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जीएसटी मे कर निर्धारण कैसे होंगे? (How will tax assessment be done in GST?)

नमस्कार दोस्तो, आज हम जीएसटी Tax Assessment in GST मे कर निर्धारण कैसे किये जायेंगे और क्या Time limit for hearing of case in GST समय-सीमा होगी और कितने प्रकार से जीएसटी मे Hearing of case in GST कर निर्धारण किया जाये, इसके अलावा किन किन धाराओं से कर निर्धारण की गणना की जायेगी और किस तरीके से एवंम् किन कारणो से भी कराधेय व्यक्ति का कर निर्धारण किया जायेंगा।

जीएसटी कानून आने के पश्चात् बहुत से लोगो के मन मे यह विचार जरूर आया होगा कि क्या जीएसटी मे नियमित केस Regular Case in GST कराने होंगे या नही? कर निर्धारण कैसे किया जायेंगा और क्या केस चिन्हित Case marked in GST किये जायेगें और क्या स्वतः कर निर्धारण किये जायेंगे। इसके अलावा क्या जिन लोगो ने जीएसटी रिटर्न समय से दाखिल Late filing of return in GST नही किये है या फिर दाखिल रिर्टनों मे गलत रिकार्ड फाइल In case of wrong return file in GST किया गया है, तो क्या होगा ऐसे मामलो मे ? क्या ऐसे मामलो मे ही कर निर्धारण किये जायेंगे।
यह सभी बिन्दुओ पर आज हम चर्चा करेंगे और जानेंगे जीएसटी मे कर निर्धारण कैसे और कब होंगे और किन किन शर्तो को यदि कोई कराधेय व्यक्ति पूर्ण नही करता है, तब भी कर निर्धारण अधिकारी व्दारा कराधेय व्यक्ति का कर निर्धारण कर सकते है। इस लेख मे जानेंगे कर निर्धारण अधिकारी किन किन धाराओं मे कराधेय व्यक्ति का कर निर्धारण कर सकते है, जो Regular Assessment अथवा Ex-Party Assesment की श्रेणी मे आते है।

जीएसटी एक्ट की धारा-59

धारा-59– स्वतः निर्धारण प्रत्येक रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन संदेय करो का स्वतः निर्धारण करेगा और धारा 39 के अधीन यथाविनिर्दिष्ट प्रत्येक करावधि के लिए विवरणी प्रस्तुत करेगा।

Section-59 – Self-assessment- Every registered person shall self-assess the taxes payable under this Act and furnish a return for each tax period as specified under section 39.

जीएसटी एक्ट की धारा 59 के अन्तर्गत स्वतः कर निर्धारण प्रत्येक कराधेय व्यक्ति इस अधिनियम के अन्तर्गत जो कराधेय व्यक्ति मासिक विवरणी प्रस्तुत करता है, तो भी इस धारा के अन्तर्गत स्वतः कर निर्धारण, कर निर्धारण अधिकारी व्दारा किया जा सकेगा।

जीएसटी एक्ट की धारा-60

धारा- 60अनंतिम निर्धारण– (1) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां कराधेय व्यक्ति मालों या सेवाओं या दोनों के मूल्य का अवधारण करने में या उसको लागू कर की दर का अवधारण करने में असमर्थ हैं तो वह समुचित अधिकारी को अनंतिम आधार पर लिखित में कर के संदाय के कारणों को देते हुए अनुरोध करेगा और समुचित अधिकारी ऐसा अनुरोध प्राप्त होने की तारीख से नब्बे दिन से अपश्चात् अवधि के भीतर अनंतिम आधार पर ऐसी दर पर या ऐसे मूल्य पर, जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, कर के संदाय को अनुज्ञात करेगा।

(2) अनंतिम आधार पर कर के संदाय को अनुज्ञात किया जा सकेगा यदि कराधेय व्यक्ति ऐसे प्ररूप में, जो विहित की जाए, और ऐसा प्रतिभू या ऐसी प्रतिभूति, जो समुचित अधिकारी उचित समझे, जो कराधेय व्यक्ति को अंतिम रूप से निर्धारित कर और अनंतिम रूप से निर्धारित कर की रकम के बीच के अंतर का संदाय करने के लिए बाध्य करती हो, निष्पादित करता है।

(3) समुचित अधिकारी उपधारा (1) के अधीन जारी आदेश की संसूचना की तारीख से छह मास से अनधिक अवधि के भीतर निर्धारण को अंतिम रूप देने के लिए यथा अपेक्षित ऐसी सूचना को गणना में लेने के पश्चात् अंतिम निर्धारण आदेश पारित करेगा:

परंतु इस उपधारा में विनिर्दिष्ट कालावधि को पर्याप्त कारण उपदर्शित करने पर और कारणों को लेखबद्ध करते हुए संयुक्त आयुक्त या अपर आयुक्त द्वारा छह मास से अनधिक की और अवधि के लिए तथा आयुक्त द्वारा चार वर्ष से अनधिक और अवधि के लिए विस्तारित किया जा सकेगा।

(4) रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति मालों या सेवाओं की आपूर्ति या दोनों पर अनंतिम निर्धारण के अधीन संदेय कर, किंतु जिसका संदाय नियत तारीख तक धारा 39 की उपधारा (7) या तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन नहीं किया गया है, पर धारा 50 की उपधारा (1) के अधीन निर्दिष्ट दर पर मालों या सेवाओं या दोनों की उक्त आपूर्ति के संबंध में कर का संदाय करने की नियत तारीख के पश्चात् वास्तविक संदाय की तारीख तक व्याज का संदाय करने का दायी होगा चाहे ऐसी रकम का संदाय अंतिम निर्धारण के लिए आदेश जारी करने से पूर्व या पश्चात् किया गया हो।

(5) जहां रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति धारा 54 की उपधारा (8) के उपबंधों के अधीन रहते हुए उपधारा (3) के अधीन अंतिम निर्धारण के आदेश के परिणामस्वरूप प्रतिदाय का हकदार हो जाता है तो ऐसे संदाय पर धारा 56 में यथा उपबंधित प्रतिदाय का संदाय किया जाएगा।


Section-60Provisional assessment– (1) Subject to the provisions of sub-section (2), where the taxable person is unable to determine the value of goods or services or both or determine the rate of tax applicable thereto, he may request the proper officer in writing giving reasons for payment of tax on a provisional basis and the proper officer shall pass an order, within a period not later than ninety days from the date of receipt of such request, allowing payment of tax on provisional basis at such rate or on such value as may be specified by him.

(2) The payment of tax on provisional basis may be allowed, if the taxable person executes a bond in such form as may be prescribed, and with such surety or security as the proper officer may deem fit, binding the taxable person for payment of the difference between the amount of tax as may be finally assessed and the amount of tax provisionally assessed.

(3) The proper officer shall, within a period not exceeding six months from the date of the communication of the order issued under sub-section (1), pass the final assessment order after taking into account such information as may be required for finalizing the assessment:

Provided that the period specified in this sub-section may, on sufficient cause being shown and for reasons to be recorded in writing, be extended by the Joint Commissioner or Additional Commissioner for a further period not exceeding six months and by the Commissioner for such further period not exceeding four years.

(4) The registered person shall be liable to pay interest on any tax payable on the supply of goods or services or both under provisional assessment but not paid on the due date specified under sub-section (7) of section 39 or the rules made there under, at the rate specified under sub-section (1) of section 50, from the first day after the due date of payment of tax in respect of the said supply of goods or services or both till the date of actual payment, whether such amount is paid before or after the issuance of order for final assessment.

(5) Where the registered person is entitled to a refund consequent to the order of final assessment under sub-section (3), subject to the provisions of sub-section (8) of section 54, interest shall be paid on such refund as provided in section 56.

