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आईपीसी की धारा 368 | व्यपहृत या अपहृत व्यक्ति को सदोष छिपाना या परिरोध में रखना | IPC Section- 368 in hindi| Wrongfully concealing or keeping in confinement, kidnapped or abducted person.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 368 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 368 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 368 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 368 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई यह जानते हुये कि कोई व्यक्ति व्यपहृत या अपहृत किया गया है, ऐसे व्यक्ति को सदोष छिपायेगा या परिरोध में रखेगा, तो वह धारा 368 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 368 के अनुसार

व्यपहृत या अपहृत व्यक्ति को सदोष छिपाना या परिरोध में रखना-

जो कोई यह जानते हुये कि कोई व्यक्ति व्यपहृत या अपहृत किया गया है, ऐसे व्यक्ति को सदोष छिपायेगा या परिरोध में रखेगा, वह उसी प्रकार दण्डित किया जायेगा, मानो उसने उसी आशय या ज्ञान या प्रयोजन से ऐसे व्यक्ति का व्यपहरण या अपहरण किया हो जिससे उसने ऐसे व्यक्ति को छिपाया या परिरोध में निरुद्ध रखा है।

Wrongfully concealing or keeping in confinement, kidnapped or abducted person-
Whoever, knowing that any person has been kidnapped or has been abducted, wrongfully conceals or confines such person, shall be punished in the same manner as if he had kidnapped or abducted such person with the same intention or knowledge, or for the same purpose as that with or for which he conceals or detains such person in confinement.

लागू अपराध

व्यपहृत व्यक्ति को छिपाना या परिरोध में रखना।
सजा- व्यपहरण या अपहरण के लिए दंड।
यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
वह न्यायालय, जिसके द्वारा व्यपहरण या अपहरण विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 368 के अंतर्गत जो कोई यह जानते हुये कि कोई व्यक्ति व्यपहृत या अपहृत किया गया है, ऐसे व्यक्ति को सदोष छिपायेगा या परिरोध में रखेगा।वह उसी प्रकार दण्डित किया जायेगा, मानो उसने उसी आशय या ज्ञान या प्रयोजन से ऐसे व्यक्ति का व्यपहरण या अपहरण किया हो जिससे उसने ऐसे व्यक्ति को छिपाया या परिरोध में निरुद्ध रखा है।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 368 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
व्यपहृत व्यक्ति को छिपाना या परिरोध में रखना।व्यपहरण या अपहरण के लिए दंड।संज्ञेयगैर-जमानतीयवह न्यायालय, जिसके द्वारा व्यपहरण या अपहरण विचारणीय है।

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 368 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 367 | व्यक्ति को घोर उपहति, दासत्व आदि का विषय बनाने के उद्देश्य से व्यपहरण या अपहरण | IPC Section- 367 in hindi| Kidnapping or abducting in order to subject person to grievous hurt, slavery, etc.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 367 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 367 के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 367 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 367 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो कोई व्यक्ति, किसी व्यक्ति का व्यपहरण या अपहरण इसलिये करेगा कि उसे घोर उपहति या दासत्व का या किसी व्यक्ति की प्रकृति विरुद्ध काम-वासना का विषय बनाया जाये या बनाये जाने के खतरे में वह जैसे पड़ सकता है वैसे उसे व्ययनित किया जाये या यह सम्भाव्य जानते हुये करेगा कि ऐसे व्यक्ति को उपर्युक्त बातों का विषय बनाया जाएगा तो वह धारा 367 के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 367 के अनुसार

व्यक्ति को घोर उपहति, दासत्व आदि का विषय बनाने के उद्देश्य से व्यपहरण या अपहरण-

जो कोई किसी व्यक्ति का व्यपहरण या अपहरण इसलिये करेगा कि उसे घोर उपहति या दासत्व का या किसी व्यक्ति की प्रकृति विरुद्ध काम-वासना का विषय बनाया जाये या बनाये जाने के खतरे में वह जैसे पड़ सकता है वैसे उसे व्ययनित किया जाये या यह सम्भाव्य जानते हुये करेगा कि ऐसे व्यक्ति को उपर्युक्त बातों का विषय बनाया जाएगा या उपर्युक्त रूप से व्ययनित किया जाएगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी
दण्डनीय होगा।

Kidnapping or abducting in order to subject person to grievous hurt, slavery, etc-
Whoever kidnaps or abducts any person in order that such person may be subjected, or may be so disposed of as to be put in danger of being subjected to grievous hurt, or slavery, or to the unnatural lust of any person, or knowing it to be likely that such person will be so subjected or disposed or, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.

