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सीआरपीसी की धारा 130 | जमाव को तितर-बितर करने के लिए सशस्त्र बल का प्रयोग | CrPC Section- 130 in hindi| Use of armed forces to disperse assembly.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 130 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 130 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 130 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 130 के अन्तर्गत यदि कोई ऐसा जमाव अन्यथा तितर-बितर नहीं किया जा सकता है और यदि लोक सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि उसको तितर-बितर किया जाए तो उच्चतम पंक्ति का कार्यपालक मजिस्ट्रेट, जो उपस्थित हो, सशस्त्र बल द्वारा उसे तितर-बितर करा सकता है तो यह धारा 130 के अंतर्गत उस पुलिस अधिकारी या उच्च अधिकारी को यह शक्ति होती है किसी मामले मे भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सशस्त्र बल का भी प्रयोग कर सकेंगे।

जब किसी मामले पुलिस अधिकारी अगर उसे लगता है कि लोक शांति भंग होगी तो वह लोक सुरक्षा खतरे के लिए यह आवश्यक है कि उसको तितर-बितर किया जाए, तो पुलिस अधिकारी को यह शक्ति होती है, कि वह भी़ड़ को तितर-बितर करने के लिए सशस्त्र बल का प्रयोग कर सकें। CrPC की धारा 130 के अन्तर्गत भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सशस्त्र बल का भी प्रयोग कर सकेंगे।

सीआरपीसी की धारा 130 के अनुसार

जमाव को तितर-बितर करने के लिए सशस्त्र बल का प्रयोग-

(1) यदि कोई ऐसा जमाव अन्यथा तितर-बितर नहीं किया जा सकता है और यदि लोक सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि उसको तितर-बितर किया जाए तो उच्चतम पंक्ति का कार्यपालक मजिस्ट्रेट, जो उपस्थित हो, सशस्त्र बल द्वारा उसे तितर-बितर करा सकता है।
(2) ऐसा मजिस्ट्रेट किसी ऐसे अधिकारी से, जो सशस्त्र बल के व्यक्तियों की किसी टुकड़ी का समादेशन कर रहा है, यह अपेक्षा कर सकता है कि वह अपने समादेशाधीन सशस्त्र बल की मदद से जमाव को तितर-बितर कर दे और उसमें सम्मिलित ऐसे व्यक्तियों को, जिनकी बाबत मजिस्ट्रेट निदेश दे या जिन्हें जमाव को तितर-बितर करने या विधि के अनुसार दंड देने के लिए गिरफ्तार और परिरुद्ध करना आवश्यक है, गिरफ्तार और परिरुद्ध करे ।
(3) सशस्त्र बल का प्रत्येक ऐसा अधिकारी ऐसी अध्यपेक्षा का पालन ऐसी रीति से करेगा जैसी वह ठीक समझे, किन्तु ऐसा करने में केवल इतने ही बल का प्रयोग करेगा और शरीर और सम्पत्ति को केवल इतनी ही हानि पहुँचाएगा जितनी उस जमाव को तितर-बितर करने और ऐसे व्यक्तियों को गिरफ्तार और निरुद्ध करने के लिए आवश्यक है।