जीएसटी एक्ट की धारा 60 के अन्तर्गत अनंतिम निर्धारण प्रत्येक कराधेय व्यक्ति इस अधिनियम के अन्तर्गत जो मासिक विवरणी इस प्रकार प्रस्तुत करता है मानो, खरीद के अनुपालन मे बिक्री कम है और कई माह से है और देरी से दाखिल कराता है अथवा कर की दर फेर-बदल करता है, तो इस धारा के अन्तर्गत कर निर्धारण अधिकारी को यह शक्ति होती है कि वह उस कराधेय व्यक्ति का अनंतिम निर्धारण Provisional assessment कर सकेगा।

जीएसटी एक्ट की धारा-61

धारा 61विवरणियों की संवीक्षा-(1) समुचित अधिकारी रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत विवरणी और संबंधित विशिष्टियों की विवरणी के सही होने का सत्यापन करने के लिए संवीक्षा करेगा और ध्यान में आई विसंगतियों, यदि कोई हों, की ऐसी रीति, जो विहित की जाए, में सूचना देगा तथा उस पर उसका स्पष्टीकरण प्राप्त करेगा।

(2) स्पष्टीकरण के स्वीकार्य पाए जाने की दशा में रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति को तदनुसार सूचित किया जाएगा और इस संबंध में कोई और कार्रवाई नहीं की जाएगी।

(3) समुचित अधिकारी द्वारा सूचित किए जाने के तीस दिन की कालावधि के भीतर या ऐसी और कालावधि, जो उसके द्वारा अनुज्ञात की जाए, में समाधानप्रद स्पष्टीकरण प्रस्तुत न किए जाने की दशा में या जहां रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति विसंगतियों को स्वीकार करने के पश्चात् उस मास की विवरणी में, जिसमें विसंगति स्वीकार की गई थी, सुधारकारी उपाय करने में असफल रहता है तो समुचित अधिकारी समुचित कार्रवाई आरंभ कर सकेगा, जिसके अंतर्गत धारा 65 या धारा 66 या धारा 67 के अधीन कार्रवाईयां हैं या धारा 73 या धारा 74 के अधीन कर और अन्य शोध्यों का अवधारण करने के लिए अग्रसर होगा ।

Section – 61Scrutiny of returns-(1) The proper officer may scrutinize the return and related particulars furnished by the registered person to verify the correctness of the return and inform him of the discrepancies noticed, if any, in such manner as may be prescribed and seek his explanation thereto.

(2) In case the explanation is found acceptable, the registered person shall be informed accordingly and no further action shall be taken in this regard.

(3) In case no satisfactory explanation is furnished within a period of thirty days of being informed by the proper officer or such further period as may be permitted by him or where the registered person. after accepting the discrepancies, fails to take the corrective measure in his return for the month in which the discrepancy is accepted, the proper officer may initiate appropriate action including those under section 65or section 66 or section 67, or proceed to determine the tax and other dues under section 73 or section 74.

जीएसटी एक्ट की धारा 61 के अन्तर्गत विवरणियों की संवीक्षा प्रत्येक कराधेय व्यक्ति इस अधिनियम के अन्तर्गत जो मासिक विवरणी मे हेर-फेर करता है अथवा गलत इनपुट क्लेम करता है, तो इस धारा के अन्तर्गत कर निर्धारण अधिकारी को यह शक्ति होती है कि वह उस कराधेय व्यक्ति की जीएसटी रिर्टन सत्यापन कराकर, यदि कराधेय व्यक्ति दोषी पाया जाता है, तो वह धारा 61 के अन्तर्गत कर निर्धारण कर सकेगा

जीएसटी एक्ट की धारा-62

धारा -62 विवरणियों को फाइल न करने वालों का निर्धारण– (1) धारा 73 या धारा 74 में तत्प्रतिकूल किसी बात के प्रतिकूल होते हुए भी जहां कोई व्यक्ति धारा 39 या धारा 45 के अधीन विवरणी प्रस्तुत करने में धारा 46 के अधीन सूचना की तामील के पश्चात् भी असफल रहता है तो समुचित अधिकारी उक्त व्यक्ति का अपनी सर्वोत्तम विवेक और उपलब्ध तात्विक सामग्री या वह सामग्री, जिसको उसने एकत्रित किया है, को गणना में लेने के पश्चात् कर के लिए निर्धारण करने के लिए अग्रसर होगा तथा वित्त वर्ष, जिसके लिए असंदत्त कर संबंधित है, की वार्षिक विवरणी को प्रस्तुत करने के लिए धारा 44 के अधीन विनिर्दिष्ट तारीख से पांच वर्ष की अवधि के भीतर निर्धारण का आदेश जारी करेगा ।

(2) जहां रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति उपधारा (1) के अधीन निर्धारण आदेश की तामील से तीस दिन के भीतर विधिमान्य विवरणी प्रस्तुत कर देता है तो उक्त निर्धारण आदेश का प्रतिसंहरण किया गया समझा जाएगा किंतु धारा 47 के अधीन विलंब फीस के संदाय या धारा 50 की उपधारा (1) के अधीन ब्याज का संदाय करने का दायित्व जारी रहेगा।

Section 62Assessment of non-filers of returns-(1) Notwithstanding anything to the contrary contained in section 73 or section 74, where a registered person fails to furnish the return under section 39 or section 45, even after the service of a notice under section 46, the proper officer may proceed to assess the tax liability of the said person to the best of his judgement taking into account all the relevant material which is available or which he has gathered and issue an assessment order within a period of five years from the date specified under section 44 for furnishing of the annual return for the financial year to which the tax not paid relates.

(2) Where the registered person furnishes a valid return within thirty days of the service of the assessment order under sub-section (1), the said assessment order shall be deemed to have been withdrawn but the liability for payment of interest under sub-section (1) of section 50 or for payment of late fee under section 47 shall continue.

जीएसटी एक्ट की धारा 62 के अन्तर्गत विवरणियों को फाइल न करने वालों का निर्धारण जो कोई कराधेय व्यक्ति इस अधिनियम के अन्तर्गत मासिक विवरणी नही दाखिल करता है, तो इस धारा के अन्तर्गत कर निर्धारण अधिकारी को यह शक्ति होती है कि वह उस कराधेय व्यक्ति का धारा 62 के अन्तर्गत कर निर्धारण कर सकेगा

जीएसटी एक्ट की धारा-63

धारा -63 अनरजिस्टर्ड व्यक्तियों का निर्धारण-धारा 73 या धारा 74 में तत्प्रतिकूल किसी बात के अंतर्विष्ट होते हुए भी जहां कोई कराधेय व्यक्ति रजिस्ट्रीकरण के लिए दायी होते हुए भी उसे अभिप्राप्त करने में असफल रहता है या जिसका रजिस्ट्रीकरण धारा 29 की उपधारा (2) के अधीन रद्द कर दिया गया है किंतु जो कर का संदाय करने का दायी था तो समुचित अधिकारी उक्त व्यक्ति का अपने सर्वोत्तम विवेक और उपलब्ध तात्विक सामग्री या वह सामग्री, जिसको उसने एकत्रित किया है, को गणना में लेने के पश्चात् कर के लिए निर्धारण करने के लिए अग्रसर होगा तथा वित्त वर्ष, जिसके लिए असंदत्त कर संबंधित है, की वार्षिक विवरणी को प्रस्तुत करने के लिए धारा 44 के अधीन विनिर्दिष्ट तारीख से पांच वर्ष की अवधि के भीतर निर्धारण का आदेश जारी करेगा :
परंतु व्यक्ति को सने जाने का अवसर प्रदान किए बिना ऐसा कोई निर्धारण आदेश नहीं किया जाएगा ।

Section -63Assessment of unregistered persons– Notwithstanding anything to the contrary contained in section 73 or section 74, where a taxable person fails to obtain registration even though liable to do so or whose registration has been cancelled under sub-section (2) of section 29 but who was liable to pay tax, the proper officer may proceed to assess the tax liability of such taxable person to the best of his judgement for the relevant tax periods and issue an assessment order within a period of five years from the date specified under section 44 for furnishing of the annual return for the financial year to which the tax not paid relates:
Provided that no such assessment order shall be passed without giving the person an opportunity of being heard.