लागू अपराध

किसी व्यक्ति को घोर उपहति, दासत्व आदि का विषय बनाने के उद्देश्य से व्यपहरण या अपहरण।
सजा- दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 367 के अंतर्गत जो कोई किसी व्यक्ति को घोर उपहति, दासत्व आदि का विषय बनाने के उद्देश्य से व्यपहरण या अपहरण करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 367 अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
किसी व्यक्ति को घोर उपहति, दासत्व आदि का विषय बनाने के उद्देश्य से व्यपहरण या अपहरण।दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।संज्ञेयगैर-जमानतीयसेशन न्यायालय द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 367 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 366B | विदेश से लड़की का आयात करना | IPC Section- 366B in hindi| Importation of girl from foreign country.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 366B के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 366B के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 366B का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 366B के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो व्यक्ति किसी इक्कीस वर्ष से कम आयु की किसी लड़की को भारत से बाहर के किसी देश से या जम्मू-कश्मीर राज्य से आयात करेगा या उसे किसी अन्य व्यक्ति से अयुक्त संभोग करने के लिये विवश या विलुब्ध करेगा तो वह धारा 366B के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 366B के अनुसार

विदेश से लड़की का आयात करना-

जो कोई इक्कीस वर्ष से कम आयु की किसी लड़की को भारत से बाहर के किसी देश से या जम्मू-कश्मीर राज्य से आयात, उसे किसी अन्य व्यक्ति से अयुक्त संभोग करने के लिये विवश या विलुब्ध करने के आशय से या तद्द्वारा वह विवश या विलुब्ध की जाएगी, यह सम्भाव्य जानते हुए करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

Importation of girl from foreign country-
Whoever imports into India from any country outside India or from the State of Jammu and Kashmir any girl under the age of twenty one years with intent that she may be, or knowing it to be likely that she will be, forced or seduced to illicit intercourse with another person, shall be punishable with imprisonment which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.

लागू अपराध

विदेश से लड़की का आयात करना।
सजा- दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 366B के अंतर्गत जो कोई कोई इक्कीस वर्ष से कम आयु की किसी लड़की को भारत से बाहर के किसी देश से या जम्मू-कश्मीर राज्य से आयात, उसे किसी अन्य व्यक्ति से अयुक्त संभोग करने के लिये विवश या विलुब्ध करने के आशय से या तद्द्वारा वह विवश या विलुब्ध करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 366B अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
विदेश से लड़की का आयात करना।दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।संज्ञेयगैर-जमानतीयसेशन न्यायालय द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 366B की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आईपीसी की धारा 366A | अप्राप्तवय लड़की का उपापन | IPC Section- 366A in hindi| Procuration of minor girl.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 366A के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 366A के अंतर्गत कैसे क्या सजा मिलती है और जमानत कैसे मिलती है, और यह अपराध किस श्रेणी में आता है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 366A का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में धारा 366A के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। जो व्यक्ति किसी अठारह वर्ष से कम आयु की लड़की को किसी अन्य व्यक्ति से अयुक्त संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध करने के आशय से या तद्वारा विवश या विलुब्ध करेगा, यह सम्भाव्य जानते हुये ऐसी लड़की को किसी स्थान से जाने को या कोई कार्य करने को, किसी भी साधन द्वारा उत्प्रेरित करेगा तो वह धारा 366A के अंतर्गत दंड एवं जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

आईपीसी की धारा 366A के अनुसार

अप्राप्तवय लड़की का उपापन–

जो कोई अठारह वर्ष से कम आयु को अप्राप्तवय लड़की को अन्य व्यक्ति से अयुक्त संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध करने के आशय से या तद्वारा विवश या विलुब्ध किया जायेगा, यह सम्भाव्य जानते हुये ऐसी लड़की को किसी स्थान से जाने को या कोई कार्य करने को, किसी भी साधन द्वारा उत्प्रेरित करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

Procuration of minor girl-
Whoever, by any means whatsoever, induces any minor girl under the age of eighteen years to go from any place or to do any act with intent that such girl may be, or knowing that it is likely that she will be, forced c seduced to illicit intercourse with another person, shall be punishable with imprisonment which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.

लागू अपराध

अप्राप्तवय लड़की का उपादन।
सजा- दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।
यह अपराध एक गैर-जमानतीय और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौते योग्य नहीं है।

जुर्माना/सजा (Fine/Punishment) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 366A के अंतर्गत जो कोई कोई अठारह वर्ष से कम आयु को अप्राप्तवय लड़की को अन्य व्यक्ति से अयुक्त संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध करने के आशय से या तद्वारा विवश या विलुब्ध किया जायेगा, यह सम्भाव्य जानते हुये ऐसी लड़की को किसी स्थान से जाने को या कोई कार्य करने को, किसी भी साधन द्वारा उत्प्रेरित करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।।

जमानत (Bail) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 366A अंतर्गत जो अपराध कारित किए जाते है वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में गैर-जमानतीय (Non-Baileble) अपराध की श्रेणी में आते है, इसलिए इस धारा के अंतर्गत किए गए अपराध में जमानत नही मिल सकेगी।

अपराधसजाअपराध श्रेणीजमानतविचारणीय
अप्राप्तवय लड़की का उपादन।दस वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना।संज्ञेयगैर-जमानतीयसेशन न्यायालय द्वारा

हमारा प्रयास आईपीसी की धारा 366A की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आप के पास कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

पॉक्सो एक्ट की धारा 46 | कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति | Pocso Act Section- 46 by in hindi | Power to remove difficulties.