Use of armed forces to disperse assembly-
(1) If any such assembly cannot be otherwise dispersed, and if it is necessary for the public security that it should be dispersed, the Executive Magistrate of the highest rank who is present may cause it to be dispersed by the armed forces.
(2) Such Magistrate may require any officer in command of any group of persons belonging to the armed forces to disperse the assembly with the help of the armed forces under his command, and to arrest and confine such persons forming part of it as the Magistrate may direct, or as it may be necessary to arrest and confine in order to disperse the assembly or to have them punished according to law.
(3) Every such officer of the armed forces shall obey such requisition in such manner as he thinks fit, but in so doing he shall use as little force, and do as little injury to person and property, as may be consistent with dispersing the assembly and arresting and detaining such persons.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 130 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 129 | सिविल बल के प्रयोग द्वारा जमाव को तितर-बितर करना | CrPC Section- 129 in hindi| Dispersal of assembly by use of civil force.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 129 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 129 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 129 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 129 के अन्तर्गत यदि कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट या पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी या ऐसे भारसाधक अधिकारी की अनुपस्थिति में किसी विधिविरुद्ध जमाव को, या पांच या अधिक व्यक्तियों के किसी ऐसे जमाव को, जिससे लोकशान्ति विक्षुब्ध होने की सम्भावना है, तितर-बितर होने का समादेश दे सकता है और तब ऐसे जमाव के सदस्यों का यह कर्तव्य होगा कि वे तदनुसार तितर-बितर हो जाएं तो यह धारा 129 के अंतर्गत पुलिस अधिकारी को यह शक्ति होती है किसी मामले मे यदि वह जानता है कि समाज मे आशांति फैलायेंगे, तो सिविल बल के प्रयोग द्वारा जमाव को हटायेंगे।

जब कार्यपालक मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी व्दारा किसी मामले मे उसे प्रतीत होता है, कि यह भीड़ समाज मे आशांति फैलायेगी, तो उस मजिस्ट्रेट को यह शक्ति होती है, कि वह भीड़ हटाने के लिये सिविल बल का प्रयोग कर भीड़ को खत्म करे, चाहे भारसाधक अधिकारी या आदेश देने वाला या अधिकारी हो या न हो CrPC की धारा 129 समाज मे आशांति फैलायेंगे, तो सिविल बल के प्रयोग द्वारा भीड़ को हटाया जाये।

सीआरपीसी की धारा 129 के अनुसार

सिविल बल के प्रयोग द्वारा जमाव को तितर-बितर करना-

(1) कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट या पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी या ऐसे भारसाधक अधिकारी की अनुपस्थिति में उपनिरीक्षक की पंक्ति से अनिम्न कोई पुलिस अधिकारी किसी विधिविरुद्ध जमाव को, या पांच या अधिक व्यक्तियों के किसी ऐसे जमाव को, जिससे लोकशान्ति विक्षुब्ध होने की सम्भावना है, तितर-बितर होने का समादेश दे सकता है और तब ऐसे जमाव के सदस्यों का यह कर्तव्य होगा कि वे तदनुसार तितर-बितर हो जाएं।
(2) यदि ऐसा समादेश दिए जाने पर ऐसा कोई जमाव तितर-बितर नहीं होता है या यदि ऐसे समादिष्ट हुए बिना वह इस प्रकार से आचरण करता है, जिससे उसका तितर-बितर न होने का निश्चय दर्शित होता है, तो उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी उस जमाव को बल द्वारा तितर बितर करने की कार्यवाही कर सकता है और किसी पुरुष से, जो सशस्त्र बल का अधिकारी या सदस्य नहीं हैं और उस नाते कार्य नहीं कर रहा है, ऐसे जमाव को तितर-बितर करने के प्रयोजन के लिए, और यदि आवश्यक हो तो उन व्यक्तियों को, जो उसमें सम्मिलित हैं, इसलिए गिरफ्तार करने और परिरुद्ध करने के लिए कि ऐसा जमाव तितर-बितर किया जा सके या उन्हें विधि के अनुसार दंड दिया जा सके, सहायता की अपेक्षा कर सकता है।