जीएसटी एक्ट की धारा 63 के अन्तर्गत अनरजिस्टर्ड व्यक्तियों का निर्धारण जो कोई अनरजिस्टर्ड व्यक्ति, जिसे जीएसटी रजिस्टर्ड होना अनिवार्य है, क्योकि वह जीएसटी छूट की परिधि से बाहर है फिर भी जीएसटी मे रजिस्ट्रेशन नही कराया गया है, तो इस अधिनियम के अन्तर्गत कर निर्धारण अधिकारी को यह शक्ति होती है कि वह उस अनरजिस्टर्ड व्यक्ति का धारा 63 के अन्तर्गत कर निर्धारण कर सकेगा

जीएसटी एक्ट की धारा-64

धारा -64 कतिपय विशेष मामलों में त्वरित निर्धारण– (1) समुचित अधिकारी उसकी जानकारी में किसी व्यक्ति के कर दायित्व को उपदर्शित करने वाले साक्ष्य के घटाने पर अपर आयुक्त या संयुक्त आयुक्त की पूर्व अनुज्ञा से राजस्व के हित का संरक्षण करने के लिए ऐसे व्यक्ति के कर दायित्व का निर्धारण करने के लिए अग्रसर होगा और निर्धारण आदेश जारी करेगा यदि उसके पास यह विश्वास करने के पर्याप्त आधार हों कि ऐसा करने में कोई विलंब करने से राजस्व के हित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है:

परंतु जहाँ कराधेय व्यक्ति, जिससे दायित्व संबंधित हैं, का निर्धारण नहीं किया जा सकता है और ऐसा दायित्व मालों की आपूर्ति के संबंध है तो ऐसे मालों के प्रभारी व्यक्ति को निर्धारण के दायी कराधेय व्यक्ति समझा जाएगा और वह कर का और इस धारा के अधीन शोध्य अन्य रकम का संदाय करने का दायी होगा।

(2) उपधारा (1) के अधीन पारित आदेश की प्राप्ति की तारीख से तीस दिन के भीतर कराधेय व्यक्ति द्वारा किए गए आवेदन पर या स्वयं अपर आयुक्त या संयुक्त आयुक्त यह विचार करता है कि ऐसा आदेश त्रुटिपूर्ण है तो वह ऐसे आदेश का प्रतिसंहरण कर लेगा और धारा 73 और धारा 74 में अधिकथित प्रक्रिया का अनुसरण करेगा।

Section- 64Summary assessment in certain special cases-(1) The proper officer may, on any evidence showing a tax liability of a person coming to his notice, with the previous permission of Additional Commissioner or Joint Commissioner, proceed to assess the tax liability of such person to protect the interest of revenue and issue an assessment order, if he has sufficient grounds to believe that any delay in doing so may adversely affect the interest of revenue:

Provided that where the taxable person to whom the liability pertains is not ascertainable and such liability pertains to supply of goods, the person in charge of such goods shall be deemed to be the taxable person liable to be assessed and liable to pay tax and any other amount due under this section.

(2) On an application made by the taxable person within thirty days from the date of receipt of order passed under sub-section (1) or on his own motion, if the Additional Commissioner or Joint Commissioner considers that such order is erroneous, he may withdraw such order and follow the procedure laid down in section 73 or section 74.

जीएसटी एक्ट की धारा 64 के अन्तर्गत कतिपय विशेष मामलों में त्वरित निर्धारण वह मामले जिनमे किसी विशेष प्रकार की शिकायत अथवा राजस्व चोरी या राजस्व के हित का संरक्षण किया जाने के उद्देश्य से ऐसे चिन्हित मामलो मे राजस्व अधिकारी ऐसे मामलो की सूची बनाकर, कर निर्धारण अधिकारी को यह आदेश देता है कि वह उन मामलो की जांच कर उनका कर निर्धारण करे

हमारा प्रयास जीएसटी कानून के अन्तर्गत कर निर्धारण की प्रक्रिया एवंम् धारा की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

अंतर्राष्ट्रीय संगठन क्या है? अंतर्राष्ट्रीय संगठनो के महत्व एवम उनके क्या कार्य है? (What is an International Organisation? What is the importance and functions of international organisations?)

नमस्कार दोस्तों, आज हम अंतर्राष्ट्रीय संगठन International Organisation पर चर्चा करेंगे, क्या आप जानते हैं कि यह अंतर्राष्ट्रीय संगठन क्यों बनाए गए हैं और इनके क्या कार्य है, साथ ही यह इन संगठनों को कौन चलाता है, और किस तरह से ये कार्य करते है। इसके अलावा विश्व के कितने देश इन संगठनों से जुड़े हुए हैं, विश्व मे कुल कितने अंतर्राष्ट्रीय सगठंन है और उनके क्या कार्य है सभी जानकारी आज इस लेख में जानेंगे।

वैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन का मुख्य कार्य यह है कि यदि किसी देश के अंदर के नागरिक या समूह पर किसी प्रकार का कोई दबाव तो नही दिया जा रहा है अथवा किसी देश व्दारा उसकी सुरक्षा व्यवस्था को भंग करने जैसे साजिश की जा रही है अथवा अगर ऐसा कोई देश किसी भी व्यक्ति के साथ इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है तो भी वह उस पर अंतरराष्ट्रीय संगठन करवाई कर सकता है। इसी तरह से अगर किसी व्यक्ति के साथ किसी देश में कोई भी प्रॉब्लम होती है वह भी सरकार के वजह से तो वह बिना घबराए अंतरराष्ट्रीय संगठन में जाकर अपना बात,विचार रख सकता है और अपने देश के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय संगठन में शिकायत दर्ज करा सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय संगठन क्या है?

अंतर्राष्ट्रीय संगठन सभी देशों के मध्य संधि अथवा एक समझौता/ करार हेतु बनाया गया है यह करार कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए, संधियों के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय विधि के अनुसार बनाए जाते हैं, साधारण भाषा में सभी देशों द्वारा एक ऐसी संधि अथवा समझौता होता है, जिससे देशो एवंम् देश मे रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा व्यवस्था एवंम् समाजिक विकास बनाए रखने के लिये गठित किया गया है, अर्थात् सभी देश शांतिपूर्वक रहे। इसके अलावा इसका उद्देश्य लाभप्रद कार्यों के लिए किया जाना होगा, जिससे सभी देशों का प्रगृति हो।

अंतर्राष्ट्रीय संगठनों व्दारा न्याय, सुरक्षा एवंम् समाजिक विकास को बढ़ावा देने के आशय से बनाया गया है इसके आलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादों को सुलझाने एवंम् समाज मे शांति और सुरक्षा स्थापित करने और एक सामंजस्यपूर्ण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ये दो प्रकार की होती हैं-

  • अन्तर्राष्ट्रीय अशासकीय संगठन (International nongovernmental organisations (INGOs)- अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करने वाली अशासकीय संस्थाएँ
  • अन्तरशासकीय संगठन (Intergovernmental organisations, या international governmental organisations)

अंतर्राष्ट्रीय संगठन मामलों की जांच एवंम् किसी मामले की चर्चा करने के लिये अंतराष्ट्रीय न्यायालय एवंम् राष्ट्र संघ बनाये गये है, जिनका मुख्य कार्य मामले की जांच एवंम् उन पर कार्यवाही करके निर्णय करना होता है। इसके अलावा सभी देशो की आर्थिक एवंम् समाजिक वृद्धि जैसे मुद्दो पर चर्चा करना अथवा मदद् करना इनका मुख्य कार्य है।

राष्ट्र संघ (League of Nations)

प्रथम विश्व युद्ध के भयानक परिणामो के उपरान्त राष्ट्र संघ की स्थापना 10 जनवरी 1920 को शान्ति एवंम् सुरक्षा कायम रखने तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग मे वृद्धि करने के मुख्य उद्देश्य के साथ की गई थी। वैसे राष्ट्रीय संघ के प्रमुख तीन अंग है-

  1. सभा (Assembly)- राष्ट्र संघ की सभा किसी मुद्दे की चर्चा हेतु प्रत्येक देश अपने तीन प्रतिनिधियों को भेज सकती है। सभा की बैठक वर्ष मे कम से कम एक बार होती है तथा यदि आवश्यकता होती थी तो बैठक कई बार भी हो सकती है। सभी बैठके संघ के मुख्यालय जेनेवा में या अन्य निर्धारित स्थानों मे होती है।
  2. परिषद् (The Council)– सभा की तरह परिषद् भी संघ के कार्य क्षेत्र के अंतर्गत तथा विश्व शांति को प्रभावित करने वाले किसी मामले का निपटारा कर सकती है। परिषद् के सदस्य दो प्रकार के होते है, जिसे हम वीटो पॉवर कहते है- स्थायी एवंम् अस्थायी। स्थायी वीटो पॉवर जैसे अमेरिका, बिट्रेन, फ्रांस, इटली और जापान जिन्हे स्थायी सदस्यता दी गयी है, इसी तरह से अस्थायी सदस्यो का सभा व्दारा प्रतिवर्ष निर्वाचन होता है।
  3. सचिवालय (The Secretariat)– सचिवालय स्थायी कार्यालय है, जिसका प्रमुख महासचिव होता है, जिसका चुनाव सभा के बहुमत के अनुमोदन से परिषद् व्दारा नियुक्त किया जाता है। इनका कार्य लिपिकीय, अनुसंधान, प्रारूपण, प्रकाशन, संधियों का पंजीकरण इत्यादि होता है।