POCSO Section-46

नमस्कार दोस्तों, आज हम पॉक्सो एक्ट की धारा 46 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 46? साथ ही हम आपको POCSO ACT की धारा 46 क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 46 का विवरण

पॉक्सो एक्ट की धारा 46 के अंतर्गत यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो उसे कठिनाइयां दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों और जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों, तो वह यह पॉक्सो एक्ट की धारा 46 के अंतर्गत कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति को परिभाषित करती है।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 46 के अनुसार

कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति–

(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो उसे कठिनाइयां दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों और जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों :
परंतु कोई आदेश इस धारा के अधीन इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि को समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।

Power to remove difficulties-
(1) If any difficulty arises in giving effect to the provisions of this Act, the Central Government may, by order published in the Official Gazette, make such provisions not inconsistent with the provisions of this Act as may appear to it to be necessary or expedient for removal of the difficulty:
Provided that no order shall be made under this section after the expiry of the period of two years from the commencement of this Act.
(2) Every order made under this section shall be laid, as soon as may be after it is made, before each House of Parliament.

हमारा प्रयास पॉक्सो एक्ट की धारा 46 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
धन्यवाद

पॉक्सो एक्ट की धारा 45 | नियम बनाने की शक्ति | Pocso Act Section- 45 by in hindi | Power to make rules.

Pocso section- 45

नमस्कार दोस्तों, आज हम पॉक्सो एक्ट की धारा 45 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 45? साथ ही हम आपको POCSO ACT की धारा 45 क्या परिभाषित करती है, इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 45 का विवरण

पॉक्सो एक्ट की धारा 45 के अंतर्गत केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी, साथ ही वह अपने न्यायविवेक के आधार पर बदलाव भी कर सकेगी। यह पॉक्सो एक्ट की धारा 45 नियम बनाने की शक्ति को परिभाषित करती है।

पॉक्सो एक्ट (POCSO ACT) की धारा 45 के अनुसार

नियम बनाने की शक्ति-

(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्:-
[(क) धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन किसी बालक को सम्मिलित करने वालों किसी भी रूप में अश्लील सामग्री को मिटाने या नष्ट करने या अभिहित प्राधिकारी को रिपोर्ट करने की रीति;
(कक) धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन किसी बालक को सम्मिलित करने वाली किसी भी रूप में अश्लील सामग्री के बारे में रिपोर्ट करने की रीति;]
(क) धारा 19 की उपधारा (4); धारा 26 की उपधारा (2) और उपधारा (3) तथा धारा 38 के अधीन किसी अनुवादक या दुभाषिए, किसी विशेष शिक्षक या बालक से संपर्क करने की रीति से सुपरिचित किसी व्यक्ति या उस क्षेत्र के किसी विशेषज्ञ की अर्हताएं और अनुभव तथा संदेय फीस;
(ख) धारा 19 को उपधारा (5) के अधीन बालक की देखभाल और संरक्षण तथा आपात चिकित्सा उपचार;
(ग) धारा 33 की उपधारा (8) के अधीन प्रतिकर का संदाय;
(घ) धारा 44 की उपधारा (1) के अधीन अधिनियम के उपबंधों की आवधिक मानीटरी की रीति।
(3) इस धारा के अधीन बनाया गया कोई नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष जब सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या दो से अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

Power to make rules-
(1) The Central Government may, by notification in the Official Gazette, make rules for carrying out the purposes of this Act.
(2) In particular, and without prejudice to the generality of the foregoing powers, such rules may provide for all or any of the following matters, namely:
[(a) the manner of deleting or destroying or reporting about pornographic material in any form involving a child to the designated authority under sub-section (1) of section 15:
(aa) the manner of reporting about pornographic material in any form involving a child under sub-section (2) of section 15;
(ab) the qualifications and experience of, and the fees payable to, a translator or an interpreter, a special educator or any person familiar with the manner of communication of the child or an expert in that field, under sub-section (4) of Section 19; asub sections (2) and (3) of Section 26 and Section 38;
(b) care and protection and emergency medical treatment of the child under sub-section (5) of Section 19;
(c) the payment of compensation under sub-section (8) of Section 33;
(d) the manner of periodic monitoring of the provisions of the Act under sub-section (1) of Section 42B.
(3) Every rule made under this section shall be laid, as soon as may be after it is made, before each House of Parliament, while it is in session, for a total period of thirty days which may be comprised in one session or in two or more successive sessions, and if, before the expiry of the session immediately following the session or the successive sessions aforesaid, both Houses agree in making any modification in the rule or both Houses agree that the rule should not be made, the rule shall thereafter have effect only in such modified form or be of no effect, as the case may be; so, however, that any such modification or annulment shall be without prejudice to the validity of anything previously done under that rule.

हमारा प्रयास पॉक्सो एक्ट की धारा 45 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप बेझिझक कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।
धन्यवाद