Dispersal of assembly by use of civil force-
(1) Any Executive Magistrate or officer in charge of a police station or, in the absence of such officer in charge, any police officer, not below the rank of a sub-inspector, may command any unlawful assembly, or any assembly of five or more persons likely to cause a disturbance of the public peace, to disperse; and it shall thereupon be the duty of the members of such assembly to disperse accordingly.
(2) If, upon being so commanded, any such assembly does not disperse, or if, without being so commanded, it conducts itself in such a manner as to show a determination not to disperse, any Executive Magistrate or police officer referred to in sub-section (1), may proceed to disperse such assembly by force, and may require the assistance of any male person, not being an officer or member of the armed forces and acting as such, for the purpose of dispersing such assembly, and, if necessary. arresting and confining the persons who form part of it, in order to disperse such assembly or that they may be punished according to law.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 129 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 128 | भरण-पोषण के आदेश का प्रवर्तन | CrPC Section- 128 in hindi| Enforcement of order of maintenance.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 128 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 128 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 128 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 128 के अन्तर्गत यदि न्यायालय द्वारा भरण-पोषण या अन्तरिम भरण-पोषण और कार्यवाहियों के खर्चे के आदेश की प्रति, उस व्यक्ति को जिसके पक्ष मे दिया गया है या उसके संरक्षक को, यदि कोई हो, या उस व्यक्ति को भरण-पोषण या अन्तरिम भरण-पोषण के लिए भत्ता और कार्यवाहियों के खर्चे दिया जाना है, निःशुल्क दी जाएगी। यह धारा 128 के अंतर्गत यदि भत्ता और खर्चे देने से इन्कार करता है, तो उस न्यायालय के मजिस्ट्रेट को समाधान करने के लिये किया जाता है।

जब मजिस्ट्रेट किसी मामले मे भरण-पोषण या अन्तरिम भरण-पोषण और कार्यवाहियों के खर्चे के आदेश करने के पश्चात् भी खर्चा देने से इन्कार करता है, तो CrPC की धारा 128 न्यायालय के मजिस्ट्रेट को यह शक्ति होती है कि उस व्यक्ति जिसे भरण-पोषण देना होता है, उस व्यक्ति पर कार्यवाही कर सकता है अथवा आदेश के अनुरूप कोई बदलाव भी कर सकते है।

सीआरपीसी की धारा 128 के अनुसार

भरण-पोषण के आदेश का प्रवर्तन-

(भरण-पोषण या अन्तरिम भरण-पोषण और कार्यवाहियों के खर्चे, जैसी भी स्थिति हो) के आदेश की प्रति, उस व्यक्ति को, जिसके पक्ष में वह दिया गया है या उसके संरक्षक को, यदि कोई हो, या उस व्यक्ति को, (जिसे भरण-पोषण या अन्तरिम भरण-पोषण के लिए भत्ता और कार्यवाहियों के खर्चे, जैसी भी स्थिति हो) दिया जाना है, निःशुल्क दी जाएगी और ऐसे आदेश का प्रवर्तन किसी ऐसे स्थान में, जहां वह व्यक्ति है जिसके विरुद्ध वह आदेश दिया गया था, किसी मजिस्ट्रेट द्वारा पक्षकारों की पहचान के बारे में और (भत्ते या देय खर्ची, जैसी भी स्थिति हो) के न दिए जाने के बारे में ऐसे मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाने पर किया जा सकता है।

Enforcement of order of maintenance-
A copy of the order of (maintenance or interim maintenance and expenses of proceeding, as the case may be) shall be given without payment to the person in whose favour it is made, or to his guardian, if any, or to the person to (whom the allowance for the maintenance or the allowance for the interim maintenance and expenses of proceeding, as the case may be] is to be paid; and such order may be enforced by any Magistrate in any place where the person against whom it is made may be, on such Magistrate being satisfied as to the identity of the parties and the non-payment of the 5[allowance, or as the case may be, expenses, due.)

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सीआरपीसी की धारा 121 | प्रतिभूओं को अस्वीकार करने की शक्ति | CrPC Section- 121 in hindi| Power to reject sureties.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 121 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 121 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 121 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 121 के अन्तर्गत यदि न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति ने पेश किए प्रतिभू को स्वीकार करने से इन्कार कर सकता है या अपने द्वारा, या अपने पूर्ववर्ती द्वारा इस अध्याय के अधीन पहले स्वीकार किये गये किसी प्रतिभू को इस आधार पर अस्वीकार कर सकता है तो यह धारा 121 के अंतर्गत उस न्यायालय के अधिकारी को यह शक्ति होती है किसी मामले की जांच करने के पश्चात् उसकी प्रतिभूति स्वीकार भी कर सकता है या अस्वीकार भी कर सकता है।