राष्ट्र संघ की कमियां

  • संघ युद्ध को पूर्णतया वर्जित नही करता है कोई राज्य यदि युद्ध करना चाहता है तो उसे कई औपचारिकताओं को पूर्ण करने के उपरांत ही किया जा सकता है।
  • महाशक्तियों मे से एक अमेरिका, सीनेट व्दारा संधि का अनुसमर्थन न किये जाने के कारण, संघ का सदस्य नही बना।
  • परिषद् तथा सभा के कार्यो को स्पष्टतः विभाजित नही किया गया है।
  • सदस्य परिषद् के विनिश्चय व्दारा बाध्य नही है।
  • आक्रमण के कृत्य को प्रभावी ढंग से निपटाने के लिये संघ की प्रसंविदा मे कोई उपबन्ध नही है। इसके अतिरिक्त, दोषी राज्य के विरूद्ध कार्यवाही करने के लिये परिषद् के पास कोई सेना उपलब्ध नही है।

अंतर्राष्ट्रीय संगठनो के महत्व एवंम् कार्य

अंतर्राष्ट्रीय संगठन आस्थायी एवंम् स्थायी संगठन हो सकते है। इनको कार्यो या प्रयोजनों के आधार पर भी विभाजित किया जा सकता है। जैसे- सरकारी, प्रशासनिक, न्यायिक, समझौताकारी, समन्वयकारी या विधायी संगठन। इनका विभाजन इनके उद्देश्यों की प्रकृति के आधार पर भी किया जा सकता है, अर्थात् एक उद्देशीय या बहुुउद्देशीय संगठन।

सामान्य सदस्यता तथा सामान्य उद्देश्यों के संगठन (General Membership and General Purpose Organisation)- ऐसे संगठनों का क्षेत्र सार्वभौमिक होता है। और इसमें सभी राज्य सदस्य हो सकते हैं। ये विभिन्न कार्यों को करते हैं, जैसे शान्ति और सुरक्षा बनाये रखना, सामाजिक आर्थिक सहयोग, मानवाधिकारों का संरक्षण, सांस्कृतिक, शैक्षणिक तथा वैज्ञानिक क्रियाकलापों का विकास तथा आदान-प्रदान।

सामान्य सदस्यता तथा सीमित उद्देश्य का संगठन (General Membership and Limited-Purpose Organisation)– ऐसे संगठनों को भी क्रियात्मक संगठन कहा जाता है, क्योंकि ये विशेष कार्य के लिए बनाये जाते हैं, किन्न अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के सभी सदस्य बन सकते हैं। ऐसे संगठनों के उदाहरण हैं, संय के विशिष्ट अभिकरण, जैसे अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण तथा विकास बैंक (International Bank for reconstruction and Development), अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन

सीमित सदस्यता तथा सामान्य उद्देश्यों के संगठन (Limited Membership and General Purpose Organisation)– ऐसे संगठन की सदस्यता केवल विशिष्ट राज्य ही ग्रहण कर सकते हैं, इसलिए इन्हें क्षेत्रीय संगठन भी कहा जाता है। इनका गठन व्यापक सुरक्षा, राजनीतिक, सामाजिक-आर्थिक कार्यों तथा उत्तरदायित्वों के लिए किया जाता है। ऐसे संगठनों के उदाहरण हैं- अमेरिकी राज्यों का संगठन (Organisation ofAmerican States-OAS), अफ्रीकी एकता संगठन (Organisation of African Unity —OAU) तथा अरब लीग (Arab Legaue)

सीमित सदस्यता तथा सीमित उद्देश्य का संगठन (Limited Membership and Limited Purpose Organisation)– ये ऐसे संगठन हैं, जिनकी सदस्यता विशिष्ट क्षेत्र के राज्य ही प्राप्त कर सकते हैं, और जो विनिर्दिष्ट या सीमित उद्देश्यों के लिए गठित किये जाते हैं। ऐसे संगठनों के उदाहरण हैं-उत्तर अटलांटिक सन्धि संगठन (North Atlantic Treaty Organisation— NATO) तथा वारसा सन्धि संगठन (Warsaw Treaty Organisation), वारसा सन्धि (Warsaw Pact)

वैसे सामान्यतः अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का समय के साथ कई प्रकार के बदलाव किये गये और कई नये संगठनों का निर्माण किया गया जिनका कार्य सुरक्षा, राजनीतिक, सामाजिक एवंम् आर्थिक आदि मदद् करना।

हमारा प्रयास अंतर्राष्ट्रीय संगठन (International Organisation) की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

आचार संहिता क्या है | Model Code of Conduct in Hindi |आचार संहिता कब लगती है | Duration of Code of Conduct

नमस्कार दोस्तों, हमारे भारत देश में आए दिन कोई न कोई चुनाव कार्यक्रम होते ही रहते है, इन चुनाव कार्यक्रमो को ठीक तरह से नियोजित करने के उद्देश्य से चुनाव आयोग आचार संहिता (Code of Conduct) लागू करती है। आचार संहिता में होने वाली शक्ति चुनाव आयोग अपने अनुसार परिवर्तन कर सकती हैवैसे आज हम आचार संहिता संबंधी समस्त जानकारी आपके साथ साझा करने वाले है, साथ ही आचार संहिता निर्वाचन आयोग कैसे लागू करवाता है, यह भी जानेंगे। कुछ लोग सोचते हैं कि आचार संहिता में चुनाव कार्यक्रमो में ऐसे क्या परिवर्तन करने के लिए लागू किया जाता है? यह भी जानकारी इस लेख में जानेंगे।

आचार संहिता के लागू होनें के पश्चात् नेताओं और जो पार्टियां चुनाव लड़ रही होती है, उनको और सभी व्यक्तियों को सख्त कानून का पालन करना होता है, अन्यथा चुनाव आयोग उन्हे दंडित करेगा, तो आइये जानते हैं वह ऐसे कौन से उल्लंघन हो सकते है, जिनकी वजह से नेता अथवा आम नागरिक कभी कभी इस कानून के दायरे में फंस जाते है। आचार संहिता (Model Code of Conduct in Hindi) और इसके नियमो के विषय में विस्तार से जानेंगे।

आचार संहिता क्या है? (What is a code of conduct?)

चुनाव आयोग (Election commission) अधिसूचना के अनुसार कुछ दिशा निर्देश जारी करते है, जिसके अनुसार आम नागरिकों और चुनाव पार्टिया व नेताओ को उन नियमों का पालन करना होता है। साधारण भाषा में यूँ कहे जिनको चुनाव के दौरान या कि चुनाव समाप्त होने तक सभी पार्टियों और आम नागरिक जो (चुनाव में लिप्त) या उसके उम्मीदवार को नियमों का पालन करना होता है, उसी को आचार संहिता या Model Code of Conduct कहते हैं।
इसके अलावा यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव आयोग व्दारा बनाये गए इन नियमों का पालन नहीं करता है, या नियमों का उल्लघंन करते हुए पाया जाता है, तो चुनाव आयोग उसके विरुद्ध कार्यवाही कर सकता है, यहाँ तक की उसे चुनाव लड़ने से भी रोका जा सकता है, चुनाव आयोग उम्मीदवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर सकता है।

आचार संहिता को भारतीय निर्वाचन आयोग व्दारा बनाया गया दिशा-निर्देश होता है। आचार संहिता का अर्थ (Meaning of aachar sanhita in hindi) उन नियमो से है जिनके व्दारा चुनाव में पार्टियों की और उम्मीदवारों के क्रिया–कलापों, भ्रष्ट आचरण का उपयोग न हो, किसी आम नागरिक को वोट के लिये धमकाया न जाये, रिश्वत देकर वोटर न खरीदा जाये और वोट के लिये किसी मतदाता को परेशान न किया जाये इत्यादि पर नजर रखी जाती है।

आचार संहिता कब लगती है? (When does the code of conduct come into force?)

