है। कि अभियोग या इत्तिला दृढ़ आधार पर है तब पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी या यदि अन्वेषण करने वाला पुलिस अधिकारी उपनिरीक्षक से निम्नतर पंक्ति का नहीं है तो वह, निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को इसमें इसके पश्चात् विहित डायरी की मामले से सम्बन्धित प्रविष्टियों की एक प्रतिलिपि भेजेगा और साथ ही अभियुक्त व्यक्ति को भी उस मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा।
(2) वह मजिस्ट्रेट जिसके पास अभियुक्त व्यक्ति इस धारा के अधीन भेजा जाता है, चाहे उस मामले के विचारण की उसे अधिकारिता हो या न हो, अभियुक्त का ऐसी अभिरक्षा में, जैसी वह मजिस्ट्रेट ठीक समझे, इतनी अवधि के लिए, जो कुल मिला कर पन्द्रह दिन से अधिक न होगी, निरुद्ध किया जाना समय-समय पर प्राधिकृत कर सकता है तथा यदि उसे मामले के विचारण की या विचारण के लिए सुपुर्द करने की अधिकारिता नहीं है और अधिक निरुद्ध रखना उसके विचार में अनावश्यक है तो वह अभियुक्त को ऐसे मजिस्ट्रेट के पास, जिसे ऐसी अधिकारिता है, भिजवाने के लिए आदेश दे सकता है।
परन्तु –
(क) मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति का पुलिस अभिरक्षा से अन्यथा निरोध पन्द्रह दिन की अवधि से आगे के लिए उस दशा में प्राधिकृत कर सकता है जिसमें उसका समाधान हो जाता है कि ऐसा करने के लिए पर्याप्त आधार है किन्तु कोई भी मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति का इस पैरा के अधीन अभिरक्षा में निरोध :-
(i) कुल मिलाकर नब्बे दिन से अधिक की अवधि के लिए प्राधिकृत नहीं करेगा जहां अन्वेषण ऐसे अपराध के सम्बन्ध में है जो मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष से अन्यून की अवधि के लिए कारावास से दण्डनीय है;
(ii) कुल मिलाकर साठ दिन से अधिक की अवधि के लिए प्राधिकृत नहीं करेगा जहां अन्वेषण किसी अन्य अपराध के सम्बन्ध में है;
और यथास्थिति, नब्बे दिन या साठ दिन की उक्त अवधि की समाप्ति पर यदि अभियुक्त व्यक्ति जमानत देने के लिए तैयार है और दे देता है तो उसे जमानत पर छोड़ दिया जाएगा और यह समझा जायेगा कि इस उपधारा के अधीन जमानत पर छोड़ा गया प्रत्येक व्यक्ति अध्याय 33 के प्रयोजनों के लिए उस अध्याय के उपबन्धों के अधीन छोड़ा गया समझा जाएगा;
(ख) कोई भी मजिस्ट्रेट इस धारा के अधीन पुलिस की अभिरक्षा में अभियुक्त के निरोध को प्राधिकृत नहीं करेगा जब तक अभियुक्त को उसके समक्ष प्रथम बार सशरीर तथा पश्चात्वर्ती प्रत्येक समय पर, जब तक अभियुक्त पुलिस की अभिरक्षा में बना रहता है, पेश नहीं किया जाता है, किन्तु मजिस्ट्रेट अभियुक्त की या तो सशरीर या इलेक्ट्रानिक वीडियो सम्पर्क के माध्यम से पेश किए जाने पर न्यायिक अभिरक्षा में अग्रेतर निरोध को बढ़ा सकेगा।
(ग) कोई द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट, जो उच्च न्यायालय द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त नहीं किया गया है, पुलिस की अभिरक्षा में निरोध प्राधिकृत न करेगा।

Procedure when investigation cannot be completed in twenty-four hours-
(1) Whenever any person is arrested and detained in custody, and it appears that the investigation cannot be completed within the period twenty-four hours fixed by Section 57, and there are grounds for believing that the accusation or information is well-founded, the officer in charge of the police station or the police officer making the investigation, if he is not below the rank of sub-inspector, shall forthwith transmit to the nearest Judicial Magistrate a copy of the entries in the diary hereinafter prescribed relating to the case, and shall at the same time forward the accused to such Magistrate.
(2) The Magistrate to whom an accused person is forwarded under this section may, whether he has or has not jurisdiction to try the case, from time to time, authorise the detention of the accused in such custody as such Magistrate thinks fit, for a term not exceeding fifteen days in the whole; and if he has no jurisdiction to try the case or commit it for trial, and considers further detention unnecessary, he may order the accused to be forwarded to a Magistrate having such jurisdiction :
Provided that-
(a) the Magistrate may authorise the detention of the accused person. otherwise than in the custody of the police, beyond the period of fifteen days, if he is satisfied that adequate grounds exist for doing so, but no Magistrate shall authorise the detention of the accused person in custody under this paragraph for a total period exceeding.-
(i) ninety days, where the investigation relates to an offence punishable with death, imprisonment for life or imprisonment for a term of not less than ten years;
(ii) sixty days, where the investigation relates to any other offence, and, on the expiry of the said period of ninety days, or sixty days, as the case may be, the accused person shall be released on bail if he is prepared to and does furnish bail, and every person released on bail under this sub section shall be deemed to be so released under the provisions of Chapter XXXIII for the purposes of that Chapter ;
(b) no Magistrate shall authorise detention of the accused in custody of the police under this section unless the accused is produced before him in person for the first time and subsequently every time till the accused remains in the custody of the police, but the Magistrate may extend further detention in judicial custody on production of the accused either in person or through the medium of electronic video linkage;
(c) no Magistrate of the second class, not specially empowered in this behalf by the High Court, shall authorise detention in the custody of the police.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 167 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।