जब मजिस्ट्रेट किसी मामले की जांच करने के पश्चात् अगर उसे लगता है कि यह व्यक्ति दोषी है, तो उस मजिस्ट्रेट को यह शक्ति होती है, कि वह चाहे तो प्रतिभू को स्वीकार कर सकता है और नहीं तो अस्वीकार भी कर सकता है। CrPC की धारा 121 न्यायालय के मजिस्ट्रेट को यह शक्ति होती है कि उसकी प्रतिभू को स्वीकार करने से इन्कार कर सकता है।

सीआरपीसी की धारा 121 के अनुसार

प्रतिभूओं को अस्वीकार करने की शक्ति–

(1) मजिस्ट्रेट किसी पेश किए गये प्रतिभू को स्वीकार करने से इन्कार कर सकता है या अपने द्वारा, या अपने पूर्ववर्ती द्वारा इस अध्याय के अधीन पहले स्वीकार किये गये किसी प्रतिभू को इस आधार पर अस्वीकार कर सकता है कि ऐसा प्रतिभू बन्धपत्र के प्रयोजनों के लिये अनुपयुक्त व्यक्ति है :
परन्तु किसी ऐसे प्रतिभू को इस प्रकार स्वीकार करने से इन्कार करने या उसे अस्वीकार करने के पहले वह प्रतिभू की उपयुक्तता के बारे में या तो स्वयं शपथ पर जांच करेगा या अपने अधीनस्थ मजिस्ट्रेट से ऐसी जांच और उसके बारे में रिपोर्ट करवाएगा।
(2) ऐसा मजिस्ट्रेट जांच करने के पहले प्रतिभू को और ऐसे व्यक्ति को, जिसने वह प्रतिभू पेश किया है, उचित सूचना देगा और जांच करने में अपने सामने दिए गये साक्ष्य के सार को अभिलिखित करेगा।
(3) यदि मजिस्ट्रेट को अपने समक्ष या उपधारा (1) के अधीन प्रतिनियुक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसे दिये गये साक्ष्य पर और ऐसे मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट पर (यदि कोई हो), विचार करने के पश्चात् समाधान हो जाता है कि वह प्रतिभू बन्धपत्र के प्रयोजनों के लिए अनुपयुक्त व्यक्ति है तो वह उस प्रतिभू को, यथास्थिति, स्वीकार करने से इन्कार करने का या उसे अस्वीकार करने का आदेश करेगा और ऐसा करने के लिये अपने कारण अभिलिखित करेगा :
परन्तु किसी प्रतिभू को, जो पहले स्वीकार किया जा चुका है, अस्वीकार करने का आदेश देने के पहले मजिस्ट्रेट अपना समन या वारण्ट, जिसे वह ठीक समझे, जारी करेगा और उस व्यक्ति को, जिसके लिए प्रतिभू आबद्ध है, अपने समक्ष हाजिर कराएगा या बुलाएगा।

Power to reject sureties-
(1) A Magistrate may refuse to accept any surety offered, or may reject any surety previously accepted by him or his predecessor under this Chapter on the ground that such surety is an unfit person for the purposes of the bond:
Provided that, before so refusing to accept or rejecting any such surety, he shall either himself hold an inquiry on oath into the fitness of the surety, or cause such inquiry to be held and a report to be made thereon by a Magistrate subordinate to him.
(2) Such Magistrate shall, before holding the inquiry, give reasonable notice to the surety and to the person by whom the surety was offered and shall, in making the inquiry, record the substance of the evidence adduced before him.
(3) If the Magistrate is satisfied, after considering the evidence so adduced either before him or before a Magistrate deputed under sub-section (1), and the report of such Magistrate (if any), that the surety is an unfit person for the purposes of the bond, he shall make an order refusing to accept or rejecting, as the case may be, such surety and recording his reasons for so doing :
Provided that, before making an order rejecting any surety who has previously been accepted, the Magistrate shall issue his summons or warrant, as he thinks fit, and cause the person for whom the surety is bound to appear or to be brought before him.