जब कोई चुनाव की घोषणा निर्वाचन आयोग के व्दारा की जाती है, तब इसके साथ ही आचार संहिता को भी लागू कर दिया जाता है और यह चुनाव के समाप्त होने और परिणाम के आने तक जारी रहता है। चुनाव के शुरू होने से पहले यह निर्वाचन आयोग (Election Commission) व्दारा चुनावी क्षेत्र में लागू कर दी जाती है।

आचार संहिता क्यों लगाई जाती है? (Why is a code of conduct imposed?)

निर्वाचन आयोग आचार संहिता लागू करने मुख्य उद्देश्य यह होता है कि चुनाव पार्टियों के बीच उत्पन्न होने वाले विवाद को रोका जा सके, जिससे शांतिपूर्ण एवं निष्पक्ष चुनाव पूर्ण किया जा सके। निर्वाचन आयोग आचार संहिता को लागू करके राजनीतिक पार्टियों व्दार कोई अनुचित लाभ को लेने से रोकता है जिससे भारत के लोकतंत्र में साफ एवं स्वच्छ सरकार चुनी जा सके।

एक तरह से आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) को राजनीतिक दलों और चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिये आचरण एवं व्यवहार का पैरामीटर कह सकते हैं। आदर्श आचार संहिता, किसी कानून के तहत नहीं बनी हुई है। यह सभी राजनीतिक दलों की सहमति से बनी और विकसित हुई है। आपको बता दें कि सबसे पहले 1960 में केरल विधानसभा चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता के तहत बताया गया कि क्या करें और क्या न करें।

आचार संहिता मे निर्वाचन आयोग की क्‍या भूमिका है ? (What is the role of the Election Commission in the code of conduct?)

भारत निर्वाचन आयोगभारत के संविधान के अनुच्‍छेद 324 के अधीन संसद और राज्‍य विधान मंडलों के लिए स्‍वतंत्र, निष्‍पक्ष और शांतिपूर्ण निर्वाचनों के आयोजन हेतु अपने सांविधिक कर्तव्‍यों के निर्वहन में केन्‍द्र तथा राज्‍यों में सत्तारूढ़ दल (दलों) और निर्वाचन लड़ने वाले अभ्‍यर्थियों व्दारा इसका अनुपालन सुनिश्चित करता है। यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि निर्वाचन के प्रयोजनार्थ अधिकारी तंत्र का दुरूपयोग न हो। इसके अतिरिक्‍त यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि निर्वाचन अपराध, कदाचार और भ्रष्‍ट आचरण यथा प्रतिरूपण, रिश्‍वतखोरी और मतदाताओं को प्रलोभन, मतदाताओं को धमकाना और भयभीत करना जैसी गतिविधियों को हर प्रकार से रोका जा सके। उल्‍लंघन के मामले मे उचित उपाय किए जाते हैं।

आचार संहिता मे दंड (Punishment in the code of conduct)

आचार संहिता के दौरान जो कोई नागरिक अथवा चुनाव पार्टियां उपरोक्त कानून का पालन नही करता है और आचार संहिता कानून का उलंघन करता है, तो वह व्यक्ति दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत किये गये अपराधनुसार ही दंड एवंम् जुर्माने का भागीदार होगा।

चुनाव आचार संहिता के नियम (Election code of conduct rules)

चुनाव आचार संहिता (Model Code of Conduct) के नियम इस प्रकार है-

1. चुनाव आचार संहिता के सामान्य नियम
सबसे पहली बात किसी भी पार्टी या उम्मीद्वार व्दारा कोई ऐसा कार्य नही किया जाना चाहिए जिससे जाति और धार्मिक या भाषा के बीच मतभेद उत्पन्न हो जाये।
धार्मिक स्थलों को चुनाव प्रचार के मंच के रूप में प्रयोग नहीं होना चाहिए।
उम्मीदवारों को ये ध्यान रखना चाहिए कि आलोचना कार्यक्रम व नीतियों तक सीमित हो, न ही व्यक्तिगत।
मतदाता को अपनी पार्टी की और आकर्षित करनें के लिए भ्रष्ट आचरण का उपयोग न करें, जैसे-रिश्वत देना, मतदाताओं को परेशान करना आदि।
बिना अनुमति के किसी की दीवार, भूमि का उपयोग न करें।

2. राजनीतिक सभाओं के लिए नियम
सभाओ के आयोजन के स्थान व समय की पूर्व सूचना पुलिस अधिकारियों को दी जाए।
दल या अभ्यर्थी पहले ही सुनिश्चित कर ले, कि जिस स्थान का चुनाव उनके व्दारा किया गया है, वहॉं निषेधाज्ञा लागू न हो।
सभा स्थल में लाउडस्पीकर के उपयोग की अनुमति पूर्व में ही प्राप्त कर ले |
सभा के आयोजक विध्न डालने वालों से निपटने के लिए पुलिस की सहायता करें।

3. रैली के लिए नियम
रैली का समय, आरंभ होने का स्थान, मार्ग और समाप्ति का समय निर्धारित कर सूचना पुलिस को दें।
रैली का आयोजन ऐसा हो, जिससे यातायात बाधित ना हो, इसका ध्यान रखें।
रैली सड़क के दायीं ओर से निकाला जाए रैली में ऐसी चीजों का प्रयोग न करें, जिनका दुरुपयोग हो सके।

4.मतदान के लिए नियम
अधिकृत कार्यकर्ताओं को पहचान पत्र देना सुनिश्चित करें।
मतदाताओं को दी जाने वाली पर्ची सादे कागज पर हो और उसमें प्रतीक चिह्न, अभ्यर्थी या दल का नाम अंकित न हो।
मतदान के दिन और इसके 24 घंटे पहले किसी को शराब का वितरण न की जाए।
मतदान केन्द्र के पास लगाए जाने वाले कैम्पों में भीड़ न लगाएं और कैम्प साधारण होने चाहिए।

5.सत्ताधारी दल के लिए नियम
मंत्रियों को सरकारी दौरों को पार्टी के प्रचार के साथ नहीं जोड़ना चाहिए, पार्टी के प्रचार के दौरान वह सरकारी मशीनरी तथा कर्मचारियों का उपयोग नहीं कर सकते।
किसी भी प्रकार के सरकारी विमान व गाड़ियों का उपयोग पार्टी के प्रचार में नहीं कर सकते।
सभा स्थल या हैलीपैड बनाने के लिए किसी मैदान पर सत्तादल का एकाधिकार नहीं होगा, दूसरे दलों को भी उसी नियम और शर्तो के अंतर्गत यह स्थान उपलब्ध होगा, जिस नियम और शर्त से सत्तादल को दिया जाएगा।
किसी भी प्रकार के सरकारी धन से कोई विज्ञापन समाचार पत्रों या टीवी चैनलों पर नहीं दिया जा सकेगा।
स्थानांतरण तथा पदस्थापना के प्रकरण आयोग का पूर्व अनुमोदन आवश्यक।

आचार संहिता कानून (Code of conduct Act) की सम्पूर्ण जानकारी आपको प्राप्त हो गई होगी। इसको कैसे लागू किया जाता है। इसमें अपराध कारित करने पर क्या सजा होगी ? इन सब के बारे में विस्तार से हमने उल्लेख किया है, यदि फिर भी इससे सम्बन्धित या अन्य से सम्बंधित किसी भी प्रकार की कुछ भी शंका आपके मन में हो या अन्य कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते है, तो आप कमेंट बॉक्स के माध्यम से अपने प्रश्न और सुझाव हमें भेज सकते है |

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) 1872 Hindi me

नमस्कार दोस्तो आज हम जानेंगे भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) को 15 मार्च 1872 को कानून लाया गया, इस कानून का मुख्य उद्देश्य न्यायिक कार्यवाहियों मे साक्ष्य को कैसे एकत्र करके पेश करना होता है, यह बतलाता है, इस सम्बन्ध मे साक्ष्य अधिनियम की सम्पूर्ण जानकारी, जैसे यह कब और कहां लागू होता है, और इसका क्या महत्व है, और यह किन मामलो मे किस तरह अप्लाई होता है। यह सभी जानकारी इस लेख मे जानेंगे। इसके अलावा यह कहां किन मामलो मे नही लागू होता है, यह भी इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे, साथ ही इसमे कितनी धाराये है, यह भी जानेंगे।

वैसे साक्ष्य अधिनियम मे कुल 167 धाराये है, जिन्हे 10 अध्यायो मे बांटा गया है। प्रत्येक धारा मामले की साक्ष्य पेश करने की कार्यवाहियो कों कैसे पूर्ण करना है, यह बतलाता है। इसका मूल उद्धेश्य एवम् महत्व न्यायालय की साक्ष्य सम्बन्धी समस्त कार्यवाहियों मे लागू होता है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) 1872 कहां लागू होता है?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम कानून को बनाने का उद्देश्य मात्र इतना था कि किसी मामलो की सुनवाई हेतु, जो साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किये जाते है, उनको किस तरह से किसे कब करना प्रस्तुत करना होगा यह बताती है, वैसे बात करे तो यह कानून कहा लागू होता है, तो समस्त न्यायिक कार्यवाहियो मे लागू होता है, जैसाकि हम जानते है कि किसी भी मामले मे साक्ष्य ही हमे यह बतलाते है कि अपराधी है या नही इसके अलावा साक्ष्य की महत्वा को लेकर ही न्यायालय किसी मामले पर निष्कर्ष कर सकेंगे। इस तरह से साक्ष्य कानून मामलो निष्पक्ष जांच हेतु साक्ष्य प्रस्तुत करने के तरीको को बतलाता है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) 1872 कहां लागू नही होता है?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम वैसे समस्त न्यायिक कार्यवाहियो को पूर्ण साक्ष्य को पेश करना होगा, इसके अलावा जबतक न्यायालय के समक्ष समस्त साक्ष्य प्रस्तुत नही करेंगे, तबतक न्यायालय किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकेंगे, लेकिन किसी न्यायालय या ऑफिसर के समक्ष पेश किये गये शपथपत्रो को और न किसी मध्यस्थ के समय की कार्यवाहियों पर लागू होता है। अर्थात् किसी न्यायालय या ऑफिसर के समक्ष पेश किये गये शपथपत्रो को साक्ष्य स्वरूप आंका नही जा सकता है, वह साक्ष्य नही कहे जायेंगे और किसी मामले मे मध्यस्थ के लिये की गयी कार्यवाही को साक्ष्य नही माना जायेगा।

धाराये-

इस कानून मे कुल 167 धाराये है, जिन्हे हम क्रम मे जानेंगे, इसके अलावा प्रत्येक धारा की विस्तृत जानकारी भी इस लेख मे जान सकेंगे।

अध्याय-1

1- संक्षिप्त नाम, विस्तार एवंम् प्रारम्भ

2- अधिनियमों का निरसन

3- निर्वचन खण्ड

4- उपधारणा करना

अध्याय-2

5- विवाघक तथ्यों और सुसंगत तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेंगा

6- एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति

7- वे तथ्य जो विवाघक तथ्यों के प्रसंग, हेतुक या परिणाम है

8- हेतु तैयारी और पूर्ण का या पश्चात् का आचरण

9- सुसंगत तथ्यों के स्पष्टीकरण के पुरःस्थाप के लिये आवश्यक तथ्य

10- सामान्य परिकल्पना के बारे मे षड्यन्त्रकारी व्दारा कही या की गई बाते

11- वे तथ्य जो अन्यथा सुसंगत नही हैं कब सुसंगत है

12- नुकसानी के लिए वादों में रकम अवधारित करने के लिए न्यायालय को समर्थ करने की प्रवृत्ति रखने वाले तथ्य सुसंगत हैं

13- जबकि अधिकार या रूढ़ि प्रश्नगत है, तब सुसंगत तथ्य

14- मन या शरीर की दशा या शारीरिक संवेदना का अस्तित्व दर्शित करने वाले तथ्य

15- कार्य आकस्मिक या साशय था इस प्रश्न पर प्रकाश डालने वाले तथ्य

16- कारोबार के अनुक्रम का अस्तित्व कब सुसंगत है

17- स्वीकृति की परिभाषा

18- स्वीकृति–कार्यवाही के पक्षकार या उसके अभिकर्ता द्वारा- कथन स्वीकृतियाँ हैं

19- उन व्यक्तियों द्वारा स्वीकृतियां जिनकी स्थिति वाद के पक्षकारों के विरुद्ध साबित की जानी चाहिए

20- वाद के पक्षकार द्वारा अभिव्यक्त रूप से निर्दिष्ट व्यक्तियों द्वारा स्वीकृतियां

21- स्वीकृतियों का उन्हें करने वाले व्यक्तियों के विरूद्ध और उनक व्दारा या उनकी ओर से साबित किया जाना

22- दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु के बारे में मौखिक स्वीकृतियां कब सुसंगत होती हैं

22A- इलेक्ट्रानिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तु के बारे में मौखिक स्वीकृतियां कब सुसंगत होती हैं

23- सिविल मामलों में स्वीकृतियां कब सुसंगत होती हैं

24- उत्प्रेरणा, धमकी या वचन द्वारा कराई गई संस्वीकृति दाण्डिक कार्यवाही में कब विसंगत होती है

25- पुलिस आफिसर से की गई संस्वीकृति का साबित न किया जाना

26- पुलिस की अभिरक्षा होते हुए अभियुक्त द्वारा की गई संस्वीकृति का उसके विरुद्ध साबित न किया जाना

27- अभियुक्त से प्राप्त जानकारी में से कितनी साबित की जा सकेगी

28- उत्प्रेरणा, धमकी या वचन से पैदा हुए मन पर प्रभाव के हो जाने के पश्चात् की गई संस्वीकृति सुसंगत है

29- अन्यथा सुसंगत संस्वीकृति को गुप्त रखने के वचन आदि के कारण विसंगत न हो जाना

30- साबित संस्वीकृति को, जो उसे करने वाले व्यक्ति तथा एक ही अपराध के लिए संयुक्त रूप से विचारित अन्य को प्रभावित करती है विचार में लेना

31- स्वीकृतियां निश्चायक सबूत नहीं हैं किन्तु विबन्ध कर सकती हैं

32- वे दशाएं जिनमें उस व्यक्ति व्दारा सुसंगत तथ्य का किया गया कथन सुसंगत है, जो मर गया है या मिल नही सकता, इत्यादि

33- किसी साक्ष्य मे कथित तथ्यों की सत्यता को पश्चात्-वर्ती कार्यवाही में साबित करने के लिये उस साक्ष्य की सुसंगति

34- लेखा पुस्तकों की प्रविष्टियाँ, जिनमें वे शामिल हैं, जिन्हें इलेक्ट्रानिक रूप में रखा गया है, कब सुसंगत हैं

35- कर्त्तव्य पालन में की गई लोक [अभिलेख या इलेक्ट्रानिक अभिलेख] की प्रविष्टियों की सुसंगति

36- मानचित्रों, चार्टों और रेखांकों के कथनों की सुसंगति

37- किन्हीं अधिनियमों या अधिसूचनाओं में अन्तर्विष्ट लोक प्रकृति के तथ्य के बारे में कथन की सुसंगति

38- विधि की पुस्तकों में अन्तर्विष्ट किसी विधि के कथनों की सुसंगति

39- जबकि कथन किसी बातचीत, दस्तावेज, इलेक्ट्रानिक अभिलेख, पुस्तक अथवा पत्रों या कागज-पत्रों की आवली का भाग हो, तब क्या साक्ष्य दिया जाये

40- द्वितीय वाद या विचारण के वारणार्थ पूर्व निर्णय सुसंगत हैं

41- प्रोबेट इत्यादि विषयक अधिकारिता के किन्हीं निर्णयों की सुसंगति

42- धारा 41 में वर्णित से भिन्न निर्णयों, आदेशों या डिक्रियों की सुसंगति और प्रभाव

43- धाराओं 40, 41 और 42 मे वर्णित से भिन्न निर्णय आदि कब सुसंगत है

44- निर्णय अभिप्राप्त करने में कपट या दुस्संधि अथवा न्यायालय की अक्षमता साबित की जा सकेगी