हमारा प्रयास सीआरपीसी की धारा 121 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

सीआरपीसी की धारा 120 | बन्धपत्र की अन्तर्वस्तुएं | CrPC Section- 120 in hindi| Contents of bond.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 120 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 120 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 120 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 120 के अन्तर्गत ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा निष्पादित किया जाने वाला बन्धपत्र उसे, यथास्थिति, परिशान्ति कायम रखने या सदाचारी रहने के लिये आबद्ध करेगा और बाद की दशा में कारावास से दंडनीय कोई अपराध करना या करने का प्रयत्न या दुष्प्रेरण करना, चाहे वह कहीं भी किया जाए, बन्धपत्र का भंग है। तो यह धारा 120 के अंतर्गत कारावास से दंडनीय कोई अपराध करना या करने का प्रयत्न या दुष्प्रेरण करना, चाहे वह कहीं भी किया जाए, बन्धपत्र का भंग है।

सीआरपीसी की धारा 120 के अनुसार

बन्धपत्र की अन्तर्वस्तुएं-

ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा निष्पादित किया जाने वाला बन्धपत्र उसे, यथास्थिति, परिशान्ति कायम रखने या सदाचारी रहने के लिये आबद्ध करेगा और बाद की दशा में कारावास से दंडनीय कोई अपराध करना या करने का प्रयत्न या दुष्प्रेरण करना, चाहे वह कहीं भी किया जाए, बन्धपत्र का भंग है।

Contents of bond-
The bond to be executed by any such person shall bind him to keep the peace or to be of good behavior, as the case may be, and in the latter case the commission or attempt to commit, or the abatement of, any offence punishable with imprisonment, wherever it may be committed, is a breach of the bond.

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सीआरपीसी की धारा 119 | जिस अवधि के लिए प्रतिभूति अपेक्षित की गई है उसका प्रारम्भ | CrPC Section- 119 in hindi| Commencement of period for which security is required.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 119 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 119 कब लागू होती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 119 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 119 के अन्तर्गत यदि कोई व्यक्ति, जिसके बारे में प्रतिभूति की अपेक्षा करने वाला आदेश धारा 106 या धारा 117 के अधीन दिया गया है, ऐसा आदेश दिये जाने के समय कारावास के लिये दण्डादिष्ट है या दण्डादेश भुगत रहा है तो वह अवधि, जिसके लिये ऐसी प्रतिभूति की अपेक्षा की गई है, ऐसे दण्डादेश के अवसान पर प्रारम्भ होगी। तो यह धारा 119 के अंतर्गत ऐसी प्रतिभूति की अपेक्षा की गई है, ऐसे दण्डादेश के अवसान पर प्रारम्भ होगी, को परिभाषित करता है।

सीआरपीसी की धारा 119 के अनुसार

जिस अवधि के लिए प्रतिभूति अपेक्षित की गई है उसका प्रारम्भ-

(1) यदि कोई व्यक्ति, जिसके बारे में प्रतिभूति की अपेक्षा करने वाला आदेश धारा 106 या धारा 117 के अधीन दिया गया है, ऐसा आदेश दिये जाने के समय कारावास के लिये दण्डादिष्ट है या दण्डादेश भुगत रहा है तो वह अवधि, जिसके लिये ऐसी प्रतिभूति की अपेक्षा की गई है, ऐसे दण्डादेश के अवसान पर प्रारम्भ होगी।
(2) अन्य दशाओं में ऐसी अवधि, ऐसे आदेश की तारीख से प्रारम्भ होगी, जब तक कि मजिस्ट्रेट पर्याप्त कारण से कोई बाद की तारीख नियत न करे।

Commencement of period for which security is required-
(1) If any person, in respect of whom an order requiring security is made under Section 106 or Section 117, is, at the time such order is made, sentenced to, or undergoing a sentence of, imprisonment, the period for which such security is required shall commence on the expiration of such sentence.
(2) In other cases such period shall commence on the date of such order unless the Magistrate, for sufficient reason, fixes a later date.

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