45- विशेषज्ञों की रायें

45A- इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य में परीक्षक की राय

46- विशेषज्ञों की रायों से सम्बन्धित तथ्य

47- हस्तलेख के बारे में राय कब सुसंगत है

47A- इलेक्ट्रानिक हस्ताक्षर के बारे में राय कहाँ सुसंगत है

48- अधिकार या रूढ़ि के अस्तित्व के बारे में रायें कब सुसंगत हैं

49- प्रथाओं, सिद्धान्तों आदि के बारे में रायें कब सुसंगत हैं

50- नातेदारी के बारे में राय कब सुसंगत है

51- राय के आधार कब सुसंगत हैं

52- सिविल मामलों में अध्यारोपित आचरण साबित करने के लिए शील विसंगत है

53- दाण्डिक मामलों में पूर्वतन अच्छा शील सुसंगत है

53A- शील या पूर्व लैगिंक अनुभव का साक्ष्य कतिपय मामलों में सुसंगत नहीं

54- उत्तर में होने के सिवाय पूर्वतन बुरा शील सुसंगत नहीं है

55- नुकसानी पर प्रभाव डालने वाला शील

अध्याय-3

56- न्यायिक रूप से अवेक्षणीय तथ्य साबित करना आवश्यक नहीं है

57- वे तथ्य, जिनकी न्यायिक अवेक्षा न्यायालय को करनी होगी

58- स्वीकृत तथ्यों को साबित करना आवश्यक नहीं है

अध्याय-4

59- मौखिक साक्ष्य द्वारा तथ्यों का साबित किया जाना

60- मौखिक साक्ष्य प्रत्यक्ष होना चाहिए

अध्याय-5

61- दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु का सबूत

62- प्राथमिक साक्ष्य

63- द्वितीयिक साक्ष्य

64- दस्तावेजों का प्राथमिक साक्ष्य द्वारा साबित किया जाना

65- अवस्थाएं जिनमें दस्तावेजों के सम्बन्ध मे व्दितीयिक साक्ष्य दिया जा सकेगा

65A- इलेक्ट्रानिक अभिलेख से सम्बन्धित साक्ष्य के बारे मे विशेष प्रावधान

65B- इलेक्ट्रानिक अभिलेखों की ग्राह्ता

66- पेश करने की सूचना के बारे में नियम

67- जिस व्यक्ति के बारे में अभिकथित है कि उसने पेश की गई दस्तावेज को हस्ताक्षरित किया था या लिखा था उस व्यक्ति के हस्ताक्षर या हस्तलेख का साबित किया जाना

67A- इलेक्ट्रानिक हस्ताक्षर के बारे मे सबूत

68- ऐसी दस्तावेज के निष्पादन का साबित किया जाना जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित है

69- जब किसी भी अनुप्रमाणक साक्षी का पता न चले, तब सबूत

70- अनुप्रमाणित दस्तावेज के पक्षकार द्वारा निष्पादन की स्वीकृति

71- मौखिक साक्ष्य द्वारा तथ्यों का साबित किया जाना

72- उस दस्तावेज का साबित किया जाना जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित नहीं है

73- हस्ताक्षर, लेख, या मुद्रा की तुलना अन्यों से जो स्वीकृत या साबित हैं

73A- अंकीय हस्ताक्षर के सत्यापन के बारे में सबूत

74- लोक दस्तावेजें

75- प्राइवेट दस्तावेज

76- लोक दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियाँ

77- प्रमाणित प्रतियों के पेश करने द्वारा दस्तावेजों का सबूत

78- अन्य शासकीय दस्तावेजों का सबूत

79- प्रमाणित प्रतियों के असली होने के बारे में उपधारणा

80- साक्ष्य के अभिलेख के तौर पर पेश की गई दस्तावेजों के बारे में उपधारणा

81- राजपत्रों, समाचार-पत्रों, पार्लमेंट के प्राइवेट ऐक्टों और अन्य दस्तावेजों के बारे में उपधारणाएं

81A- इलेक्ट्रानिक रूप में राजपत्रों के बारे में उपधारणा

82- मुद्रा या हस्ताक्षर के सबूत के बिना इंग्लैण्ड में ग्राह्य दस्तावेज के बारे में उपधारणा

83- सरकार के प्राधिकार द्वारा बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों के बारे में उपधारणा

84- विधियों के संग्रह और विनिश्चयों की रिपोर्टों के बारे में उपधारणा

85- मुख्तारनामों के बारे में उपधारणा

85A- इलेक्ट्रानिक करार के बारे में उपधारणा

85B- इलेक्ट्रानिक अभिलेखों और इलेक्ट्रानिक हस्ताक्षर के बारे में उपधारणा

85C- इलेक्ट्रानिक हस्ताक्षर प्रमाणपत्र के बारे में उपधारणा

86- विदेशी न्यायिक अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियों के बारे में उपधारणा

87- पुस्तकों, मानचित्रों और चार्टों के बारे में उपधारणा

88- तार सन्देशों के बारे में उपधारणा

88A- इलेक्ट्रानिक सन्देश के बारे में उपधारणा

89- पेश न की गई दस्तावेजों के सम्यक् निष्पादन आदि के बारे में उपधारणा

90- तीस वर्ष पुरानी दस्तावेज के बारे में उपधारणा

90A- पाँच वर्षीय पुराने इलेक्ट्रानिक अभिलेख के बारे में उपधारणा

अध्याय-6

91- दस्तावेजों के रूप में लेखबद्ध संविदाओं, अनुदानों तथा सम्पत्ति के अन्य व्ययनों के निबन्धनों का साक्ष्य

92- मौखिक करार के साक्ष्य का अपवर्जन

93- संदिग्धार्थ दस्तावेज को स्पष्ट करने या उसका संशोधन करने के साक्ष्य का अपवर्जन

94- विद्यमान तथ्यों को दस्तावेज के लागू होने के विरुद्ध साक्ष्य का अपवर्जन

95- विद्यमान तथ्यों के संदर्भ में अर्थहीन दस्तावेज के बारे में साक्ष्य

96- उस भाषा के लागू होने के बारे में साक्ष्य जो कई व्यक्तियों में से केवल एक को लागू हो सकती है

97- तथ्यों के दो संवर्गों में से, जिनमें से किसी एक को भी वह भाषा पूरी की पूरी ठीक-ठीक लागू नहीं होती, उसमें से एक को भाषा के लागू होने के बारे में साक्ष्य

98- न पढ़ी जा सकने वाली लिपि आदि के अर्थ के बारे में साक्ष्य

99- दस्तावेज के निबन्धनों में फेरफार करने वाले करार का साक्ष्य कौन दे सकेगा

100- भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के विल सम्बन्धी उपबन्धों की व्यावृत्ति

अध्याय-7

101- सबूत का भार

102- सबूत का भार किस पर होता है

103- विशिष्ट तथ्य के बारे में सबूत का भार

104- साक्ष्य को ग्राह्य बनाने के लिए जो तथ्य साबित किया जाना हो, उसे साबित करने का भार

105- यह साबित करने का भार कि अभियुक्त का मामला अपवादों के अन्तर्गत आता है

106- विशेषतः ज्ञात तथ्य को साबित करने का भार

107- उस व्यक्ति की मृत्यु साबित करने का भार जिसका तीस वर्ष के भीतर जीवित होना ज्ञात है

108- यह साबित करने का भार कि वह व्यक्ति, जिसके बारे में सात वर्ष से कुछ सुना नहीं गया है, जीवित है

109- भागीदारों, भू-स्वामी और अभिधारी, मालिक और अभिकर्ता के मामलों में सबूत का भार

110- स्वामित्व के बारे में सबूत का भार

111- उन संव्यवहारों में सद्भाव का साबित किया जाना जिनमें एक पक्षकार का सम्बन्ध सक्रिय विश्वास का है

111A- कुछ अपराधों के बारे मे उपधारणा

112- विवाहित स्थिति के दौरान में जन्म होना धर्मजत्व का निश्चायक सबूत है

113- राज्यक्षेत्र के अध्यर्पण का सबूत

113A- किसी विवाहित स्त्री द्वारा आत्महत्या के दुष्प्रेरण के बारे में उपधारणा

113B- दहेज मृत्यु के बारे में उपधारणा

114- न्यायालय किन्हीं तथ्यों का अस्तित्व उपधारित कर सकेगा

114A- लैंगिक हमला के लिये कतिपय अभियोजन में सम्मति न होने की उपधारणा

114B- भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 509, धारा 509क या धारा 509ख के अधीन कारित अपराधों के संबंध में उपधारणा

अध्याय-8

115- विबन्ध

116- अभिधारी का और कब्जाधारी व्यक्ति के अनुज्ञप्तिधारी का विबन्ध

117- विनिमय-पत्र के प्रतिगृहीता का, उपनिहिती का या अनुज्ञप्तिधारी का विबन्ध

अध्याय-9

118- कौन साक्ष्य दे सकेगा

119- साक्षी, जो मौखिक रूप से संसूचना देने में असमर्थ है

120- सिविल वाद के पक्षकार और उनकी पत्नियाँ या पति। दांडिक विचारण के अधीन व्यक्ति का पति या पत्नी

121- न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट

122- विवाहित स्थिति के दौरान में की गई संसूचनाएँ

123- राज्य का कार्यकलापों के बारे में साक्ष्य

124- शासकीय संसूचनाएँ

125- अपराधों के करने के बारे में जानकारी

126- वृत्तिक संसूचनाएँ

127- धारा 126 दुभाषियों आदि को लागू होगी

128- साक्ष्य देने के लिए स्वयंमेव उद्यत होने से विशेषाधिकार अभित्यक्त नहीं हो जाता

129- विधि सलाहकारों से गोपनीय संसूचनाएँ

130- जो साक्षी पक्षकार नहीं है, उसके हक-विलेखों का पेश किया जाना

131- उन दस्तावेजों या इलेक्ट्रानिक अभिलेखों का पेश किया जाना, जिन्हें कोई दूसरा व्यक्ति, जिसका उन पर कब्जा है, पेश करने से इंकार कर सकता था

132- इस आधार पर कि उत्तर उसे अपराध में फँसाएगा, साक्षी उत्तर देने से क्षम्य न होगा

133- सहअपराधी

134- साक्षियों की संख्या

अध्याय- 10

135- साक्षियों के पेशकरण और उनकी परीक्षा का क्रम

136- न्यायाधीश साक्ष्य की गाह्यता के बारे में निश्चय करेगा

137- मुख्य परीक्षा

138- परीक्षाओं का क्रम

139- किसी दस्तावेज को पेश करने के लिए समनित व्यक्ति की प्रतिपरीक्षा

140- शील का साक्ष्य देने वाले साक्षी

141- सूचक प्रश्न

142- उन्हें कब नहीं पूछना चाहिए

143- उन्हें कब पूछा जा सकेगा

144- लेखबद्ध विषयों के बारे में साक्ष्य

145- पूर्वतन लेखबद्ध कथनों के बारे में प्रतिपरीक्षा

146- प्रतिपरीक्षा में विधिपूर्ण प्रश्न

147- साक्षी को उत्तर देने के लिए कब विवश किया जाए

148- न्यायालय विनिश्चित करेगा कि कब प्रश्न पूछा जायेगा और साक्षी को उत्तर देने के लिये कब विवश किया जायेगा

149- युक्तियुक्त आधारों के बिना प्रश्न न पूछा जायेगा

150- युक्तियुक्त आधारों के बिना प्रश्न पूछे जाने की अवस्था में न्यायालय की प्रक्रिया

151- अशिष्ट और कलंकात्मक प्रश्न

152- अपमानित या क्षुब्ध करने के लिए आशयित प्रश्न

153- सत्यवादिता परखने के प्रश्नों के उत्तरों का खण्डन करने के लिए साक्ष्य का अपवर्जन

154- पक्षकार द्वारा अपने ही साक्षी से प्रश्न

155- साक्षी की विश्वसनीयता पर अधिक्षेप

156- सुसंगत तथ्य के साक्ष्य की सम्पुष्टि करने की प्रवृत्ति रखने वाले प्रश्न ग्राह्य होंगे

157- उसी तथ्य के बारे में पश्चात्वर्ती अभिसाक्ष्य की सम्पुष्टि करने के लिए साक्षी के पूर्वतन कथन साबित किए जा सकेंगे

158- साबित कथन के बारे में, जो कथन धारा 32 या 33 के अधीन सुसंगत है, कौन-सी बातें साबित की जा सकेंगी

159- स्मृति ताजी करना एवं साक्षी स्मृति ताजी करने के लिए दस्तावेज की प्रतिलिपि का उपयोग कब कर सकेगा

160- धारा 159 में वर्णित दस्तावेज में कथित तथ्यों के लिए परिसाक्ष्य

161- स्मृति ताजी करने के लिए प्रयुक्त लेख के बारे में प्रतिपक्षी का अधिकार

162- दस्तावेजों का पेश किया जाना

163- मंगाई गई और सूचना पर पेश की गई दस्तावेज का साक्ष्य के रूप में दिया जाना

164- सूचना पाने पर जिस दस्तावेज के पेश करने से इंकार कर दिया गया है उसको साक्ष्य के रूप में उपयोग में लाना

165- प्रश्न करने या पेश करने का आदेश देने की न्यायाधीश की शक्ति

166- जूरी या असेसरों की प्रश्न करने की शक्ति

167- साक्ष्य के अनुचित ग्रहण या अग्रहण के लिए नवीन विचारण नहीं होगा

हमारा प्रयास भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की समस्त धाराओ की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 167 | साक्ष्य के अनुचित ग्रहण या अग्रहण के लिए नवीन विचारण नहीं होगा | Indian Evidence Act Section- 167 in hindi| No new trial for improper admission or rejection of evidence.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 167 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 167, साथ ही क्या बतलाती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 167 का विवरण

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 167 के अन्तर्गत साक्ष्य का अनुचित ग्रहण या अग्रहण स्वयमेव किसी भी मामले में नवीन विचारण के लिए या किसी विनिश्चय के उलटे जाने के लिए आधार नहीं होगा, यदि उस न्यायालय को, जिसके समक्ष ऐसा आक्षेप उठाया गया है, यह प्रतीत हो कि आक्षिप्त और गृहीत उस साक्ष्य के बिना भी विनिश्चय के न्यायोचित ठहराने के लिये यथेष्ट साक्ष्य था अथवा यह कि यदि अगृहीत साक्ष्य लिया भी गया होता, तो उससे विनिश्चय में फेरफार न होना चाहिये था।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 167 के अनुसार

साक्ष्य के अनुचित ग्रहण या अग्रहण के लिए नवीन विचारण नहीं होगा-

साक्ष्य का अनुचित ग्रहण या अग्रहण स्वयमेव किसी भी मामले में नवीन विचारण के लिए या किसी विनिश्चय के उलटे जाने के लिए आधार नहीं होगा, यदि उस न्यायालय को, जिसके समक्ष ऐसा आक्षेप उठाया गया है, यह प्रतीत हो कि आक्षिप्त और गृहीत उस साक्ष्य के बिना भी विनिश्चय के न्यायोचित ठहराने के लिये यथेष्ट साक्ष्य था अथवा यह कि यदि अगृहीत साक्ष्य लिया भी गया होता, तो उससे विनिश्चय में फेरफार न होना चाहिये था।

No new trial for improper admission or rejection of evidence-
The improper admission or rejection of evidence shall not be ground of itself for a new trial or reversal of any decision in any case, if it shall appear to the Court before which such objection is raised that, independently of the evidence objected to and admitted, there was sufficient evidence to justify the decision, or that, if the rejected evidence had been received, it ought not to have varied the decision.

हमारा प्रयास भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 167 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, उम्मीद है कि उपरोक्त लेख से आपको संतुष्ट जानकारी प्राप्त हुई होगी, फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 166 | जूरी या असेसरों की प्रश्न करने की शक्ति | Indian Evidence Act Section- 166 in hindi| Power of jury or assessors to put questions.

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 166 के बारे में पूर्ण जानकारी देंगे। क्या कहती है भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 166, साथ ही क्या बतलाती है, यह भी इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

धारा 166 का विवरण

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 166 के अन्तर्गत जूरी द्वारा या असेसरों की सहायता से विचारित मामलों में जूरी या असेसर साक्षियों से कोई भी ऐसे प्रश्न न्यायाधीश के माध्यम से या इजाजत से कर सकेंगे, जिन्हें न्यायाधीश स्वयं कर सकता हो और जिन्हें वह उचित समझे।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 166 के अनुसार

जूरी या असेसरों की प्रश्न करने की शक्ति–

जूरी द्वारा या असेसरों की सहायता से विचारित मामलों में जूरी या असेसर साक्षियों से कोई भी ऐसे प्रश्न न्यायाधीश के माध्यम से या इजाजत से कर सकेंगे, जिन्हें न्यायाधीश स्वयं कर सकता हो और जिन्हें वह उचित समझे।

Power of jury or assessors to put questions-
In cases tried by jury or with assessors, the jury or assessors may put any questions to the witnesses, through or by leave of the judge, which the judge himself might put and which he considers proper.

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